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Hindi Section ( 29 March 2014, NewAgeIslam.Com)

Divorce, Women and Islam तलाक़, औरत और इस्लाम

 

 

 

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

30 मार्च, 2014

निकाह अथवा विवाह संबंध को दुनिया के तमाम धर्मों में एक आला मुकाम हासिल है। हिंदू धर्म में जहां इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है वहीं इस्लाम में हजरत मोहम्मद (सल्ल0) ने निकाह की अहमियत बताते हुये अपनी जुबाने-मुबारक से फरमाया था,  "बंदे ने जब निकाह कर लिया तो आधा दीन मुकम्मल हो जाता है, अब बाकी आधे के लिये के लिये वह अल्लाह से डरे। " (मिश्कात, जि0-2, सफा-72, हदीस-2962) 

(हिंदू ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण (5/2/1/10) के एक मंत्र में भी यही भाव है। इस मंत्र में आता है, "पत्नी मनुष्य का आधा अंग है, मनुष्य तब तक अधूरा रहता है जबतक वह पत्नी प्राप्त कर संतानोत्त्पत्ति नहीं कर लेता।" )

इस हदीसे-पाक को अगर सामने रखे तो पता चलता है कि नबी (सल्ल0) ने निकाह को कितनी अहमयित दी है। इस्लाम की पाँच बुनियादें है,  जिनका अनुपालन करने से बंदे का दीन मुकम्मल होता है। निकाह की इससे बड़ी अहमियत और क्या होगी कि नबी (सल्ल0)  ने ईमान के तराजू के पलड़े पर एक तरफ हज, नमाज, रोजा, जकात आदि बुनियाद आमाल को रखा और दूसरी तरफ सिर्फ निकाह को। निकाह को यह आला फजीलत इसलिये हासिल है क्योंकि इसके द्वारा इंसान न केवल जिना, बदकारी, व्यभिचार आदि बुराईयों से बचता है बल्कि उसमें उत्तरदायित्व की भावना का भी विकास होता है और वह संतान उत्त्पत्ति के द्वारा सृष्टि के क्रम को भी चालू रखता है। निकाह का मकसद किरदार की पाकीजगी भी है। इन्हीं कारणों से नबी (सल्ल0 ने ये फरमाया था कि एक बार बंदा निकाह कर ले तो उसका आधा दीन मुकम्मल हो जाता है। ऐसे में यह हरगिज जायज नहीं कि बंदा अल्लाह के द्वारा दी गई इस अजीम नेमत और आर्शीवाद को तलाक देकर गंवा बैठे।

विवाह संबंध ईश्वर की तरफ से  

इस मान्यता के बारे में हर मजहब में एकरुपता है कि निकाह का पाक रिश्ता खुद ईश्वर तय करता है। पवित्र कुरान में इस बारे में कई जगहों पर आता है, उदा0-

- वही है जिसने आदमी को पानी से पैदा किया और फिर उसे वंश तथा ससुराली रिश्तों वाला कर दिया। (सूरह फुरकान, 25:54)

- और उसकी निशानियों में से यह है कि उसने तुम्हारे लिये स्वयम् तुम्हीं में से जोड़े पैदा किये ताकि तुम उनके पास आराम और चैन पाओ तथा तुम्हारे बीच प्रेम और दयालुता रख दी। (सूरह रुम, 30:21)

हिंदू धर्म में विवाह को जन्म-जन्मांतर का संबध माना जाता है। वर-वधू को लोग यही आशीष देतें हैं कि उनकी जोड़ी सात जन्मों तक कायम रहे। इस्लाम में यधपि सात जन्मों का सिद्धांत मान्य नहीं है तथापि ऐसी मान्यता जरुर है कि किसी ने अगर बिना तलाक अपना वैवाहिक जीवन इस दुनिया में बिताया है तो जन्नत में भी उसे वही बीबी मिलेगी। नबी (सल्ल0) ने भी यही कामना की थी कि अपनी जिन बीबियों को उन्होंनें इस दुनिया में अपना हमराह बनाया था वो जन्नत में भी उनकी बीबी के रुप में हों। इसलिये कुरान ने हुक्म दे दिया था यह जायज नहीं कि नबी के बाद कोई उनकी पत्नियों से निकाह करे। (कुरान, अल-अहज़ाब,  33:53)

जिस रिश्ते को ईश्वर ने इतनी अहमियत दी है, जो संबंध ईश्वर की मंशा और उनके आशीष से कायम होता है , उस रिश्ते को तोड़ना क्या खुदाई मंशा की अवहेलना और ईश्वर के आर्शीवाद को गंवाना नहीं है ?

तलाक अल्लाह को नापंसद

- हजरत अब्दुल्ला इब्ने उमर फर्मातें हैं कि नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "हलाल चीजों में अल्लाह को सबसे नापसंदीदा तलाक है। " (अबू दाऊद)

- हजरत मुआज इब्ने जबल फर्मातें हैं कि मुझसे नबी (सल्ल0) ने फरमाया, " ऐ मुआज! इस धरती पर अल्लाह को गुलाम आजाद करने से ज्यादा कोई चीज पसंदीदा नहीं और धरती पर सबसे ज्यादा गंदी और नापसंदीदा चीज अल्लाह के नजदीक तलाक है। "

इसका अर्थ ये है कि जबतक कोई बड़ी जरुरत न हो तलाक नहीं दी जानी चाहिये क्योंकि यह एक ऐसी चीज है जो अल्लाह को सबसे अधिक नापंसदीदा है और अल्लाह के गजब को आमंत्रण देती है।

निकाह मर्जी पूछ कर तो तलाक बिना रजामंदी के क्यों?

तलाक की नौबत न आये इसके लिये इस्लाम में तलाक की प्रक्रिया को बेहद जटिल बनाया गया है मगर चूंकि लोगों को इस पूरी प्रक्रिया का सही इल्म नहीं है, इसलिये उनकी जहालत ने इसे बेहद आसान बना दिया है। पुरुष स्त्री को डराने, उस पर धौंस जमाने और उसे काबू में करने के लिये तलाक को हथियार के रुप में इस्तेमाल करता है। जब मर्जी हुई तलाक का लब्ज तीन बार बोलकर अपनी बीबी को अपनी जिदंगी और घर दोनों से बाहर कर दिया। कभी स्त्री से उसकी मंशा नहीं पूछी जाती कि क्या उसे भी ये तलाक मंजूर है?

इस्लाम धर्म विधान में निकाह से पूर्व लड़की की मर्जी जानना न केवल जायज है बल्कि उसका ये तक हक है कि अगर वो निकाह से इंकार कर दे तो फिर उसके साथ जर्बदस्ती नहीं की जा सकती। इस्लाम दुनिया का वाहिद मज़हब है जहाँ निकाह पूर्व लड़की से दो बार मर्ज़ी पूछने का विधान है ! सिर्फ निकाह से पूर्व ही नहीं, निकाह के दौरान भी औरत से उसकी मर्जी पूछी जाती है। इस्लाम में काजी निकाह पढ़ाने के पूर्व लड़की से तीन बार उसकी मर्जी पूछतें हैं कि आपका निकाह फ्लां शख्स के बेटे फ्लां के साथ किया जा रहा है, आपको ये निकाह कबूल है? अगर वो कबूल करे तभी वो निकाह कराया जा सकता है अन्यथा नहीं। औरतों से उसकी मर्जी पूछ कर ही उसका निकाह किया जाये,  इसके मुतल्लिक दसियों हदीसें हैं।

-  हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है रसूल ने इर्शाद फरमाया, "बालिग कुंवारी लड़की से उसकी निकाह की इजाजत ली जाये अगर खामोश हो जाये तो यह उसकी तरफ से इजाजत है और अगर इंकार कर दे तो उसपर कोई जर्बदस्ती नहीं। " (तिर्मिजी शरीफ, हदीस-1101, जि0-1, सफा-567)

हजरत अबुहूरैरा और हजरत अब्दुल्ला इब्ने अब्बास से रिवायत है, रसूल ने इर्शाद फरमाया,  "कुंवारी का निकाह न किया जाये जब तक कि उसकी रजामंदी न ले ली जाये" (मस्नदे-अहमद, तिर्मिजी शरीफ)

"और निकाह न किया जाये बेबा का, जब तक कि उससे इजाजत न ले ली जाये।" (तिर्मिजी, जि0-1, सफा-566, मस्नदे इमामे आजम,  सफा-214)

हजरत अब्दुल्ला इब्ने -अब्बास से रिवायत है कि एक औरत का शौहर मर गया। उसके देवर ने उसे निकाह का पैगाम भेजा मगर औरत का बाप देवर के साथ उसका निकाह करने पर राजी नहीं हुआ और उसका निकाह किसी दूसरे मर्द के साथ कर दी। वो औरत नबी (सल्ल0) के पास आई और उनसे सारा हाल कह सुनाया। हुजुर ने उसके बाप को बुलबाया और फरमाया, यह औरत क्या कहती है? उसके बाप ने जबाब दिया, ये सच कहती है मगर मैनें इसका निकाह एक ऐसे आदमी से किया है जो इसके देवर से बेहतर है। इस पर हुजूर(सल्ल0) ने वह निकाह रद्द फरमा दिया और उसका निकाह उसी आदमी से कर दिया जिससे वो करना चाहती थी। (मस्नदे इमामे-आजम, बाब-124, सफा-215) यही हदीस बुखारी शरीफ और इमाम मालिक की मोअत्ता में भी आई है जिसमें यह पता चलता है कि उस महिला का नाम 'खन्सा बिंते खिजाम' था। वो फरमाती हैं, मेरे वालिद ने मेरा निकाह जर्बदस्ती कर दिया और मैं उस निकाह से खुश नहीं थी, मैं नबी(सल्ल0) के पास आई और आपने वो निकाह रद्द फरमा दिया। (मोअत्ता शरीफ, जि0-2, सफा-424, बुखारी शरीफ, जि0-3, सफा-76)

ये काम (यानि मर्जी पूछने का) खुद नबी-ए-पाक (सल्ल0) करते थे। एक हदीस हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, वो फरमातें हैं कि जब नबी (सल्ल0) अपनी किसी साहबजादी को किसी के निकाह में देना चाहते तो वो उनके पर्दे के पास तशरीफ़ लाते और फरमाते, 'फ्लां शख्स तुम्हारा जिक्र करता है और फिर निकाह पढ़ा दिया करते।' (मस्नदे इमामे-आजम़ बाब-123, सफा-214) अपनी सबसे अजीज बेटी बीबी फातिमा के निकाह के वक्त भी नबी (सल्ल0) ने उनसे उनकी मर्जी पूछी थी और फिर हजरत अली(रज़ि0) को जबाब दिया था। इब्ने अब्बास से रिवायत है कि सरकार ने जब अपनी साहबजादी हजरत फातिमा (रज़ि0) का निकाह अली (रज़ि0) से करने का इरादा फरमाया तो आप फातिमा (रज़ि0) के पास तशरीफ़ लाये और इर्शाद फरमाया, 'अली तुम्हारा जिक्र करतें हैं।' (मस्नदे इमामे-आजम़ बाब-122, सफा-213)

निकाह के पाक रिश्ते में तो मर्द और औरत दोनों एक-दूसरे को चुनतें हैं फिर अलगाव किसी एक की मर्जी से कैसे हो सकता है? जब औरत की मंजूरी के बिना निकाह नहीं हो सकता तो फिर उसकी मर्जी के बिना तलाक देना कैसे जाएज हो गया? अगर किसी लड़की का निकाह बिना उसकी मर्जी पूछे नहीं हो सकता तो फिर उसके तलाक में उसकी मर्जी क्यों नहीं पूछी जाना चाहिये?

ये खुदा का आदेश है जो कुरान से साबित है, एक आयत नबी (सल्ल0) की पाक बीबियों के संबंध में नाजिल हुई थी, ‘हे नबी ! अपनी पत्नियों से कहो , "यदि तुम सांसारिक जीवन और शोहरत चाहती हो तो आओ तुम्हें कुछ दे दिलाकर भली रीति से रुखसत कर दूं और अगर तुम अल्लाह, उसके रसूल और आखिरत के घर को चाहती हो तो अल्लाह ने तुम्हारे लिये बड़ा अज्र मुहैया कर रखा है।" (सूरह अहजाब, 28:29) इतना ही नहीं इस आयते-करीमा के उतरने के बाद नबी (सल्ल0) अपनी पत्नी बीबी आएशा (रज़ि0) के पास गये और उन्हें इस आयत के बारे में बता कर उनकी मंशा पूछी और कहा कि तुम इस बारे में अपने वालिदैन से भी मशवरा कर सकती हो। नबी(सल्ल0) ने न केवल अपनी बीबी से उनकी मर्जी पूछी बल्कि उनसे ये तक कहा कि आप चाहे तो अपने वालिद-वालिदा से भी इस बारे में पूछ सकती हैं। इसी सूरह में आगे अल्लाह तआला ने मोमिनों से ये भी फरमा दिया, "जो शख्स अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करेगा वह बड़ी कामयाबी को पहुँचेगा।" (सूरह अहजाब, 28,71)

निकाह नबी की सुन्नत है: तलाक नहीं

नबी (सल्ल0) का इर्शाद है, "निकाह मेरी सुन्नत है।" (इब्ने माजा, जिल्द-1, हदीस-1913, सफा-518) नबी (सल्ल0) ने अपनी जिंदगी में 12 निकाह किये और जब वो अपने रब से जा मिले उस वक्त उनकी नौ बीबियां जीवित थी। नबी (सल्ल0) ने अपनी किसी बीबी को कभी तलाक नहीं दी, यह इस्लामी तारीख के हर किताब में दर्ज है। नबी (सल्ल0) की सीरत और अपनी उम्मत को दी गई उनकी नसीहतें यह स्पष्ट कर देती है कि उन्हें तलाक किस कदर नापसंदीदा था।

नबी (सल्ल0) की पाकीजा बीबियों में हजरत हफ्शा (रज़ि0) भी थीं जो हजरत उमर-फारुख (रज़ि0) की बेटी थीं। हदीसों और तारीख की किताबों में आता है कि बीबी हफ्शा (रज़ि0) के मिजाज में कुछ सख्ती थी। एक बार हजरत उमर फार्रुख (रज़ि0) ने हजरत उस्मान (रज़ि0) से पेशकश की थी कि वो उनकी बेटी बीबी हफ्शा (रज़ि0) से निकाह कर लें पर हजरत उस्मान(रज़ि0) ने बीबी हफ्शा (रज़ि0) के सख्त स्वभाव को देखते हुये इस निकाह से इंकार कर दिया था। बाद में बीबी हफ्शा (रज़ि0) नबी (सल्ल0) के निकाह में आईं। उनके सख्त स्वभाव को जानने वाले उनके वालिद हजरत उमर (रज़ि0) हमेशा इस चिंता में रहते कि कहीं मेरी बेटी की कोई बात या काम नबी (सल्ल0) का दिल न दुःखा दे। इसलिये जब भी हजरत उमर नबी (सल्ल0) के घर आते तो अपनी बेटी को हिदायत करते हुये फरमाते, "तुझे जिस चीज की भी जरुरत हो मुझसे मांग लिया करना और नबी (सल्ल0) को परेशान न करना।"

नबी (सल्ल0) बीबी हफ्शा (रज़ि0) के इस गर्म मिजाज से वाकिफ थे पर इसके बाबजूद उन्होंनें उन्हें अपनी बीबी के रुप में कबूल किया और सारी उम्र उनका साथ निभाया। नबी (सल्ल0) का ऐसा करना कुरआन के उस आदेश के अनुसार ही था जिसमें अल्लाह ने फरमाया था, ‘तुम उसके लिये लिबास हों और वो तुम्हारे लिये (सूरह बकरह, 2:187) यानि पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे की बुराई को ढ़कना और एक-दूसरे की इज्जत-आबरु की हिफाजत करनी चाहिये। बुराई ढ़कने का अर्थ ये है कि कोई भी इंसान कभी पूर्ण नहीं हो सकता और न ही बुराईयों और ऐब से पाक हो सकता है, इसलिये किसी के अंदर कोई कमी है तो सामने वाले को चाहिये कि वह उस कमी के बाबजूद उसे स्वीकार करे क्योंकि उसमें कई बेहतर और अच्छी आदतें भी हो सकतीं हैं। नबी (सल्ल0) ने अपनी एक हदीसे-पाक में फरमाया था, "कोई आदमी अपनी औरत से दुश्मनी न करे क्योंकि अगर उसकी कोई बात नागवार होगी तो दूसरी जरुर खुश कर देगी।" (मुस्लिम)

नबी (सल्ल0) जानते थे कि बीबी हफ्शा (रज़ि0) के स्वभाव में अगर अल्लाह ने थोड़ी सख्ती रखी है तो उन्हें कई ऐसी गुणों से भी नवाजा है जो अद्वितीय है। बीबी हफ्शा (रज़ि0) को अल्लाह तआला ने बहुत परहेजगार और इबादत करने वाली बनाया था तथा दीन की समझ अता फरमाई थी। बीबी हफ्शा (रज़ि0) से 60 हदीसें रिवायत हुई है।

माँ-बाप हमेशा अपनी औलाद के लिये बेहतर से बेहतर जीवनसाथी तलाश करतें हैं और ये कामना करतें हैं कि उनके बच्चे का जीवनसाथी ऐसा हो जो हर हाल में उसका साथ निभाये और उसे खुश रखे। नबी (सल्ल0) और उनकी पहली पत्नी बीबी खदीजा (रज़ि0) ने भी अपनी औलाद बीबी जैनब (रज़ि0) के लिये एक बेहतरीन रिश्ता तय किया था और अपनी प्यारी बेटी का निकाह अबुल आस से किया था। जिस आदमी को नबी (सल्ल0) ने अपना दामाद बनाना पसंद किया, यकीनन वह बेहतरीन इंसान रहे होंगें। नबी (सल्ल0) ने जब अपने दीन की तब्लीग आरंभ की तब इनकी बेटी ने तो इस्लाम कबूल कर लिया पर इनके दामाद अबुल आस ईमान न लाये। मक्का के काफिरों ने अबुल आस पर इस बात पर इस बात के लिये दबाब डाला वो नबी (सल्ल0) की बेटी को तलाक दे दें, पर अबुल आस ने ऐसा नहीं किया। इस पर नबी (सल्ल0) ने अबुल आस की प्रशंसा करते हुये कहा कि "अबुल आस ने बेहतरीन दामादी का परिचय दिया है।" यही अबुल आस बाद में जंगे-बद्र के दौरान गिरफ्तार कर लिये गये। अबुल आस नबी (सल्ल0) की कैद में थे, नबी (सल्ल0) अगर चाहते तो अबुल आस से उनकी रिहाई के एवज में अपनी बेटी को तलाक देने को कह सकते थे पर नबी (सल्ल0) ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वो तलाक को नापसंद फरमाते थे।

नबी (सल्ल0) के सीरत की ये धटना तलाक को लेकर नबी (सल्ल0) की सोच को प्रतिबिंबित करती है। उनकी बेटी एक काफिर के निकाह में थी और उनके दामाद को उनके मुखालिफों ने इस बात पर उकसाया था कि वो उनकी बेटी को तलाक दे दे पर उन्होनें इससे इंकार कर दिया था जिस पर नबी ने उनके बेहतरीन दामाद होने की बात कही थी। नबी (सल्ल0) उन्हें बेहतरीन इंसान भी कह सकते थे पर उन्होंनें दामाद शब्द का इस्तेमाल किया, इसका अर्थ ये है कि किसी भी बाप के लिये इससे दुःखद बात और कुछ नहीं हो सकती कि उसकी बेटी को तलाक देकर जलील किया जाये इसलिये जब अबुल आस ने उनकी बेटी को तलाक न दिया तो नबी (सल्ल0) के दिल को ठंढ़क पहुँची और उन्होंनें अबुल आस की प्रशंसा की।

इसलिये अगर निकाह करना नबी (सल्ल0) की सुन्नत है तो अपनी बीबी को तलाक न देना और अपने अजीजों को इससे बचाते रहने की कोशिश करना भी नबी (सल्ल0) की ही सुन्नत है ये भी हदीसों और नबी (सल्ल0) की सीरत से साबित है।

तलाक अंबियाओं की भी सुन्नत नहीं

हदीस-पाक में आता है, "अन्निकाह मिन सुन्नति अंबिया" यानि "निकाह अंबियाओं की सुन्नत रही है।" कुरान मजीद में नाम से 25 पैगंबरों का जिक्र आता है, जिनमें कईयों की बीबियों के बारे में भी बताया गया है। इसका अध्ययन करने पर ये बात मालूम होती है कि नबी (सल्ल0) के पहले भेजे गये अंबिया भी तलाक को नापसंद करते थे। इसके कई उदाहरण हैं, हजरत आदम (अलैहि0) ने अपनी बीबी हव्वा के बहकाने पर वर्जित फल खाया था और उस गलती के एवज में जन्नत से निकाले गये थे। उस जन्नत से जो हर मुसलमान की तमाम इबादतों, हज़, रोज़ा, ज़कात सबका मकसद होता है ! मगर इसके बाबजूद आदम (अलैहि0) ने अपनी बीबी को तलाक नहीं दिया, उलटा तारीख की किताबों में तो ये आता है कि वो दोनों जन्नत से निकाले जाने के बाद अलग-2 स्थानों पर उतारे गये थे और हज़रत आदम (अलैहि0) बीबी हव्वा से मिलने के लिये बेकरार फिरते थे। 300 बरस की मुद्दत के बाद उनकी मुलाकात हुई और इस मुलाकात के बाद वो दोनों आपस में लिपट कर इतना रोये की फ़रिश्ते भी उनकी मुहब्बत देखकर ग़मगीन हो गए थे ! इसी तरह हजरत अय्यूब (अलैहि0) की बीबी रहमत ने शैतान की बात मानी थी पर तब भी हजरत अय्यूब (अलैहि0) ने उन्हें तलाक नहीं दिया था । हज़रत इब्राहिम (अलैहे0) की पहली पत्नी बीबी सारा ने उनकी दूसरी पत्नी बीबी हाज़रा से बुग्ज़ के कारण हज़रत इब्राहिम (अलैहे0) से उन्हें छोड़ देने को कहा था मगर हज़रत इब्राहिम (अलैहे0)  ने उन्हें तलाक़ दिया हो ऐसा नहीं मिलता बल्कि वो बीबी हाज़रा को अपने नवजात बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहे0) के साथ मक्का की वादियों में छोड़ के आ गए थे!  हज़रत नूह (अलैहि0) और हजरत लूत (अलैहि0) की बीबी नाफरमान थी पर कुरान में कहीं भी ये नहीं आता कि हजरत लूत या हज़रत नूह ने उन्हें तलाक दिया हो। इंजील में हजरत ईसा (अलैहि0) के निकाह का तो जिक्र नहीं मिलता अलबत्ता अपनी हवारियों को दिये उनके उपदेश से ये जरुर पता चलता है कि वो भी तलाक को पसंद नहीं करते थे। आखिरी नबी मोहम्मद (सल्ल0) की भी यही सुन्नत थी। अल्लाह के भेजे हुये ये अंबिया आखिर तलाक को कैसे पसंद करते जबकि उनके खुदा को ये सख्त नापंसद है। कुराने-पाक ने मर्द और औरत के दरम्यान निकाह से बने इस रिश्तों की अहमियत को इन लफ्जों से बताया है, "अल्लाह ने तुम्हें एक ही नफ़्स से पैदा किया तथा उसी से बीबी पैदा की ताकि वह उसके तरफ राहत हासिल कर सके।"

तलाक: इन दुआओं का अपमान

विवाह के पश्चात् वर-वधू के भावी जीवन के लिये मंगलकामनायें करने का रिवाज दुनिया के प्रायः हर धर्म में है और इस्लाम भी इससे अछूता नहीं है। निकाह होने के पश्चात् वर-वधू को आशीष देना व उनके उज्ज्वल भबिष्य के लिये दुआ करना नबी (सल्ल0) की सुन्नत है।

हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, जब कोई शख्स निकाह करता तो नबी (सल्ल0) उसको मुबारकबाद देते और उसके लिये यूं दुआ फरमाते हुये कहते, 'ब-र-कल्लाहो लका-व-ब-र-क-अलैका व जमा-अ-बै-न-कुमा फी़ खैर' यानि 'अल्लाह तआला तुझे बरकत दे तथा तुझपर बरकत नाजिल फरमाये तथा तुम दोनों में भलाई रखे।' (तिर्मिजी, जि0-1, सफा-557 एवम् अबूदाऊद, जि0-2, सफा-139)

नबी सल्ल (सल्ल0) की इस सुन्नत का अनुपालन हर निकाह के बाद यकीनन उनके उम्मतियों द्वारा वर-वधू को दुआ देने में की जाती होगी तो फिर ऐसी पाक दुआओं के नींव पर खड़े रिश्ते को तोड़ना क्या इन दुआओं का अपमान नहीं है? तलाक के मात्र तीन लब्ज बोलकर पाक रिश्ते को खत्म करना क्या शैतानी काम नहीं है?

हिस्ने-हसीन में आता है कि निकाह के बाद जब लड़की के विदाई का वक्त आ जाये तो लड़की के वालिद को चाहिये कि वो वर-वधू दोनों को अपने पास बुलाये और फिर एक प्याले में पानी लेकर लड़की के लिये यह दुआ पढ़ें, "अल्लाहुम्मा इन्नी उइजुहा बेका-व-जुर्री-य-त-ह-मिनश शैतानिर्रजीम" यानि "ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह में देता हूँ इस लड़की को और इसकी होने वाली औलादों को मरदूद शैतान से।" दुआ पढ़ने के बाद उस पानी से लड़की के ऊपर छींटा मारे। इसके बाद फिर इसी तरह दामाद के साथ भी करें और उसके लिये ये दुआ करें, "अल्लाहुम्मा इन्नी उइजुहु बेका-व-जुर्री-य-त-ह-मिनश शैतानिर्रजीम।" यानि "ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह में देता हूँ इस लड़के को और इसकी होने वाली औलादों को मरदूद शैतान से।" निकाह के मुकम्मल होने के बाद खुदा का पाक नाम लेकर लड़की का वालिद जब उन दोनों के लिये ये दुआ करते हुये अपने बच्चों को खुदा की पनाह में सौंप दे फिर कैसे जाएज है कि ऐसी पाक दुआ से रिश्ते की शुरुआत करने वाला इंसान वो काम करे जो अल्लाह की नजर में सबसे नापसंदीदा है?

गुन्यतुत्तालेबीन के पांचवे बाब में हदीसे-पाक के हवाले से बताया गया है कि पहली मुलाकात पर दुल्हा और दुल्हन को क्या करना चाहिये। नबी (सल्ल0) ने ताकीद की निकाह के बाद जब पहली बार शौहर और बीबी मिले तो वो पहले नमाज पढ़ें और उसके बाद यह दुआ करें, ‘ऐ अल्लाह! तेरा शुक्र और एहसान है कि तूने हमें यह दिन दिखाया है और हमें इस खुशी के नेमत से नवाजा है और हमें अपने हबीब की सुन्नत पर अमल करने की तौफीक अदा फरमाई है। ऐ अल्लाह! हमारी इस खुशी को हमेशा इसी तरह कायम रख, हमें मेल-मिलाप और मोहब्बत के साथ इत्तेफाक व इत्तेहाद के साथ जिदंगी गुजारने की तौफीक अता फरमा। ऐ रब! हमें नेक व फरमाबदार औलाद अता फरमा मुझे इससे और इसे मुझसे रोजी अता फरमा।इस दुआ में चार बातें हैं जो शादी की पहली रात अल्लाह से तलब की गई है और जिसके लिये उसका शुक्र अता किया गया है-

1. इस दुआ से ये पता चलता है कि निकाह अल्लाह की तरफ से एक नेअमत है।

2. यह नबी (सल्ल0) की सुन्नत है।

3. यह ऐसा अजीम तोहफा है जिसे हमेशा कायम रहने वाला बनाया गया है, यानि इस पवित्र बंधन को तलाक जैसी किसी चीज से तोड़ना गुनाह है।

4. दुआ के आखिर में ये कहा गया है कि दोनों एक दूसरे से रिज्क हासिल करें, यानि मर्द को यह हक नहीं कि वह अपनी बीबी को तलाक देकर उसे किसी और से रिज्क हासिल करने पर मजबूर कर दे। 

इस एक दुआ ने नबी (सल्ल0) की नजरों में निकाह की पाकीजगी, इसका दर्जा और इसकी अहमियत सभी बयान कर दी है। इस पाक दुआ से अपनी नयी जिंदगी की शुरुआत करने के बाद उसे तोड़ने वाला क्या इस दुआ का अपमान नहीं करता?

नबी (सल्ल0) ने अपने जीवनसाथी से मुलाकात की पहली रात के लिये अपने उम्मतियों को एक और दुआ सिखाई। ये हदीस अम्र बिन आस से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, 'जब कोई शख्य निकाह करे और पहली रात को अपनी दुल्हन के पास जाये तो उसकी पेशानी के कुछ बाल अपने दायें हाथ में लेकर यह दुआ पढ़े, ‘ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी (बीबी की ) भलाई तथा खैरो-बरकत मांगता हूँ तथा उसकी फितरी आदतों की भलाई तथा तेरी पनाह चाहता हूँ इसकी बुराई तथा इसकी फितरी आदतों की बुराई से।' (अबू दाऊद, जि0-2, सफा-150) पहली रात में बीबी के लिये खुदा से की गई यह दुआ क्या इस बात को नाजायज नहीं ठहराती कि अपनी उसी बीबी को रुसवा कर के छोड़ दे और उसे दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर करे। एक हदीस में आता है,  'सबसे बुरा आदमी वो है जो अपनी बीबी को सताए।'

नबी (सल्ल0) ने अपनी उम्मतियों को ये तमाम दुआयें इसलिये सिखाई थी ताकि उनके उम्मतियों को इन दुआओं के कबूल होने के कारण अल्लाह के गजब और गुस्से का शिकार न होना पड़े। उनकी एक हदीसे-पाक में भी आता है, 'निकाह करो, तलाक न दो,  इसलिये कि तलाक देने से अर्शे-इलाही लरज उठता है।' (तफ्सीर अल-करतबी, 149/8)

तलाक टालने के उपाए

नबी (सल्ल0) ने अपनी शरीयत में बेशक तलाक को रखा पर ये प्रावधान सामान्य परिस्थितयों के लिये नहीं थी वरन् केवल उन परिस्थितयों के लिये रखी गई थी जब इसके (तलाक) सिवा कोई चारा न बचता हो। यही कारण था कि नबी (सल्ल0) ने अपनी उम्मतियों को हर वो उपाय सुझाये थे और मशवरे दिये थे जिसके द्वारा तलाक को टाला जा सके। नबी (सल्ल0) इंसानी प्रकृति से वाकिफ थे। उन्हें मालूम था कि ये इंसान का स्वभाव है जो कभी किसी बात पर खुश होता है तो कई बातें उसे नाराज भी कर देती है। इंसान की यह फितरत है कि वो अपने जिन अजीजों से प्रेम करता है, कभी-2 उन्हीं अजीजों की किसी बात पर उसे नाराजगी भी हो जाती है और ये प्रवृत्ति औरतों में ज्यादा होती है। इसलिये उन्होंने औरत और मर्द दोनों को ही ताकीद करते हुये बताया कि एक-दूसरे के गुण-दोषों को समझते हुये एक दूसरे को स्वीकार करें। अगर उनमें कोई अवगुण है तो निश्चय ही उनमें कुछ अच्छी बातें भी यकीनन होंगी।

औरतों को ताकीद - नबी (सल्ल्0) जानतें थे कि किन बातों से पुरुषों का मन भटक सकता हैं इसलिये उन्होनें महिलाओं को हिदायत देते हुये फरमाया था, ये हदीस इब्ने मसूद से रिवायत है। वो कहतें हैं, नबी (सल्ल) ने फरमाया, "कोई औरत दूसरी औरत से मिलकर उसकी तारीफ अपने शौहर से न करो, जैसे वो औरत को सामने देख रहा है।" (बुखारी शरीफ, किताबुल निकाह) फतहुलबारी में इसकी तफ्सीर बताते हुये कहा गया है कि ऐसा करने से उस औरत का खाविंद फित्ने में पड़ सकता है और वो उस दूसरी औरत के हुस्नो-जमाल के पेशे-नजर अपनी औरत को तलाक दे सकता है।

नबी (सल्ल0) का अपनी उम्मत की औरतों को दिया ये मशवरा इसलिये भी तो था ताकि महिलाओं को हर उन कामों से खबरदार किया जाये जो उसके पति के जेहन को उसकी तरफ से हटा कर किसी पराई औरत की तरफ कर सकता हो और जिसके परिणामस्वरुप उसे तलाक जैसी चीज के कारण जलील होना पड़े।

मर्दों को ताकीद- नबी (सल्ल0) ने औरतों के जेहन के बारे में बताते हुये ने पुरुषों को भी ताकीद करते हुये समझाया। ये हदीस हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, 'बेशक औरत पसली से पैदा की गई है और तुम्हारे बताए हुये रास्तों पर कभी सीधी न होगी, तो अगर तुम औरत के साथ फायदा उठाना चाहो तो इस हालत में उठा सकते हो कि उसका टेढ़ापन उसमें बाकी रहे लेकिन अगर तुमने यह चाहा कि उसकी टेढ़ दूर कर फायदा उठाओ तो सीधा करते-करते तुम उसे तोड़ दोगे और उसका तोड़ना उसकी तलाक है।'

एक और हदीस हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "औरतों के हकों में भलाई के बारे में मेरी वसीयत कबूल करो, इसलिये कि औरतें पसली से पैदा की गई हैं और टेढ़ी है, सो अगर तू पसली सीधी करना चाहेगा तो वह टूट जायेगी और अगर उसी तरह छोड़ देगा तो हमेशा टेढ़ी ही रहेगी। तो तुम इस बारे में मेरी वसीयत कबूल करो।"

कुछ प्रवृतियां औरतों में स्वाभाविक रुप से पाई जाती है, जिन्हें अगर मर्द समझने का प्रयास करे तो तलाक की नौबत आएगी ही नहीं। तलाक देने का जो शरई तरीका है, उसमें ये आता है कि अगर पति और पत्नी के बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो जाये तो उन्हें चाहिये कि वो मिल-बैठकर परस्पर बातचीत से मामले को सुलझा लें। अगर आपसी बातचीत का कोई हल न निकाल तो कुराने-पाक का हुक्म है कि दोनों की तरफ से एक-2 पंच तय किया जाये और मामले को सुलझा लिया जाये। (सूरह निसा, 4:35)

नबी (सल्ल0) की तालीमें और कुरआने-पाक के आदेश इसलिये दिये गये थे ताकि तलाक टालने की हर संभव कोशिश की जाये।

तीन तलाक का मसअला                         

इस्लाम के मानने वालों ने आज तलाक देने के लिये मनचाहे तरीके ईजाद कर लियें हैं। अब तलाक देते वक्त ये नहीं देखा जाता कि ये इस्लामी तरीका है या नहीं। तलाक देने वाले इस बात का भी ध्यान नहीं रखते कि कुरान और सुन्नत किस तरह के तलाक को जाएज बताती है। इन्हीं कारणों से आज मुसलमानों की बीच समान्यतया तीन किस्म की तलाकें वजूद में हैं।

1. तलाके-बिदअत-  जिसमें तीन तलाकें एक बार में दी जाती है।

2. तलाके-हसन- इसमें तलाक देकर एक महीने रुका जाता है (हैज के लिये) फिर तलाक दी जाती है, फिर एक महीना रुका जाता है और फिर तलाक दी जाती है।

3. तलाके-अहसन- ये तलाक देने का सबसे सही तरीका है जो कुरान और हदीस से साबित है। इसमें ये है कि अगर कोई  तलाक दे देता है तो उसे तीन माह रुकना चाहिये और अगर तीन महीने के अंदर उसे लगता है कि उसने गलती की तो वह अपनी बीबी के साथ रुजु हो सकता है। इस तीन महीने के अंदर अगर वो रुजु न हुये फिर वो मियां-बीबी नहीं रहते। लेकिन उसके बाद अगर शौहर चाहे तो वो अपनी पुरानी बीबी से दुबारा निकाह कर सकता है। कुरान में आता है- "और जब तुम स्त्रियों को तलाक दे चुकें और वो इद्दत पूरी कर लें तो फिर उन्हें उनके पति के साथ निकाह करने से न रोको।" (सूरह बकरह, 2:232) मगर इस निकाह में फिर से नया मेहर तय किया जाएगा। दुबारा निकाह होने के बाद फिर से कोई समस्या हुई और तलाक देना पड़ गया तो फिर से तीन महीने की मुद्दत है जिसमें वो बीबी के साथ रुजु कर सकता है। तीन बार ऐसा जायज है, उसके बाद फिर से उसे अपनी बीबी से निकाह करने के लिये हलाला विधि का सहारा लेना पड़ेगा।

इकट्ठे दी गई तीन तलाकें एक

तलाक का सबसे सही तरीका तलाके-अहसन है जो कुरान से और नबी (सल्ल0) की हदीसों से साबित है। नबी (सल्ल0) के जमाने में हजरत रुकाना ने अपनी औरत को एक मस्जिद में तीन बार तलाके दे दी। नबी (सल्ल0) ने फरमाया, यह तो एक ही बार है, अगर चाहो तो रुजु कर लो। चुनांचे उसने रुजु कर लिया और अपना घर आबाद कर लिया। (मस्नदे इमामे, 1/265)

हजरत महमूद इब्ने-लबीद फरमातें हैं कि नबी (सल्ल0) को एक आदमी की खबर दी गई कि उसने अपनी बीबी को तीन तलाके दे दी हैं, आप इस खबर को सुनते ही गुस्से की वजह से खड़े हो गयें और फिर फरमाया कि क्या मेरी मौजूदगी में अल्लाह की किताब के साथ खेल किया जाता है?

एक साथ तीन तलाक देना इस्लामी तरीका नहीं है, ऐसा करने वाला कुरआन और नबी (सल्ल0) के आदेशों की अवहेलना करता है। तीन अलग-2 वक्तों में दी गई तलाकें भूल-सुधार का मौका देती है और एक साथ दी गई तीन तलाकों में रुजु की कोई गुंजाईश नहीं बचती। नबी (सल्ल0) भी फरमातें हैं, जो आदमी मेरे तरीके से मुंह मोड़ेगा वो मुझसे नहीं।

इमाम अबू हनीफा के नजदीक भी तीन तलाक बिदत मानी गई है।

हमारी परंपरा में तलाक अथवा विवाह विच्छेद जैसे कोई शब्द नहीं हैं और हो भी नहीं सकते क्योंकि हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि विवाह संबंध अटूट रिश्ता है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लोकोपवाद के भय से सीता माता का परित्याग किया था पर जब यज्ञ की नौबत आई तो सीता माता की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर श्रीराम के बगल में स्थान दिया गया। ये इसलिये हुआ क्योंकि वहां तलाक नहीं था, संबंधों की पवित्रता बनी हुई थी, अगर विवाह विच्छेद होता तो श्रीराम दूसरी शादी करके याज्ञिक अनुष्ठान को पूरा करते। पति-पत्नी सबंधों की उत्कृष्टता का इससे बेहतर दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। हिंदू समाज श्रीराम का अनुगमन करता है इसलिये हिंदू स्त्रियों के मन में तलाक को लेकर कोई डर नहीं होता।

जिस समाज में सभ्यता होगी, संस्कृति होगी, नारी सम्मान की परंपरा होगी, ईश्वर का डर होगा वहां तलाक हो ही नहीं सकता। इस्लाम की तालीम भी पति-पत्नी संबंधों के बारे में ऐसी ही है, खुदा का खौफ रखने वाला कभी खुदा को नापसंदीदा काम नही नहीं सकता।

एक मुसलमान के ईमान की पुख्तगी भी इसी से है जो नबी (सल्ल0) की इन हदीसों से साबित है।

- बीबी आएशा फर्मातीं हैं, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "ईमान में सबसे ज्यादा मुकम्मल वह आदमी है जिसकी आदत और अख्लाक सबसे अच्छें हों तथा अपनी बीबी के साथ सबसे अच्छा बर्ताब करता हो।"

- हजरत अबू हुरैरा रिवायत करतें हैं, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, "ईमान में सबसे ज्यादा मुकम्मल वह आदमी है जो सबसे ज्यादा अख्लाक वाला हो तथ तुममें बेहतर वह आदमी है जो अपनी औरतों के लिये बेहतर है।" (तिर्मिजी शरीफ)       

इस्लाम और उसके लाने वाले की तालीमें पुरुषों को औरतों के हक के बारे में ताकीद करती है मगर आज मुस्लिम महिलायें तलाक से सबसे ज्यादा पाडि़त हैं। आये दिन मुस्लिम महिलाओं को इसका शिकार बनना पड़ता है। पुरुष की मर्जी हुई और तलाक के तीन लब्ज बोलकर उसे हमेशा के लिये अपनी जिंदगी और घर से बाहर कर दिया और दर-2 की ठोकरे खाने पर मजबूर कर दिया। तलाक देने का शरई तरीका क्या है, ये सवाल बहुत पीछे छूट चुका है, अब हर आदमी अपनी मन-मर्जी से तलाक के तरीके इजाद कर चुका है। तलाक कभी फोन पर, कभी नशे की हालत में, कभी इंटरनेट पर और कभी sms से दे दिया जाता है और इसका खामियाजा बेचारी मुस्लिम औरत को भुगतना पड़ता है। मर्द अगर अपनी गलती सुधारना भी चाहे तो हलाला के रुप में प्रायश्चित उसे नहीं वरन् औरत को करना पड़ता है। इस्लाम धर्म हजरत मोहम्मद (सल्ल0) पर आ कर पूर्ण हो गई । इसलिए अगर कुरान की गवाही को माने तो इस्लाम के साथ धर्म विधान मुकम्मल हो चुका है और हजरत मोहम्मद (सल्ल0) अल्लाह के द्वारा भेजे जाने वाले अंबियाओं की श्रेणी में आखिरी है, यानि अब कोई नई शरीयत आने की गुंजाईश नहीं है तो फिर क्या ये जरुरी नहीं कि है कि जिस चीज के कारण महिलाओं को जलील होना पड़ता है, उन्हें दर-2 की ठोकरें खानी पड़ती है, उसके लिये कोई समाधान तलाशी जाये? तलाक न हो और अगर अगर इसकी नौबत आये भी तो ये उस तरीके से ही दी जाये जो शरीयत के हिसाब से जाएज हो। क्यों मुस्लिम उलेमा इस बारे में एक राय नहीं बनाते हैं और तलाके-अहसन (तीन अलग-2 वक्तों में दी गई तलाक) को मुस्लिम समाज में स्वीकृति दिलाते हैं? क्यों उलेमा इस मसले पर कभी मुखर होकर सामने नहीं आते? न तो वो मुस्लिम समाज में ये संदेश देने की कोशिश करतें हैं कि अल्लाह को नापसंदीदा इस चीज से बची जाये और न ही वो तलाक का सही शरई तरीका आम करतें हैं। विवाह संबंधों की पवित्रता, निकाह को कायम रखने की फजीलत और तलाक न होने पाये इस संबंध में अल्लाह और नबी के आदेश के ऊपर खुलकर परिचर्चा होनी चाहिये ताकि मुस्लिम महिलाओं दांपत्य का भबिष्य दोनों ही सुरक्षित हो सके।

हदीसे-पाक कहती है- "दो प्यार करने वालों के लिये निकाह जैसी कोई चीज नहीं देखी गई।" (इब्ने माझा, 440/5)

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/divorce,-women-and-islam-तलाक़,-औरत-और-इस्लाम/d/66335

 

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