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Hindi Section ( 23 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Terrorism And Murder: From The Islamic Perspective आतंकवाद और क़त्ल: इस्लाम के नज़रिए से

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

24 मार्च, 2014

हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के भेजे जाने का एक मकसद तो बेशक उस दीन को दोबारा स्थापित करना था जो दीन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम वगैरह नबियों का था पर उनके भेजे जाने का एक और मकसद था। ये मकसद था लोगों के दिलों में फिर से दया और रहमत की भावना पैदा करना जो दीन के लुप्त होने के साथ-साथ दिलों से भी लुप्त हो चुकी थी। ये हाल दुनिया के तकरीबन तमाम मुल्कों में था। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की विलादत के वक्त के अरबों के दिल पत्थर हो चुके थे। वो महिलाओं के साथ पशुवत् व्यवहार करते थे, बच्चियों को जिंदा दफन कर देते थे, बात-बात पर उनके बीच खून-खराबा हो जाता था। इंसानी जान की कोई कीमत न थी। जानवरों की तरह इंसानों का क्रय विक्रय होता था और गुलामी प्रथा आम थी।

ऐसे दौर में ईश्वर ने अपने एक बंदे मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सारी इंसानियत के लिये हिदायतकर्ता और रहनुमा बना कर भेजा और उनसे कहा, "हमने आपको पूरी दुनिया के लिये रहमत बना कर भेजा है।" (सूरह अंबिया, 107) खुदा की तरफ से इस भेजे जाने वाले की रहतम में न केवल इंसान बल्कि खुदा की बनाई तमाम मख्लूक शामिल थी। यहाँ तक कि उनके रहमत के साये में अपने मालिक का ज़ुल्म सह रहा एक बेज़ुबान जानवर भी अपना दुःख ज़ाहिर कर सकता था। एक बार नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम किसी अंसारी के बाग़ में दाखिल हुये, अंदर एक ऊँट था जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को देखकर आवाज़ करने लगा और उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे तो रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उसके पास आये और उसकी गर्दन पर हाथ फेरा तो वो चुप हो गया। रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने पूछा, इसका मालिक कौन है? एक अंसारी लड़के ने उत्तर दिया कि ये मेरा ऊँट है, तो रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, 'क्या इस जानवर के बारे में तुमको अल्लाह का डर नहीं है।' इसने मुझसे शिकायत की है कि तुम इसे तेज़ी से हाँकते हो और निरंतर उसके ऊपर भारी बोझ डाले रखते हो। (अबु दाऊद) इस इंसान के रहमत का गवाह न केवल उनका व्यवहार था बल्कि वो अपनी ज़ुबान से भी किसी को तकलीफ न देते थे। उनके इस करुणामयी स्वभाव का गवाह कुरान भी है, "ये अल्लाह की बड़ी दयालुता है कि आप इन लोगों के लिये बहुत नर्म स्वभाव के हो। अन्यथा अगर यदि आप क्रूर स्वभाव और कठोर हृदय के होते तो ये सब आपके आस-पास से छंट जाते। इनके कुसूर माफ कर दो, इनके लिये

मग़फ़िरत की दुआ करो।" (सूरह आले-इमरान, 159)

उनके इस दया और रहमत ने जाहिल और बर्बर अरबों को युगांतकारी परिवर्तन करने वाली कौम में बदल दिया। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जिस दीन को पुर्नस्थापित किया उसका नाम सलामती और अमन था ! मगर दुर्भाग्यवश उनके जाने के बाद उनकी तालीमों को भूला दिया गया और इस्लाम के नाम पर दुनिया में कत्ल, फसाद, दहशतगर्दी शुरु हो गई। परिणाम ये है कि आज सारी दुनिया हिंसक और जेहादी इस्लाम की चपेट में है। जहां कहीं भी इस्लाम के ये तथाकथित ठेकेदार है वहां वहशत और दहशत के बादल छायें हैं, गैर-मुस्लिमों की इज्जत और कई जगह तो खुद मुसलमानों की आबरु और जिंदगियाँ खतरे में पड़ी हुई है और उनके इस कृत्य पर मुंह खोलने वाले मुसलमानों को भी उनकी वहशत का शिकार होना पड़ रहा है।

अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिये इस्लाम का नाम इस्तेमाल करनेवाले उस इंसान की तौहीन कर रहें हैं जिसने अपनी पाक जुबान से ये फरमाया था, "जो लोगों के ऊपर दया नहीं करता, अल्लाह उसके ऊपर दया नहीं करता।" इनके नापाक कृत्यों का ही परिणाम है कि आज कुछ लोग मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम  की तौहीन करने की गुस्ताखी कर रहें हैं।

रसूल की पेशनगोई

उस इंसान को (जिसे खुदा ने तमाम आलम के लिये रहमत और तमाम कौमों के लिये रसूल बना कर भेजा था) को आने वाले जमाने में इस्लाम का नाम खराब करने वालों का अंदेशा था इसलिये उन्होंनें आगे आने वाले जमाने का हाल बताते हुये फरमाया था, ये हदीस हज़रत अबु हुरैरा से रिवायत है, वो फरमातें हैं कि रसूले-खुदा सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने खुदा की कसम खाकर इरशाद फरमाया कि "उस वक्त तक दुनिया खत्म न होगी, जब तक लोगों पर ऐसा दिन न आ जाये कि कातिल को यह इल्म भी न होगा कि मैंनें क्यों कत्ल किया और मक्तूल यह न जानेगा कि मैं क्यों कत्ल हुआ?"

आज दुनिया ठीक उसी जगह पर आकर खड़ी हुई है जिसका इशारा नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी इस हदीस में किया था। रसूल की ये पेशीनगोई आतंकवादियों की तरफ ही तो इशारा कर रही है। वो लोग भी तो मंदिरों में, इबादतगाहों में, बसों और ट्रेनों में, बाजारों में बम रख देतें हैं और उन हजारों लोगों की जानें ले लेतें हैं कि जिन्हें ये भी पता नहीं चलता कि वो किस जुर्म में मारे गये। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला, भारत के दर्जनों स्थानों पर समय समय पर होते रहने वाले बम-विस्फोट, मुंबई में हुआ आतंकी हमला, जम्मू-कश्मीर में तकरीबन दो दशक से चल रहा आतंकवाद, ब्रिटेन के रेलवे-स्टेशन पर हुआ हमला, विभिन्न देशों के राजनयिकों पर होने वाले हमले और हाल में हुये केन्या और पाकिस्तान में हुई वारदातें इसका सबूत है। ये सारे हमले उन लोगों ने किये और करवाये जो खुद को मुसलमान कहतें हैं।

अत्याचार अधर्मियों का काम

ये कौन सा इस्लाम है, जिसकी तब्लीग ये लोग कर रहें हैं? क्या नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम या तमाम अंबियाओं की सीरत की एक भी धटना है जो इनके कृत्य से मिलती है? प्रथम मानव के अवतरण से लेकर आज तक इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया में हमेशा धर्मियों को, मोमिनों को,  ईश्वरभक्तों को दुष्टों का अत्याचार झेलना पड़ा है। अत्याचार हमेशा अधर्मी करतें हैं, जो धर्मी हैं वो अत्याचार कर ही नहीं सकता। कुरान में नाम से 25 नबियों का वर्णन आता है, ये तमाम नबी लोगों को तौहीद की तरफ बुलाने वाले थे। इसी कारण उन्हें अपनी कौम के हाथों तकलीफें उठानी पड़ी, हिजरत करनी पड़ी। बनी ईसराइल की तरफ जितने नबी भेजे गये थे उनमें से कईयों को उनकी कौम ने मार डाला। जो ईश्वर से प्रेम करता है उसे  दुनिया को चाहने वाले कभी अपना नहीं सकते। ये बात प्रथम इंसान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से जमाने से आज तक की धटनाओं से साबित है। कुरान इस बारे में कहता है, "और कुफ्र करने वालों ने अपने रसूलों से कहा, हम तुम्हें अपनी धरती से निकाल कर रहेंगें, या तो फिर तुम हमारे पंथ में लौट आओ।" (सूरह इब्राहीम,13)

हज़रत आदम और बीबी हव्वा की दो औलादें थी, हाबील और काबील। दोनों ईश्वर की आराधना करने निकले तो ईश्वर ने हाबील की भेंट को स्वीकार किया और काबील की भेंट को ठुकरा दिया तो गुस्से में काबील ने ने हाबील का कत्ल कर दिया। यही हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के साथ भी हुआ। उन्होंनें इस दुनिया के मुकाबले में खुदा को पसंद किया तो दुनिया वाले उनके मुखालिफ हो गयें जब उन्होनें अपनी कौम को दीन की दावत दी तो उन्होंनें हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को तो ठुकराया ही और साथ ही साथ उन्हें धमकी देते हुये कहा, "हे नूह! अगर तू बाज़ न आया, तो ज़रुर संगसार कर दिये जाओगे।" (सूरह शुअरा, 117 ) कुफ्र के प्रतिनिधियों ने यही हिमाकत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के साथ भी की। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने भी अपनी कौम को जब बुतपरस्ती छोड़कर एक खुदा की इबादत के लिये बुलाया तो उन्होंनें उनको पहले डराने की कोशिश की फिर जिंदा आग में जलाना चाहा। (सूरह अंबिया, 67) हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम के साथ भी यही कुछ हुआ। उनकी तौहीद की दावत को सुनकर उनकी जाति के बड़े सरदार जो खुद को बड़ा समझते थे ने उन्हें धमकाते हुये कहा, ‘हे शुएब ! हम तुझे और उन लोगों को जो तेरे साथ ईमान लाये हैं, अपनी बस्ती से निकाल कर रहेंगें  या तो तुम्हें हमारे पंथ में लौट आना होगा।  (सूरह आराफ, 88) इसी तरह हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की ऊंटनी को भी उनकी कौम वालों ने मार डाला और उन्हें तकलीफें दी। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब फिरऔन को दीन की दावत दी, तो उसने भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को कत्ल करना चाहा।

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बनी ईसराईल की तरफ भेजे गये थे। उन्होंनें जब यहूदियों को तौहीद की तरफ बुलाया तो उन्होंनें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को गिरफ्तार करवा दिया, उन्हें मारा-पीटा और सूली पर चढ़ा दिया ! यही जुल्म आखिरी नबी मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम  और उनके मानने वालों के साथ भी किया गया। जब उन्होंनें अपने दीन की तब्लीग आरंभ की तो मक्का में उनपर जुल्मो-सितम के पहाड़ तोड़े गये, उनका सामाजिक और आर्थिक बायकॉट किया गया और उन्हें अपने वतन को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। कुरान में जो पुरातन कौमों और लोगों की कहानियां आती है उससे भी यही पता चलता है कि अत्याचार हमेशा वही करतें हैं जो अधर्मी होतें है। सच्चे खुदा पर ईमान लाने वाले असहाबे-कहफ पर उनके बादशाह द्वारा किये गये जुल्मों की दास्तां यही कहती है।

यकीनन वो लोग हरगिज मुसलमान नहीं हैं जो फसाद, कत्ल, आतंकवाद और मासूमों के कत्ल को इस्लाम से जोड़तें हैं। कुरान साक्षी है कि सच्चा मोमिन कभी नाहक किसी का खून नहीं बहा सकता और जो नाहक मासूमों का खून बहाता है फिर वो मोमिन हो नहीं सकता। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने जमाने में अपने प्रिय सहाबी हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) के निदोर्षों के खून बहाने के कृत्य को पसंद नहीं फरमाया और खुद को उनके जुर्म से अलग कर लिया (ये हदीस हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत है। वो कहतें हैं कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत खालिद बिन वलीद को बनी जजिमा की तरफ भेजा तो हज़रत खालिद ने उन्हें इस्लाम की दावत दी। वो अच्छी तरह ये न कह सके कि हम इस्लाम लाये बल्कि वो ये कहने लगे कि हमने अपना दीन बदल डाला। जिस पर हज़रत खालिद ने उन्हें कत्ल कर दिया और कुछ को कैद कर के हम में से सबको एक कैदी के रुप में दे दी। फिर एक रोज हज़रत खालिद ने हुक्म दिया कि हर आदमी अपने कैदी को मार डाले। मैनें कहा, मैं हरगिज ऐसा न करुँगा और न ही मेरा कोई साथी अपने किसी कैदी को मारेगा। फिर जब हम नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास आये और उनसे सारा किस्सा बयान किया तो आपने अपने हाथ उठाये और दुआ फरमाई, ऐ अल्लाह! मैं खालिद के काम से बरी हूँ। आपने दो बार ये दुआ फरमाई। (बुखारी शरीफ, गज़वात के बयान) हज़रत खालिद बिन वलीद(रज़ि.) को नबी-ए-पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुदा की तलवारकहा करते थे और वो उनके प्रमुख सहाबियों में विशिष्ट स्थान रखते थे । जब उनके द्वारा बेगुनाहों के खून किये जाने पर उन्होंनें खुद को वलीद के इस काम से बरी कर लिया तो फिर क़यामत के रोज़ वो कैसे उन जालिमों और इस्लाम का नाम बदनाम करने वालों के लिये मग़रिफ़त और बख्शिश की सिफारिश करेंगें जिनके हाथ निर्दोषों के खून से से रंगे होंगें और दामन दहशतगर्दी के छींटों से?

इस्लाम सलामती का दीन

दुनिया के तमाम मज़हबों में इस्लाम वाहिद है जो लोगों को हर मुलाकात पर सलामती की दुआ देने का निर्देश देता है। इस्लाम अपने मानने वालों को ये भी आदेश देता है कि सलामती की दुआ देने में पहल करनी चाहिये। हज़रत अब्दुल्लाह से रिवायत है कि नबी करीम ने इरशाद फरमाया, "सलाम में पहल करने वाला तकब्बुर से बरी है।" (बैहकी) इस्लाम की तालीम लोगों के साथ नरमी बरतने की है, फसाद, कत्ल, दहशतगर्दी जैसी चीजों के लिये इस्लाम में कोई गुंजाईश नहीं हैः-

- खुदा के बंदे तो वो हैं जो ज़मीन पर आहिस्तगी से चलतें हैं और जब जाहिल लोग उनसे जाहिलाना गुफ्तगू करतें हैं तो वो उन्हें सलाम कहतें हैं। (सूरह रकान, 63)

- तबरानी में हज़रत अबूदर्दा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फरमातें हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, "सलाम को खूब फैलाओ ताकि तुम बुलंद हो जाओ।"

-"और तुम्हें सलामती की कोई दुआ दी जाये तो तुम भी सलामती की उससे अच्छी दुआ दो या वहीं दुहरा दो।" (सूरह निसा, 86)

इन्हें मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम  को बदनाम करने का हक किसने दिया?

एक आंकड़ें के मुताबिक पिछले 150 सालों में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तौहीन करने वाली 50 हज़ार से अधिक किताबें लिखी गईं। इन किताबों को लिखने वाले निःसंदेह अपराधी है पर उन्हें इस कृत्य पर उभारने का काम करने वाले वो लोग हैं जिन्होंनें अपने फायदे के लिये इस्लाम और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पाक नाम की तौहीन करवाई। इन लोगों ने कत्लो- गारत और आतंकवादी कारवाईयों की योजना बनाई और अपने संगठन का नाम उस नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पाक नाम पर रख दिया जिसके सीरत से सिर्फ मोहब्बत की खुश्बू आती है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने प्रिय सहाबी हज़रत खालिद बिन वलीद(रज़ि.) के हाथों हुई एक गलती से खुद को अलग कर लिया था इसलिये कि कुफ्र को ये कहने का मौका न मिले कि देखो, मोहम्मद ने इस गलत काम करने वाले का साथ दिया। फिर आज ये लोग किस हक से अपने नापाक कामों में रसूल को शामिल कर रहें हैं और अपने दुनियावी मकसदों को साधने वाले कामों के साथ रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पाक नाम को शामिल कर रहें हैं? क्यों नहीं मुस्लिम उलेमाओं की तरफ से उनकी इस गुस्ताफी पर कोई आवाज उठती है?

मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर अवतरित ग्रंथ ने बेशक जिहाद की बात की पर उसने फरमाया, "सबसे बेहतरीन जिहाद वो है जो कुरआन की तलवार से लड़ी जाये।" (सूरह फुरकान, 52) वो लोग जो क़ुरान की तलवार की बजाए वास्तविक तलवार लेकर इस्लाम का परिचय दे रहें हैं क्या वो कुरान और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तालीम के मुखालिफ नहीं हैं? ये सब इस्लाम के नाम पर  हज़रत अब्दुल्ला बिन अम्रू एक हदीस रिवायत करतें हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, "रहम करने वालों पर रहमान रहम करता है। तुम ज़मीन वालों पर रहम करो और, आसमान वाला तुम पर रहम करेगा।" अबु दाऊद शरीफ में आई इस हदीस को आज इस्लाम का इस्तेमाल अपने स्वार्थों के लिये करने वाले भूल गये हैं। मासूमों को मारना, निर्दोषों को बम से उड़ा देना, अपहरण करना ये सारे काम ही आज इनके मुस्लिम होने की पहचान बन गई। ये अपने मन-मर्जी से इस्लामी अवधारणों यथा जिहाद, काफिर, कुफ्र और शिर्क की व्याख्या करतें हैं और किसी को भी काफिर धोषित कर उसे मारने निकल पड़तें है। जेहाद का नाम लेकर ये लोग वो तमाम काम करतें हैं, जो कुरान के द्वारा तय किसी भी मानक पर खड़ा नहीं उतरता।

मुसलमानों का हित चाहने वालों को इस बात की तहकीक जरुर करनी चाहिये कि मुस्लिम इतिहास में जेहाद का नाम लेकर जो कत्लेआम हुये उसमें कितने अल्लाह के दीन के लिये थे और कितने उन हादियों के निजी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये। ओसामा बिन लादेन और उसके संगठन ने अमेरिका पर आतंकवादी हमला किया और उसके दो टावर उड़ा दिये। लादेन के इस कृत्य ने अमेरिका को मौका दे दिया कि वो अपना स्वार्थ पूरा करने के लिये आगे आ जाये और बदले में उसने मुसलमानों को दो देशों को अपना निशाना बनाया, उसमें कत्लेआम करवाया और उनके राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। इस्लाम का नाम लेकर मुसलमानों की बर्बादी तय करने वाले लोगों को ये हक किसने दिया कि वो अपनी मन-मर्जी से कुछ भी करें और भुगतना बेचारे निरपराधों को पड़े?

इन लोगों के इन्हीं कुकृत्यों का ही परिणाम है कि दुनिया में आज इस्लाम को आतंक का पर्याय माना जाता है , नबी-ए-करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के खिलाफ अनाप-शनाप लिखा जाता है और पवित्र कुरान के बारे में यही समझा जाता है इसमें सिर्फ जिहाद की बातें हैं। अगर ये लोग दुनिया के सामने इस्लाम के वास्तविक रुप को नहीं दिखा सकते तो फिर उन्हें ये हक भी नहीं है कि ये इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी फैला कर इस्लाम का नाम बदनाम करें।

कत्ल और आतंकवाद को इस्लाम का समर्थन नहीं

वो लोग जो अपने क़त्लो-गारत और दहशतगर्दी के कामों को इस्लाम के आदेशानुसार बतलातें हैं वो कुरान और रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तालीमों का अपमान करतें है। क्योंकि कुरान वो ग्रंथ है जिसने एक कत्ल के अपराध को पूरी इंसानियत के कत्ल करने के अपराध के बराबर रखा और कहा, "और जिसने किसी व्यक्ति को किसी खून का बदला लेने या धरती पर फसाद फैलाने के सिवा किसी और कारण से कत्ल किया तो मानो उसने सारी इंसानियत का कत्ल कर दिया और जिसने उसे जीवन प्रदान किया समझो उसने पूरी इंसानियत की रक्षा की।" (सूरह माइदह, 32)

"किसी जान को कत्ल न करो जिसके कत्ल को अल्लाह ने हराम किया है सिवाय हक के।" (सूरह इसरा, 33)

कुरान जिस जगह नाज़िल हुआ था वहां के इंसानों की नज़र में इंसानी जान की कोई कीमत न थी। बात-बात वो एक दूसरे का खून बहा देते थे, लूटमार करते थे। कुरान के अवतरण ने न केवल इन कत्लों को नाजायज़ बताया बल्कि कातिलों के लिये सज़ा का प्रावधान भी तय किया। वो आतंकी लोग जो कुरान के मानने वाले होने की बात करते हैं उन्हें ये जरुर पता होना चाहिये कि इस्लाम ने ये सख्त ताकीद की है कि खुदा की बनाई इस धरती पर कोई फसाद न फैलाये (हमने हुक्म दिया कि खुदा की अता की हुई रोजी खाओ और धरती पर फसाद फैलाते न फिरो, सूरह बकरह, 60)

कुरान वो ग्रंथ है जो न केवल फसाद (आतंकवाद) यानि दहशतगर्दी फैलाने से मना करता है बल्कि दशहतगर्दी फैलाने वालों के कत्ल को जाएज करार देता है (सूरह माइदह, 32)

यहां ये बात भी याद रखने की है कि पवित्र कुरान में जिहाद शब्द केवल 41बार आया है (वो भी विभिन्न अर्थों में) जबकि रहमत या दया शब्द 335 बार और इंसाफ शब्द 244 बार आया है।

मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की तालीम

जब मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने मक्का में दीन की दावत शुरु की तो ये बात वहां के सरदारों को बेहद नागवार गुजरी और उन्होंनें मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से इस्लाम की दावत छोड़ने को कहा, उन्हें तरह तरह के लालच दिये। मगर जब मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस्लाम की तरफ लोगों को बुलाना बंद नहीं किसा तो मक्का के सरदारों ने उन्हें और उनके मानने वालों पर अत्याचार शुरु कर दिये। हज़रत ख्बबाब को बांध कर पूरे मक्के में धसीटा गया जिससे उनकी पीठ का चमड़ा जानवरों की तरह हो गया। एक हब्शी गुलाम हज़रत बिलाल को उसके मालिक तपती रेत पर लिटा देते थे और उनकी छाती पर बड़े बड़े पत्थर रख देते थे। एक अमीर सरदार हज़रत सुहैब के ऊपर भी अत्याचार किये गये और मक्का वालों ने उनके तमाम धन-दौलत छीन लिये। एक और दास हज़रत अम्मार एवम् उनके वालिद यासिर और वालिदा बीबी सुमैय्या पर भी अत्याचार किया गया। हज़रत यासिर और बीबी सुमैय्या को मक्का के सरदारों ने मार डाला। नबिया नाम की एक दासी को इतना मारा गया कि वो अंधी हो गईं।

मक्का वालों का ये जुल्म केवल गुलामों और दासों पर ही नहीं था वरन् मक्का के मालदारों में एक हज़रत उस्मान को उनके चाचा ने रस्सियों से बांध कर पीटा। जुबैर बिन अवाम को जान से मारने की कोशिश की गई। गफ्फार कबीले के एक सरदार अबु ज़र को मारते मारते बेहोश कर दिया गया। स्वयं मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम भी उनके जुल्मों का शिकार बने। एक बार जब वो इबादत में मशगूल थे तो लोगों ने उनके गले में पट्टा डालकर उन्हें धसीटा तो एक ने उनके ऊपर जिबह किये गये ऊँट की गंदगी डाल दी गई। अत्याचार जब सीमा से बाहर हो गये तो मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने मानने वालों में से कुछ को हब्शा हिजरत करने को कहा और खुद अपने चंद साथियों के साथ कुरैश का अत्याचार झेलते हुये भी दीन की दावत देते रहे। मक्का के लोगों ने जब ये देखा कि इतने अत्याचारों के बाद भी मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का इरादा नहीं बदला है तो उन्होंनें एक सभा की और निर्णय लिया कि इस्लाम के मानने वालों का आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाये और तीन वर्षों तक मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और उनके परिवरजनों तथा इस्लाम लाने वालों को आर्थिक बहिष्कार झेलना पड़ा। इन तमाम अत्याचारों से भी जब मक्के वालो का दिल नहीं भरा तो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लममदीना हिजरत कर गये।

सब्र और रहमत की बेजोड़ मिसाल

इतने ज़ुल्मो-सितम झेलने के बाद शायद कोई भी इन अत्याचारियों को क्षमा नहीं करता पर फत्ह-मक्का के दिन मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जो किया उसकी मिसाल इतिहास में कहीं भी नहीं मिलती। मदीने में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के जाने के बाद इस्लाम फैलना शुरु हुआ और 8 हिजरी रमजान के महीने में मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने 10 हज़ार साथियों के साथ मक्के के लिये चल पड़े। मक्का पहुँचते ही उनके तमामा उन साथियों के ज़ख्म कुरैशों को देखकर ताज़ा हो गये जिनके साथ इन कुरैशों ने इस्लाम के आरंभिक दिनों में बेइंतहा अत्याचार किया था, उनके माल-दौलत लूट लिये थे और उनकी औरतों को जबरन गुलाम बना लिया था। जब मुसलमानों की फौज मक्का के काफिर सरदार अबु सुफियान के घर के सामने से गुज़र रही थी जब अबु सूफियान को देखकर मुसलमानों के सरदार सआद बिन उबादा बोल उठे, आज खुदा तआला ने हमारे लिये ये हलाल कर दिया है कि हम तलवार के ज़ोर से मक्के में दाखिल हो जाये।

आज कुरैश कौम ज़लील कर दी जाएगी। जब अबु सूफियान ने ये सुना तो वो नबी करीम के पास जाकर बोले, हे नबी! 'क्या आज आपने अपने कौम को कत्ल की आज्ञा दे दी है? क्या आपकी रहमत इस बात को गवारा नहीं करती कि आप अपने कौम की खताओं को माफ कर दें?' इस पर रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, 'ऐ अबु सूफियान! साद ने गलत कहा, आज तो रहम का दिन है, आज अल्लाह तआला कुरैश और खाना काबा को अज्मत देने वालें हैं।' फिर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपना एक आदमी साद के पास भेजा और उससे कहलवाया कि वो अपना झंडा अपने बेटे कैस को दे दें कि वह उसके स्थान पर कमान संभालेगा। कैस को कमान देने की पीछे रसूल की रहमत ही थी क्योंकि वो जानतें हैं कि मक्का वालों के द्वारा किये गये जुल्म कहीं सआद को उनके कत्लो-गारत पर न उभार दे इसलिये उन्होंनें कमान उनके बेटे हज़रत कैस को दे दी जो बेहद रहमदिल इंसान थे।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने कमांडर खालिद बिन वलीद को बड़ी सख्ती से ये आदेश दिया था कि वो किसी पर जुल्म न करें पर वलीद ने उनकी बात नहीं मानी और 24 लोगों का कत्ल किया। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को जब ये पता चला तो उन्होंनें वलीद को बेहद सख्त अल्फाज में डांटा। मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की माफी उनके सबसे बड़े दुश्मन अबु जहल के बेटे हज़रत इक्रमा को भी मिली और अबु सूफियान की बीबी हिंदा को भी मिली। ये नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का व्यवहार था जो गुनाहों का अंबार ढ़ोने वालों को भी रहमत के आगोश में ले लेता था, उस हिंदा को माफी दे देता था जिसने उहद के मैदान में उनके प्यारे चचा के जिगर को चबाया था, उस इक्रमा को माफ फरमा दिया जिसकी तलवार नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की गर्दन काटने के फिराक में रहती थी और उन तमाम मक्का वालों को अमान देता था जिनकी सारी जिंदगी रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, उनके परिवार वालों और उनके साथियों को तकलीफें देने में गुजरी थी और आज उसी नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सुन्नत का दंभ भरने वाले वो लोग हैं जिनकी गोलियां बिना किसी से उसका गुनाह पूछे उसे मौत के आगोश में सुला देती है, बच्चों को यतीम बना देती है, ललनाओं को भरी जवानी में वैधव्य का तोहफा देती है और माताओं को गोद सूनी कर देती है। ये कौन सा इस्लाम है और ये कैसे सुन्नत का पालक होने का दंभ भरने वालें हैं? क्या इन्हें ये लगता है कि कयामत के रोज नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने इन उम्मतियों की कारनामों को सुनकर उनकी पीठ थपथपायेंगें? हरगिज़ नहीं, बल्कि इन ज़ालिमों पर अमन के उस राजकुमार की जुबान से फिटकार पड़ेगी और जहन्नम का एक कोना इनके लिये तैयार कर दिया जाएगा।

पवित्र कुरआन की आयत है, "तुम (ऐ मुहम्मद!) तो केवल सचेत करने वाले हो, और हर चीज का हवलदार तो अल्लाह है।" जब अपने सबके बरगुज़ीदा पैगंबर को अल्लाह ने हक को ठुकराने वालों को उनके हाल पर छोड़ देने का आदेश दिया तो फिर ये लोग कौन होतें हैं लोगों को बंदूक और बारुद के साथ समझाने वाले? क्या ऐसे लोग कुरआन के मुखालिफ नहीं है?

मुसलमानों की ज़िम्मेदारी

एक मुसलमान की ज़िम्मेदारी क्या होनी चाहिये, इसे बताने के लिये खुदा ने एक पूरी सूरह नाजिल फरमा दी। सूरह अस्र में आता है, "जमाने की कसम! इंसान बेशक खसारे में है, सिवाए उनके जो ईमान लाये और नेक आमाल के पाबंद रहे और दूसरे को आमाल की पाबंदी की ताकीद करते रहे (अलबत्ता ये लोग पूरे-पूरे कामयाब हैं)" यह सूरह एक मुसलमान को यह याद दिलाती है कि वह केवल अपने इस्लाह में ही न लगा रहे वरन् अपने समाज के और मआशरे के दूसरे लोगों के प्रति भी उसकी जिम्मेदारी है और वो ये है कि वह उन्हें हक और सही राह चुनने और उस पर चलने की ताकीद करे। मगर बदकिस्मती से मुसलमान अपनी इस जिम्मेदारी को भूल गये हैं। इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वालों और फसाद को जेहाद कहने वालों को आज हर किस्म की खुली छूट उनके समाज ने और उलेमाओं ने दी रखी है।

इस्लाम का नाम लेकर कत्ल और दहशतगर्दी करने वालों का विरोध और निंदा करना तो दूर उल्टा इस्लामी समाज के जिम्मेदार लोग इसे इस्लाम विरोधियों की साजिश करार देकर टाल जातें हैं। नबी या रसूल को तो खुदा एक तय अवधि के लिये ही भेजता है उसके बाद उनके मानने वालों की ये जिम्मेदारी रहती है कि वो उनकी तालीमों पर अमल करे और दूसरों को भी उस पर चलने की ताकीद करें। इस्लाम दिल जीतने के लिये आया था। बर्बर अरबों के दिल में दया की भावना प्रस्फुटित करने वाली तालीम इस्लाम की थी, जिस अरब में किसी को किसी कत्ल के लिये सजा नहीं मिलती थी वहां कत्ल को गुनाहे-अजीम धोषित कर उसके लिये सजा तय करने वाली तालीम भी इस्लाम की ही थी। ये इस्लाम ही था जिसने ये स्पष्ट कहा था कि वो कौम भी अज़ाब की हकदार बनती है जो अपने लोगों को गलत रास्ते पर चलने से नहीं रोकती। सूरह हूद की आयतों में आता है, "जो कौमें तुमसे पहले हलाक हो चुकी हैं, उनमें ऐसे समझदार लोग क्यों न हुये जो लोगों को मुल्क में फसाद फैलाने से रोकते अलबत्ता चंद आदमी ही ऐसे थे जिन्हें हमने अज़ाब से बचा लिया था।" (सूरह हूद, 116:117)

सिर्फ कुरान ही नहीं नबी करीम की तालीम भी यही कहती है। उनकी मुबारक जुबान से निकली कई हदीसें हैं यथा, -हज़रत उर्स बिन अमीरा फरमातें हैं, :अल्लाह तआला बाज लोगों की गलतियों पर सबको अजाब नहीं देतें अलबत्ता सबको इस सूरत में अजाब देतें हैं जबकि फरमाबरदार बाबजूद कुदरत के नाफरमानी करने वालों को न रोकें। (तिबरानी) -हज़रत ज़ैनब बिंत जहश फरमाती हैं कि मैनें रसूलसल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से पूछा, या रसूल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम! क्या हम लोग ऐसी हालत में भी हलाक हो जायेंगे जबकि हममें नेक लोग भी हो? आप ने इरशाद फरमाया, हां, जब बुराई आम हो जाये।(बुखारी)

- हज़रत हुज़ैफा बिन यमान फरमातें हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, "कसम है उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है, तुम ज़रुर अम्र बिल्मारुफ और नह्य अनिल मुन्कर करते रहो वरना अल्लाह तआला अंकरीब तुम पर अपना अज़ाब भेज देंगें, फिर तुम दुआ भी करोगे तो अल्लाह तआला तुम्हारी दुआ कबूल न करेंगें।" (तिर्मिज़ी) वो लोग जो अपने दीन से, अपने रसूल से मोहब्बत करतें हैं और चाहतें हैं कि उनके प्यारे नबी के लाये दीन को कोई रुसवा न करे तो उन्हें चाहिये कि वो सामने आकर इस्लाम का नाम बदनाम करने वालों के खिलाफ आवाज बुलंद करें अन्यथा कयामत के रोज़ रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बारगाह में उनसे ये जरुर पूछा जाएगा कि तूने कादिर होते हुये भी अपनी कौम को इन गुनाहों के काम से क्यों नहीं रोका और क्यों तूने खुदा के दीन और उसके रसूल की बदनामी करने वालों की कृत्यों के प्रति आंखें मूंद ली?

सिद्धांतों और मान्यताओं को लेकर मतभेद तो हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के काल से चला आ रहा है, और कयामत के रोज तक चलेगा क्योंकि पवित्र कुरान ने ये कहा है, "हरेक के लिये एक दिशा है तो तुम नेकियों में अग्रसरता प्राप्त करो।" हर इंसान अपनी समझ के हिसाब से अपने आपको उस रब के साथ जोड़ता है। कोई एक तरीका ही हमें हमारे माबूद के करीब कर सकती है और मैंनें जिस तरीके को अख्तियार कर रखा है बस यही सही तरीका है, ये सोच ही कत्लो-गारत और आतंक के काम का आधार है।

इस मान्यता से तो मजहब के नाम पर खून बहाने वाले किसी आताताई का भी इंकार नहीं हो सकता कि इस्लाम के साथ दीन की पूर्णता आ गई है। अगर ऐसा है तो फिर इस्लाम के आने के बाद भी संसार में वही बर्बरता, वहशीपन, खून-खराबा, कत्लेआम, लूट-मार, बलात्कार चलता ही रहे और वो भी उस दीन के मानने वालों के द्वारा तो फिर इस्लाम के साथ दीन की पूर्णता का अर्थ क्या हुआ? अल्लाह ने मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम  को भेजने से पूर्व जिन एक लाख तेईस हजार नौ सौ निन्यानवे नबियों को भेजा था, वो सबके सब मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की राह देखने वाले थे क्योंकि उन्हें यकीन था कि इस सारे आलम के लिये रहमत बन कर आने वाले इस इमामुल अंबिया के आदर्शों पर चलने वाले उनके उम्मती दुनिया में अमन और खुशहाली का वो दौर लायेंगें जिसे लाने की कोशिश उन सबने की थी। मगर अफसोस उस इमामुल अंबिया की उम्मत उस यकीन को पूरा करना तो दूर उनके आदर्शों के विपरीत काम करने में लगी है। इस्लाम तो वो था जिसने सबके ऊपर सलामती की दुआ करने की तालीम दी थी, जिसमें हर काम इस अकीदे को जेहन में रखकर करने का था कि मैं इस काम को उस खुदा के नाम से अंजाम देने रहा हूँ जिसका नाम ही रहमान है। और जो रहमान है वो कभी भी किसी को अपने बंदों पर जुल्म करने की इजाजत नहीं दे सकता।

आज हकीकी इस्लाम को (जिसे मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम लेकर आए थे) मज़हब के नाम पर सियासत करने और अपना स्वार्थ साधने वालों की मनमाफिक व्याख्याओं ने बंधक बना लिया है। वो इस्लाम आज कहीं भी दिखता ही नहीं जो हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का था, नूह अलैहिस्सलाम का था, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का था और उन तमाम नबियों का था जिसे खुदा ने अपनी प्यारी धरती और अपनी एक बेहतरीन मख्लूक की हिफाजत और रहबरी करने के लिये भेजा था। सबसे अफसोसनाक बात तो ये ही है कि जिस दीन का नाम सलामती है, जिस दीन के मालिक का नाम सलाम है, जिस दीन का सबसे बरगुज़ीदा पैगंबर सारी दुनिया के लिये रहमत बना कर भेजा गया था, जहां दुश्मन का अभिवादन भी 'आप पर सलामती हो' कह कर किया जाता है, उस दीन के मानने वालों के जुल्म से आज दुनिया दहशत के साये में है और इस दीन के तमाम अलंबरदार इन तमाम ज्यादतियों और इस्लाम को बदनाम करने वालों के कृत्यों पर खामोशी की चादर ओढ़ें बैठें हैं और रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की उस पेशनगोईं की याद दिला रहें हैं जिसे वो अपनी मुबारक जुबान से आज से तकरीबन 1400 साल पहले फरमा चुके थे। मुस्लिम शरीफ में यह हज़रत हुजैफा से रिवायत है, वो फरमातें है कि रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया, "मेरे बाद ऐसे रहबर होंगें, जो मेरी हिदायत को कबूल न करेंगें और मेरे तरीके को अख्तियार न करेंगें और बहुत जल्द उनमें से ऐसे लोग खड़े होंगें, जिनके दिल इंसानी बदन के होते हुये भी दिल शैतान वाले होंगें।"

पवित्र कुरान की आयत है, "हर एक के लिये एक दिशा है और वह उसी की ओर रुख किये हुये है, तो तुम नेकियों में अग्रसरता प्राप्त करो।" जहाँ कहीं भी तुम होगे अल्लाह तुम सबको इकट्ठा करेगा। निःसंदेह अल्लाह को हर चीज का सामर्थ्य प्राप्त है।‘ (सूरह बकरह, 2:148)

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/terrorism-and-murder--from-the-islamic-perspective-आतंकवाद-और-क़त्ल--इस्लाम-के-नज़रिए-से/d/66234

 

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