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Hindi Section ( 26 May 2014, NewAgeIslam.Com)

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We Take Pride In Our Ancestors हमारे पूर्वज: हमारा अभिमान

 

 

अभिजीत

27 मई, 2014

इंसान अपनी हर चीज बदल सकता है, वह अपनी राष्ट्रीयता बदल सकता है, प्रांतीयता बदल सकता है, अपना मजहब बदल सकता है, अपना नाम बदल सकता है पर चाहकर भी अपने पूर्वज और अपने बाप-दादों को नहीं बदल सकता , ये सनातन सत्य है । इस कथन को साबित करने के लिये कई दिलचस्प उदाहरण दिये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ ,

(1.) एक इंसान जनवरी , 1947 में वर्तमान बांग्लादेश के खुलना जिले में पैदा हुआ था। अगर उस समय उसे अपनी राष्ट्रीयता लिखनी होती तो वो हिंदुस्तानी या भारतीय लिखता। 1947 मे देश का विभाजन हुआ और पूर्वी बंगाल का खुलना जिला पाकिस्तान में चला गया। अब उस आदमी की राष्ट्रीयता बदल कर पाकिस्तानी हो गई। 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ और खुलना बांग्लादेश मे आ गया और उस इंसान की राष्ट्रीयता बदलकर बांग्लादेशी हो गई। इस 25 साल की अवधि में उसकी राष्ट्रीयता तीन बार बदली।

(2.) इसी तरह एक आदमी वर्तमान झारखंड के रांची में उस समय पैदा हुआ जब बंगाल और बिहार एक प्रांत थे, इसलिये उस समय उसकी प्रांतीयता बिहारी  थी। फिर झारखण्ड के बिहार से अलग होने के बाद उसकी प्रांतीयता बदल कर झारखंडी हो गई यानि उसकी प्रांतीयता दो बार बदली।

(3.) रामलाल एक हिंदू परिवार में पैदा हुआ। बाद में उसने मजहब तब्दील कर ली और ईसाई हो गया और उसने अपना नाम बदलकर पीटर रख लिया। बाद में किसी ने उससे कहा कि इस्लाम धर्म ज्यादा बेहतर है और इस मजहब में भी हजरत ईसा (अलैहे0) को अत्यंत बुलंद दर्जा प्राप्त है तो उसने इस्लाम ग्रहण कर लिया और अपना नाम बदल कर रहीम खान रख लिया। यानि तीन बार मजहब और नाम दोनों बदला।

पहले उदाहरण में राष्ट्रीयता तीन बार बदली, दूसरे में प्रांतीयता दो बार बदली और तीसरे मे नाम और मजहब दोनों तीन बार बदला पर इन तीनों ही परिस्थितियों में इंसान अपने बाप-दादाओं को या पूर्वजों को नहीं बदल सका। पूर्वज नहीं बदले जा सकते, ये निर्विवाद सत्य है। रामलाल भले रहीम खान बन जाये या पीटर मसीह पर यदि उसके बाप का नाम श्याम लाल और दादा का नाम मनोहर लाल था तो वो नाम वही रहेगा, उसमें परिवर्तन की कोई गुंजाईश नहीं है।

हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के जाने के बाद उनके अनुयायी दुनिया भर में उनके द्वारा स्थापित दीन को फैलाने निकल पड़े। अरब के समीपववर्ती देश, अफ्रीका महादेश आदि के साथ-2 भारतीय उपमहाद्वीप में भी वो दीने-इस्लाम का संदेश लेकर आये। भारतबर्ष पर लंबे समय तक विभिन्न मुस्लिम आक्रमणकारी आते रहे, कई सूफी संत भी आये और इस उपमहाद्वीप में इस्लाम विस्तारित होता चला गया। भारतबर्ष में इस्लाम तलवार के जोर से फैला या सूफियों के प्रेम, भाईचारा और बराबरी के संदेश से, यह एक अलग अनुसंधान का बिषय हो सकता है पर ये हकीकत है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम स्वीकार करने वालों में अधिकांश के पूर्वज हिंदू थे। इस देश पर शासन करने वालों ने और इस्लाम की शिक्षाओं को गलत रुप में प्रस्तुत करने वाले मौलानाओं ने इन मतांतरित हुये मुसलमानों को ये समझाना शुरु किया कि तुम्हारा मूल इस देश में नहीं है वरन् तुम्हारे पूर्वज अरब और मध्य एशिया के थे। जिन लोगों को अपने हिंदू मूल का पता था उनको मौलानाओं ने यह कहकर बरगलाया कि अपने काफिर पूर्वजों से किसी भी तरह का संबंध जोड़ना तो दूर उनका स्मरण करना भी तुम्हें जहन्नमी बना देगा। इन सब बातों का परिणाम ये हुआ कि इस उपमहाद्वीप में इस्लाम मत में दीक्षित हुये लोगों ने खुद को इस देश की मूल परंपराओं से और अपने पूर्वजों से काट लिया और खुद को विदेशी समझने लगे और अपना भावात्मक संबंध अरब से जोड़ लिया। जिन परंपराओं, रीति-रिवाजों और विरासतों पर उन्हें गर्व करना था उसे वो हेय समझने लगे। भारत में रहकर भारतीय परंपराओं और पूर्वजों के प्रति नफरत भाव और इस देश के राष्ट्रनायकों के प्रति अश्रद्धा भाव की इस मानसिकता ने देश के शेष समाज की नजरों में उनकी निष्ठा को संदिग्ध बना दिया और उस समय से जो हिंदू-मुस्लिम संबंधों में दरार बननी शुरु हुई वो आज तक कायम है।

अगर इस्लाम में दीक्षित लोगों को कोई आरम्भ से ही ये समझाता कि अरब से उन्होनें सिर्फ एक पूजा-पद्धति ली है, संस्कृति, भाषा, वर्ण और नस्ल से वो इस देश के बाकी लोगों जैसे ही हैं तो ये समस्या आज नहीं रहती। काश कोई उन्हें ये भी समझाता कि धर्म-परिवर्तन अपनी परंपराओं और पूर्वपुरुषों से कटना नहीं है तो भी ये समस्या नहीं रहती। इस संबंध में 1948 में अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में नेहरु जी द्वारा दिया गया भाषण इसे पूरी तरह स्पष्ट कर देता है। नेहरु जी ने अपने इस ऐतिहासिक भाषण में कहा था- "मुझे अपनी विरासत और उन पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होनें भारत को एक बौद्धिक और सांस्कृतिक सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। आप इस अतीत के बारे में कैसा महसूस करतें हैं? मेरी तरह ही आप भी स्वयम् को इसमें साझीदार महसूस करतें हैं कि नहीं? मेरी तरह ही आप भी इस विरासत को स्वीकार करते और इस पर गर्व करतें हैं या नहीं? या आप स्वयं को इससे अलग मानतें हैं और आप इस विरासत को समझे बिना ही इसे अगली पीढ़ी को सौंप देंगें? क्या आप यह सोचकर रोमांचित नहीं होते कि हम इस विशाल संपदा के न्यासी हैं? मैं आपसे ये प्रश्न पूछ रहा हूँ क्योंकि हाल के बर्षों में अनेक शक्तियां लोगों का मन गलत रास्तों की ओर मोड़ने और इतिहास की धारा को विकृत करने के प्रयास में लगी हुई है। आप मुसलमान हैं और मैं एक हिंदू हूँ। हम भिन्न-2 धार्मिक आस्थाओं का पालन कर सकतें हैं या हम नास्तिक भी हो सकतें हैं। मगर इसके कारण हम उस सांस्कृतिक विरासत से दूर नहीं जा सकते, जो उतनी ही आपकी है जितनी मेरी है। जबकि हमारा अतीत हमें एक साथ जोड़ता है, तो हम अपने वर्तमान या भबिष्य को हमें विभाजित करने की अनुमति क्यों दे? अतः चाहे हमारे इष्टदेव कहीं भी हों, मगर भारत में हम ऋषियों की ही परंपरा के वाहक हैं। हमारी धार्मिक आस्था चाहे कोई भी हो, लेकिन हम सभी आध्यात्मिकता की उनकी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। आध्यात्मिकता का अर्थ क्या है? यह रिवाजों या सिद्धांतों का जमधट या पारलौकिकता नहीं है, बल्कि यह एकता के दृष्टिकोण पर शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक जीवन पद्धति है। अपनी शक्ति को संगठित करने के लिये हमें इन शाश्वत सिद्धांतों को जानना होगा, जो हमारी भिन्न धार्मिक आस्थाओं के बाबजूद हम सभी को संगठित कर सकतें हैं।"

वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप के दो बड़े समुदायों के बीच एकता का सबसे बड़ा आधार यही है जिसे जवाहरलाल नेहरु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव राव सदाशिवराव गोलवल्कर गुरुजी से लेकर मौलाना वहीउद्दीन खान सभी ने माना है।

पूजा-पद्धति बदलने से पूर्वज नहीं बदलते

भारतबर्ष में मुसलमानों की काफी अच्छी तादाद है ! भारत से अलग हुये पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी मुसलमानों की भारी तादाद है। इन लोगों ने कुछ सौ-दो सौ-पांच सौ साल पहले अपनी पूजा पद्धति बदल ली थी पर इनका मूल तो हिंदू ही था। ये भी उन्हीं हिंदुओं की संतानें हैं जिनके वंशज होने का दावा यहां के सनातन धर्माबलंबी करतें हैं। सवाल ये है कि क्या पूजा-पद्धति की तब्दीली से पूर्वज भी बदल जातें हैं? इस्लाम धर्म का कट्टर से कट्टर मताबलंबी भी इस सवाल का जबाब न में देगा पर जाहिल मौलवियों के द्वारा गुमराह किये जाने के कारण इस उपमहाद्वीप के बहुसंख्यक मुस्लिमों ने खुद को अपने पूर्वजों और पूर्व की परंपराओं से काट लिया है। भारत के विभाजन और सैकड़ों बर्षों से चली आ रही हिंदू-मुस्लिम वैमनस्यता के जड़ में यही बातें हैं। समान पूर्वज और समान संस्कृति एकता का सबसे बड़ा आधार है , हुज़ूर (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फ़रमाया था 'अपने नसब (खानदान) के बारे में मालूम करो ताकि इसके जरिये तुम अपने रिश्तेदारों से सिलारहमी कर सको !'

भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच समानता का सबसे बड़ा आधार ये है कि हमारे पूर्वज समान हैं और हम सबकी धमनियों में समान रक्त प्रवाहित हो रहा है।

पूर्वजों का सम्मान: इस्लाम और रसूल (सल्ल0) की तालीम

मौलवी भले ही बहकातें हो कि चूंकि तुम्हारे पूर्वज काफिर थे इसलिये उनके साथ किसी भी तरह का संबंध रखना कुफ्र है पर ये बात रसूल (सल्ल0) की सुन्नत से भी साबित है कि पूर्वजों के साथ संबंध विच्छेद करना जायज नहीं है। ये धटना हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के उस जमाने की है जब उन पर कुरान उतरना शुरु हो गया था ! उन्होनें अपने मानने वालों से कहा था कि वो खुद कुरान को समझें और दूसरों को भी समझाये। एक शख्स जो रोज उनके पास कुरान सीखने आता था एक दिन उनसे पास आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। रसूल (सल्ल0) ने कारण पूछा तो उसने कहा, या रसूल (सल्ल0)!  आपको तो पता ही है कि मेरा बाप इस्लाम पर नहीं है। रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, हाँ, मुझे पता है। उसने कहा, मैं जब घर पर कुरान की तिलावत करने जाता हूँ तो वह मुझे रोकते हैं और हमारी तकरार हो जाती है। कल रात भी हमारी इसी बात को लेकर तकरार हो गई और मैनें उनपर हाथ उठा दिया। ये सुनते ही रसूल (सल्ल0) ने उससे कहा, तुम मेरी नजरों के सामने से हट जाओ और जाकर अपने बाप से माफी मांगो। उस शख्स ने कहा, या रसूल (सल्ल0) वो तो काफिर है, मैं क्यों उससे माफी मांगू? रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, वो इस्लाम पर हो या किसी भी मजहब पर तुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिये, क्योंकि वो तेरा बाप है और उसे तफलीफ देना इस्लामी तालीम के खिलाफ है।

इस संबंध में केवल एक नहीं और भी कई उदाहरण हैं-

हजरत मोहम्मद (सल्ल0) का निकाह उम्मे हबीबा बिन अबू सूफियान (रजि0) से हुआ था और अबू सूफियान उस वक्त इस्लाम नहीं लाये थे यानि काफिर थे और सिर्फ काफिर ही नहीं हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के सबसे बड़े दुश्मन थे। एक बार जब वो मदीना आये तो अपनी बेटी के पास गये। जमीन पर एक चादर बिछा था। अबू सूफियान को देखते ही उनकी बेटी ने उसे जल्दी से हटा लिया। अबू सूफियान उस समय मक्का के सबसे बड़े सरदार थे, बेटी को ऐसा करते देख उन्होंनें उससे पूछा, तुम ये चादर शायद इसलिये हटा रही हो क्योंकि ये पुराना, फटा हुआ और पैबंद लगा हुआ है? बेटी ने कहा, नहीं बल्कि इसलिये हटा रही हूँ कि एक काफिर कहीं रसूल (सल्ल0) के पाक बिस्तर पर न बैठ जाये और उसे नापाक न कर दे। इसके बाद उन्होंनें अबू सूफियान से कहा कि आप बाहर ही रहें क्योंकि जब तक मैं रसूल (सल्ल0) से हुक्म न ले लूं आप अंदर नहीं आ सकते। उम्मे हबीबा (रजि0)  ने जब नबी (सल्ल0) के पास जाकर सारा किस्सा उन्हें सुनाया कि कैसे मैनें अपने काफिर बाप को धर में धुसने और आपके पाक चादर पर बैठने नहीं दिया। रसूल (सल्ल0) ये सुनकर अपनी बीबी उम्मे हबीबा (रजि0) पर बहुत सख्त नाराज हुये और फरमाया, भले अबू सूफियान काफिर और मुश्रिक है पर वो तुम्हारे बाप हैं और बाप को सम्मान देना तुम्हारे ऊपर फर्ज है।

खुद नबी (सल्ल0) की सुन्नत से ये बात साबित है कि उन्होंनें भी अपने गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों और बुर्जुगों का हमेशा एहतराम किया और उनको सम्मान देने के कभी कोई कमी नहीं की। जब नबी (सल्ल0) गारे-हिरा में थे और उनपर पहली वह्य नाजिल हुई थी तो वो बहुत धबरा गये थे और इस आलम में अपनी बीबी खदीजा (रजि0) के पास गये और उनसे सारा किस्सा बयान कर पूछा कि मेरे जैसा कमजोर आदमी इस बोझ को कैसे उठा सकेगा? तो वो बोलीं ,खुदा की सौगंध !  यह कलाम अल्लाह ने आप पर इसलिये नहीं उतारा कि आप नाकाम और नामुराद हों और खुदा आपका साथ छोड़ दे। खुदा तआला ऐसा कब कर सकता है,  आप तो वह हैं जो रिश्तेदारों के साथ नेक व्यवहार करतें हैं और असहायों का बोझ उठातें हैं। वह चरित्र जो देश से मिट चुके थे, आपके द्वारा स्थापित हो रहें हैं। अतिथि की सहायता करतें हैं, मुसीबतजदा लोगों की मदद करतें हैं। क्या ऐसे व्यक्ति को खुदा परीक्षा में डाल सकतें हैं? बुखारी शरीफ में इस धटना का वर्णन है। ये रसूल (सल्ल0) द्वारा अपने रिश्तेदारों और बुर्जुगों के एहतराम करने के उनके गुणों की प्रशंसा है। गौरतलब है कि उस वक्त रसूल (सल्ल0) के तमाम रिश्तेदार मुश्रिक थे पर बाबजूद इसके रसूल (सल्ल0) के रिश्तेदारों के एहतराम के गुणों की प्रशंसा ही की गई है।

नबी (सल्ल0)के पिता उनकी विलादत से पहले फौत हो गये थे और जब वो महज छह साल के थे तो उनकी वालिदा भी फौत हो गईं थी। आप (सल्ल0) अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब के संरक्षण में रहे और आपकी आयु के आठवें साल में अब्दुल मुत्तलिब का भी इंतकाल हो गया। जिसके बाद उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया। अबू तालिब के रहते हुये मक्का के बड़े-2 सरदारों की हिम्मत नहीं थी कि वो खुलकर रसूल (सल्ल0) की मुखालफत करें पर जब अबू तालिब का निधन हो गया तो मक्के के लोगों की हिम्मत बढ़ गई और वो रसूल (सल्ल0) को इतना सताने लगे कि उन्हें अपना जन्मस्थान तक छोड़ के मदीना हिजरत करना पड़ गया। ये बात गौरतलब है कि हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के चाचा अबू तालिब ने इस्लाम कबूल नहीं किया था, यहां तक कि जब वो मरणशैय्या पर थे तब भी हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने उनसे कहा था कि चाचा आप इस्लाम कबूल कर लो पर उनका जबाब था कि मैं अब्दुल मुत्तलिब के दीन पर ही इस दुनिया से जाता हूँ। (इससे यह बात भी साबित हुआ कि हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के दादा भी इस्लाम पर नहीं थे) उनके ऐसा कहने और इस्लाम न लाने के बाबजूद उनके प्रति मोहम्मद साहब के सम्मान में कोई कमी नहीं आई। उनकी मौत से वो बहुत दुःखी रहने लगे और उस साल का नाम ही उन्होंनें गम का साल रख दिया। रसूल (सल्ल0) की एक नहीं वरन् अनेकों हदीस हैं जिसमें उन्होंनें पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने का आदेश दिया है।

इतना ही नहीं रसूल (सल्ल0) की सीरत से ये भी पता चलता है कि आदमी भले ही अपने मजहब तब्दील कर ले पर पूर्वजों का अंश अपने वजूद से दूर नहीं कर सकता। जो बात भारत में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच समानता स्थापित करने के प्रयासों में कही जाती है कि 'हमारी पूजा-पद्धति भले ही भिन्न हो पर हमारे रगों में एक ही पूर्वज का समान रक्त प्रवाहित हो रहा है' ठीक वही भाव रसूल (सल्ल0) की इस हदीस से भी निकल कर आता है। अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि एक देहाती नबी (सल्ल0) की खिदमत में आकर कहने लगा, मेरी बीबी को बच्चा हुआ है पर वह बच्चा काला है, इसलिये मैनें उसके बारे में कह दिया कि चूंकि वह मेरे रंग और मेरी शक्ल पर नहीं है इसलिये ये मेरी औलाद नहीं बल्कि इसका बाप कोई और है जिसकी शक्ल पर यह पैदा हुआ है। इस पर नबी (सल्ल0) ने फरमाया, तुम्हारे पास ऊँटें हैं? उसने फरमाया, जी है ! इस पर आप (सल्ल0) ने उससे पूछा, उसका रंग क्या है? उसने जबाब दिया, लाल ! आप (सल्ल0) ने फिर फरमाया उसमें कोई भूरे रंग का भी है? उसने कहा, है!  आप(सल्ल0) ने फिर पूछा, यह रंग कहां से आया जबकि उसके माँ-बाप इस रंग के नहीं?  इस पर उस देहाती ने कहा, इसकी नस्ल में कोई ऊँट इस रंग का रहा होगा जिससे यह रंग उसे मिला है। यह सुनकर आपने फरमाया, तो तुम्हारे बाप-दादाओं में भी कोई काले रंग का होगा जिसके कारण लड़के को ऐसा रंग मिला। फिर नबी (सल्ल0) ने उस बद्दू से कहा कि वह उस लड़के का बाप होने से इंकार न करे। ये हदीस इस बात को साबित करने के लिये पर्याप्त है कि मजहब की तब्दीली पूर्वजों से संबंध खत्म नहीं करती।

पूर्वजों का एहतराम न करना बड़ा गुनाह

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की सीरत से तो ये बात साबित हैं ही कि पूर्वजों का सम्मान हम पर फर्ज है पर इस्लाम के इतिहास में एक और धटना है जो बताती है कि पूर्वजों का सम्मान न करना गुनाहे-अजीम है। इस्लाम में एक मुसलमान के लिये यह फर्ज है कि वह हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से पूर्व भेजे गये सभी नबियों के ऊपर ईमान लाये और उनके प्रति सम्मान भाव रखे। इस्लाम के बारे में सामान्य जानकारी रखने वाला भी ये बात जानता है कि हजरत इब्राहीम (अलैहे0) के दो बेटे थे , हजरत इस्माइल (अलैहे0) और हजरत इसहाक (अलैहे0)। बनी-इजराइल में जितने नबी भेजे गये सभी हजरत इसहाक(अलैहे0) की औलादों में से थे जबकि हजरत इस्माइल(अलैहे0) की औलादों में केवल हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को पैगंबरी दी गई। इस्लाम के बारे में जानकारी रखने वाले ये भी जानतें हैं कि हजरत यूसूफ(अलैहे0) के खानदान में पैगंबरी परंपरा विरासत की तरह चली आ रही थी । उनके बाप, दादा सभी पैगंबर थे पर हजरत यूसूफ(अलैहे0) के बाद उनके खानदान से पैगंबरी छीन ली गई। इसकी वजह ये थी कि जब यूसूफ(अलैहे0) के बाप हजरत याकूब(अलैहे0) अपने बेटे से मिलने मिश्र पहुँचे तो यूसूफ(अलैहे0) उस समय शाही लिबास पहने तख्त पर बैठे हुये थे। दरअसल वो अपने बाप को अपनी शानो-शौकत दिखाना चाह रहे थे ताकि बाप को अपने बेटे का वैभव और रुतबा देखकर सुकून हो। इसी क्रम में उन्हें ये ध्यान न रहा कि बाप के आने के बाद उनके सम्मान में खड़ा होकर तख्त से नीचे उतरा जाता है। तभी फरिश्ते जिब्रील (अलैहे0) नाजिल हुये और यूसूफ (अलैहि0) से कहा, ऐ यूसूफ (अलैहि0)! अपना हाथ उठाओ। यूसूफ (अलैहि0) ने जैसे ही हाथ उठाया, उनके हाथ से एक प्रकाश किरण निकल कर ऊपर चली गई। यूसूफ (अलैहि0)  ने जिब्रील (अलैहि0) से पूछा, ये क्या था? जिब्रील (अलैहि0) ने कहा, चूंकि तूने अपने बाप की ताजीम में कोताही की कि इसलिये तेरे खानदान से अल्लाह ने पैगंबरी उठा ली है और अब से तेरे बाद तेरे खानदान में कोई पैगंबर न होगा। जिब्रील (अलैहि0) ने यूसूफ (अलैहि0) से ये नहीं कहा कि तुमने अल्लाह के एक नबी की इज्जत नहीं की बल्कि ये कहा कि तू अपनी बाप के सम्मान में खड़ा नहीं हुआ इसलिये तेरे नस्ल से पैबंगरी छीन ली गई। यानि पूर्ववर्ती नबियों कि परंपरा से भी ये बात साबित है की बाप का अपमान किसी भी हालत में जायज नहीं है।

हमारे पूर्वज: हमारा अभिमान

हमारे पूर्वज हमारा अभिमान हैं, हमारी पहचान है। इस बात को इंडोनेशिया, ईरान, तुर्की आदि देशों ने साबित कर दिया है। इंडोनेशिया, ईरान आदि मुस्लिम राष्ट्र हैं जहां मुसलमानों के अलावा दूसरे मताबलंबियों की तादाद नगण्य है। इंडोनेशिया तो विश्व का सबसे बड़ा इस्लामी मुल्क है। कुछ सौ साल पहले इंडोनेशिया इस्लाम मत में दीक्षित हो गया पर वहां के लोगों ने भारतीय मुसलमानों की तरह खुद को अपने पूर्वज, परंपरा व संस्कृति से नहीं काटा। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जब विश्व सिंधी सम्मेलन में भाग लेने के लिये इंडोनेशिया गये हुये थे तो विश्व के इस सबसे बड़े इस्लामी मुल्क में हिंदुत्व का प्रभाव देखकर चकित रह गये। वहां के आने के बाद आडवाणी ने बताया कि वहां के स्थलों, संस्थानों और लोगों के नामों पर संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव झलकता है। वहां के लोग रामायण और महाभारत के कथानक से भलीभांति परिचित हैं। अपनी इस यात्रा में आडवाणी जी बाली की राजधानी डेनपासर भी गये। वहां एक मूर्ति की तरफ इशारा करते हुये उनके ड्राइवर ने बताया कि ये धटोत्कच की मूर्ति  है। धटोत्कच को तो हिंदुस्तान के बहुत सारे लोग नहीं जानते पर मुस्लिम इंडोनेशिया का एक सामान्य ड्राइवर उससे भलीभांति परिचित है और सिर्फ परिचित ही नहीं है वरन् अपने देश में धूमने आने वाले पर्यटकों को गर्व से अपनी प्राचीन विरासत और धरोहर दिखाता है। इसी तरह की एक और धटना है। प्रख्यात साहित्यकार विधानिवास मिश्र एक बार इंडोनेशिया की यात्रा पर थे। वहां इंडोनेशिया के कला विभाग के निदेशक सुदर्शन के साथ जब वो इंडोनेशिया के प्राचीन स्थलों का निरीक्षण कर रहे थे तो रास्ते में उन्होनें देखा कि कुछ संगतराश पथ्थरों पर कुछ अक्षर उकेर रहें हैं। विधानिवास मिश्र ने सुर्दशन से जानना चाहा कि इन पथ्थरों पर क्या उकेरा जा रहा है? तो सुर्दशन ने (जो इस्लाम मत के मानने वाले थे) ने बताया कि यहां के मुस्लिमो में रामायण और महाभारत के प्रति अतिशय भक्ति भावना है इसलिये कुछ लोग अपने कब्र पर लगाये जाने वाले पथ्थर पर जावाई भाषा में महाभारत और रामायण की कोई पंक्ति खुदवातें हैं। यह सुनकर विधानिवास मिश्र स्तंभित रह गये कि एक ऐसे मुल्क में जहां 98 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं पर फिर भी अपने पूर्वजों की विरासत के प्रति इतना सम्मान भाव है। यह कहानी केवल इंडोनेशिया के आम जनों की नहीं है वरन् वहां की राज्यव्यवस्था और राजकीय प्रतीकों में भी पूर्वजों के प्रति सम्मान झलकता है। इंडोनेशिया के मिलिट्री इंटिलेजेंस का आधिकारिक शुभंकर वीर बजरंग वली हैं, वहां के एयरवेज का नाम गरुड़ है जो भगवान बिष्णु का वाहन हैं।

तुर्की एक समय सारे इस्लामी मुल्कों पर हुकूमत करता था। मुस्तफा कमाल पाशा के आगमन के बाद उनमें भी राष्ट्रीय जागरण भाव आया। मुस्तफा कमाल पाशा और उनके साथियों ने कहा कि 'हमारी उपासना पद्धति नहीं बदलेगी, हम कुरान, हदीस और हजरत मोहम्मद साहब के प्रति भी अपने श्रद्धा भाव को खत्म नहीं करेंगें, हमारा मजहब इस्लाम रहेगा पर अपने राष्ट्रजीवन का निर्माण हम अपनी संस्कृति के आधार पर करेंगें।' तुर्की के मुसलमानों ने अपनी पूजा-पद्धति भले अरबों से ली पर इस्लाम के नाम पर उनकी भाषा, उनके पूर्वज, उनकी संस्कृति को अपनाने से इंकार कर दिया। पूर्वजों के प्रति अभिमान का यह भाव मिश्र में भी आया जब मिश्र के राष्ट्रप्रेमी नवयुवकों ने फराओ राजाओं की उपलब्धियों पर गर्व करना शुरु किया और उनके बनाये पिरामिडों को मिश्र के राष्ट्रीय गौरव और प्रतीक से जोड़ना शुरु किया। उनकी इन कोशिशों ने कट्टरपंथियों को नाराज कर दिया और वो कहने लगे कि काफिर पूर्वजों का सम्मान करना कुफ्र है पर मिश्र के इन राष्ट्रभक्तों ने उनकी दलील को यह कहकर ठुकरा दिया कि जो हजरत मोहम्मद (सल्ल0) से पहले पैदा हुआ वो कैसे काफिर हो सकता है? पूर्वजों को सम्मान देने और उनकी उपलब्धियों पर अभिमान करने का यह भाव मिश्र में आज भी है। जागरण की इस लहर से ईरान भी अछूता नहीं रहा। वहां भी रजाशाह पहलवी के नेतृत्व में सुधारों का अभियान चला और वो ईरान के पूर्वजों और राष्ट्रपरुषों को उनका उचित स्थान दिलवाने में जुट गये। ईरान के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करने के क्रम में मजूसी राजाओं के वीरतापूर्ण अभियानों और उपलब्धियों को संग्रहित किया जाने लगा और रुस्तम, सोहराब, जमशेद आदि पूर्वजों और राष्ट्रनायकों के प्रति सम्मान भाव रखने की परंपरा शुरु हो गई। इतना ही नहीं अपने महान पूर्वजों के नाम पर उन्होंनें सड़कों, भवनों आदि के नाम रखने भी आरंभ कर दिये। आश्चर्यजनक रुप से यह जागृति पाकिस्तान में भी आई। वहां भी पाणिनी की पांच हजारवीं जयंती मनाई गई, इन बातों पर चर्चायें  आरंभ हुई कि झेलम के तट पर सिकंदर से लोहा लेने वाला राजा पोरस भी उन्हीं के पूर्वज हैं और मुहम्मद बिन कासिम से संघर्ष करने वाले राजा दाहिर की बहादुर बेटियां सूर्या और परिमाल भी उनकी भी उतनी ही अपनी है जितनी हिन्दुओं की । दुर्भाग्य से भारतीय मुसलमानों में यह जागृति अभी आनी बाकी है।

यहां के मुसलमानों के मन में अगर पूर्वजों और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान भाव आ जाये तो रामजन्मभूमि, गोहत्या जैसे तमाम विवादित मसले चुटकियों में हल हो सकतें हैं।

पूर्वजों से खुद को काटना कुफ्र

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की समस्या यह है कि इन लोगों ने अपनी पूजा-पद्धति तो बदली ही साथ ही खुद को अपने अतीत, अपनी संस्कृति और अपने पूर्वजों से भी काट लिया और खुद को अरब से जोड़ लिया। हजरत सईद इब्न अबी वक्कास रिवायत करतें हैं, नबी (सल्ल0) ने फरमाया कि जिसने अपनी जात बदल ली, हालांकि उसको ये इल्म है कि ये मेरी जात नही तो जन्नत उसपर हराम है। (बुखारी व मुस्लिम) भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में कई लोग हैं जो खुद को कुरैशी, शेख, सैयद, अब्बासी आदि वंश के बतलातें हैं जबकि ये तो अरब के कबीलों के नाम हैं। डाॅ0 हम्जा अहमद अज-जियान ने हिमायतुल अंसाब फी शरीयतील इस्लामिया नाम से एक किताब भी लिखी है। इस किताब में उन्होंनें कई हदीसो का हवाला देते हुये लिखा कि अपने पूर्वजों से खुद को काट लेना कुफ्र है। उन्होंनें अपनी किताब में न केवल पूर्वजों से संबंध विच्छेद करने वाले को हदीसों के हवाले से काफिर कहा है बल्कि उन लोगों के लिये भी इस वाक्य का इस्तेमाल किया है जो खुद को उस वंश से जोड़ लेता है जिस वंश का वो है ही नहीं। भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज समान है, ये निर्विवाद सत्य है। इसलिये उनके लिए अपनी वंश-परंपरा यहां से जोड़ना इस्लाम का ही हुक्म है।

क्या इस्लाम में नाम बदलना अनिवार्य है?

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान मजहब तब्दील करने के साथ एक काम ये भी करतें हैं कि वो अपना नाम भी बदल कर लेतें हैं जबकि अपना नाम अपने पूर्वजों के नाम पर रखना और अपने नाम में पूर्वजों के नाम को शामिल रखना भी रसूल (सल्ल0) के हुक्म में से है। सही बुखारी और सही मुस्लिम शरीफ में हजरत अबू हुरैरा (रजि0) से रिवायत एक हदीस है जिसमें नबी (सल्ल0) फरमातें हैं, "जिसने मुँह मोड़ा अपने बाप-दादा से तो उसने काफिर का काम किया और कुफ्र किया।" यानि इंसान को अपनी निस्बत अपने बाप-दादाओं की तरफ करनी चाहिये। इतना ही नहीं है एक हदीस में नबी ने फरमाया, "बेशक तुम कयामत के दिन अपने नाम और बापों के नाम से पुकारे जाओगे!" (इमाम अहमद, अबू दाऊद, जिल्द- 3, बाब- 485, हदीस- 1513, सफा-550) यानि हमारा मजहब कोई भी हो पर कयामत के दिन हमारा नाम हमारे बाप-दादाओं केे साथ ही लिया जायेगा।

महज इसलिये अपना नाम अपने बाप दादा के नाम पर नहीं रखना अथवा उनके नाम को अपने नाम के साथ शामिल न करना कि वो एक हिंदू थे या गैर-मुस्लिम थे गलत है। हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने अपने एक गुलाम जैद को अपना मुँहबोला बेटा बना लिया था। सही बुखारी में अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि जैद बिन हारिसा को हमलोग हमेशा जैश बिन मुहम्मद कहा करते थे जब कुरान की ये आयत नाजिल हो गई कि 'उनके बाप के नाम से ही पुकारो यह सबसे उत्तम है' तो हम उसके बाद जैद को जैद बिन हारिसा नाम से ही बुलाने लगे। इससे ये साबित हुआ कि भले हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने जैद को अपना बेटा बना लिया पर कुरान ने लोगों को मना फरमाया कि जैद को जैद बिन मुहम्मद कहकर बुलाया जाये, कुरान ने यही हुक्म दिया कि जैद को उनके हकीकी बाप के नाम से ही पुकारना बेहतर है। हजरत मोहम्मद की पत्नियों और कई बड़े सहाबियों के नामों को देखने से भी ये बात साबित हो जाती है कि पूर्वजों के काफिर या इस्लाम के इंकारी होने के बाबजूद भी नाम में उनके नाम को शामिल किया जा सकता है। इसके कई उदाहरण हैं-

1. इक्रमा बिन अबू जहल- ये मोहम्मद (सल्ल0) और इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन अबू जहल के बेटे थे। इन्होंनें फतह मक्का के बाद ईमान लाया था। अपने इस्लाम लाने के पूर्व ये भी रसूल (सल्ल0) और उनके दीन के सबसे बड़े मुखालिफों में थे। सहाबियों के बीच इनका स्थान काफी ऊँचा था। रसूल (सल्ल0) ने कभी भी इनसे ये नहीं कहा कि चूंकि तुम्हारा बाप काफिर था इसलिये तुम अपना नाम बदल लो या अपने नाम के साथ अपने बाप का नाम न जोड़ो।रसूल (सल्ल0) तो खुद भी इन्हें इक्रमा बिन अबू जहल कहकर पुकारते थे।

2. उम्मे-हबीबा बिन अबू सूफियान - ये हजरत अबू सूफियान की बेटी थीं। अबू सूफियान भी हजरत इक्रमा की तरह बहुत बाद में ईमान लाने वाले थे और जिस समय उम्मे हबीबा (रजि0) से रसूल (सल्ल0) का निकाह हुआ था उस समय अबू सूफियान ने इस्लाम नहीं लाया था पर रसूल (सल्ल0) ने कभी भी अपनी बीबी को अपना नाम नाम बदलने को नहीं कहा।

3. सफिया बिन्त  हुयिय बिन्त अख्तब- ये यहूदियों के कबीले से थीं और बाद में इस्लाम लाई तथा हजरत मोहम्मद (सल्ल)0 से इनका निकाह हुआ। इनके पति, वालिद, चचा और भाई सभी खैबर की जंग में मारे गये। मतलब ये कि इनका पूरा खानदान और इनके परिवारजन न सिर्फ यहूदी थे बल्कि रसूल (सल्ल0) के मुखालिफ थे पर निकाह के बाद कभी भी रसूल (सल्ल0) ने इनसे ये नहीं कहा कि तुम अपने नाम से अपने बाप-दादाओं के नाम को निकाल दो।

4. उमर बिन खत्ताब- ये भी रसूल (सल्ल0) के बड़े सहाबियों में एक थे और दूसरे खलीफा थे पर रसूल (सल्ल0) ने इन्हें भी कभी इन्हें अपना नाम बदलने को नहीं कहा।

5. अली बिन अबू तालिब- ये हजरत मोहम्मद के चचाजाद भाई थे और अबू तालिब के बेटे थे। अबू तालिब ने इस्लाम कबूल नहीं किया था पर नबी (सल्ल0) ने कभी भी हजरत अली से ये नहीं कहा कि आप अपने नाम से अपने वालिद का नाम निकाल दो ! 

इस तरह के एक नहीं वरन् अनेकों उदाहरण इस बात को साबित करने के लिये काफी हैं कि इस्लाम में महज इसलिये अपना नाम तब्दील कर लेना कि ये उनके काफिर पूर्वजों के नाम पर है जायज नहीं है और ऐसा हो भी क्यों न जबकि खुद रसूल (सल्ल0) का ऐसा हुक्म था। इब्ने अब्बास (रजि0) से रिवायत एक हदीस है जिसमें रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, जिसने अपना नाम अपने बाप के नाम पर नहीं रखा उसपर खुदा, फरिश्ते और तमाम इंसानों की लानत है। (इब्ने माजह, इमाम अमहद)

इस संबंध में एक और हदीस है, तुम्हारा अपनी बाप की तरफ से निस्बत हटाना कुफ्र है। यह भी फरमाया कि अपने बाप की तरफ से अपने नसब का सिलसिला खत्म न करो क्योंकि यह कुफ्र है।  (यह हदीस हजरत उमर से रिवायत है)

नाम बदलने और अपने पूर्वजों को विस्मृत करने का चलन अफगानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप में ज्यादा है। दुनिया के बाकी इस्लामी देशों में ऐसा नहीं है। मजहब के रुप में इस्लाम को चुनने के बाबजूद उन्हानें अपने पूर्वजों को विस्मृत नहीं किया है। इस मामले में इंडोनेशिया एक मिसाल है। बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले इस देश के लोगों के नामों को देखकर हैरानी होती है पर इंडोनेशियाई लोगों ने अपने पूर्वजों को स्मरण करने का एक ये भी उत्कृष्ट चलन कायम रखा है। इस्लाम के आने से पूर्व इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का बोलबाला था इसलिये वहां के मुस्लिमों के नामों में संस्कृत शब्द देखने को मिलते हैं। सुहार्तो, सुकर्ण, मेधावती सुकर्णोपुत्री आदि वहां के राष्ट्राध्यक्षों के नाम रहें हैं। वहां के मुसलमानों के संस्कृतनिष्ठ नामों को देखकर दुनिया के दूसरे देशों के मुसलमान जब उनसे पूछतें हैं कि ये काफिरों वाला नाम क्यों रखा? तो उनका जबाब होता है, 'कुछ पीढ़ी पहले हमने उपासना पद्धति बदला होगा। परंतु इससे बाप-दादा तो नहीं बदलते है, बाप-दादाओं की स्मृति और परंपरा को कायम रखने का यह सर्वोत्कृष्ट पद्धति है।' वहां के राष्ट्रपति सुकर्ण से जब बीजू पटनायक ने पूछा कि आपका नाम सुकर्ण क्यों रखा गया? तो उन्होंनें कहा कि उनके पिता महाभारत का नियमित पारायण करते थे और उनका प्रिय पात्र कर्ण था पर चूंकि वह युद्ध में असत्य और अधर्म के साथ खड़ा हुआ था इसलिये मेरे पिता ने कर्ण के नाम में सुकर्ण लगाकर मेरा नाम रख दिया। इस मामले में अहमदिया मुसलमानों भी इंडोनेशियाई मुसलमानों की तरह ही हैं। इन्होनें भी अपने नामों के द्वारा अपने पूर्वजों की स्मृतियों को अपने जेहन में बनाये रखा है। अहमदी मुसलमानों के नामों में नानक, राम, मीरा, कृष्ण, गौतम आदि जुड़े देखे जा सकतें हैं ।

सबित ये हुआ कि अगर कोई महज इसलिये अपने पूर्वज से निस्बत तोड़ लेता है कि वो मुसलमान नहीं थे तोे वो खुदा और उसके रसूल (सल्ल0) के हुक्म का नाफरमान है।

पूर्वजों के लिये दुआयें

अपने पूर्वजों को याद करने व उनके लिये दुआयें करने की पुनीत परंपरा दुनिया के प्रायः हर मजहब में है। हिंदू अपने पूर्वजों के लिये पिंड दान करता है तो मुसलमान शबे-बरात में कब्रिस्तान जाकर उनके मग्रिफत के लिये दुआयें करतें हैं। पूर्वज काफिर हो या मोमिन, बदले नहीं जा सकते और इसलिए अगर पूर्वजों की मग्रिफत की दुआयें मांगी जायेगी तो उसमें गैर-मुस्लिम पूर्वज आयेंगें ही। इसलिये अगर कोई शबे-बरात की रात को दुआओं में सिर्फ अपने मुसलमान पूर्वजों की मग्रिफत चाहता है तो वो कुरान और हदीस का अवज्ञाकारी है। अपने काफिर बाप आजर के लिये तो कयामत के दिन सेमेटिक मजहबों के जनक इब्राहीम (अलैहे0) भी पैरवी करेंगें भले ही उनकी इबादत कबूल हो या न हो।

यह बात भी तो समझने की है कि आज अगर कोई मुसलमान है जो अपने पूर्वजों की वजह से ही है। अपने जिन पूर्वजों को मुस्लिम काफिर समझकर हेय समझतें हैं, उन्हीं की बदौलत वो इस दुनिया में आयें है और उन्हें इस्लाम की दौलत मिली है और यह बात तो रसूल (सल्ल0) की सीरत से भी साबित है। मस्नदे-अहमद में आता है कि एक जिहाद में सहाबियों ने छोटे-2 बच्चों को भी कत्ल किया। जब नबी (सल्ल0) को ये पता चला तो बहुत नाराज हुये और फरमाया, क्या बात है कि लोग हद से आगे निकलने लगे और बच्चों को भी कत्ल करने लगे। इस पर एक सहाबी ने की, रसूल (सल्ल0) वो तो मुश्रिकों की औलादें थीं। नबी (सल्ल0) ने फरमाया, तो क्या हुआ? याद रखो कि तुममे से बेहतरीन लोग भी मुश्रिकों की ही औलादें हो। पढ़े-लिखे मुसलमान इस बात को समझतें हैं और इसलिये उनकी मग्रिफत की दुआओं में उनके सारे पूर्वज शामिल होतें हैं। इस संदर्भ में महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल मोहम्मद फजल का उदाहरण अधिक पुराना नहीं है। एक बार श्री फजल क्षिप्रा नदी के तट पर पिंड दान (पूर्वजों के मग्रिफत के लिए दुआ करने कि हिन्दू परंपरा) करने गये तो उन्हें पत्रकारों ने धेर लिया। पूछा, आप तो मुसलमान है फिर ये गैर-इस्लामी काम क्यों कर रहें हैं? मोहम्मद फजल ने इसपर जबाब दिया कि मैं शबे-बरात के दिन कब्रिस्तान जाता हूँ अपने उन पूर्वजों की आत्मा की शांति की दुआ करने जो आज से ढ़ाई सौ-तीन सौ साल पहले के थे, जो मुसलमान थे और यहां आया हूँ अपने उन पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने जो उन ढ़ाई सौ-तीन सौ साल पहले से लेकर हजारों-लाखों बर्ष पहले के थे, जो हिंदू थे। अगर पूर्वजों की स्मृति के लिये कब्रिस्तान को रोशन किया जा सकता है तो श्मशानों पर दीपक क्यों नहीं जलाया जा सकता? यह कितना बड़ा अपराध है कि अपने जिन पूर्वजो के कारण आज हम इस दुनिया में हैं, जिन पूर्वजों ने हम आने वाली पीढ़ी के लिये अपना पेट काटकर संपत्ति और जमीन अर्जित की, हमारे जन्म से पहले हमारे लिये धर बनबा कर रखा, अपने उन्हीं पूर्वजों को हम अपनी दुआओं में भूला देतें हैं। अगर मग्रिफत की अपनी दुआओं में हम अपने पूर्वजों को छोड़ सकतें हैं तो फिर उनके द्वारा सहेजी गई जमीन और अर्जित संपत्ति लेने से भी हमें परहेज करनी चाहिये। नैतिकता का तकाजा तो यही कहता है कि अगर सिर्फ गैर-मुस्लिम होने की वजह से वो हमारी दुआओं में शामिल नहीं हो सकते तो फिर उन गैर-मुस्लिमों के द्वारा अर्जित जमीन पर भी हमारा कोई हक नहीं होना चाहिये। अपने हिंदू पूर्वजों की मग्रिफत के लिये दुआयें कर रहें मो0 फजल कोई इस्लाम विरुद्ध काम नहीं कर रहे थे वरन् वो वही कर रहे थे जो रसूल (सल्ल0) की परंपरा था। नबी (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फरमाया था, कयामत के रोज एक हाफिज अपनी तीन पीढि़यों को तथा एक आलिमे-दीन अपनी सात पीढ़ियों को बख्शवायेगा। इस हदीस का एक मतलब ये भी है कि अगर कोई मुस्लिम आलिमे-दीन है तो कियामत के रोज दीन से मोहब्बत करने की इस वजह से उसके सात पीढ़ी तक के पूर्वज भी बख्शे जायेेंगें।

मोहम्मद फजल इसलिये भी गैर-इस्लामी काम नहीं कर रहें थे क्योंकि उन्होंनें जो काम एक दिन किया वही काम तो दुनिया के सारे मुसलमान हर रोज करतें हैं। एक मुसलमान नमाज के बाद की अपनी दुआओं में अपने पूर्वजों की मग्रिफत की ही तो दुआ मांगता है। वो कहता है-"ऐ अल्लाह! बख्श मुझको और मेरे माँ-बाप को और मेरे उस्ताद को !" और बख्शिश की इस दुआ में मोमिन मां-बाप की कोई शर्त नहीं है।

अंत में

इस संबंध में एक बहुत ही प्रेरक उदाहरण पूर्वोत्तर से प्रशासकीय सेवा के लिए चयनित हुए के दो अफसरों का है। ये दोनों अधिकारी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ट्रेनिंग करने गये। उस ट्रेनिंग कैंप में देश के विभिन्न हिस्सों से अधिकारी परीक्षा में उत्तीर्ण युवक आये हुये थे। संध्याकाल की सांस्कृतिक सत्र के दौरान सबसे कहा गया कि यदि आप किसी बिशिष्ट इलाके से अथवा किसी बिशेष जाति, जनजाति वर्ग से आतें हैं जिससे हममें से अधिकांश लोग परिचित नहीं हैं तो उसकी परंपरा, संस्कृति, रीति-रिवाजों के बारे में हमें बतायें ताकि हम सभी को एक-दूसरे को जानने का मौका मिले। जब पूर्वोत्तर के युवकों की बारी आई तो ये जिस जनजाति से आते थे उसकी परंपरायें, त्योहार, खान-पान, पूजा-पद्धति आदि के बारे में बताने को कहा गया। पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों की अधिकांश आबादी मिशनरियों के चलते ईसाई मत में दीक्षित हो चुकी है और मिशनरियों ने वहां के भोले-भाले लागों को उनकी परंपराओं और संस्कृतियों से काट दिया है। उन दोनों युवकों ने तो जब से आंखें खोली थी, अपने चारों तरफ ईसाई संस्कृति, भाषा-भूषा और त्योहारों को ही देखा था। उनलोगों ने वही बताना शुरु कर दिया। सभा के संचालक ने उनसे कहा, ये तो आप हमें ईसाई धर्म के बारे में बता रहे हो, हमें आपके कबीले के बारे में जानना है। तो उन युवकों ने कहा कि हमें तो यही बता है जो हम बता रहेें हैं। इसपर प्रबंधक ने उन्हें डांट कर ये कहते हुये मंच से उतार दिया कि अगर ईसाईयत के बारे में ही हमें सुनना है तो क्या इस शहर में चर्च और ईसाई पादरी नहीं है?

हम भारत से बाहर जातें हैं तो दुनिया हमसे वेद के बारे में पूछती है, उपनिषदों के बारे में पूछती है, योग और अध्यात्म पर सवाल करती है, हड़प्पा , मोहनजोदड़ो और वैदिक संकृति के बारे में जानना चाहती है, राम, कृष्ण, बुद्ध ,महावीर और आर्यभट्ट के बारे में पूछती है क्योंकि ये चीजें हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का आधार है, हमारी धरोहर है। योग, अध्यात्म, गीता, रामायण, महाभारत और राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर से इस देश की पहचान है और चूंकि हमारी पहचान हमारे वतन के साथ जुड़ी हुई है इसलिये इन चीजों का जानना और अपने पूर्वपुरुषों के प्रति सम्मान भाव रखना हमें दुनिया में प्रतिष्ठा दिलायेगा। हमारी पूजा-पद्वति भले ही भिन्न-2 हो पर हम सब उन महापुरुषों के वंशज हैं जिन्होंनें दुनिया को वसुधैव-कुटुंबकम का अभिनव मंत्र दिया, हजारों साल तक विश्वगुरु बन कर दुनिया का मार्गदर्शन किया, दुनिया को शून्य की खोज करके दी (जो कंप्यूटरों के आबिष्कार का आधार है), अंक दिये, शल्य-चिकित्सा सिखाई और न जाने कई ऐसे ज्ञान दिये जिसे आधुनिक विज्ञान आज जान पा रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप का मुसलमान रंग, नस्ल और पूर्वज परंपरा से सिर्फ और सिर्फ भारतीय है। इस्लाम कबूल करने से वो न तो अरब हो सकता है, न तुर्क और न ही ईरानी और न ही अपना पूर्वज बदल सकता है। मुसलमान अगर इन बातों को समझे और तद्नुरुप व्यवहार करे तो निश्चित रुप से आपसी मतभेद दूर होगें और परस्पर एकात्मता भाव सुढ़ृढ़ होगा।

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

 

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