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Hindi Section ( 26 Feb 2018, NewAgeIslam.Com)

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Women Leading Mixed Gender Prayers - Smashing Patriarchal Certainties औरतों और मर्दों की इमामत करने वाली औरतें - रूढ़ीवाद का अंत

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

जनवरी 29, 2018

इमाम जमीदा अध्यापिका ने एन डी टी वी (NDTV) को बताया कि “कुरआन बिलकुल स्पष्ट हैl पुरुष और महिला के बीच कोई अंतर नहीं हैl”

यह बात अब कोई ढकी छुपी नहीं रही कि मुसलमान महिलाएं नमाज़ की इमामत कर सकती हैंl ऐसे सबूत मौजूद हैं जिनसे इस बात की पुष्टि होती हैl लेकिन उनसे हमें यह पता चलता है कि वह केवल महिलाओं की जमाअत की इमामत करती थींl शायद ऐसी कोई जमाअत मौजूद नहीं थी कि जिसमें उनहोंने पुरुषो और महिलाओं दोनों की मिली जुली जमाअत की इमामत की होl मस्जिदों के अंदर महिलाओं के नमाज़ अदा करने की हालिया मिसाल अहमदाबाद में सामने आई है जहां यह स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि महिलाओं ने उनके लिए राहें साफ़ कर दी हैं: आमतौर पर महिलाओं के लिए आवंटित तहखाने के ऊपरl उनके लिए प्रवेश करने और निकलने के रास्ते अलग अलग थे और ख़याल यह था कि महिलाओं को मुसलमान पुरुष नमाज़ियों की नज़रों से दूर रहना चाहिएl

कुरआन में ऐसी कोई आयत नहीं है जिसमें महिलाओं के लिए मस्जिद में दाखिल होने या महिला पुरुष की जमाअत की इमामत करने की मनाही वारिद हुई होl दरअसल, बहुत सारे मुस्लिम देश ऐसे हैं जहां मुस्लिम महिलाएं मस्जिदों में प्रवेश कर सकती हैं और वह नमाज़ भी अदा कर सकती हैंl इसलिए, अब भी उनके लिए अब भी उनके लिए नमाज़ अदा करने की एक अलग जगह आवंटित होती है और महिला-पुरुष की नमाज़ जैसी कोई चीज अब भी अकाल्पनिक हैl दक्षिण एशिया में यह मसला आम है, जहां महिलाओं को मस्जिद के अंदर नमाज़ अदा करने की अनुमति नहीं हैl मस्जिदों की तो बात छोड़ें उनहें विभिन्न दरगाहों में जाने की इजाज़त भी नहीं हैl ज़रा इस विडंबना पर विचार करें: भुल्ले शाह नें अधिकतर इस्लाम महिलाओं की ही संगत में सिखा है और अब महिलाओं को ही उनकी दरगाह पर जाने की अनुमति नहीं हैl पाकिस्तान में पीर अब्बास के मज़ार का भी मामला यही है जहां कुत्तों को उनकी दरगाह पर हाज़िर होने की अनुमति नहीं है, जबकि जब वह जीवित थे तो आप हर समय पालतू कुत्तों से घिरे रहते थेl महिलाओं और कुत्तों दोनों के बारे में तक़द्दुस परस्ती की एक ही कल्पना है: उन दोनों को नापाक समझा जाता है इसलिए इन पवित्र स्थलों से अलग रखा जाना चाहिएl

चूँकि कुरआन इसके बारे में खामोश है और केवल हदीस में ही मस्जिदों और मजारों में महिलाओं के लिए अलग जगहों की बात की गई है, इसलिए पुरे इतिहास में ऐसे रुढ़िवादी शिक्षाओं की किताब पर समय समय पर प्रशन उठाए जाते रहे हैंl इसके खिलाफ सबसे पहले बगावत का झंडा उंचा करने वाली खुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पोती ही थींl सकीना ने अपना निकाहनामा खुद तैयार किया था ताकि उनका पति कभी दूसरी बीवी ना रख सके जो कि ऐसा कदम है जिससे हम एक मिसाली निकाहनामे पर अपनी मौजूदा बहस के बीच कुछ सीख सकते थेl सदियों पहले सकीना के इस एक्शन से हौसला पा कर एक मुस्लिम खातून ने मुस्लिम समाज के अंदर प्रचलित पुरुषों के प्रभाव को चैलेंज करने का प्रयास है कि जमीदा नें मल्लापुरम में एक मख्लूत (मर्द और औरत) की जमाअत की इमामत कीl ज़ाहिर है कि उनके इस एक्शन में उन ही की तरह प्रगतिशील मानसिकता के हामिल मुसलमान मर्दों और औरतों दोनों ने उनकी हिमायत की होगीl लेकिन पहला कदम उठाना हमेशा हिम्मत की बात होती है और केवल इस कारण से उनहें खराजे तहसीन पेश किया जाना चाहिएl अपने इस साहसिक कार्य के माद्ध्यम से उनहोंने आमिना वदूद और इसरार नोमानी की पैरवी की है जिन्होंने पश्चिमी दुनिया में ऐसी नमाज़ों की इमामत की हैl इबादत का यह सादा अमल दरअसल एक राजनीतिक विरोध है क्योंकि महिलाओं को किसी जमाअत की इमामत करने के मूल अधिकार से वंचित रखा गया है हालाँकि वह जमाअत में सबसे अधिक इल्म रखने वाली ही क्यों ना हों, उनहें केवल उनके लिंग की वजह से नमाज़ की इमामत करने से वंचित कर दिया गया हैl यह कहते हुए कि कुरआन में कहीं भी ऐसा कोई हुक्म नहीं, इन महिलाओं ने आगे बढ़ अपना प्रियतम ओहदा प्राप्त कर लिया है और वह मानती हैं कि यह उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण भाग हैl

हम ऐसे किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले कृपया फिर से सोचें कि यह पश्चिम से प्रभावित महिलाएं हैं जो किसी भी वास्तविक ज्ञान के बिना पश्चिम की अंधी तकलीद कर रही हैंl कि जमीदा एक हिन्दुस्तानी खातून हैं और मर्दों के प्रभुत्व को चैलेंज करने का साहस उनके अंदर अपने समाज के अंदर एक लम्बे संघर्ष के बाद पैदा हुई हैl और इसके पीछे एक सैद्धांतिक तहरीक भी काम करने वाला है कि जमीदा कुरआन व सुन्नत सोसाइटी से संबंध रखती हैं जो चिकानूर मौलवी के सिद्धांत पर काम कर रहा है जिनका 1993 में संदिग्ध स्तिथी में हत्या कर दि गयी थीl शायद चिकनूर मौलवी ऐसे सबसे पहले आलिम थे जिन्होंने शाहबानों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की हिमायत की थी और कहा था कि उसे नान व नफ्का दिया जाना चाहिएl उन्होंने कुरआन की राह में आने वाली सभी क्लासिकी किताबों को रद्द कर दिया और यहाँ तक कहा कि कुछ हदीसें मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बदनाम करने के लिए गढ़ी गई हैंl इस कारण उन्होंने अपने दृष्टिकोण के अनुसार अबू हुरैरा जैसे रिवायती रावियों की रिवायत को रद्द कर दिया था जिनके बारे में उनका मानना है कि वह ऐसी बहुत सारी बातों के लिए ज़िम्मेदार हैं जो कुरआन के अनुसार ग़लत हैंl उन्होंने कुरआन करीम की प्रचलित व्याख्या पर सवाल उठाए और इस तरह उनहोंने समाज में मौजूद बहुत सारे मसलों पर सवाल खड़े किएl इसलिए, इसमें कोई हैरत नहीं है कि एक दिन वह ‘गायब’ हो गए और कभी वापस नहीं आएl अगर उनके कामों की तरवीज और इशाअत इस बड़े पैमाने पर की जाए कि दुसरे लोग भी इससे लाभ उठा सकें तो यह उस आलिम के लिए बहुत बड़ी श्रद्धांजलि होगीl

उनकी वफात के बाद उनके अनुयाइयों ने कुरआन सुन्नत सोसाइटी स्थापित की और के जमीदा उसकी एक मेंबर हैंl इसलिए, वह किसी सैद्धांतिक निगाह्दाश्त के बिना नहीं हैंl उनका संबंध एक ऐसे सिद्धांत से है जिसने रुढ़िवादियों को इस बात पर बराँगीखतह किया कि वह  चिकानूर मौलवी को उनकी ज़िंदगी में अलग नामों से पुकारेंl आज जब उन्होंने मख्लूत जमाअत की इमामत करके एक क्रांतिकारी कारनामा अंजाम दिया है तो रुढ़िवादी एकजुट हैं कि यह एक मामूली घटना है और केरल की सोसाइटी पर इसका कोई असर नहीं हैl इस प्रकार उन्होंने कुरआन सुन्नत सोसाइटी को एक ऐसा फिरका बना दिया है जो दुनिया के किसी कोने में और जिसके मेंबर सीमित हैं और इस कारण से वह बड़ी समाजी मज़हबी साखत के लिए को खतरा नहीं हैंl उनहें याद रखना चाहिए कि सारे अंबिया और सारी सच्चाईयां सीमित थीं लेकिन आखिरकार उनहें फतह हासिल हुईl

जमीदा और उसके पैरुकारों में बढ़ोतरी हो!


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