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Hindi Section ( 26 Aug 2012, NewAgeIslam.Com)

मक्का शिखर बैठक का मकसद

सईद नक़वी

24 अगस्त, 2012

सउदी अरब के मक्का शहर में आयोजित ऑर्गनइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) की आपातकालीन बैठक में ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद, राष्ट्रपति के वरिष्ट सलाहकार मुज्तबा समारेह-हाशमी, राष्ट्रपति कार्यालय के प्रमुख अस्फंदियार रहीम मशाई, विदेश मंत्री अली अकबर सालेही और वहाँ के सर्वोच्च नेता खामेनी के विदेश नीती सलाहकार अली अकबर विलायती, आदि सभी मौजूद थे।

कई लोगों के मन में सवाल उठा कि क्या सऊदी अरब के शाह अब्दुल्लाह ने ईरान के इस उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मेज़बानी इसलिए की कि वह परोक्ष रुप से उसे अपमानित करना चाहते थे। यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि ओआईसी की बैठक मे सीरिया के निलंबन की तरफदारी की गई। वहां बेमन से दो और प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें से एक म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में था और दूसरा फिलिस्तिन के पक्ष में।

पश्चिम के खुले समर्थन वाली राजशाहियों और शेख सल्तनत वाली व्यावस्थाओं ने सिरिया के मसले पर एक तरह का उन्माद सा फैला रखा है लेकिन सऊदी अरब खुद को इस अंधी दौड़ में शामिल नहीं होने दें सकता। उसके पास नेतृत्वकर्ता की भूमिका है और पश्चिम एरिया में उस के हित औरों के मुकाबले कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अक्टूबर 2011 में सुल्तान बिन अब्देल अजीज और जून 2012 में नईफ बिन अब्देल अजीज के रुप में दो शहजादों की जल्दी-जल्दी मौत हो जाने के बाद संभावित उत्तराधिकारीयों की एक पूरी श्रृखला के दर पर मौत की सूचना दस्तक सी दे रही है।जिस समय अरब में जन उभार आया उस वक्त शाह अब्दुल्लाह खुद यूरोप में अपना इलाज करवा रहे थे। उन्होंने  फरवरी 2012 में वतन वापसी के बाद काम संभाला।

स्वदेश में भी उनको भारी मतभेदों और कलह का सामना करना पड़ रहा है। एसी अपुष्ट खबरें हैं कि सऊदी अरब के जासूसी महकमें के प्रमुख शहजादे बंदेर बिन सुल्तान की हत्या कर दी गई है। सऊदी अरब की ओर से इस मामले में किसी भी अधिकारिक पुष्टि अथवा इनकार के अभाव में अटकलों का बाजार गर्म है। देश के बाहरी खुफिया एजेंसी के प्रमुख और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विद्वान विक्रम सूद कहते है। जिस बात ने सऊदी सरकार को स्तब्ध और खामोश कर दिया वह बंदेर की हत्या नहीं बल्कि यह है कि सीरिया की पहुंच सऊदी अरब के इतने अंदरुनी इलाके तक में हों चुकी है।इसके अलावा सऊदी अरब के शिया बहुल तथा तेल से समृद्ध पूर्वी प्रांत में भी प्रतिरोध बढ़ रहा है। रियाद से ऐसी जानकारी मिली है कि वहां प्रर्दशन भी हो रहे है।

पश्चिमी मीडिया पिछले तकरीबन एक साल से बशर असद के पतन के अनुमान लगा रहा है। देश बाहर से थोपे गए गृह युद्ध की स्थिति में है लेकिन फिर भी बशर को सत्ता से बेदखल करने कि पश्चिम की हसरत पूरी नहीं हो सकी है। जाहिर सी बात है कि इराक पर तकरीबन एक दशक तक काबिज रहने के बाद अमेरिका ने पश्चिम एशिया में बदलाव का वह खेल शुरु किया है जो हमें अब देखने को मिल रहा है। ऐसे में सीरिया भला हथियारों से लैस भाड़े के टटटुओं के समक्ष घुटने क्यों टेकेगा? इन तमाम बातों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि सऊदी अरब आसानी से हार स्वीकार कर लेगा।

एक संभावना यह है कि सीरिया के मसले पर अब तक तालमेल के साथ कदम उठा रही पश्चिमी ताकतें और अरब जगत अब मतभिन्नता की स्थिति में पहुंच गए हों। यकीनन अमेरिका में कुछ लोगों का अब भी यही विचार होगा कि दमिश्क में सत्ता परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के दोबारा चुने जाने के मौके पर उनको बेहतरीन तोहफा होगा। यही वजह है कि टेलीविजन कैमरों की निगाहें अफगानिस्तान से दूर बनी हुई है, जहां से कई दिनों से कोई अच्छी खबर नहीं आ रही है और सैनिकों की वापसी का काम भी ठप पड़ा हुआ है।

पश्चिम में कुछ लोगों को खुश करने के लिए पश्चिम एशिया में एक और शुरुआत देखने को मिल सकती है। यह है मुस्लिम समुदाय के लोगों को आपस में लड़वाना, ताकि वे इस्राइल और फिलिस्तीन को लेकर कोई चर्चा ही न करें। लेकिन यह संभव है कि विभिन्न मुस्लिम समुदायों के बीच में आपस में लंबी लड़ाई मऊदी अरब को रास न आए। उसे खुद अपने तेल से समृद्ध पूर्वी प्रांत कि चिंता है। दम्माम नामक यह इलाका संकट के दौर से गुजर रहे बहरीन से महज 37 किलोमीटर की दूरी पर है और इसकी 80 फीसदी शिया आबादी सुन्नी शासक के खिलाफ है। अमेरिका का पांचवां बेड़ा बहरीन में ही स्थित है। इस क्षेत्र में अगर शिया राजनीति का उदय होता है तो वह तब तक सही नहीं होगा जब तक कि इसमें बगदाद के निकट स्थित नजफ शहर के अलाव,तेहरान, हेजबुल्लाह और बहरीन की अधिसंख्या आबादी शामिल न हो।

जब ट्युनिसिया और मिस्र में आए जन उभार की हवा बहरीन पहुंची तो प्रदर्शनकारियों को लेकर यह भ्रम व्याप्त था कि वे शिया हैं अथवा सुन्नी। इन प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रदर्शन के शांतिपूर्ण होने पर जोर देने के लिए अपने हाथों में गांधी के चित्र तक लहराए थे।

पिछले वर्ष अमेरिकी दूत जिफ्री फेल्टमैन, क्राउन प्रिंस हमद बिन खलीफा और युवा शिया नेता शेख अली सलमान के बीच साझा भविष्य को लेकर जो खाका बना था वह पूरी तरह नष्ट हो चुका है। लेकिन इस बात ने प्रधानमंत्री खलीफा इब्र सलमान अल खलीफा की सत्ता को भयभीत कर दिया। वह शाह के भाई भी हैं। इस वक्त तक प्रधानमंत्री के मित्र और सऊदी अरब में कट्टर विचारधारा के माने जाने वाले क्राउन प्रिंस नईफ रियाद पर नियंत्रण किए हुए थे। उन्होंने सशस्त्र बलों को दम्माम में बहरीन जाने वाले मार्ग पर बढ़ने का निर्देश दे दिया। इसके बाद विरोध प्रदर्शनों और और पुलिस के दमन का अंतहीन सिलसिला आरंभ हो गया।

यही वजह है कि ओआईसी की उस आपातकालीन बैठक में ईरान के उच्च स्तरिय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी बहुत अधिक आवश्यक थी।

क्या बहरीन में फेल्टमैन योजना अथवा वैसी ही किसी और चीज को दोबारा लाने के बारे में काम हो रहा है? और क्या सीरिया के लिए भी वैसी ही कोई योजना बनाई जा रही है? याद रखिए कट्टरपंथी विचारों वाले शहजादा नईफ अब शाह अब्दुल्ला के पास नहीं हैं। वह भावनओं से रहित हैं और उनको हमेशा से व्यावहारिक माना जाता रहा है। विभिन्न मुस्लिम पंथों के बीच बातचीत के लिए रियाद को प्रस्तावित किया जाना एक समझौताकारी कदम है। बहरीन द्वारा तेहरान में अपने राजदूत को बहाल करना भी वैसा ही कदम है।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

24 अगस्त, 2012

स्रोतः नेशनल दुनिया, दिल्ली

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/सईद-नक़वी/मक्का-शिखर-बैठक-का-मकसद/d/8436

 

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