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इंसानों ने इंसानों के बीच धर्म, नस्ल, ज़ात, रंग और कौमियत की जितनी लकीरें खींच रखी थीं उनको मिटाने का कोई रास्ता ज़िन्दगी तो नहीं खोज सकी, अलबत्ता मौत की दहशत और बीमारी के खौफ ने भेद भाव की सारी लकीरें मिटा कर सारे इंसानों को एक बार फिर इंसान बना दियाl.......

 

संक्रामक रोग और महामारी मानवजाति के लिए कोई नई बात नहीं है, फिर भी इतने बड़े पैमाने पर कोरोना वायरस का प्रकोप हम सबके जीवनकाल में एक नई घटना है। मेरी संवेदना उन डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिक्स, स्वास्थ्यकर्मियों तथा उन अन्य सभी लोगों के साथ भी है जो अपने जीवन को जोखिम में डालकर मानवजाति की सेवा कर रहे हैं।.....

 

ओआईसी के सेक्रेटरी जनरल ने इस बात का भी उल्लेख किया कि उनका संगठन (ओआईसी) आतंकवादियों के माध्यम से विकल्प किये हुए वैचारिक बयान बाज़ी की निंदा करती रहती है, लेकिन केवल जिहादी बयानों की निंदा ना तो अब तक सहायक सिद्ध हुई है और ना ही भविष्य में इससे मदद की उम्मीद की सकती है, जिहादी विचारधारा के समर्थक केवल बयान बाज़ी नहीं करते, बल्कि वह हिंसा और तकफीर की एक बहुत ही एकीकृत और व्यापक थियोलाजी भी तैयार कर चुके हैंl......

अल्लाह पाक का फरमान है वह दुनिया में लोगों को खौफ देकर, जान लेकर आज़माए गा लेकिन बशारत उन लोगों के लिए है जिन्हें जान व माल के छिन जाने पर भी सब्र होता है, सब्र तो वह खुबसूरत जीना है जो अल्लाह के साथ के यकीन व एहसास की तरफ ले जाती है, यह वही साबिर व शाकिर लोग हैं जिन्हें कोई खौफ नहीं और कोई गम नहींl......

अल्लाह पाक का इरशाद है “उसने हक़ के साथ आप पर किताब नाज़िल की जो उन किताबों की पुष्टि करने वाली है जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी हैं और उसने तौरात और इंजील को नाज़िल कियाl......

 

आज़ादी की जंग ने जब ज़ोर पकड़ा तो मुस्लिम राजनीतिज्ञों के साथ फिर उलेमा राजनीति में आए और उन्होंने दोसरी कौमों के साथ मिलकर आज़ादी की तहरीक में हिस्सा लियाl.......

 

इस्लाम में मुर्तद उसे कहते हैं जो इस्लाम कुबूल करने के बाद दीन से फिर जाए और दोसरा धर्म स्वीकार कर ले या फिर अपने पुराने दीन पर लौट जाएl नबूवत के ज़माने में कई लोग विभिन्न कारणों से मुर्तद हो जाते थे जिनमें एक कारण था ज़कात अदा करना l......

 

प्रदर्शनों के प्रकार बड़े पैमाने पर सेकुलर ही रही है और प्रदर्शनकारी केवल संवैधानिक अधिकारों के बहाली का मुतालबा कर रहे हैं। या उन प्रदर्शनों की बहादुरी और दूरदर्शिता है है कि उन्होंने अब तक किसी धार्मिक आलिम को अपने करीब नहीं आने दिया।.....

 

जिहादी लिट्रेचरों और मदरसों में पढाए जाने वाली रिवायती थियोलॉजी में बसे बुनियादी जिहादी जड़ों पर मेरा अध्यन दशकों से है और उसी आधार पर मैं यह स्टैंड रखना चाहूँगा कि कम से कम निम्नलिखित बिन्दुओं को उलेमा जिहादी सिद्धांतों के रद्द और इब्ताल में ज़ेर ए गौर रखें ताकि उनका यह कार्य प्रभावी हो सके। उन पर आवश्यक हैकि वह इन बिन्दुओं की व्याख्या करते हुए सैद्धांतिक इस्तिलाह व मनहज के साथ संतोषजनक जवाब दें अगर वह सच में चाहते हैं कि युवाओं पर इसका साकारात्मक प्रभाव हो सके और फिर वह अधिक हिंसा की राह विकल्प करने से बाज़ रहें।........

 

आज से कुछ ही सप्ताह पहले तक लगता था कि सेकुलरिज्म, न्याय, आज़ादी, समता और आपसी भाईचारा कुछ ऐसे बेजान शब्द हैं जिनका कोई ख़ास अर्थ नहीं है, जो एक ऐसी पुस्तक के पन्नों में बंद हैं जिसे कम ही लोगों ने पढ़ी है।.......

 

फैसले से पहले मुसलमान इस बात पर सहमत थे कि जो भी निर्णय होगा, वे इसे स्वीकार करेंगे। लेकिन निर्णय आने के बाद कुछ मुसलमान इस फैसले से नाखुश और असंतुष्ट हैं। ....

मुस्लिम बुद्धिजीवी जिन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों को खुश करने के लिए लम्बे समय से चल रहे विवादित मामले में अदालत से बाहर समस्या का हल निकालने का मुतालबा किया था, उन्होंने देश में देर पा अमन कि खातिर यह ज़मीन हिन्दुओं के हवाले करने की अपील की थीl लगभग सभी मुस्लिम संगठनों ने राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवादित भूमि के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने का संकल्प लिया थाl लेकिन अब जबकि हिन्दुस्तान की आला अदालत ने हिन्दुओं को वह ज़मीन दे दी है जिस पर बाबरी मस्जिद की इमारत लगभग पांच सदियों से खड़ी थी, तो विभिन्न सुन्नी रहनुमा और उलेमा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर “सम्मान और असंतोष” के बीच घिरे मालुम पड़ रहे हैंl...

 

यह बात लगभग स्पष्ट है कि बाबरी मस्जिद विवाद के मामले पर सुप्रीम कोर्ट शीघ्र ही निर्णय सूना दे गाl सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय पर गौर करते हुए ऐसा नहीं लगता कि अदालत अपने निर्णय में और देरी करे गाl हालिया फैसलों से भी हमें एक इशारा दिया है कि फैसला किसके हक़ में जाए गाl तथापि यह मानते हुए कि सुप्रीम कोर्ट अभी निष्पक्ष है, सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला ‘मुस्लिम पार्टी’ के हक़ में या “हिन्दू पार्टी” के हक़ में पेश करे गाl ....

 

भारत में मुसलमानों का थोड़ा असहज होना स्वाभाविक बात है क्योंकि देश को अयोध्या में बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद से संबंधित उच्च न्यायलय के निर्णय की प्रतीक्षा है जो कि कुछ ही दिनों में आने वाली हैl तरह तरह की अफवाहें परिवेश में फ़ैल रही हैं जो हमारे मीडिया के किसी भी जिम्मेदार हिस्से में तकरार के काबिल कल्पना नहीं की जाती हालांकि इस मामले से अधिकतर मुसलमानों को प्रतिरोध का सामना हैl…

 

इस्लामोफोबिया और इस्लाम परस्ताना हिंसा दोनों को ऐसे ऐसे जगहों पर बढ़ावा मिल रहा है जहां गुमान भी नहीं जाताl श्रीलंका गिरजा घरों पर हालिया हमले इतने ही आश्चर्यजनक थे जितने क्राइस्ट चर्च के मस्जिदों पर हमलेl और अब उसी प्रकार के दिल खराश हमले और भी दोसरी जगहों पर भी हो रहे हैंl और ज़ेनोफोबिक (गैरों से घृणा पर आधारित) हिंसा का यह सिलसिला अपने चरम पर हैl आज जबकि पूरी दुनिया जिहादी हिंसा का शिकार है, ख़ास तौर पर उन फिरका वाराना जंगों में सबसे अधिक हलाकतें मुसलमानों की ही हुई हैं जिनकी आग इस्लामी जिहादी विचारधारा के जरिये भड़काई गई हैl........

 

लेकिन वह ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकते कि लोगों के सामने दीन की सही तस्वीर पेश कर दें कि इससे उनके हितों पर ज़द लगने लगे गी और जंग व जिदाल और क़त्ल व किताल पर आधारित उनका पूरा कारोबार ख़त्म हो जाएगाl.......

 

यह वह कुरआनी आयतें और हदीसें हैं जिनमें प्रारम्भिक इस्लाम के कुछ सितम रसीदा मोमिनीन व मुस्लिमीन को अपने वजूद की बका के लिए उन लोगों से जंग करने की अनुमति दी गई थी जो उनके लिए जान बन चुके थेl......

 

पवित्र कुरआन की उल्लेखित आयतों और हदीसों के इतने उल्लेख से अब इस बात में कोई शक बाकी नहीं रहता कि गुनाहों से निजात हासिल करने के लिए अब हमारे पास सच्चे दिल से अल्लाह की बारगाह में तौबा करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं हैl.......

 

शैख़ यूसुफ अल अबीरी के इन कलिमात को आतंकवाद का ज़हर मैंने इसलिए कहा क्योंकि उन्होंने अपने उपर्युक्त बयान में बे दरेग कत्ल की हिमायत की है और एक ऐसे नरसंहार का समर्थन इस्लाम और पैगंबर ए इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हवाले से पेश करने की कोशिश की हैl.........

 

मौलाना तौकीर रज़ा: तो सुनिए तलाक़ ए बिदअत पर उन्होंने बिल बनाया है तलाक़ ए अहसन और तलाक़ ए हसन पर नहीं बनाया है तलाक़ ए बिदअत जो नशे में और गुस्से में होती है और ऐसी तलाक़ पर हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी नागवारी का इज़हार फरमाया था और हज़रत उमर के ज़माने में ऐसी तलाक़ पर कोड़े भी लगाए गए थे l........

 

कुरआन और सुन्नत ने खूँ रेज़ी को सख्ती से निषेध करार दिया हैl और जहां कहीं भी जंग की अनुमति दी गई वहाँ भी असल में मानवता की सुरक्षा ही मद्देनजर रहीl कुरआन पाक सरीह शब्दों में यह एलान करता है कि जिसने किसी एक जान को क़त्ल किया ना जान के बदले ना ज़मीन पर किसी आपराधिक कार्य के आधार पर तो गोया उसने पूरी इंसानियत का कत्ल कर दिया (अल मायदा).......

 

अक्टूबर १९४७ ई० में कश्मीर के महाराजा को कश्मीर का भारत से सहबद्ध करना पड़ा था वहाँ की जनता तीन वर्गों में बट गईl एक वर्ग आज़ाद राज्य, दोसरा वर्ग पाकिस्तान के साथ एकीकरण और तीसरा वर्ग भारत के साथ सहबद्धता का इच्छुक थाl

 

अल्लाह ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को शिफा याबी की ताकत अता की थीl इसलिए, अगर कोई बीमार शख्स उनके पास शिफा याबी के लिए आया तो क्या यह “शिर्क” हुआ? बेशक नहीं\, ख़ास तौर पर जब आने वाले को इस बात का शउर है कि शिफा की ताकत हज़रात ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने अता की हैl

 

कुरआन में मुसलमानों को दीन के प्रचार और इसके अस्तित्व के लिए मेहनत करने और कुर्बानी पेश करने की तलकीन की है और इसके लिए बड़े बदले की बशारत दी हैl मुसलमानों को दीन के प्रचार प्रसार और तौहीद के संदेश को जनता तक पहुंचाने के लिए हर तरह से मेहनत और संघर्ष करने की हिदायत दी हैl

 

कुरआन और दोसरे सभी आसमानी सहिफों में खुदा को निरंकार, बेमाहीत और लतीफ कहा गया हैl उसकी ज़ात को ना देखा जा सकता है, ना अंदाजा किया जा सकता है और ना उसे अक्ल पा सकती हैl उसे किसी भी माद्दी सूरत से पहचाना नहीं जा सकताl मगर इसके साथ ही साथ कुरआन यह भी कहता है कि वह सुनने, देखने, तदबीर करने और तखलीक करने और तबाह करने की सलाहियत रखता हैl

 
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