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Hindi Section ( 15 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Peaceful Coexistence in Islam इस्लाम में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व

 

 

 

 

ऐमन रियाज़, न्यु एज इस्लाम

18 जुलाई, 2014

गैर मुस्लिम देशों में ये सवाल उठता है कि क्या मुसलमान और गैर मुस्लिम एक साथ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व कर सकते हैं? उनके इस सवाल का आधार ये तथ्य है कि उन्हें अक्सर देखने को मिलता है और पता है कि मुस्लिम देशों में गैर मुसलमानों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है। कुरान और पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं के मुताबिक़ इस सवाल का जवाब ये है कि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व हो सकता है और उन्हें ऐसा करना चाहिए और उन्हें ऐसा ज़रूर करना चाहिए। लेकिन ये सिर्फ बयानबाज़ी नहीं है। मेरा कहना है कि हमें किस आधार पर ये दावे करना चाहिए।  

उपरोक्त सवाल के जवाब में ज़ोरदार ढंग से हाँ इस्लामी मूल्यों पर आधारित है। मैं इनमें से कुछ मूल्यों का वर्णन करूँगा जिनका हवाला पूरी तरह से इस्लाम के बुनियादी स्रोतों से लिया जा सकता है। पहला मूल्य, शांति का मूल्य है। इस्लाम शांति का धर्म है, ये कोई लफ़्फाज़ी नहीं है, बल्कि ये उससे भी गहरा है। खुद इस्लाम का अर्थ शांति है और इसका तकाज़ा है कि अल्लाह की पूर्ण आज्ञाकारिता को स्वीकार करना जिसके नतीजे में व्यक्ति को सुकून और सभी प्राणियों के साथ सद्भाव हासिल होता है चाहे वो इंसान (मुस्लिम या गैर मुस्लिम) हो या जानवर या पेड़- पौधे या पर्यावरण हो, कोई भी इंसान सच्चे दिल और पूरी ईमानदारी से अल्लाह के सामने समर्पण कर और उसके निर्देशों का पालन करके शांति और सद्भाव को हासिल कर सकता है।

दूसरा मूल्य अल्लाह पर पूर्ण विश्वास है, जो आकाश और धरती में सब कुछ का रचियता है। ये केवल एक सिद्धांत या विश्वास नहीं है, जब हम खुदा के एक होने का इक़रार करते हैं तो पूरी मानवता भी एक ही है जिसका स्रोत भी एक ही है। पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इसे बहुत खूबसूरती के साथ पेश किया है: सभी लोग (सिर्फ मुसलमान ही नहीं) अल्लाह के अधीन हैं और अल्लाह के नज़दीक सबसे प्यारे बंदे वो लोग हैं जो लोगों के साथ ज़्यादा रहमदिली और प्यार से पेश आने वाले हैं।

तीसरा मूल्य अल्लाह के सभी रसूलों को स्वीकार करना और उनकी प्रतिष्ठा और सम्मान करना है जिन सभी का मूल संदेश एक ही था जिसका उद्देश्य प्रत्येक स्तर पर सर्वशक्तिमान और खुद के भीतर और अल्लाह के पैदा किये सभी प्राणियों के साथ शांति व सद्भाव हासिल करना था।

चौथा मूल्य खुद कुरान का नैतिक आंदोलन है। वास्तव में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस्लाम के संदेश और अपने मिशन को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया, "मैं केवल अच्छे नैतिक व्यवहार के लिए भेजा गया हूँ।" यही इस्लामी शिक्षाओं का सार है। ये बताता है कि न्याय, संतुलन और धर्मपरायणता सभी इस शब्द में शामिल हैं।

पांचवाँ मूल्य ये है कि कुरान केवल मोमिनों या मुसलमानों का ही नहीं बल्कि सभी लोगों की गरिमा की पुष्टि करता है।  इस्लाम में मानव जान की महिमा बहुत महत्वपूर्ण है। जब मानव जान की महिमा को अच्छी तरह समझ लिया गया तो स्वतः धार्मिक स्वतंत्रता, विश्वास और अभ्यास की स्वतंत्रता की कल्पना स्पष्ट हो जाती है, वरना गरिमा कहाँ होगी अगर धर्म का पालन लोगों से ज़बरदस्ती कराया जाए।

कुरान कहता है "और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग ज़मीन पर हैं सबके सब ईमान ले आते। तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो कि वो मोमिन हो जाएं।

और मानव जीवन की गरिमा भी बहुत महत्वपूर्ण है यानि एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या के समान है और एक व्यक्ति को बचाना पूरी मानवता को बचाने के बराबर है।

अगला मूल्य वैश्विक भाईचारे का है। इस विचारधारा का स्रोत भी कुरान है। ''लोगों! हमने तुमको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारी कौमें और क़बीले बनाए। ताकि एक दूसरे को पहचान सको। और खुदा के मुताबिक़ तुममें ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जो ज़्यादा परहेज़गार है। बेशक खुदा सब कुछ जानने वाला (और) सबसे खबरदार है।''

एक अन्य मूल्य उदारता या संतुलन है। अल्लाह का फरमान है कि उसने मुसलमान उम्मत को उदार और संतुलित क़ौम बनाया है। और कुरान और रसूलुल्लाह की शिक्षाओं दोनों में हर प्रकार के अतिवाद की निंदा की गई है।

अगला मूल्य मुसलमानों और दूसरी क़ौमों के बीच सम्बंध स्थापित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मुख्य रूप से इस बारे में कुरान का फरमान ये है कि अगर दूसरे धर्मों के लोगों तुम्हारे साथ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को अपनाते हैं तो ऐ मुसलमानों तुम्हें भी उनके साथ शांति और सद्भाव के साथ रहना चाहिए और उनके साथ सहानुभूति, न्याय, धर्म और सम्मान के साथ पेश आना चाहिए।

आखरी मूल्य इस्लाम में दया, स्नेह और प्यार का है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को ब्रह्माण्ड (मानव, पशु, पौधों और पर्यावरण) के लिए रहमत बनाकर भेजा गया था।

हमें उस संदर्भ को अच्छी तरह से समझने की ज़रूरत है जिसमें मुसलमानों को अपनी रक्षा के लिए लड़ने की इजाज़त दी गई है। ऐसा कहा जाता है कि ईसा अलैहिस्सलाम ने सिर्फ शांति का उपदेश दिया लेकिन मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कई लोगों को मारा है। ये आधी सच्चाई की एक बेहतरीन मिसाल है। जैसा कि बाइबल में है ईसा अलैहिस्सलाम ने फरमाया है कि हर वो व्यक्ति जिसे अपने ऊपर मेरा शासन स्वीकार नहीं है, उसे यहां लेकर मेरे सामने आओं और उसकी हत्या कर दो। और वास्तव में जैसा कि क़ुरान में उल्लिखित है कि मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हमेशा लड़ाई से नफरत की है। लेकिन जब अल्लाह का हुक्म नाज़िल हुआ तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अल्लाह की खातिर ऐसा किया।

''(मुसलमानों) तुम पर (खुदा के रास्ते में) लड़ना फ़र्ज़ कर दिया गया है वो तुम्हें नागवार (नापसंद) तो होगा मगर अजब नहीं कि एक चीज़ तुमको बुरी लगे और वो तुम्हारे लिए भली हो और अजब नहीं कि एक चीज़ तुमको भली लगे और वो तुम्हारे लिए नुकसानदेह हो। (और इन बातों को) खुदा ही बेहतर जानता है और तुम नहीं जानते।''

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