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Critiquing Islam: Mahmoud Taha And The Second Message Of Islam; Makkan Verses Of Peace Versus Madinan Verses Of War इस्लाम पर एक आलोचनात्मक समीक्षा: महमूद ताहा और इस्लाम का अंतिम संदेश, शांतिपूर्ण मक्की आयतें बनाम युद्ध वाली मदनी आयतें

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

उर्दू से अनुवाद, न्यू एज इस्लाम

28 जून 2021

शांतिपूर्ण प्रोत्साहन और आन्दोलन और मानवीय समानता की शिक्षा देने वाली मक्की आयतें इस्लाम के असल उद्देश्य और संदेश को व्यक्त करते हैं

महत्वपूर्ण बिंदु:

* पारम्परिक कुरआन के मुफ़स्सेरीन मक्की आयतों को जंग के समय में नाज़िल होने वाली मदनी आयतों से मंसूख मानते हैं

* इस गलत सिद्धांत पर आधारित शरीअत की कल्पना महिलाओं और गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार की अभिव्यक्ति होगी। यह इस्लाम के आधारभूत शिक्षाओं के बिलकुल खिलाफ है

* मुसलमानों के लिए अनिवार्य है कि झूठी कल्पना को रद्द करें और मक्की आयतों को इस्लाम का मार्गदर्शक सिद्धांत मानें

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Hamed Abdel Samad a German-Egyptian political scientist and author.

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अधिकांश धार्मिक पुस्तकों की तरहकुरआन में आयतें हैं जो शांतिसहिष्णुता और बहुलवाद को बढ़ावा देते हैंलेकिन दूसरी जगहों पर यह मोमिनों को काफिरों को मारने के लिए कहता है। मुसलमान सदियों से इस अंतर्विरोध से जूझते रहे हैं। प्रारंभिक मुफ़स्सेरीन ने इस विरोधाभास का खंडन किया कि कुरआन के बाद की आयतों ने इन प्रारंभिक आयतों को अमान्य कर दिया। चूँकि ये आयतेंजो आम तौर पर शांति और अहिंसा की बात करती हैंपहली बार मक्का में नाज़िल हुई थींउन्हें युद्ध की शिक्षाओं से युक्त आयतों द्वारा निरस्त कर दिया गया था जो बाद में मदीना में नाज़िल हुए थे। किसी भी समस्या को हल करने के बजायनस्ख (मंसूख) के इस सिद्धांत ने एक ऐसे इस्लाम का परिचय दिया जो सर्वोच्चता का अग्रदूत बन गया। उन्होंने मुसलमानों को केवल अपने धर्म के लोगों के साथ सहिष्णुता की शिक्षा दी। यह विचारधारा विशेष रूप से परेशान कर रही है जब एक बहु-धार्मिक समाज में कुरआन का पाठ किया जा रहा है। कुरान का पारंपरिक अध्ययन किसी भी बहुसांस्कृतिक समाज में विभिन्न समुदायों के अंतर्संबंधों को सीधे प्रभावित करता है।

सूडान के उसी बहु-धार्मिक संदर्भ मेंमहमूद मुहम्मद ताहा (1985-1909) ने कुरआन की मौलिक रूप से नई व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया। वही के नुज़ूल के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुएउन्होंने यह स्टैंड ग्रहण कियालेकिन मक्की आयतजो शांतिप्रोत्साहन और मानवीय समानता सिखाते हैंइस्लाम के वास्तविक उद्देश्य और संदेश को व्यक्त करते हैं। बाद के मदनी छंद एक विशेष स्थिति में नाज़िल हुएइसलिए उनका संदेश अस्थायी था। मदीना में मुसलमान खुद को एक धार्मिक समुदाय के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। महमूद ताहा का मानना है कि वे स्थितियां अब मौजूद नहीं हैंइसलिए मुसलमानों को मक्का की आयतों की ओर लौटना चाहिए और उन्हें इस्लाम का हतमी और अंतिम संदेश मानना चाहिए। इसलिएइस्लाम के प्रारंभिक संदेश (मक्का में नाज़िल) इस्लाम के अंतिम संदेश हैं।

जैसा कि हम आगे अध्ययन करेंगेइस्लाम के हतमी और अंतिम संदेश के रूप में मक्की आयतों को स्वीकार करने पर जोर न केवल ऐतिहासिक तथ्यों की एक सच्ची तस्वीर देता है बल्कि शरीअत और उसके कार्यान्वयन और इस्लामी राज्य के गठन को समझने में भी मदद करता है। और इसकी कल्पना का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जानते हैं कि इस्लामी कानून उन आयतों पर आधारित है जो इस्लाम के दूसरे चरण में नाज़िल हुए थे जो मदीना में नाज़िल हुए थे। ताहा का कहना है कि इस स्तर पर खुदा पैगंबर के माध्यम से समाज की वास्तविक जरूरतों का उत्तर प्रदान कर रहे थे जो अपने ऐतिहासिक विकास के एक निश्चित चरण से गुजर रहा था। इसके लिएपिछले वही के कुछ पहलुओं को कानूनी दृष्टिकोण से निरस्त कर दिया गया थाहालांकि इसकी नैतिक वैधता बनी हुई थी। ताहा का तर्क है (और इसलिए पारंपरिक मुफ़स्सेरीन से मौलिक रूप से अलग है) कि नस्ख अंतिम नहीं थालेकिन वास्तव में एक अस्थायी स्थगन था। इस दृष्टिकोण को लेते हुएताहा का कहना है कि इस्लाम का संदेश हमेशा लिंग या धर्म के बावजूद मानव की पूर्ण स्वतंत्रता और समानता का संदेश था और रहेगा।

इसलिएऐतिहासिक शरीअत एक पूर्ण इस्लाम नहीं है बल्कि इस्लामी कानून का एक अध्याय है जो मानव विकास के एक विशेष चरण के अनुसार था। चूंकि (मदीना राज्य) में वे स्थितियां अब मौजूद नहीं हैंइसका मतलब है कि मौजूदा शरई कानूनजैसा कि मुस्लिम मानते हैंपूरी तरह से अप्रासंगिक हो गए हैं। मानव समाज उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां मक्का में नाज़िल इस्लाम का असली संदेश अब वह मानक है जिसके द्वारा मुसलमान खुद को बाकी दुनिया से जोड़ सकते हैं। ताहा के अनुसारयह सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश है जहां महिलाओं और गैर-मुसलमानों को नागरिक के रूप में पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे।

इसके अलावामक्की और मदनी आयतों के बीच का अंतर वही के समय और स्थान के कारण नहीं हैबल्कि मुख्य रूप से इन आयतों के अभिभाषकों के लिहाज़ से है। मदनी आयतों में शब्द, "ऐ मोमिनों" शब्द एक विशेष समुदाय को संदर्भित करता हैजबकि मक्की आयत में, "ऐ आदम की औलाद" सभी लोगों को संदर्भित करता है। आयत "निश्चय ही तुम्हारे पास तुम्हारे बीच से रसूल आए हैं जिन पर तुम्हारा कष्टों का सामना करना गिरां हैऔर तुम्हारी भलाई के अत्यंत चाहने वाले मुसलामानों के प्रति अत्यन्त दयावान और दयालु हैं" (९:१२८)। इस आयत के विपरीत, "वास्तव मेंअल्लाह मानव जाति के लिए सबसे दयालु है" (2: 143)। पहले आयत में अल्लाह पाक इतिहास के एक विशेष कालखंड में एक विशेष समूह को संबोधित कर रहे हैंजबकि अगले आयत में वे पूरी मानवता को संबोधित कर रहे हैं। इसी तरहताहा का मानना है कि मदीना में वही के दस वर्षों में कुरआन में पहली बार मुनाफिकों का उल्लेख किया गया थालेकिन मक्का में वही के तेरह वर्षों में उनका कभी उल्लेख नहीं किया गया था क्योंकि वहाँ कोई मुनाफिक नहीं थे।

इसलिए,  कुरआन में कुछ आयतें समय और स्थान से परे हैं जबकि कुछ आयतें एक विशिष्ट संदर्भ के लिए हैं और अब मुसलमानों को इस्लाम के पहले संदेश को कुरआन के हतमी और अंतिम संदेश के रूप में मानने की आवश्यकता है। संक्षेप मेंमहमूद ताहा भी 'अल मुस्लिमीन और अल मोमिनीनके बीच अंतर करते हैं और कहते हैं कि कुरआन की मांग है कि हम अल मोमिनीन बनें। ताहा मूल रूप से कहते हैं कि मुसलमानों को एक वैश्विक पहचान के साथ रहना चाहिएन कि राजनीतिकजो अल्लाह की पूर्ण आज्ञाकारिता से पूरी होती है। इसका मतलब यह है कि जो कोई भी सुन्नत का पालन करने के बजाय अल्लाह की आज्ञाकारिता को स्वीकार करता हैवह मुस्लिम कहलाने के योग्य हैऔर इस तरह वह विभिन्न धार्मिक पहचानों के बीच के अंतर को धुंधला कर देता है। संकीर्ण सोच वाले होने के बजायसमय की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता इस्लाम के सार्वभौमिक संदेश को पुनः प्राप्त करना है जो मक्की युग में देखा गया था।

आज मुसलमान और खासकर जो समय के साथ आगे बढ़ना चाहते हैंउनमें गहरी उलझन है। उनके पास केवल दो विकल्प हैंया तो स्वाभाविक रूप से भेदभावपूर्ण शरीअत को लागू करना या इसे पूरी तरह से खारिज करना और एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करना। दोनों रास्ते मुसलमानों के लिए बहुत नाजुक हैं जो अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहते लेकिन साथ ही इसकी पारंपरिक व्याख्या से खुश नहीं हैं। महमूद ताहा एक समाधान प्रस्तुत करते हैं: "इस्लामी कानून का मसौदा इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि इसके पहलू जो महिलाओं और गैर-मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करते हैंस्वचालित रूप से समाप्त हो जाएं।"

दुर्भाग्य सेमुसलमान इस संदेश को समझने के लिए तैयार नहीं थे और ताहा को इर्तेदाद (धर्म त्याग) के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। अपने फैसले मेंन्यायाधीश ने अल-अजहर और सऊदी-वित्त पोषित मुस्लिम वर्ल्ड लीग के फैसलों को बरकरार रखा। मुसलमानों और ईसाइयों के बीच सूडान में मौजूदा संकट 1983 में शरिया कानून के लागू होने के साथ शुरू हुआजिस पर ताहा चर्चा कर रहे थे। मुस्लिम दुनिया एक और विचारक के विचारों और ख्यालों से वंचित हो गईजिसमें दुनिया को बदलने की क्षमता थी।

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