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Hindi Section ( 16 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

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Anti-Islam Film Sparks Violence and Killings: Complex Challenge देश-दुनिया की कठिन चुनौती

 

सी. उदयभास्कर

16 सितम्बर, 2012

इस्लाम विरोधी फिल्म के खिलाफ दुनिया भर में हो रहे प्रदर्शनों में मृतकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अफ्रीका और एशिया के साथ यूरोप के भी कई हिस्सों में अमेरिका विरोधी लहर फैल रही है। इस तरह के हमले अमेरिकी दूतावासों और कूटनीतिक महत्व के अन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किए जा रहे हैं। भारत सहित कम से कम 15 देशों में इस तरह के विरोध प्रदर्शन हुए हैं। चेन्नई और कश्मीर में भी एक दिन पहले ही लोगों ने धरना दिया है। हिंसा की शुरुआत लीबिया के बेनगाजी से हुई, जहां मंगलवार को अमेरिकी राजदूत जे. क्रिस्टोफर की हत्या कर दी गई। इस तरह की हिंसा का फैलना दुखद है। इसके बाद शुक्रवार को ही तीन और अमेरिकी राजनयिकों को निशाना बनाया गया और तालिबान ने अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हमला किया। इसमें दो अमेरिकी सैनिक मारे गए, हालांकि इस संख्या के बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा सूडान, ट्यूनीशिया और मिश्र में हुए प्रदर्शनों में सात लोगों के मारे जाने की खबर है। इस हिंसा के और फैलने का डर लगातार बना हुआ है। इनमें से कुछ देशों में इस हिंसा के पीछे कट्टरपंथि का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है।

इस्लाम विरोधी इस छोटे से वीडियो को देखने वाले ज्यादातर लोग एकमत हैं कि यह घृणास्पद और भड़काऊ है, लेकिन इसकी वजह से फैली हिंसा और अशांति से तात्कालिक और दूरगामी, दोनों तरह की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह सच है कि इस हिंसा की आग पाकिस्तान, बांग्लादेश और यहां तक कि अपने ही देश के दो शहरों में भी महसूस की गई। यानी इसने दक्षिण एशिया को भी अपनी चपेट में ले लिया। भले ही इस पर मतभेद बना हुआ है कि इस फिल्म का मकसद ही लोगों की भावनाएं भड़काना था, फिर भी इस तरह की हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसकी निंदा की जानी चाहिए और दोषियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि ऐसा कहना करने से ज्यादा आसान है। मिश्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी ने काहिरा में कड़ी कार्रवाई की है, लेकिन फिर भी अगले कुछ दिन अरब जगत के लिए संकट भरे हैं। कुछ बातें गौर करने वाली हैं। इतने बड़े पैमाने पर अमेरिका विरोधी हिंसा का भड़कना और फिर 9/11 की 11वीं बरसी के एक दिन बाद इसका व्यापक रूप ले लेना यह आशंका पैदा करता है कि पिछले पांच दिनों से जारी इस हिंसा के पीछे किसी की सोची-समझी साजिश काम कर रही थी। हालांकि इस चुनौती के कारणों का पता लगाना कठिन है और इस संकट से निपटने के लिए सोच-समझकर कदम उठाने होंगे।

18 दिसंबर, 2010 को ट्यूनीशिया से शुरू हुई 'अरब क्रांति' की दूसरी सालगिरह मना रहे अरब जगत में अभी उबाल है और मिश्र में अंदरखाने कुछ परेशानियां और असंतोष हैं, जो लगातार सामने आ रहे हैं। तानाशाही को जनता ने नकार दिया है और मिश्र के पूर्व नेता होस्नी मुबारक इसके उदाहरण हैं, जहां अमेरिका लोकहित को नजरअंदाज करते हुए दमनकारी शासन के साथ खड़ा था। यानी अरब में अमेरिका विरोधी स्वर पहले से ही मौजूद थे। कट्टरपंथियों ने इसी का फायदा उठाया, जो अल कायदा की विभिन्न शाखाओं से जुड़े थे। विरोध प्रदर्शनों की यह लहर इसी असंतोष के खिलाफ उभरे जोश पर पनप रही है और कुछ मामलों में स्थानीय कट्टरपंथी समूहों ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए इस अवसर को भुनाया है। लीबिया में जिस जल्दबाजी में गद्दाफी का खात्मा किया गया उससे वहां अमेरिका विरोधी विचार को बल मिला। अब लीबिया में ही अमेरिकी राजदूत की हत्या इसी विचार की परिणति हो सकता है, जिसे कट्टरपंथियों ने अंजाम दिया। हेलमंड प्रांत में हुआ हमला भी इसी तर्ज पर किया गया हो सकता है और यह संभव है कि भविष्य में अभी इस तरह के हमले और किए जाएं। भारत में खास तौर पर सोचने की जरूरत है। चेन्नई में जिस तरह स्थानीय संगठन के करीब 1500 प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर प्रदर्शन किया वह चिंता का विषय है। हालांकि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन होते रहे हैं, लेकिन इस मामले में कई तरह के सवाल उठते हैं। मसलन, क्या इस प्रदर्शन के पीछे हाल ही में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में जिहादी आतंकियों की गिरफ्तारियां थी? क्या भारत में भी घरेलू मुस्लिम भावनाओं को गलत दिशा में मोड़ा जा रहा है? या दूसरे शब्दों में कहें तो क्या यहां भी कुछ ऐसे जिहादी संगठन काम कर रहे हैं जो राष्ट्र विरोधी धार्मिक हिंसा फैलाने के लिए ही समय-समय पर सक्रिय होते रहते हैं? भारत के लिए ये सवाल बेचैन करने वाले हैं, लेकिन जनता के बीच इनका उठना जरूरी है।

आज की संचार तकनीक के जरिये किसी भी तरह की भड़काऊ सूचना, तस्वीर या फिर अफवाह आसानी से फैलाई जा सकती है। बेंगलूर से उत्तर पूर्व के लोगों का पलायन हम पहले ही देख चुके हैं। भारत की प्राथमिक जरूरतों की सूची में इस तरह की घटनाओं पर विराम लगाना सबसे ऊपर शामिल होना चाहिए और इसके लिए पेशेवर क्षमता और संस्थागत एकता की जरूरत है। फिलहाल हम कहीं न कहीं दोनों की ही कमी का सामना कर रहे हैं। हमारा देश पहले ही दो तरह के कैंसरों- भ्रष्टाचार और जातिगत स्वार्थ से लड़ रहा है। यदि यह सांप्रदायिक राजनीति में प्रवेश करता रहा तो हमें एक बार फिर इतिहास के बुरे दौर की पुनरावृत्ति झेलनी पड़ सकती है। इस बार ये त्रासदी ज्यादा भयंकर रूप लिए होगी। इस्लाम विरोधी वीडियो जारी होने के बाद फैली हिंसा एक चेतावनी है। धर्म के नाम पर सोची-समझी साजिश समाज के ताने-बाने में तेजी से जहर घोल सकती है और इससे होने वाली क्षति की कभी भरपाई नहीं हो सकती। ताजा घटनाओं के संदर्भ में राष्ट्र-राज्य और सिविल सोसायटी को शांतिपूर्वक तथा रचनात्मक तरीके से स्थितियों को संभालने के लिए आगे आना चाहिए।

सी. उदयभास्कर, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं

स्रोतः दैनिक जागरण, दिल्ली

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http://www.newageislam.com/current-affairs/c-uday-bhaskar-for-new-age-islam/anti-islam-film-sparks-violence-and-killings--complex-challenge/d/8696

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