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Hindi Section ( 10 May 2021, NewAgeIslam.Com)

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Why India Must Salute its Muslims भारत को अपने मुसलमानों को सलामी क्यों देना चाहिए?

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

२९ अप्रैल २०२१

मज़हबी निशाने पर होने के बावजूद, मुसलमान इन सख्त हालात में हर एक की बेलौस खिदमत कर रहे हैं

महत्वपूर्ण बिंदु:

१- कुछ समय पहले, उन्हें कोरोना जिहाद में लिप्त होने की हैसियत से बदनाम किया गया था। वायरस को फैलाने वाले मुसलमान हैं की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर गर्दिश किया जा रहा था।

इन सबके बावजूद, मुसलमान ज़ात पात और नस्ल से परे हर किसी की मदद करने की पुरी कोशिश कर रहे हैं।

गहरी नजर रखने वाले उन मुसलमानों के लिए, इस्लाम इंसानियत की खिदमत के बारे में है, चाहे वह इंसान किसी भी धर्म और अकीदे से जुड़ा हो।

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कोविड १९ की दूसरी लहर ने वास्तव में देश को सख्त नुक्सान पहुंचाया है। ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब हम अपने किसी रिश्तेदार या दोस्त के वायरस के शिकार होने की खबर नहीं सुनते हैं। वायरस से लड़ना एक बात है, लेकिन सेहत का बुनियादी ढांचा, एक और बात है। आक्सीजन की अनुपलब्धता के कारण ऐसे मरीजों की तकलीफ देने वाली कहानियां हैं जिन्हें हस्पताल के बेडों से महरूम रखा गया या मुनासिब आक्सीजन की कमी की वजह से सांस के लिए हांप रहे हैं। अगर सरकार लोगों की जिंदगियों के बारे में हस्सास होती तो ऐसी बहुत सारी मौतों को रोका जा सकता था।

चूँकि सरकार को सिस्टम से बदलना फैशन बन गया है, इसलिए हम यह कहें कि इस सिस्टम के पास इस घटना की पहले से समझ नहीं थी। कुछ तो इसकी आत्मविश्वास और तकब्बुर का नतीजा था बुद्धिजीवियों की तरफ से दी जाने वाली चेतावनी पर भी ध्यान नहीं दिया गया। बल्की इससे भी बुरा यह हुआ कि उन लोगों ही का मज़ाक बनाया गया। दलील यह दी गई थी सब कुछ काबू में है। और जो व्यक्ति भी इस बात से मुत्तफिक नहीं हुआ, उसे भारत विरोधी करार दिया गया और इसके नतीजे में वह मुआवजा हासिल करने वाले ट्रोलों (paidtrolls) के हमले की ज़द में आ गए। आज हकीकत स्पष्ट हो चुकी है और हमारे अन्दर यह कड़वा एहसास पैदा हो चुका है कि सेहत का निजाम ख़त्म नहीं हुआ बल्कि उसे केवल बे नकाब कर दिया गया है।

इस विकट स्थिति में, हम कुछ ऐसी खबरें भी देख रहे हैं, जो हमारी आत्माओं को मजबूत करती हैं और एक आम मानवता में हमारे आत्मविश्वास को मजबूत करती हैं। अल्पसंख्यक, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लोग, जाति या पंथ की परवाह किए बिना, हर किसी की मदद करने में लगे हुए हैं। रमजान के पवित्र महीने में पूरे दिन उपवास करने पर यह वास्तव में अधिकांश मुसलमानों के लिए एक मुश्किल समय होता है। कोरोना वायरस अब पहले से ज्यादा घातक है। खुले मैदान में अपनी जान जोखिम में डालकर जरूरतमंदों की मदद करने के लिए एक खास तरह के साहस और मानवीय मूल्यों के साथ दृढ़ संकल्प की जरूरत है। बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने देखभाल और सहायता की पेशकश की। मुसलमान विशेष रूप से सलाम के लायक हैं क्योंकि वे रमजान के इस महीने के दौरान भूखे-प्यासे रहने पर भी दूसरों की सेवा के लिए उपलब्ध हैं। यह सब देखकर, जो व्यक्ति आज इसे स्वीकार नहीं करता है, तो समझें कि वह व्यक्ति अपनी मानवता या परोपकार से वंचित है।

मेरे कहने का थोड़ा भी यह उद्देश्य नहीं कि केवल अल्पसंख्या में रहने वाले लोग ही जरूरत मंदों की सहायता करने की कोशिश में अपनी जान को खतरे में डाल रहे हैं। सारे मज़हबी परम्पराओं से संबंध रखने वाले नेक नियत लोग सीधे या किसी वास्ते से लोगों की मदद के लिए जो कुछ कर सकते हैं वह कर रहे हैं। और इस तरह की तमाम कोशिशों को ख़ास तौर पर सराहा जाना चाहिए ख़ास तौर पर उस वक्त जब ‘सिस्टम’ लगभग विफल हो चुका है। तथापि जब बात अल्पसंख्यकों की होती है तो राज्य से वाहिद गुफ्तगू जो हम उनके बारे में सुनते हैं वह इंजमाम के मामले में है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय समाज में कम मरबूत समझा जाता है और इसी वजह से वह खुसूसी पालिसियों का निशाना हैं। जारी वबाई रोगों ने यह साबित कर दिया है कि इस देश में कोई भी इस देश की मज़हबी अल्पसंख्यकों से अधिक मरबूत नहीं है। बावजूद यह कि उन्हें बातिल करार दिया गया, उनका तंज़ किया गया और उन्हें मुजरिम करार दिया गया लेकिन फिर भी उनकी तरफ से साथी शहरियों के लिए की जाने वाली बेलौस खिदमत का केवल यही मतलब हो सकता है कि वह एकता और दूसरों से मजबूत रिश्ता रखने के मामले में एक या दो सबक अवश्य सिखा सकते हैं। वह लोग जो उनके इस इरादे पर असर अंदाज़ होते हैं वही हकीकत में इस देश अजनबी रूहें हैं।

अल्पसंख्यक भी दशकों से घृणा और व्यवस्थित भेदभाव का लक्ष्य रहे हैं। एक समय था जब सिखों को आतंकवादी माना जाता था जब तक कि वे इसके विपरीत साबित नहीं होते। अब यह मुसलमान हैं जो अक्सर सत्ता में रहने वालों द्वारा छेड़े जा रहे खतरनाक अभियान का सामना करते हैं। बहुत पहले नहीं, कोरोना जिहाद में शामिल होने के लिए मुसलमानों को अपमानित किया गया था। दक्षिणपंथी हिंदू सोशल मीडिया पर मुसलमानों की तस्वीरें फैला रहे थे, जिसमें दावा किया गया था कि कोरोनोवायरस फैलाने के लिए मुसलमान जिम्मेदार थे। मुसलमान यह नहीं भूल पाए हैं कि छह महीने पहले उन्होंने किन कठिनाइयों का सामना किया था। और वे यह नहीं भूल पाए हैं कि हाल के दिल्ली दंगों में उनके साथ क्या हुआ था। वह यह नहीं भूलते थे कि उनके कई साथी मुस्लिम कठोर आरोपों में कैद थे। वह डॉ० कफील के मामले को नहीं भूले हैं, जो इस तथ्य के बावजूद कैद थे कि उनकी गवाही ने साबित कर दिया कि वह लोगों की जान बचा रहे हैं। संक्षेप में, वह यह नहीं भूले हैं कि इस देश में मुसलमान केवल इसी कारण से पीड़ित हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं।

Self-made billionaire Pyare Khan (India Today photo)

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फिर भी, इस सब बातों को छोड़ कर, मुसलमान ना केवल अपनी बिरादरी के लोगों की खिदमत कर रहे हैं बल्कि जरुरत मंद किसी भी बिरादरी का हो, जो भी उनकी मदद मांगते हैं वह उनकी मदद कर रहे हैं। मुसलमानों की इस गैर मामूली हिम्मत, हमदर्दी और कुर्बानी को आने वाले लम्बे समय तक याद रखना चाहिए।

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नागपुर के प्यारे खान का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है जिन्होंने विभिन्न अस्पतालों को आवश्यक ऑक्सीजन प्रदान करने के लिए लगभग 500,000 रुपये खर्च किए। ऐसे व्यक्तियों के समूह भी हैं जो स्वेच्छा से शवों का दाह संस्कार कर रहे हैं जिनके पास कोई नहीं है या उनके परिवारों और रिश्तेदारों द्वारा छोड़ दिया गया है। मथुरा, मुज़फ्फरनगर, इंदौर, दिल्ली और अन्य जगहों पर, ऐसे व्यक्ति और समूह अपने जीवन की रक्षा के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं। संस्थागत रूप से, मुसलमानों ने अपनी कई मस्जिदों को कोविड उपचार केंद्रों में बदल दिया है, जिससे सभी धर्मों के लोगों को इन सुविधाओं का उपयोग करने की पूरी आजादी है। कुछ समय पहले, यही मुस्लिम थे जो अपनी उपस्थिति के कारण नापसंद थे। लेकिन इसके बावजूद, वे एक ही पोशाक और एक ही शैली के साथ मानवता की सेवा करना जारी रखते हैं। आज, जो लोग उन्हें उनके कपड़ों से जानते थे और समाज का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करते थे, उन्हें शर्म से सिर झुकाना चाहिए।

इस्लाम के विद्वानो की एक नई नस्ल, जो अधिकतर सोशल मीडिया पर है, जो यह सोचते हैं कि एक मुसलमान गैर मुस्लिम के लिए जो भी करता है वह यातो उसे परिवर्तित करने या तबाह करने के लिए। बेशतर दाएं बाजू के हिन्दू, जो मुसलमानों के लिए नफरत रखने की वजह से मशहूर हुए हैं। उन्हें आज इस तरह की तरक्की पर बहुत मायूस होना चाहिए। इसी तरह तीसरे दर्जे वाले मुल्ला भी मायूस होंगे जिन्होंने एक लम्बे समय से यह तबलीग की थी कि किसी मुसलमान को गैर मुस्लिमों के साथ कोई एकता नहीं करना चाहिए। इन दोनों प्रकार के लोगों के लिए, ‘वास्तविक’ मुसलमान वह हैं जो केवल दुसरे मुसलमानों की मदद करते हैं और हर एक को उनके दायरे से बाहर करते हैं।

तथापि जो मुसलमान दूसरों की बेलौस मदद कर रहे हैं वह गहरी नजर रखने वाले हैं। साथी इंसानों की मदद के लिए उनका यह अज्म और हौसला जिस जगह से आता है वह है इस्लाम की उनकी अपनी समझ और अपनी तशरीह। उनके लिए इस्लाम पुरी तरह इंसानों की खिदमत के बारे में है, चाहे वह इंसान किसी भी धर्म या अकीदे से जुड़ा हो। यह इस्लाम अपने बेहतरीन मुकाम पर है और वह मुसलमान जो इस नजरिये के पाबंद हैं वह इसके बेहतरीन सफीर हैं।

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