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Hindi Section ( 26 March 2012, NewAgeIslam.Com)

Toulouse or to Gain from Two Tragedies? टुलूस या दो गंभीर त्रासदियों से क्या मिला?


सैफ शाहीन, न्यु एज इस्लाम

यह आश्चर्यजनक है कि कैसे सांस्कृतिक संघर्ष के दोनों ओर  के लोगों की नफरत और बदले की इस तरह की कहानियाँ एक दूसरे की ठीक एक जैसी समानता को सामने ला रही हैं। रॉबर्ट बेल्स मोहम्मद मीराह के सभी जातीय और धार्मिक मतभेदों के बावजूद उन्हें एक दूसरे से बदल सकते हैं, और किसी सवाल के पूछे जाने की जरूरत नहीं है। उनकी भिन्नता की समानता में विडम्बना है, और पिछले दो सप्ताह - और पिछले दो दशकों का सबसे गंभीर त्रासदी है।

रॉबर्ट बेल्स मोहम्मद मीराह के बीच बहुत कम ऐसा है जो समान है और शायद एक दूसरे के बारे में इन्होंने कभी सुना भी नहीं होगा। इनमें से एक 37 वर्षीय अमेरिकी सेना का सार्जण्ट और दूसरा अल्जीरियाई मूल का एक 23 वर्षीय फ्रांसीसी है। और इसके बावजूद भी, पिछले कुछ दिनों के दौरान, उन्होंने दुनिया को अपने कार्यों, इससे पीड़ितों लोग और वे लोग जिनका वो प्रतिनिधित्व करने का विचार करते थे, उनकी रहस्यमय तरीके की समानता को बताता है।

11 मार्च की रात को, बेल्स ने अफगानिस्तान के कंधार में बालांडी और अलकोज़ई में 17 ग्रामीणों की उनके घरों में गोली मार कर हत्या कर दी, इनमें कई बच्चे भी शामिल थे। उसने बेरहमी से हत्या की और बाद में शवों को जला दिया। इकबाल जुर्म के बाद उसे हिरासत में रखा गया है, और वह हत्या के आरोप का सामना कर रहा है।

उसी दिन और कुछ हज़ार किलोमीटर दूर, मीराह ने टुलूस में जिम के बाहर एक फ्रांसीसी मुस्लिम पैरा ट्रूपर (सिपाही) को मार डाला। चार दिन बाद उसने दो फ्रांसीसी मुस्लिम सैनिकों और अपनी ही तरह के उत्तरी अफ़्रीकी नस्ल के एक पुरुष  को मार डाला। इसके बाद 19 मार्च को एक स्कूल के बाहर तीन बच्चों सहित चार यहूदियों को मार दिया। फ्रांसीसी पुलिस ने उसके अपार्टमेंट पर छापा मारा और 32 घंटे की घेराबंदी के बाद एक स्नाइपर ने उसे गोली मार कर खत्म कर दिया।

जबकि बेल्स ने स्पष्ट किया नहीं किया है कि उसने गांव वालों को क्यों मार दिया, और सच ये है कि उसने उसके बाद शवों को जला दिया- इसी तरह की उत्तेजना अफगानिस्तान में बेल्स  के साथी सैनिकों के द्वारा इसी तरह की बेअदबी करने वाले अमल के तहत पवित्र क़ुरआन की प्रतियों को आग लगाने के बाद पैदा हुई थीं- ये उसकी मंशा पर कुछ प्रकाश डालता है। मीराह ने अपनी गोलीबारी की वीडियो रिकॉर्डिंग की जिसमें उसने फ्रांसीसी सेना को अफगानिस्तान में मुसलमानों की हत्या और यहूदियों को फिलिस्तीनी बच्चों की हत्या करने का ज़िम्मेदार ठहराया है।

इन दो त्रासद घटनाओं में आम कारण नफरत, बदला और बच्चे रहे हैं। "दूसरों" के लिए नफरत दोनों बेल्स और मीराह में बहुत अधिक थी और किसी को नहीं पता इनमें ये नफरत कब से थी। बेल्स जो इराक में तीन युद्ध मिशनों के बाद अफगानिस्तान में चौथे युद्ध मिशन पर था, शायद "मुस्लिम अफ़ग़ानियों" के कुछ लोगों को नहीं बल्कि उन सभी को अपने दुश्मन के रूप में देखा। मीराह के लिए, लगता है पूरी यहूदी-ईसाई दुनिया शैतान का रूप थी, जो इस्लाम और मुसलमानों को नष्ट करने पर आमादा हैं।

अगर उनकी नफरत उन्हें ऐसे स्थिति में ले आई थी जहां से वापसी संभव नहीं थी तो बदले ने उन्हें इसके आगे जाने का इशारा दिया। कुरआन के अफ़ग़ानिस्तान में अपमान के कारण मारे गए अमेरिकी सैनिकों के बाद शायद बेल्स यह सोच रहा हो कि वो उसका बदला ले रहा है। मीराह ने अपनी मंशा के बारे में कोई शक नहीं छोड़ा है, वीडियो रिकॉर्डिंग में उसने पीड़ितों को संबोधित करते हुए कहा है कि "तुमने मेरे भाइयों को मारा। मैं तुम्हें जान से मारूंगा है।"

इन दोनों में से किसी पर भी ये फर्क नहीं पड़ता कि वो लोग जिन्हें ये हत्या कर रहे थे ये वो लोग नहीं थे जिन्होंने "अपराध" किए थे और जिनसे वो बदला लेना चाहते थे। लेकिन जो महत्वपूर्ण था वो था बयान: "उन लोगों" ने "मेरे भाइयों" की हत्या की है इसलिए मैं उन "लोगों" को मारूंगा है। इस हत्या के आम पीड़ितों से विशेष रूप से ये स्पष्ट हैः बच्चे, जिनका इससे कोई लेना देना नहीं था। उसने इन लोगों को हत्या करने की मंशा की प्रेरणा दी।

यह आश्चर्यजनक है कि कैसे सांस्कृतिक संघर्ष के दोनों ओर  के लोगों की नफरत और बदले की इस तरह की कहानियाँ एक दूसरे की ठीक एक जैसी समानता को सामने ला रही हैं। रॉबर्ट बेल्स मोहम्मद मीराह के सभी जातीय और धार्मिक मतभेदों के बावजूद उन्हें एक दूसरे से बदल सकते हैं, और किसी सवाल के पूछे जाने की जरूरत नहीं है। उनकी सोच एक थी, उनकी जीवनशैली समान थी, दोनों ने एक जैसा काम किया और वो भी एक जैसे ही कारण के लिए।

उनकी भिन्नता की समानता में विडम्बना है, और पिछले दो सप्ताह - और पिछले दो दशकों का सबसे गंभीर त्रासदी है।

औसतन शायद रोज़ाना सैकड़ों लोग सांस्कृतिक संघर्ष में मारे जाते हैं और जो कम होने का कोई संकेत नहीं दे रहा है। कोई गौर नहीं करता है कि जिस तरह से हम जरूरी समानता के साथ संघर्ष में भाग लेते हैं वो संघर्ष के एक प्रमुख आधार ही से इंकार करता करता है। मुसलमानों ने पहले मारे गए हज़ारों मुसलमानों का बदला लेने के लिए 9/11 में हजारों "पश्चिमी लोगों" को मारा और उसके बाद पश्चिमी देशों के लोगों ने सैकड़ों मुसलमानों को इस तरह के हमले की रोकथाम के लिए लाखों मुसलमानों की हत्या करना शुरू कर दिया, लेकिन ये दुनिया भर के पश्चिमी निशानों पर बदले के तहत हमले का एक सिलसला कायम करने में कामयाब हुआ।

अगर हम इस तरह सोचते, महसूस करते या समान रूप से एक दूसरे को जवाब देते हैं तो हम अलग कैसे हो सकते हैं, या हम किस कदर अलग हो सकते हैं?  ज्यादा नहीं, सिर्फ अगर हम जो स्पष्ट है उसे देख सकें। शायद जो स्पष्ट नजर आ रहा है उसे न देख पाने की दोनों ओर की कमजोरी भी इनकी समानता की एक और मिसाल है।

इस मौके पर ये रुझान उभरता है कि यहूदीवाद, ईसाईवाद और इस्लाम के बीच जो कुछ भी समान है उसकी सूची की तरफ़ इशारा करता है, जैसा कि निस्संदेह सभी विश्वासों के बीच है। एक मुसलमान की हैसियत से ये प्रेरणा देने वाला है कि कुरान की उन आयतों का उल्लेख करूं जो बताती हैं कि इस्लाम उसी अकीदे का सिलसिला है जिसे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और हजारों दूसरे अम्बिया हज़रात ने पेश किया और उनके अनुमान के मुताबिक धार्मिक मतभेद के आधार पर मुसलमानों को लड़ने या मारने से रोकती हैं।

लेकिन इस मार्च में मैं शांति के नबियों से बहस करने की इल्तेजा नहीं करूंगा कि इस खून की प्यास का कोई मतलब नहीं है। बल्कि उसकी जगह नफरत के अम्बिया से उसे बताने के लिए कहूंगा।

जहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम नाकाम रहे हैं, क्या बेल्स और मीराह हमारे आपसी पागलपन को दूर करने का रास्ता निकाल सकते हैं?

सैफ शाहीन, आस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कालर हैं।

URL for English article:

http://newageislam.com/islam-and-politics/saif-shahin/toulouse-or-to-gain-from-two-tragedies؟/d/6916

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