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Hindi Section ( 30 Nov 2011, NewAgeIslam.Com)

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Purdah and Islam पर्दा और इस्लाम


अनीस जीलानी (उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

पाकिस्तान में काम कर रही एक विदेशी महिला पत्रकार दोस्त इस्लामाबाद में सलमान तासीर के कातिल के घर पर जाने के बाद उलझन में थी। वो हैरान थी कि कातिल के घर के मर्द जब उससे बातें कर रहे थे, तो उन लोगों ने उसकी ओर एक बार भी नहीं देखा।

वो पहली ऐसी पश्चिमी देश की महिला नहीं है, जिन्होंने इसका ज़िक्र किया है। बहुत से लोग इसे या तो अपना अपमान मानते हैं या दूसरा शख्स उसको पसंद नहीं करता है, इसका संकेत मानते हैं। इसके विपरीत इसी महिला ने गलियों में महसूस किया कि सभी उसको घूर रहे थे। ऐसे में कोई इस घटना को कैसे समझा सकता है?

कुरान करीम कहता हैः मोमिन मर्दों से कह दो कि अपनी नज़रें नीची रखा करें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें। ये उनके लिए बड़ी पाकीज़गी की बात है और जो काम ये करते हैं खुदा उनसे खबरदार है। (24:30)कुरान ये भी फरमाता हैः और मोमिन औरतों से भी कह दो कि अपनी नज़रें नीची रखा करें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त किया करें और अपनी आराइश (यानि ज़ेवर के मकामात) को ज़ाहिर न होने दिया करें मगर जो इन में से खुला रहता हो। और अपने सीनों पर ओढ़निया ओढ़े रहा करो और अपने खाविंद और अपने बाप और ससुर, और बेटों और खाविंद के बेटों और भाईयों और भतीजों और भांजों और अपनी (ही किस्म की) औरतों और लौण्डी गुलामों के सिवा, साथ ही उन खुद्दामों के जो औरतों की ख्वाहिश न रखें या ऐसे लड़कों के जो औरतों के पर्दे की चीज़ों से वाकिफ न हों (इन लोगों के सिवा) किसी पर अपनी ज़ीनत (और सिंगार के मकामात) को ज़ाहिर न होने दें। और अपने पांव (ऐसे तौर से ज़मीन पर) न मारें ( कि झनकार कानों में पहुँचे और) उनका पोशीदा ज़ेवर मालूम हो जाये......(24:31)

इन आयतों में बहुत सी चीज़ें स्पष्ट हो जाती हैं। मिसाल के तौर पर ये नहीं कहा गया है कि महिलाएं अपने चेहरे को ढांक कर रहें। अगर उनके चेहरे ढांक कर रखने होते तो फिर उनके लिए और मर्दों को अपनी नज़रें नीची रखने की ज़रूरत नहीं होती। दूसरे जो आम तौर पर ज़ाहिर होता है उसके अलावा उनको अपने हुस्न और ज़ेवर न दिखाने की हिदायत की है। इस हिदायत की व्याख्या कई तरह से हो सकती है। एक व्याख्या ये हो सकती है कि महिलाएं ज़ाहिर तौर पर अपने हुस्न और ज़ेवर को न दिखायें, लेकिन जो आम तौर पर ज़ाहिर होता है उसे न छिपायें।

तीसरे छाती एक चादर से ढंकी होनी चाहिए। ये शायद दक्षिण एशिया में दुपट्टे को इंगित करता है, जो ज़रूरी पर्दा उपलब्ध कराता है। एक और आयत (33:59) लगभग वही बात कहती है, मोमिनात.....(जब बाहर निकला करें, तो) अपने (मुँह) पर चादर लटका लिया करें, ये अमल उनके लिए मौजबे शिनाख्त (व इम्तियाज़) होगा, तो कोई उनको तकलीफ न देगा........ मर्दों और बुज़ुर्ग महिलाओं के मामले में इन शर्तों में छूट दी गयी है।

सवाल फिर ये उठता है कि सिर से पांव तक पर्दा फिर आया कहाँ से? स्पष्ट तौर से ये मर्दों की ओर से महिलाओं को अधीन बनाने और उन्हें कड़ी सीमाओं में रखने की कोशिश है। वर्ना उपरोक्त आयतों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसकी इस कदर व्याख्या की जाये।

इस्लामी पर्दे का बेहतरीन नमूना महिला हाजियों के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें पूरा शरीर एक ढीले कपड़े से ढंका होता है और चेहरा स्पष्ट रूप से नज़र आता है और जैसा कि खुदा ने फरमाया है।

जैसा हमारे समाज में महिलाओं को पर्दा करने के लिए कहा जाता है, इस पर उन्हें अमल करने की ज़रूरत नहीं है। सीधे साधे कपड़े में वो मर्दों के साथ कांधे से कांधा मिला कर काम कर सकती हैं और फोटोग्राफ और इलेक्ट्रानिक मीडिया में नज़र आ सकती हैं। शराफत और शर्म व हया की बुनियाद पर मोहब्बत भरी निगाह से देखने की इजाज़त नहीं है। कुरान करीम एक और आयत (33:32) में कहता है कि पैगम्बरों की बीविया और महिलाओं की तरह नहीं हैं और अगली ही आयत (33:33) में उनसे कहता है और अपने घरों में ठहरी रहो और जिस तरह (पहले) जाहिलियत (के दिनों में) इज़हारे तजम्मुल किया करती थीं उस तरह ज़ीनत न दिखाओ। और नमाज़ पढ़ती रहो और ज़कात देती रहो और खुदा और उसके रसूल  स.अ.व. की फरमांबरदारी करती रहो। ऐ (पैगम्बर) अहले बैत खुदा चाहता है कि तुमसे नापाकी (का मैल कुचैल) दूर कर दे और तुम्हें पाक साफ कर दे।

इस तरह नबी करीम स.अ.व. की पत्नियों को पर्दे के आम उसूल से अपवाद रूप में छूट थी, जो आम मुस्लिम महिलाओं पर लागू होता था। क्या कोई उस वक्त कह सकता था कि ये शर्त आम मुस्लिम महिलाओं पर लागू नहीं होती है, मिसाल के तौर पर जिन पर सऊदी सरकार पाबंदी लगाना चाहती है और यहाँ तक कि उन्हें गाड़ी चलाने की इजाज़त भी नहीं देना चाहती? हवाले में दी गयी आयत (24:31) का आखिरी हिस्सा और नबी करीम स.अ.व. की पत्नियों के लिए दिये गये निर्देश स्पष्ट रूप से महिलाओं को अपने हुस्न और ज़ेवरात का प्रदर्शन करने से मना फरमाती हैं, और अपने पांव (ऐसे तौर से ज़मीन पर) न मारें (कि झंकार कानों में पहुँचे) और उनका पोशीदा ज़ेवर मालूम हो जाये.........। क्या इसका मतलब नाचने या महिलाओं के इस अंदाज़ से चलना कि छिपे हुए ज़ेवरात सुनाई दें, को गैर कानूनी बनाने से है?

मेरे ख्याल से ऐसा नहीं है और इसकी वजह ये हैः कई मुस्लिम देशों में होने वाले नृत्य या फैशन के लिए होने वाले कैट वाक को बुरे व्यवहार के दृश्य नहीं माना जाता है। जहाँ इस तरह का व्यवहार सामने आता है, वहाँ इससे निपटने के लिए कानून हैं और ये कानून पुरुषों और महिलाओं पर बराबरी से और कड़ाई से लागू होता है।

ये एक इशारा है कि वक्त बदल गया है और मानव समाज का दर्जा ऊँचा हो गया है, जहाँ अलग रहना निजी पसंद का मामला हो सकता है लेकिन एक मानदण्ड नहीं होना चाहिए, जैसा आज अधिकांश मुस्लिम देशों में स्थिति है। समाज में व्यवस्था स्थापित करने के लिए सरकार की ओर से पर्दे को सख्ती से लागू करना अब ज़रूरी नहीं रहा जैसा कि सऊदी अरब, ईरान और तालिबान की सत्ता के दौरान अफगानिस्तान में होता था। महिलाएं आज पढ़ी लिखी हैं और पेशेवर क्षमताओं में योग्य मर्दों के साथ कांधें से कांधा मिला कर काम कर रही हैं।

अधिकांश मुस्लिम समाज में सार्वजनिक जीवन में सभ्य व्यवहार के अनकहे कोड पर बिना बलपूर्वक अमल होता है और सरकार महिलाओं को सिर से पांव तक पर्दा करने के लिए मजबूर नहीं करती है। इसलिए ये सरकार की चिंता का विषय नहीं होना चाहिए बल्कि किसी की भी निजी पसंद का विषय होना चाहिए।

स्रोतः दि डॉन, कराची

URL for English article: http://www.newageislam.com/islamic-culture/purdah-and-islam-/d/4934

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/purdah-and-islam--پردہ-اور-اسلام/d/5997

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/purdah-and-islam--पर्दा-और-इस्लाम/d/6042


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