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Hindi Section ( 8 March 2018, NewAgeIslam.Com)

Beyond Babri Mosque बाबरी मस्जिद मामला

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

14 फरवरी 2018

बाबरी मस्जिद और राम जन्म भूमी के ऊपर विवादों को हल करने के बारे में मुसलमानों और हिन्दुओं के धार्मिक उलेमा के बीच जारी इस बहस को किस तरह समझा जाए, जिनके बीच कई बार मध्यस्थता का प्रयास किया जा चुका है? बात और आगे बढ़ाने से पहले मैं स्पष्ट तौर पर यह बताना चाहता हूँ कि मुसलमानों और हिन्दुओं का बीच किसी भी विवाद का हल एक सुखद कदम हैंl बाबरी मस्जिद विवाद कई दशकों पुराना है और इस मसले को हल करने के लिए सामाजिक स्तर पर की जाने वाली कोशिशों का स्वागत किया जाना चाहिएl

इसका मतलब यह नहीं कि 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ हुआ वह सहीह थाl मस्जिद के ढाए जाने की निंदा की जानी चाहिए और शायद दोनों समाज के बीच सुलह के लिए किसीभी बात चीत का प्रारंभिक बिंदु इसी घटना को बनाया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ यह भी समझना जरुरी है कि मस्जिद को पहले ही तबाह किया जा चुका है और एक कम्युनिटी की हैसियत से मुसलामानों को उस एतेहासिक और सांस्कृतिक त्रासदी से नहीं जोड़े नहीं रखा जा सकता हैl सभी कम्युनिटी की तरह मुसलमानों को भी आगे पढ़ने की ज़रूरत है, और इसीलिए सुलह के लिए बात चीत महत्व दिए जाने के काबिल बन जाती हैl

यही काम के तरीके दुसरे स्थानों पर भी कारगर रहा है: उदहारण के तुर पर दक्षिण अफ्रीका के अंदर जातीयता के दौर के बाद एक सच्चाई और सुलह आयोग की स्थापना की गई जिसने कई दशकों की विनाशकारी राजनीति और सामाजिक रुझान से पैदा होने वाले भावनाओं को खत्म करने का काम कियाl हिन्दुस्तान के अंदर गुजरात में 2002 के मुसलमानों के खिलाफ दंगों के बाद धार्मिक हस्तक्षेप की कोशिश की गईl तथापि, चूँकि उस समय गुजरात एक कौमी मसला बन चुका था और मुसलमानों के मददगार सामने आ चुके थे इसी लिए सुलह की किसी भी कोशिश को खुद मुसलामानों के उपर मज़ाक समझा गयाl न्याय के प्रभाव होते हैं और इसका अधिग्रहण ज़रुरी भी है लेकिन घावों का उपाय केवल न्याय से नहीं होता हैl इसलिए, इस संदर्भ में इस बात के अंदर कुछ वज़न है कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह समस्या हल नहीं होने वाला हैl इस समस्या के एक लम्बे से के हल के लिए एक पुरखुलूस बात चीत ज़रुरी हैl

इसके साथ साथ में यह भी कहना आवश्यक समझता हूँ कि इस समय बात चीत का जो काम जारी है उसका एक ख़ास नतीजा निर्धारित हैl इस समस्या के हल के लिए जो लोग सक्रिय हैं वह किसी रचनात्मक अंदाज़ में इसका हल तलाश नहीं कर रहे हैं बल्कि उनका उद्देश्य राम मंदिर के निर्माण के लिए किसी हल की तलाश हैl यह वास्तव में एक पुरखुलूस वार्तालाप नहीं है और इसका परिणाम पहले से तय हैl एक पुरखुलूस बात चीत का कोई अग्रिम योजना नहीं होना चाहिएl और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बातचीत के कार्य में शामिल समूहों को यह समझना चाहिए कि सब बराबर हैं ना कि इस विचार के साथ बातचीत की जाए कि एक पक्ष को हमेशा दुसरे के लिए कुर्बानी पेश करने के लिए तैयार रहना चाहिएl अगर नहीं तो हम एक आदर्श दुनिया में नहीं रहते हैं इसी लिए केवल मौजूदा तथ्यों की रौशनी में ही बातचीत को आदर्श मानना चाहिएl

इन तथ्यों में से एक वास्तविकता यह है कि मुसलमान को अब यह एहसास हो जाना चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण के हक़ में एक राजनीतिक सहमति कायम हो चुकी हैl जो लोग भाजपा का विरोध करते हैं इसका मतलब नहीं कि वह अनिवार्य रूप से राम मंदिर के निर्माण के भी खिलाफ हैंl सबसे पहले कांग्रेस पार्टी ने ही बाबरी मस्जिद के ताले खोल कर उसे मंदिर में परिवर्तित करने का इंतज़ाम कियाl इसके बाद राजीव गांधी के ज़माने में कांग्रेस पार्टी की खुली साम्प्रदायिकता को कौन भूल सकता है जब उन्होंने अयोध्या से अपने चुनावी मुहिम का प्रारंभ किया था? उत्तर प्रदेश में सपा और बिहार में आरजेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को कुचल दिया गया जिन्होंने राम मंदिर के निर्माण का विरोध किया थाl

वामपंथियों के पास मंदिर के मसले पर कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं रहा हैl उसने मस्जिद के ढाए जाने से मुस्लिम वोटरों की हमदर्दी प्राप्त करके काफी लाभ प्राप्त किया है, लेकिन कभी भी इस बात का इज़हार नहींकिया कि पुरे मसले के बारे में इसका क्या स्टैंड हैl किसी भी वामपंथी पार्टी ने कभी यह मांग नहीं किया कि तबाह किये गए मस्जिद की फिर से निर्माण उसी स्थान पर की जानी चाहिएl यह दलील कि मंदिर या मस्जिद के बजाए उस स्थान पर सभी धर्म के लिए साझा पूजास्थल निर्माण की जानी चाहिए इस मसले को केवल पेचीदा कर कर रही हैl

मैं इस बात को साफ़ करना चाहता हूँ कि वामपंथी पार्टियां cadre (छोटी छोटी पार्टियों) पर आधारित संगठन है और अगर वह मस्जिद के ढाए जाने को रोकने के बारे में गंभीर होती तो उनहें उन लोगों के खिलाफ काउंटर आंदोलन का मुतालबा करना चाहिए जिन्होंने दरअसल मस्जिद को ढाया थाl इस समय उनकी खामोशी और अब उनका इस समस्या को पेचीदा बनाना केवल इस वास्तविकता की ओर इशारा है कि मस्जिद के ढाए जाने में उनकी भी साज़िश थीl और यह कि इस संदर्भ में मुस्लिम समस्याओं पर कोई ध्यान देने वाला नहीं है और इस देश के मुसलमानों को निर्णय करना होगा कि क्या इस मसले को बढ़ावा देना चाहिए या उनहें इस पेचीदा समस्या को हल करने के लिए गंभीरता के साथ विचार करना चाहिएl

सांप्रदायिक तनाव के बाद सामने आने वाले दंगों के सबसे अधिक शिकार मुसलमान ही हैं, और उनमें जान व माल का सबसे अधिक नुक्सान मुसलमानों को ही हुआ हैl और यही कारण है कि इस बहस में सबसे पहले उनहें ही प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहिएl जब खुद मुसलमान तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की सेक्युलर संरचना के बारे में यकीनी ना हों तो सेक्युलरिज्म का प्रतिबद्धता करने की आवश्यकता नहींl

समस्या यह है कि जो लोग बातचीत की मेज पर हैं वह अधिक आत्मविश्वास भरे नज़र नहीं आ रहे हैं और उनके अंदर किसी भी लाभदायक बातचीत में शामिल होने की काबिलियत नहीं हैl सबसे पहले श्री श्री की ही बात करते हैंl अपने आर्ट ऑफ़ लिविंग प्लेट फॉर्म के माध्यम से एक साम्राज्य स्थापित करने के बाद अब वह खुद के लिए गैर मामूली किरदार चाहते हैं और एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर इतिहास का एक हिस्सा बनना चाहते हैं जिसने राम मंदिर हिन्दुओं को दिया होl हुकूमत के साथ करीबी तौर पर जुड़े होने के कारण से उनहें तटस्थ मध्यस्थ कल्पना नहीं किया जा सकताl इसके अलावा उनके कुछ सिद्धांतों से मुसलमानों को ज़रूर तकलीफ होगीl अब बदनामे ज़माना ज़ाकिर नायक के साथ बहस के बाद श्री श्री ने अपने अनुयाइयों को एक संदेश दिया है जिसमें उन्होंने इस बात की वजाहत की है कि उन्होंने इस बहस में शिरकत क्यों कीl इसी तरह उन्होंने यह भी कहा कि काबा हकीकत में एक शिव मंदिर है और ज़ाकिर नायक को आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस मामले को बहस में नहीं उठायाl अब मक्का में काबे के बारे में यही बात कई दशकों से रूढ़िवादी हिन्दू कह रहे हैंl इससे हमें यह मालूम होता है कि श्री श्री जो सांप्रदायिक सहबद्ध से ऊपर होने का दावा करते हैं जब मुसलमानों के बारे में सोचने की बात आती है तो वह खुद रुढ़िवादी विचारधारा से प्रभावित दिखाई देते हैंl

दूसरी ओर हमारे सामने एक और दिलचस्प किरदार है जिसे सलमान नदवी कहते हैं जिनहें आज उनके मंदिर के समर्थन में विचार के कारण आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से निकाल दिया गया हैl जो कुछ हो रहा है वह बहुत अजीब हैl ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का इस मसले के साथ कोई संबंध नहीं है, यहाँ तक कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में चाल रहे इस मामले का एक पक्ष भी नहीं हैl लेकिन हिन्दुस्तान में मुसलामानों की यह तथाकथित रक्षक संगठन किसी भी ऐसे मौके को गंवाना नहीं चाहती कि जिससे उसे समाज के अंदर आंतरिक रूपसे कोई जवाज़ हासिल हो सकेl अपने आगाज़ से ही मुस्लिम मर्द और औरतों को नाकाम करने के बाद अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खुद को मुसलामानों के धार्मिक अधिकारों का रक्षक साबित करना चाहता हैl अब इस पर अधिक बातें फिर कभी औरl

अब हम सलमान नदवी की बात करते हैंl मेरा भी यही मानना है कि बातचीत होनी चाहिए और इस अर्थ में सलमान नदवी का स्टैंड सहीह है कि केवल एक अदालत का फैसला काफी नहीं होगाl लेकिन क्या हिन्दू पक्षों के साथ इस बातचीत का आगाज़ करने के लिए उनका व्यक्तित्व उपयुक्त हैं? अगर मेरी याददाश्त सहीह है तो फिर सलमान नदवी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने अबू बकर अल बगदादी के नाम एक लंबा ख़त लिखा था इसमें उन्होंने तथाकथित इस्लामी राज्य के साथ अपने गठबंधन का एलान किया थाl यह काफी दिलचस्पी की बात है कि दुसरे लोगों को केवल आइएस आइएस से प्रभावित होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि सलमान नदवी आइएसाइएस के साथ अपने गठबंधन का एलान करने के बावजूद आजादी से घूम रहे हैं और असल में अब इंदु मुस्लिम एकता के लिए एक अवतार के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैंl यह केवल हिन्दुस्तान में ही हो सकता हैl नदवी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने सऊदी अर्ब के बादशाह को भी एक ख़त लिखा था कि शिया का मुकाबला करने के लिए वह 5 लाख दक्षिण एशियाई मुसलामानों की फ़ौज तैयार करना चाहते हैंl अब थोड़ा विचार करें कि एक ऐसा साम्प्रदायिक व्यक्ति जो यह सोचता है कि शिया काफिर हैं और इस वजह से उनहें मार दिया जाना चाहिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसका हीरो बगदादी रह चुका हो और जो उस आइएसआइएस का प्रशंसक हो जिसने मुसलामानों और दुसरे लोगों पर भयानक बर्बरता ढाए हों, उसे आज लिबरल, सहिष्णु और हिन्दू मुस्लिम एकता का झंडा उठाने वाला समझा जा रहा हैl

अभी जो कुछ हो रहा है वह इस देश के आम हिन्दुओं और मुसलमानों पर केवल एक भद्दा मज़ाक हैl एक लम्बे समय तक अयोध्या का मसला केवल एक स्थानीय मसला था यहाँ तक कि इस विवाद में कौमी लीडर शामिल हो गए जिन्होंने इसे एक कौमी मसला बना दियाl शायद इसका हल फिर से स्थानीय समुदाय को सशक्त बनाने में निहित हैl अयोध्या के स्थानीय हिन्दुओं और मुसलमानों की एक कमेटी होनी चाहिए और उनहें उचित बातचीत के माध्यम से इस मसले को हल करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिएl मरहूम हासिम अंसारी ने एक बार इस प्रकार के नतीजे प्राप्त करने का प्रयास किया लेकिन उस समय के कौमी मुस्लिम रहनुमाओं ने उनहें खामोश कर दियाl इसी प्रकार की कोशिश अब निर्मोही अखाड़ा कर रही है लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि क्या इस तरफ के कौमी लीडर इस स्थानीय हिकमत पर ध्यान देंगेl

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