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Hindi Section ( 27 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Killing of Ulema in Pakistan पाकिस्तान में उलमा का क़त्ल

 

A letter to Editor of Monthly Sautul Haq

जब अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को पैदा करने का इरादा फ़रमाया तो फरिश्तों ने कहा वो तो धरती पर फसाद फैलाएगा और खून बहाएगा। शायद फरिश्तों ने हमारे बारे में कहा होगा क्योंकि हमारे यहां कोई दिन फसाद और खून खराबे से खाली नहीं जाता। यूं लगता है जैसे हमने क़सम खाई हो कि फरिश्तों की आशंका गलत साबित न हो। पेशावर शहर में तब्लीग़ी मरकज़ में धमाका हुआ, 8 नमाज़ी जान से हाथ धो बैठे और 60 घायल हुए, इसके अलावा दो बम नाकारा बना दिया गया। धमाका जुमा के दिन मगरिब की नमाज़  के दौरान हुआ, नमाज़ी रुकू में थे। दूसरे दिन ज़िला नौशहर के तब्लीग़ी मरकज़ से बम बरामद हुए।  

हमारे यहां कई प्रकार के विश्वास वाले लोग मौजूद हैं। एक वो जो नमाज़ रोज़ा को प्राचीन रस्मों का नाम देते हैं। दूसरे वो जो नमाज़ को ईरानी इबादत समझते हैं और कहते हैं कि इस नमाज़ का अरबों की सलात से कोई वास्ता नहीं। पहले को तो धर्म से कोई सरोकार ही नहीं, दूसरे समूह कुछ शर्त रखता है पर वो खुलकर अपनी आस्था व्यक्त भी नहीं करते, खून खराबे की बात तो छोड़ दीजिए। तीसरे वर्ग वो है जो परंपरागत मुसलमान है जो कुछ उसे बाप दादा से विरासत में मिला है उसे सीने से लगाए लगाए फिरता है। और इन्हीं की संख्या अधिक है। ये कभी दंगा और खून खराबे की कल्पना भी नहीं कर सकते। मुझे अभी तक याद है कि हमारे स्कूल के रास्ते में एक मस्जिद पड़ी थी, हम सभी बच्चे इस मस्जिद की दीवार के पत्थरों को चूमते हुए जाते थे और आते हुए भी हमारा यही नियम होता था।  

तो ये भी सम्भव नहीं है कि हमारे दिल से मस्जिदों का सम्मान खत्म हो गया हो, फिर ये कौन है कि मस्जिदों में धमाका कर के नुकसान पहुंचाता है बल्कि वहां खड़े नमाज़ियों की भी हत्या करता है जिनमें बच्चे- बूढ़े सीधे साधे गैर राजनीतिक लोग नमाज़ पढ़ने आते हैं। बंदे अल्लाह के, घर भी अल्लाह का, ब्रांच काबे बैतुल्लाह की, इन्हें नुकसान पहुंचाना अल्लाह से दुश्मनी और जंग है तो उनके दिल में अल्लाह का डर नहीं रहा? अगर ये तोड़फोड़ यही पाकिस्तानी मुसलमान नागरिक कर रहे हैं तो क्या उन्हें कुरान में ऐसा कोई इशारा मिला है कि जो सरकार ''तुम्हारे अनुसार'' इस्लामी न हो उसके दरो दीवार को हिला दो, उसका जो निवासी दिखे मुस्लिम या गैर मुस्लिम, सैनिक हो, रेंजर या पुलिस वाला, नमाज़ी हो, तब्लीग़ी हो या आम आदमी हो, डॉक्टर हो, इंजीनियर हो या नाई की दुकान में बैठा हुआ हजामत करवा रहा हो, या कोई मर्द औरत घर से सौदा लेने निकला हो उसे मारना सवाब (पुण्य) का काम है?

माना कि मुसलमानों में बहुत से कपटी, दुष्ट, गुनहगार और गलती करने वाले भी होंगे, मगर क्या अल्लाह का इनके बारे में कोई इरशाद है कि उन्हें मौत की नींद सुला दो? तालिबान जब अपनी वारदात को फोन आदि के द्वारा क़ुबूल करते हैं तो इस बारे में भी स्पष्टीकरण दें कि अमुक सूरे की अमुक आयत में ऐसा हुक्म दिया गया है। तो बहुत सारे लोग संतुष्ट हो जाएंगे। इसके अलावा आत्मघाती धमाके की क्या हमारे धर्म में इजाज़त है? क्योंकि अल्लाह का फरमान है,

अन्नलाहा योहिबुबल्लज़ीना योक़ातेलूना फी सबीलेहि सफ्फन कअन्नहुम बुनयानम् मरसूसा (61: 4)

अनुवाद: अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्तिबद्ध होकर लड़ते है मानो वे सीसा पिलाई हुए दीवार है। अगर अल्लाह सीसा पिलाई हुई दीवार की तरह पंक्तिबद्ध होकर लड़ने वालों को पसंद करता है तो फिर उन्हें नापसंद करता है जो चुपके से बिना ऐलान के बेखबरी में क़त्ले आम करते हैं। ये कोई तरीका नहीं कि बेखबरी में वार किया या टाइम बम रखा, रिमोट कंट्रोल बम रखा और बेगुनाहों को मौत की नींद सुला दिया।

अगर इस्लाम न मानने वालों, गुनहगारों, गलती करने वालों के क़त्ले आम का कोई अल्लाह का हुक्म बताया जाए, अगर आत्मघाती हमले से या धोखे से हत्या करने का औचित्य कुरान से मिल जाए तो बहुत से लोगों की चिंता दूर हो जाएगी और हो सकता है कि हम जैसे बहुत लोग उनमें शामिल हो जायें। अगर ऐसा कोई हुक्म, इशारा कुरान में नहीं है तो फिर किसी एक इंसान का क़त्ल पूरी इंसानियत का क़त्ल है।  

मौलाना शमोज़ई से लेकर आज तक उलमा का क़त्ल रुक नहीं रहा है। आज जब मैं ये पंक्तियों लिख रहा हूं तो मुफ्ती उस्मान यारखान और उनके साथी मोहम्मद रफीक का जनाज़ा पढ़ा जा रहा है। आखिर कब तक ये दृश्य देखने पड़ेंगे? अगर कोई गलत करने वाला है और उसके अमल से समाज या धर्म को नुकसान पहुंच रहा है तो उसे उसकी गलती से आगाह कर उसे चेतावनी दी जाए। हत्या तो आखिरी कदम है।

अल्लाह का फरमान है, वादल्लाहूल लज़ीना आमनू वाआमेलुस्वालेहाते लहुम मग़फेरतुम वअजरुन अज़ीम, वल्लज़ीना कफरू वकज़्ज़बू बेआयातेना उलाएका अस्हाबुल जहीम (5: 9,10)

जो लोग ईमान लाए और उन्होंन अच्छे कर्म किए उनसे अल्लाह का वादा है कि उनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है।

रहे वे लोग जिन्होंने इंकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही भड़कती आग में पड़ने वाले हैं।

फ़रमाया- वल्वुज़्ना यौमऐज़िल हक़्का फमन सक़ोलत मवाज़ीनहू फउलाऐका हुमुल मुफलेहून, वमन खफ्फ़त मवाज़ीनहू फउलाऐकल लज़ीना कसेरू अन्फोसाहूम बेमा कानू बेआयातेना युज़लेमून (7: 8, 9)

अनुवाद: और बिल्कुल पक्का-सच्चा वज़न उसी दिन होगा। अतः जिनके कर्म वज़न में भारी होंगे, वही सफलता प्राप्त करेंगे

और वे लोग जिनके कर्म वज़न में हलके होंगे, तो वही वे लोग हैं, जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला, क्योंकि वे हमारी आयतों का इंकार और अपने ऊपर अत्याचार करते रहे।

ध्यान दें- पहली आयत में अल्लाह ने अच्छे काम करने वालों को खुश खबरी दी और बुरे काम करने वालों को नरक की चेतावनी। दूसरी आयत में रब ने नेक काम करने वालों को कल्याण की खबर दी है और जिनके बुरे काम का तराज़ू झुका होगा उन्हें नुकसान की खबर दी है। कहीं भी हमें ये हुक्म नहीं दिया कि उनको क़त्ल किया जाए। इसलिए अगर कोई मुसलमान भी कुफ़्फ़ार का मददगार लगता है, वो इन आयतों पर विचार करे और अपने आपको क़त्ल के जुर्म का गुनहगार न बनाए। हत्या बहुत बड़ा पाप है।

मार्च, 2014 स्रोत: मासिक सौतुल हक़, कराची

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