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Hindi Section ( 9 Oct 2012, NewAgeIslam.Com)

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The Qur’an’s Regard for the People of the Book अहले किताब (यहूदी और ईसाई) और धार्मिक मानवता के लिए कुरान का सम्मानः एक प्रमाण

 

मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

सह लेखक (अशफाकुल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

एक पिता जो दस बार अपने बच्चे की तारीफ करता है लेकिन एक बार डाँटता है तो ज़रूरी नहीं है कि वह बुरा आदमी हो। बेटे को अपने पूरे जीवन के मामलों को देखते हुए अपने पिता के बारे में फैसला करना चाहिए। बिल्कुल यही कुरान के जैसे ग्रंथ के लिए भी सही है जो 23 साल (610-632) के समय में नाज़िल (उतरी) हुई। इसके कुल संदेश को केवल कुछ आयतें तक सीमित नहीं किया जा सकता है, खासकर आयत 2:120, 5:51 और 5:57 जो ईसाइयों और यहूदियों के प्रति निष्ठुर हैं। आयते निम्नलिखित हैं:

 "और (ऐ रसूल) न तो यहूदी कभी तुमसे रज़ामंद होगे न नसारा यहाँ तक कि तुम उनके मज़हब की पैरवी करो (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि बस खुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (बाक़ी ढकोसला है) और अगर तुम इसके बाद भी कि तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका है उनकी ख्वाहिशों पर चले तो (याद रहे कि फिर) तुमको खुदा (के ग़ज़ब) से बचाने वाला न कोई सरपरस्त होगा न मददगार"(2:120)

"ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता"(5:51)

"ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो (57) और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते"(5: 58)

ये आयते (लगभग 624-628) के काल की हैं, जब मदीना में स्थानीय यहूदी जनजाति मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मक्का के दुश्मनों के साथ षड़यंत्र और एकता कर रही थी ताकि बाहरी हमले और आंतरिक विद्रोह द्वारा धर्मान्तरितों के बढ़ रहे समुदाय को नष्ट किया जा सके। इस प्रकार ये आयतें एक विशेष संदर्भ के लिए थीं। लेकिन क़ुरान के अंतिम चरण में नाज़िल होने वाली आयते बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वो किसी भी विशिष्ट स्थिति के लिए नहीं थी और कुरान के संदेश की पराकाष्ठा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए ये ध्यान देने योग्य है कि अंतिम नाज़िल हुई सूरे (सूरे अलमायदा) की कुछ आयतों (5: 44-47) में तौरेत और इंजील का संदर्भ नाज़िल हुए सहीफों (ग्रंथों) के रूप में दिया गया है और इस तरह आस्था वाले लोगों के रूप में यहूदियों और ईसाइयों को स्वीकार करता है।

" बेशक हम ने तौरेत नाज़िल की जिसमें (लोगों की) हिदायत और नूर (ईमान) है उसी के मुताबिक़ ख़ुदा के फ़रमाबरदार बन्दे (अम्बियाए बनी इसराईल) यहूदियों को हुक्म देते रहे और अल्लाह वाले और उलेमाए (यहूद) भी किताबे ख़ुदा से (हुक्म देते थे) जिसके वह मुहाफ़िज़ बनाए गए थे और वह उसके गवाह भी थे पस (ऐ मुसलमानों) तुम लोगों से (ज़रा भी) न डरो (बल्कि) मुझ ही से डरो और मेरी आयतों के बदले में (दुनिया की दौलत जो दर हक़ीक़त बहुत थोड़ी क़ीमत है) न लो और (समझ लो कि) जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुताबिक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग काफ़िर हैं, (5:44 ) और हम ने तौरेत में यहूदियों पर यह हुक्म फर्ज क़र दिया था कि जान के बदले जान और ऑख के बदले ऑख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दॉत के बदले दॉत और जख्म के बदले (वैसा ही) बराबर का बदला (जख्म) है फिर जो (मज़लूम ज़ालिम की) ख़ता माफ़ कर दे तो ये उसके गुनाहों का कफ्फ़ारा हो जाएगा और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुवाफ़िक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं, (5 : 45), और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी, (5:46), और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं"(5: 47)

इन घोषणाओं के अलावा, कुरान ईसाइयों और यहूदियों के लिए उनके सम्मान और आदर के और भी उदाहरण पेश करता है।

कुरान स्वीकार करता है कि ईसाइयों और यहूदियों के बीच कुछ लोग बहुत पवित्र, धार्मिक और उदारवादी थेः

"और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं"(3: 75)

" और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि) अहले किताब से कुछ लोग तो ऐसे हैं कि (ख़ुदा के दीन पर) इस तरह साबित क़दम हैं कि रातों को ख़ुदा की आयतें पढ़ा करते हैं और वह बराबर सजदे किया करते हैं, (3:113), खुदा और रोज़े आख़ेरत पर ईमान रखते हैं और अच्छे काम का तो हुक्म करते हैं और बुरे कामों से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ पड़ते हैं और यही लोग तो नेक बन्दों से हैं, (1143:), और वह जो कुछ नेकी करेंगे उसकी हरगिज़ नाक़द्री न की जाएगी और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ़ है"(3:115)

और अहले किताब में से कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर हैं जो ख़ुदा पर और जो (किताब) तुम पर नाज़िल हुई और जो (किताब) उनपर नाज़िल हुई (सब पर) ईमान रखते हैं ख़ुदा के आगे सर झुकाए हुए हैं और ख़ुदा की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनियावी फ़ायदे) नहीं लेते ऐसे ही लोगों के वास्ते उनके परवरदिगार के यहॉ अच्छा बदला है बेशक ख़ुदा बहुत जल्द हिसाब करने वाला है"(3:199)

और अगर यह लोग तौरैत और इन्जील और (सहीफ़े) उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किये गए थे (उनके एहकाम को) क़ायम रखते तो ज़रूर (उनके) ऊपर से भी (रिज़क़ बरस पड़ता) और पॉवों के नीचे से भी उबल आता और (ये ख़ूब चैन से) खाते उनमें से कुछ लोग तो एतदाल पर हैं (मगर) उनमें से बहुतेरे जो कुछ करते हैं बुरा ही करते हैं" (5:66)

यह सभी धार्मिक मानवता (2:62, 5:69 22:17) स्पष्ट रूप से ईसाइयों और यहूदियों का उल्लेख करते हुए, सबके लिए खुदा के फैसले के वैश्विक मानदण्ड का प्रस्ताव पेश करता है।

 ”ेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और ला मज़हबों में से जो कोई खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए और अच्छे-अच्छे काम करता रहे तो उन्हीं के लिए उनका अज्र व सवाब उनके खुदा के पास है और न (क़यामत में) उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह रंजीदा दिल होंगे"(2:62)

  ”इसमें तो शक ही नहीं कि मुसलमान हो या यहूदी हकीमाना ख्याल के पाबन्द हों ख्वाह नसरानी (गरज़ कुछ भी हो) जो ख़ुदा और रोज़े क़यामत पर ईमान लाएगा और अच्छे (अच्छे) काम करेगा उन पर अलबत्ता न तो कोई ख़ौफ़ होगा न वह लोग आज़ुर्दा ख़ातिर होंगे"(5:69)

इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया (मुसलमान) और यहूदी और लामज़हब लोग और ईसाई और मजूसी (आतिशपरस्त) और मुशरेकीन (कुफ्फ़ार) यक़ीनन खुदा उन लोगों के दरमियान क़यामत के दिन (ठीक ठीक) फ़ैसला कर देगा इसमें शक नहीं कि खुदा हर चीज़ को देख रहा है"(22:17)

नोट: चार आयतें (4:124, 64:9, 65:11)  हैं जो किसी भी आस्था या वर्ग का उल्लेख किया बिना पूरी धार्मिक मानवता के लिए अजर व सवाब का वादा करती हैं, जिज्ञासू लोग इसे कुरान की अपनी नकल में देख सकते हैं।

ये घोषणा करता है कि खुदा का नाम खानकाहों, चर्चों, यहूदी पूजा स्थलों और मस्जिदों में नियमित रूप से लिया जाता है (22:40)

"ये वह (मज़लूम हैं जो बेचारे) सिर्फ इतनी बात कहने पर कि हमारा परवरदिगार खुदा है (नाहक़) अपने-अपने घरों से निकाल दिए गये और अगर खुदा लोगों को एक दूसरे से दूर दफा न करता रहता तो गिरजे और यहूदियों के इबादत ख़ाने और मजूस के इबादतख़ाने और मस्जिद जिनमें कसरत से खुदा का नाम लिया जाता है कब के कब ढहा दिए गए होते और जो शख्स खुदा की मदद करेगा खुदा भी अलबत्ता उसकी मदद ज़रूर करेगा बेशक खुदा ज़रूर ज़बरदस्त ग़ालिब है"(22:40)

वही के नाज़िल होने के अंतिम चरण में कुरान साफ और स्पष्ट शब्दों में धार्मिक बहुलता के बारे में अपने विचार की घोषणा करता है:

"और हर फरीक़ के वास्ते एक सिम्त है उसी की तरफ वह नमाज़ में अपना मुँह कर लेता है पस तुम ऐ मुसलमानों झगड़े को छोड़ दो और नेकियों मे उन से लपक के आगे बढ़ जाओ तुम जहाँ कहीं होगे ख़ुदा तुम सबको अपनी तरफ ले आऐगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है"(2:148)

"...... हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है"(5:48)।

"लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने तुम्हारे कबीले और बिरादरियाँ बनायीं ताकि एक दूसरे की शिनाख्त करे इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सबमें बड़ा इज्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार ख़बरदार है"(49:13)

अपने अंतिम चरण में, कुरान मुसलमान मर्दों को ईसाई, यहूदी और किसी मोमिन औरत (5:5) से शादी करने की इजाज़त देता है।

"आज तमाम पाकीज़ा चीजें तुम्हारे लिए हलाल कर दी गयी हैं और अहले किताब की ख़ुश्क चीजें ग़ेहूं (वगैरह) तुम्हारे लिए हलाल हैं और तुम्हारी ख़ुश्क चीजें ग़ेहूं (वगैरह) उनके लिए हलाल हैं और आज़ाद पाक दामन औरतें और उन लोगों में की आज़ाद पाक दामन औरतें जिनको तुमसे पहले किताब दी जा चुकी है जब तुम उनको उनके मेहर दे दो (और) पाक दामिनी का इरादा करो न तो खुल्लम खुल्ला ज़िनाकारी का और न चोरी छिपे से आशनाई का और जिस शख्स ने ईमान से इन्कार किया तो उसका सब किया (धरा) अकारत हो गया और (तुल्फ़ तो ये है कि) आख़ेरत में भी वही घाटे में रहेगा"(5:5)

कुरान मुसलमानों से सिवाय उन लोगों के जो दूसरों पर अत्याचार करते हैं (29:46), उनके अलावा सभी अहले किताब से सबसे ज़्यादा सुंदर और तार्किक ढंग (16:125, 29:46) से बहस करने के लिए कहता है।

"(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है"(16:125)

और (ऐ ईमानदारों) अहले किताब से मनाज़िरा न किया करो मगर उमदा और शाएस्ता अलफाज़ व उनवान से लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया (उनके साथ रिआयत न करो) और साफ साफ कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताब तुम पर नाज़िल हुई है हम तो सब पर ईमान ला चुके और हमारा माबूद और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फरमाबरदार है"(29:46)

इस तरह विशेष संदर्भ वाली कुरान आयतें 2:120, 5:51, 5:57 या किसी अन्य आयत का वर्तमान समय के ईसाइयों और यहूदियों और अन्य धार्मिक वर्गों के खिलाफ घृणा के लिए इनका संदर्भ देना कुरान के संदेश को विकृत करने के बराबर होगा।

सावधानी के लिए नोट- आज लोगों के तीन प्रकार हैं, जो कुरान की उपरोक्त विशेष संदर्भ वाली आयतें को वैश्विक आयाम देने पर तुले हैं। (1) मुस्लिम आतंकवादी संगठन और चरमपंथी तत्व- आंशिक हालांकि प्रत्यक्ष अल्पसंख्यक अपने हिंसक एजेंडे का औचित्य पेश करने के लिए इनका संदर्भ देते हैं, (2) इस्लामोफ़ोब्स (Islamophobes) / इस्लाम विरोधी वेबसाइट-  इस्लाम से अपनी घृणा और भय का औचित्य पेश करने के लिए और (3) पश्चिमी देशों में अप्रवासी मुसलमानों के बीच कुछ मुसलमान- कुरान की नैतिक शिक्षा और बुनियादी मानजदंडों (जैसे नेक आमाल, हलाल गतिविधियों में उत्कृष्ठता, नैतिक और आर्थिक ईमानदारी, अपनी क्षमता को विकसित करने के लिए लगातार संघर्ष, सामाजिक न्याय, सामाजिक जिम्मेदारी, उदारता, माफी, दया, करुणा, सहानुभूति, महिलाओं, पड़ोसियों और सभी मानवता के साथ दया) और लालच, उपभोक्तावाद और स्वार्थी आकांक्षाओं की धुन और कुरान के संदेश से खुले तौर पर इन्कार के लिए औचित्य पेश करने के लिए करते हैं। जज़िया (9:29) पर एक अकेली और माले ग़नीमत (8:41 , 33:27) पर दो आयतें हैं जो पूरी तरह से उस दौर के ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार थीं और जो उस जमाने के आर्थिक आदेश का हिस्सा और अनिवार्य थीं और कभी कभी इस्लाम को बदनाम करने के लिए इनका पूरी तरह से ऐतिहासिक संदर्भ के बिना हवाला पेश किया जाता है।

इस हकीकयत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस्लामी धार्मिक बातचीत की सभी शाखाओं- हदीस, प्राचीन सीरत (जीवनी) और इस्लाम की प्राचीन शरीअत, उस समय मौखिक रूप से संचलन में था और ये इन्हीं सामग्रियों पर आझारित थे और जिनका संकलन नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मृत्यु के कम से कम एक सौ पचास साल बाद किया गया। इनमें ऐसी सामग्री है जो अजीब लगती हैं, जिसकी मंशा कामुकता के लिए उकसाना, आतंकवाद को बढ़ावा देना, अंतर विश्वास घृणा को बढ़ावा देना, महिलाओं के विरोधी हैं और जिनके औचित्य के लिए वैज्ञानिक रूप से तर्क नहीं दिया जा सकता है और खुद परस्पर विरोधी हैं [1] ये अपरिहार्य अलंकरण और वृद्धि को दर्शाते हैं जो मौखिक संचरण में रही सामग्री में पाया जाता था और जो सभी प्रमुख धर्मों के तुलनात्मक धार्मिक बातचीत की विशेषताएं हैं। इस्लाम की बुनियादी और अकेली आसमानी किताब कुरान में न तो इन घातक और नुकसान करने वाले अलंकरणों और वृद्धि का उल्लेख है और न ही वो इनका समर्थन करता है।

नोट:

हदीस और उनके संकलनकर्त्ताओं का बचाव: आदरणीय इमाम जिनकी हतक की गयी

http://www.newageislam.com/hindi-section/defending-the-hadith-and-its-compilers-–-the-great-imams-who-are-sometimes-misunderstood-and-even-reviled--हदीस-और-उनके-संकलनकर्त्ताओं-का-बचाव---आदरणीय-इमाम-जिनकी-हतक-की-गयी/d/8223

 08 अक्तूबर, 2012

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam-and-pluralism/muhammad-yunus,-new-age-islam/the-qur’an’s-regard-for-the-people-of-the-book-(christians-and-jews)-and-the-believing-humanity–-a-living-testimony/d/8924

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/quran’s-respect-and-the-people-of-the-book--a-testimony--اہل-کتاب-(یہودی-اور-عیسائی)اور-معتقد-انسانیت-کے-سلسلے-میں-قرآن-کا-احترام--ایک-شہادت/d/8934

URL for this article: http://www.newageislam.com/hindi-section/the-qur’an’s-regard-for-the-people-of-the-book--अहले-किताब-(यहूदी-और-ईसाई)-और-धार्मिक-मानवता-के-लिए-कुरान-का-सम्मानः-एक-प्रमाण/d/8947


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