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Hindi Section ( 7 Feb 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Importance Of Human Rights In Islam इस्लाम में बंदों के अधिकारों का महत्व

 

अबु नस्र फ़ारूक़

18 जनवरी, 2013

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

ये बात आमतौर पर सब लोग और खासतौर पर मुसलमान खूब जानते हैं कि हर इंसान पर उसके पैदा करने वाले अल्लाह का भी हक़ है और दुनिया में अनगिनत इंसानों का भी उस पर हक़ है। मगर कम लोग ये जानते हैं कि किसी का हक़ अदा करना इंसान का फर्ज़ है और इस दायित्व में देरी, लापरवाही या बेइमानी के लिए अल्लाह के सामने जवाबदेह होना पड़ेगा और इसके बदले अज़ाब का हकदार बनना पड़ेगा। जब किसी मुसलमान पर मज़हबयित (धार्मिकता) का असर होता है तो वो खूब नमाज़, ज़िक्रे खुदा और मज़हबी बातों में लगा रहता है और अपनी वेश भूषा भी धार्मिक लोगों की तरह बना लेते है। इसकी अपेक्षाएं क्या क्या हैं और अहले ईमान पर क्या क्या फर्ज़ हैं, मानवाधिकार का क्या स्थान है। दीन से बेइल्म और लापरवाह लोग उसको मुत्तक़ी और परहेज़गार समझने लगते हैं। आम आदमी तो दरकिनार बहुत से आलिम और पढ़े लिखे लोग मानवाधिकार के ऐसे गुनाह करते हैं जिनको इल्म और समझ रखने वाले एक साधारण मुसलमान भी नहीं करना चाहेगा।

किसी भी इंसान पर अल्लाह का क्या हक़ है उस का इल्म इस हदीस से होता है ''रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अल्लाह का बन्दों पर ये हक़ है कि वो उसकी बंदगी (बंदगी) करें और बंदगी में किसी गैर को ज़रा भी साझी न बनायें। अल्लाह की बंदगी करने वालों का अल्लाह पर ये हक़ है कि वोउन्हें अज़ाब न दे। (बुखारी, मुस्लिम) मानवाधिकार का उर्दू अनुवाद है बन्दों के अधिकार। अल्लाह के हक़ के बाद बन्दों के हक़ की क्या हक़ीक़त है इसका अंदाज़ा इस हदीस से कीजिए, ''हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू रवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने लोगों से पूछा, क्या तुम जानते हो मुफलिस (गरीब) कौन है? लोगों ने कहा मुफ़लिस हमारे यहाँ वो व्यक्ति कहलाता है जिसके पास न दिरहम हो और न कोई सामान। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: मेरी उम्मत में मुफलिस वो है जो क़यामत के दिन अपनी नमाज़, रोज़ा और ज़कात के साथ अल्लाह के पास हाज़िर होगा और उसी के साथ उसने दुनिया में किसी को गाली दी होगी, किसी पर तोहमत (आरोप) लगाई होगी, किसी का माल मार खाया होगा, किसी को क़त्ल किया होगा और किसी को मारा होगा, तो इन सभी मज़लूमों (पीड़ितो) में उसकी नेकियाँ (भलाइयां) बाँट दी जाएँगी, फिर अगर उसकी नेकियाँ खत्म हो जाएंगीं तो उनकी खताएं उसके आमालनामे में शामिल कर दिया जाएगा और फिर उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा।'' (मुस्लिम)

इस वक्त ऐसे मुसलमानों का जो दीन वशरीअत से गाफ़िल (अंजान) हैं और ऐसे मुसलमान जो मज़हब की पैरवी करने वाले समझे जाते हैं, दोनों के आमाल और खयालात को देखिए तो मालूम होगा कि ये लोग दीन की हक़ीक़त से बिल्कुल अंजान हैं। बेदीन मुसलमान समझते हैं कि नमाज़ रोज़ा वग़ैरह से ज़्यादा बड़ी नेकी इंसानों की मदद और ख़िदमत करना है, इस तरह वो शरीयत की फर्ज़ इबादत से ग़ाफ़िल और महरूम रहते हैं। और जो लोग धार्मिक बन जाते हैं वो अल्लाह की इबादत के साथ अल्लाह के बन्दों के अधिकारों को अदा करसे ग़ाफ़िल और महरूम रहते हैं। बंदों के अधिकार में महत्वपूर्ण बातें क्या क्या हैं उनकी कुछ चर्चा यहाँ की जाती है:

(1) 'हज़रत अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहू अन्हू बिन उमर और बिन आस रवायत करते हैं, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: चार खसलतें (लक्षण) जिस शख्स में पाई जाएं वो पक्का मुनाफ़िक़ होगा और जिसमें उनमें से एक खसलत पाई जाए तो ये नेफ़ाक़ की अलामत (सूचक) होगी, यहाँ तक कि वो उसे छोड़ दे। जब उसके पास अमानत रखी जाए तो उसमें खयानत करे, जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो वादा खिलाफ़ी करे जब झगड़ा करे तो गाली गलौज करे (बुखारी, मुस्लिम) अमानत में खयानत करने वाला, झूठ बोलने वाला, मुनाफ़िक़ है, और जो मुनाफ़िक़ या नेफ़ाक़ की कोई अलामत रखता है उसका कोई अमल अल्लाह क़ुबूल नहीं फरमायेगा, इसलिए कि ये आदमी खयानत, झूठ, वादा खिलाफ़ी, गाली गलौज के ज़रिए खुदा के बंदों का हक़ मारता रहता है।

(2)'रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: रिश्तेदारों से कट कर रहने वाला जन्नत में नहीं जाएगा। (मुस्लिम) रिश्तेदारी की कितनी अहमियत है, इस हदीस से मालूम होता है, यानी रिश्तेदारों से कट कर रहने वाला और अपने गरीब ज़रूरतमंद रिश्तेदारों की मदद और खिदमत नहीं करने वाला इतना बड़ा गुनहगार है कि कोई इबादत उसे जन्नत का हक़दार नहीं बना सकेगी और जहन्नम में चला जाएगा। मौजूदा दौर में मिल्लत के अंदर रिश्तेदारों का क्या हाल है, ये सब जानते हैं।

(3)'नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि मुस्लिम समाज का सबसे अच्छा घर वो है जहां कोई यतीम हो और उसके साथ हुस्ने सुलूक (बहुत अच्छा व्यवहार) किया जा रहा हो, और मुस्लिम घरोने का बदतरीन घर वो है जहां कोई अनाथ हो और उसके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा हो।'' (इब्ने माजा) कई परिवार ऐसे हैं जहां पिता के मर जाने के बाद अनाथ बच्चे और बच्चियाँ दादा, नाना, चाचा, मामू, बुआ, भाई या बहन के घर रहते हैं। इन यतीम बच्चों का ये हक़ है कि अपने बच्चों से ज़्यादा इनका लिहाज़ रखा जाए और उनकी परवरिश और तालीम व तर्बियत में कोई कमी नहीं की जाय। लेकिन देखने में ये आता है कि घर वाले इस अनाथ की मजबूरी का फायदा उठाकर उसको मुलाज़िम बना लेते हैं और इस गरीब से ऐसे ऐसे काम लेते हैं जो वो अपने बच्चों से कराना पसंद नहीं करते हैं। इस तरह वो अपने घर को समाज का बदतरीन घर बना लेते हैं।

(4)'रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अल्लाह पाक है और वो सिर्फ पाकीज़ा माल को ही क़ुबूल करता है, और अल्लाह ताला ने मोमिनों को यही हुक्म दिया है ..... फिर एक ऐसे आदमी का हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ज़िक्र किया जो लंबी दूरी तय करके पवित्र स्थान (खानए काबा) पर आता है, ग़ुबार से अटा हुआ है, गर्द पड़ी है और अपने दोनों हाथ आसमान की तरफ फैलाकर कहता है, ऐ मेरे रब! ऐ मेरे रब! (और दुआएं माँगता है) हालांकि उसका खाना हराम है, उसका पानी हराम है, उसका लिबास हराम है और हराम पर ही वो पला है तो ऐसे शख्स की दुआ क्यों क़ुबूल हो सकती है। (मुस्लिम) जब आदमी अपने ओहदे और मंसब का फायदा उठाकर लोगों की मजबूरी के तहत उनसे गलत तरीके से उनसे माल वसूलता है तो ये माल हराम हो जाता है। बेईमानी, धोखे और झूठ बोल कर कमाया हुआ माल हराम हो जाता है। जो लोग गलत तरीके से माल कमा कर रातों रात दौलतमंद बन जाना चाहते हैं वो लगातार खुदा के बंदों का हक़ मारते रहते हैं और बदतरीन क़िस्म का गुनाह करते रहते हैं। हराम माल कमाने वाले बुरे लोग अपने साथ अपने परिवार वालों को हराम माल खिलाकर उनकी दुनिया और आखिरत बर्बाद करते रहते हैं।

(5)'हज़रत सईद बिन ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जिस किसी ने ज़ालिमाना तौर पर किसी की भी बालिश्त भर ज़मीन ली तो क़यामत के दिन सात ज़मीनों का तौक़ उसके गले में पहनाया जाएगा। (बुखारी, मुस्लिम) दौलत और जायदाद की हवस इंसान को हलाल और हराम की वास्विकता से महरूम (वंचित) कर देती है और इंसान हवस का शिकार होकर धार्मिक होते हुए अत्याचार करने लगता है। भूमि विवाद मुस्लिम मिल्लत में एक आम बात है। ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करना कैसा गुनाह है अगर मुसलमान इसको समझ ले और दूसरों के अधिकारों के हनन करने से बच जाये तो ये कितनी बड़ी नेकी ह और इसके सबब वो कितने बड़े अज़ाब (प्रकोप) से बच जाएगा।

(6)'हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू से रवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जिस आदमी की दो बीवियाँ हों और उसने उनके साथ निष्पक्ष और बराबरी का व्यवहार नहीं किया तो ऐसा व्यक्ति क़यामत के दिन उस हाल में उठेगा कि उसका आधा जिस्मर गिर गया होगा। (तिरमिज़ी) कुछ लोग शौक से या किसी ज़रूरत के तहत दो शादियां कर लेते हैं और दूसरी शादी के बाद पहली बीवी से मुंह मोड़ लेते हैं। अगर मुसलमान इस हदीस को पढ़ लें और इस ज़ुल्म व ज़्यादती के अंजाम से डरें तो हर मुसलमान दूसरी शादी करने से पहले सौ बार सोचेगा। और दूसरी शादी कर लेगा तो हरगिज़ किसी एक बीवी को उसके अधिकारों से महरूम करके बंदे के अधिकारों के हनन का गुनाह नहीं करेगा।

(7) 'हज़रत अदिस रज़ियल्लाहू अन्हू कहते हैं, मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को फरमाते सुना है कि जो व्यक्ति किसी ज़ालिम का साथ दे कर उसे ताक़त पहुंचाए, जबकि वो जानता है कि वो ज़ालिम है तो वो इस्लाम से खारिज (बाहर) हो गया। (मिशक़ात) जानबूझ कर किसी ज़ालिम दरअसल मज़लूम के अधिकारों का हनन और उससे दुश्मनी करना है। भेदभाव, जिद और हठधर्मी की वजह से लोग अपने और बेगाने का अंतर कर मज़लूम के अधिकारों का हनन और ज़ालिम की मदद करते हैं। वो नहीं जानते कि ऐसा करके वो मुसलमान ही नहीं रहते हैं।

(8)'हज़रत अबु सईद रज़ियल्लाहू अन्हू और जाबिर रज़ियल्लाहू अन्हू रवायत करते हैं, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) ज़िना (व्यभिचार) से अधिक सख्त जुर्म है। सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम! ग़ीबत कैसे ज़िना से अधिक सख्त जुर्म है? आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: एक शख्स ज़िना करने के बाद जब तौबा करता है तो उसकी मग़फ़िरत हो जाती है, लेकिन ग़ीबत करने वाले की मग़फ़िरत तब तक नहीं होती है जब तक कि वो शख्स उसे माफ नहीं कर दे जिसकी उसने ग़ीबत की है। (मिशक़ात) 'अबु हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हू रवायत करते हैं, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने सहाबा इकराम से पूछा, क्या तुम जानते हो ग़ीबत क्या है? लोगों ने कहा अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ही ज़्यादा जानते हैं। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ग़ीबत ये है कि तू अपने भाई का ज़िक्र ऐसे ढंग से करे जिसे वो नापसंद करे। लोगों ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से कहा अगर मेरे भाई में वो बात मौजूद हो जिसे मैं कह रहा हूँ तब भी ये ग़ीबत होगी? आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अगर वो बात उसके अंदर हो तो ये ग़ीबत हुई और अगर वो बात उसके अंदर नहीं पाई जाती है तो ये आरोप होगा। (मिशक़ात) ग़ीबत का गुनाह मुस्लिम समाज में खुलेआम होता रहता है। कुरान में ग़ीबत को मुर्दा भाई का गोश्त खाना कहा गया है।

(9) 'हज़रत अबु फसीला रज़ियल्लाहू अन्हू कहते हैं, मैंने रसूलुअल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से पूछा: अपने लोगों से प्यार करना धर्मांधता है? आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: नहीं ये धर्मांधता नहीं है, धर्मांधता (यानी भेदभाव और साम्प्रदायिकता) ये है कि आदमी ज़ालिमाना कार्रवाईयों में लोगों की मदद करे। (मिशक़ात) इस वक्त मुस्लिम मिल्लत में ज़ात बिरादरी का जो मसला पैदा किया गया है, उसके समर्थक और हमनवा क्या इस फरमाने रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का आदर करेंगे और अपने अमल का जायज़ा लेंगे?

(10)'' हज़रत तमीमदारी रज़ियल्लाहू अन्हू का बयान है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: दीन नाम है वफादारी और खैरख्वाही का। ये बात आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने तीन बार दोहराई। पूछा गया किसके साथ वफादारी और खैरख्वाही? आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अल्लाह, उसके रसूल, उसकी किताब, मुसलमानों के अमीर और पूरी इस्लामी दुनिया के साथ। (मुस्लिम)

18 जनवरी, 2013 स्रोत: रोज़नामा जदीद ख़बर, नई दिल्ली

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