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Hindi Section ( 31 Oct 2012, NewAgeIslam.Com)

Shariat and Wisdom Both against Forced Marriage शरीयत और अक़्ल दोनों जबरन शादी के खिलाफ हैं

 

 

 

 

 

 असद मुफ्ती

1 नवम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

पिछले हफ्ते जियो चैनल पर जंग फोरम लंदन का जबरन शादियों के बारे में एक विशेष कार्यक्रम देखने का इत्तेफाक़ हुआ। यूके में रहने वाले एशियाई समुदाय में जबरन, बे-जोड़ और सहूलत की शादी की समस्या बढ़ती ही जा रही है या बढ़ गयी है, इस बात का खुलासा इस विशेष टीवी कार्यक्रम में बखूबी किया गया। मेरे हिसाब से ये एक पूरे यूरोप भर का 'शो था, जिसे स्कॉटलैंड के शहर डंडी में रिकार्ड किया गया था, और ये कि स्कॉटलैंड में जबरन शादियों को आपराध करार दिया गया है और ऐसा कराने वाले माता पिता,  नज़दीकी रिश्तेदारों या संरक्षकों को दो साल तक की सजा दी जा सकती है। ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के एशियाई समुदाय में जबरन और बे-जोड़ शादियों के साढ़े तीन सौ मामले दर्ज हुआ हैं, जिनमें पचास फीसद शादियां जबरन या बे-जोड़ शादियों की श्रेणी में आती हैं। इस तरह की स्थिति से जोड़े के अलावा न केवल उनके परिवार, बल्कि जातीय संबंध भी प्रभावित होते हैं। कौंसिल की रिपोर्ट में बताया गया है कि 88 प्रतिशत शादियों में पक्ष का संबंध 'विदेश' से होता है। 79 फीसद शादियां मुआवजा, बे-जोड़ और हितों पर आधारित होती हैं (जिन्हें सहूलत की शादी भी कहा जाता है) जबकि 21 फीसद विशुद्ध रूप से जबरन थीं। शादी करने वाली महिलाओं का अनुपात 62 प्रतिशत और मर्दों का अनुपात 38 प्रतिशत था, जबकि 35 प्रतिशत को बुरे व्यवहार का सामना करना पड़ा। जबरन शादी के लिए मजबूर किए जाने वाली महिलाओं की उम्र सोलह से बीस साल के बीच थी। यही कारण है कि ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड में मर्ज़ी के खिलाफ जबरदस्ती शादियों के कारण कुछ लड़कियां आत्महत्या तक कर बैठती हैं और ये बात आपके ध्यान में लाना मेरे लिए बेहद जरूरी है कि आत्महत्या की दर एशियाई लड़कियों में अन्य महिलाओं की तुलना में तीन गुना अधिक है। यही कारण है कि सरकार एक नए कानून को देश में लागू कर दिया है, जिससे उन लोगों के खिलाफ यौन अपराध, अपहरण और जबरदस्ती करने के कामूम का मुकदमा चलाया जा सकेगा जिन पर ज़बरदस्ती या जबरन शादी का आरोप साबित हो जाएगा। आने वाले समय में इंग्लैंड में रहने पाकिस्तानी, भारतीय और दूसरे एशियाई माता पिता अपने बच्चों की जबरन शादी कराने पर अब कड़ी सजा का सामना करने के लिए तैयार रहें।

प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के हवाले से भी खबर आ चुकी है। उन्होंने वादा किया है कि सरकार जबरन और बोगस शादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। इसके अलावा उप प्रधानमंत्री ने भी यूरोपीय संवाददाताओं से बातचीत करते हुए फिर कहा है कि संगठित गिरोह बोगस शादियां और सहूलत की शादियां करवा के भारी रक़म बटोर रहे हैं। मेरे अनुसार ये भी जबरन शादियों जैसा अपराध है और ऐसी शादी के लिए किसी भी एशियाई देश से आने वाले को ब्रिटेन में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी, इसलिए कानून के तहत किसी एशियाई माता पिता के लिए ये संभव नहीं होगा कि वो अपने बेटे या बेटी या भाई बहन की शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कर सके। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में सालाना बारह शादियां माता पिता की इच्छा (अरेंज) से होती हैं, जिनमें अधिकांश लड़कियां शामिल हैं, लेकिन अब आइंदा ऐसा नहीं हो सकेगा। मेरे हिसाब से जबरन शादी न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि ये अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मान्यता प्राप्त संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार चार्टर और मानदंड का भी उल्लंघन है, न ही धर्म या संस्कृति के संदर्भ से इसका औचित्य पेश किया जा सकता है। हमारी तुलना में भारतीय समुदाय में हालांकि इस तरह की बे-जोड़ और जबरन शादियों के उदाहरण बहुत कम हैं, लेकिन पूरे उपमहाद्वीप में इसका रिवाज है, जो धार्मिक नेता शादी जैसे सुखद मौके को परिवार की समझ के ऊपर छोड़ने के पक्ष में हैं, मेरे हिसाब से वो धर्म की वास्तविकता को नहीं समझते, लेकिन खुदा के करीब होने का दावा करते हैं। इस्लाम का दृष्टिकोण कानून, शादी और तलाक में पूरी तरह स्पष्ट है। जिस तरह इस्लाम का मतलब अमन और सलामती है उसी तरह शादी का मतलब खुशी और सुकून और राहत है। इस्लाम में शादी का मकसद ये है कि आत्मा को संतोष हो, दिल को राहत मिले, ज़मीर को करार हासिल हो और मर्द व औरत  प्यार, दया और सहानुभूति, समानता, समायोजन, आपसी सहयोग, आपसी मोहब्बत व मेहरबानी और एक दूसरे की खैरख्वाही के साथ जीवन गुजारें और ये तभी संभव हो सकता है जब दोनों पक्षों के बिना जब्र, बिना धौंस और धमकी और लालच के सौ फीसद रज़ामन्दी और मोहब्बत शामिल हो। जब इस्लाम में जब्र नहीं है तो इस्लामी शादी में जब्र कैसे उचित हो सकता है? इस्लाम ने औरत को जैसे और जितने भी अधिकार दिये हैं, उसमें पहली चीज़ अपने जोड़ीदार के चुनाव में उसकी पसंद और स्तर का ध्यान रखना और निकाह के समय सौ फीसद उसकी रज़ामन्दी है, जिसके बिना शादी नहीं हो सकती। यहाँ मैं रसूलुल्लाह के ज़माने की एक घटना पेश करना ज़रूरी समझता हूँ। एक व्यक्ति ने अपनी बेटी का निकाह एक मालदार व्यक्ति से कर दिया। लड़की उसको पसंद नहीं करती थी, उसने नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से पूछा कि मेरे पिता ने मेरी शादी अपने दौलतमंद भतीजे से कर दी है, ताकि मुझे फंसा कर अपनी विलासिता का मज़ी ले सके। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: तुमको ये शादी पसंद नहीं तो तू आज़ाद है। तो उस लड़की ने जवाब दिया: मेरे पिता ने जो कदम उठाया है, उसको मैं बहाल करती हूँ लेकिन मैं चाहती हूँ कि औरतों को ये मालूम हो जाये कि उनकी मर्ज़ी के खिलाफ माँ बाप को उनकी शादी का हक़ नहीं है। (मस्नद अहमद जिल्द 2 पेज 136)

इसी तरह जबरदस्ती के खिलाफ एक और ऐतिहासिक घटना पेश है। दौरे रिसालत में चूंकि महिलाएं मस्जिदों में जाया करती थीं, हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू को अपनी पत्नी हज़रत आतेका रज़ियल्लाहू अन्हा का मस्जिद जाना पसंद नहीं था, लेकिन हज़रत आतेका रज़ियल्लाहू अन्हू शरीयत की इस एक छूट का फायदा उठाना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपना तरीका नहीं छोड़ और हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू ने उस समय के खलीफा होने के बावजूद गवारा न किया कि उन्हें ज़बरदस्ती इससे वंचित करें। (बुखारी किताबुल उम्मा)

आख़िर में माँ बाप और मज़हबी रहनुमा जो जबरन शादियों (या कोई नाम दे लें) के कायल हैं, उनसे गुज़ारिश करूंगा कि वो इस्लाम के कानूनों को अपने हाथों में न लें और समाज को बिगाड़ने के लिए अपनी ऊर्जा खर्च करने से बचें कि यही उनके और समाज के पक्ष में बेहतर है:

इसलिए हैं अंधेरे ख़फ़ा ख़फ़ा हमसे

हम चिराग ज़िया बार करना चाहते हैं

1 नवम्बर, 2012 सधन्यवाद: रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली

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