New Age Islam
Tue Jun 09 2026, 11:24 PM

Hindi Section ( 3 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Salman Rushdie controversy: India too is not immune to perils of Islamo-Fascism सलमानम रुश्दी विवादः हिंदुस्तान भी इस्लामोफासिज़्म के खतरे से महफूज़ नहीं



सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम डाट काम

24 जनवरी, 2012

सलमान रश्दी को जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में जमा हुए लेखकों और उनके चाहने वालों से वीडियो लिंक के ज़रिए से बात करने की इजाज़त नहीं दी गई। यह हमारे देश के लिए शर्म की बात है और इससे भी ज़्यादा हमारी कौम के लिए है। हमारे देश के लिए शर्म की बात इसलिए है क्योंकि न तो हमारे पास संसाधन हैं और न ही दुनिया में अपनी किस्म के बेहतरीन एक लिटरेरी फेस्टिवल को गैंगस्टर और माफियाओं की हिंसा की धमकी से हिफ़ाज़त करने की हिम्मत है। हमारी कौम के लिए शर्म की बात इसलिए है क्योंकि हमारे बीच मज़हबी ठग हैं जो एक नुक्सान न करने नाली तकरीब को इसलिए चैलेंज कर रहे हैं,  क्योंकि वह एक लेखक है जिसने हमारे नबी करीम (स.अ.व.) की तौहीन की है - ऐसी तौहीन जो हम बिना एहसास किए हर दिन, हर मिनट, आमतौर से करते हैं और जिस प्रकार के भ्रष्ट हम लोग हैं,  अपनी बुरे कामों  की वजह से खुदा के सामने ताल ठोंकते हैं और इस्लाम को बदनाम करते हैं। समारोह से कोई नुक्सान होने वाला नहीं था क्योंकि सलमान रश्दी कोई विवादास्पद मुद्दा उठाने,  सेटेनिक वर्सेज़ के बारे में बोलने या उसे पढ़ने नहीं जा रहे थे।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिज्ञ और मीडिया हमारे मज़हबी नेताओं को मानसिक दिवालिया की तरह व्यवहार करते हैं, जो साहित्य या कला पढ़ने और उसका तारीफ करने के काबिल नहीं हैं। समारोह में ऐसे ही एक फ़ितना फैलाने वाले को कहा गया कि वह जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के मंच पर एक बौद्धिक बहस के लिए रश्दी को चुनौती क्यों नहीं देते हैं। यह वास्तव में एक सवाल है और शायद जिसका वो जवाब भी नहीं दे सकते हैं। यदि व्यक्ति रश्दी के अदब की खूबसूरती और उसके सम्मान की सराहना करने के काबिल होते तो वो फेस्टिवल करने वालों को हिंसा की की धमकी नहीं देते,  हालांकि वह ऐसा करता भी तो बहुत शांतिपूर्ण तरीके और उचित भाषा के साथ करता, जैसा कि सभी माफिया सरगना हैं।

रश्दी के वीडियो लिंक को भी इजाज़त नहीं मिली,  इस घोषणा के बाद जयपुर महोत्सव में एक चर्चा में तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने मौलवी से पूछा, "क्या कोई भी ऐसा कुछ कह सकता है जो इस्लाम की महानता और उसके सौंदर्य को चोट पहुंचा सकता है। जब दाढ़ी वाले फितना परवर तेजपाल के सवाल को नहीं समझ सके तो तहलका की शोमा चौधरी जो चर्चा को माडरेट कर रहीं थीं,  उन्होंने सवाल किया कि 'क्या सलमान रश्दी की सिर्फ वर्चुअल मौजूदगी से अल्लाह के अस्तित्व को खतरा है?  बेशक उन्हें कोई संभावित जवाब नहीं मिल सकता था।

एनडीटीवी (NDTV) की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त ने कहा कि पुलिस का एक वीडियो लिंक की इजाज़त नहीं देने का फैसला मुस्लिम समुदाय को सामूहिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाला था, क्योंकि उनका मानना ​​था कि इस समस्या को पैदा करने वाले कुछ पागल लोग हैं और मुस्लिम समुदाय का बहुमत हिंसा की धमकी के साथ नहीं है। बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर बरखा दत्त को दिए एक इंटरव्यू में सलमान रश्दी ने भी इस बात पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि ' बिल्कुल ठीक ऐसा ही मैंने भी कहा है कि हिंदुस्तानी मुसलमानों का बहुमत इस पर तवज्जोह नहीं देते हैं कि  मैं आता हूँ या जाता हूँ। उनके सामने और भी मुश्किल समस्याएं हैं। और अभी तक सिर्फ एक उदारवादी मुसलमान की आवाज़ जो मीडिया में पेश किए जाने के लिए खोजी गयी वो हर जगह मौजूद रहने वाले और वास्तव में स्वतंत्र विचार वाले शायर जावेद अख्तर हैं जिन्होंने ने वाज़ेह किया है कि वो खुफिया तौर पर से बेदीन नहीं हैं। ऐर जावेद अख्तर के ही जैसे एक या दो और दानिशवारों को तलाश किया गया।

एनडीटीवी (NDTV) ने मुसलमानों की आबादी में से किसी और को तलाश करने की कोशिश की जो उदारवादी खयालात की तर्जुमानी कर सके। उन्होंने थियेटर के व्यक्ति को पेश किया जो खुदा जानता है के मंत्र के साथ आए और अपनी टिप्पणी में कहा कि, सलमान रश्दी एक बोर करने वाले लेखक हैं,  उनकी किताब मिड नाइट चिल्ड्रेन् को वो एक बाब (अध्याय) से आगे नहीं पढ़ सका,  इसलिए उन्हें किया जाना चाहिए....... मैं समझ नहीं सका कि वो रश्दी पर प्रतिबंध चाहते थे कि वह बोर करने वाले हैं या प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए क्योंकि वह बोर करने वाले हैं. यह उदारवादी मुसलमान खुद नहीं जानते थे कि वो रश्दी के साहित्य से खुद अपनी दानिशवाराना समझ पर टिप्पणी कर रहे थे।

क्या इसका मतलब यह है कि भारतीय मुसलमान एक गैर उदारवादी कौम हैं? अगर गौर करने के लिए कोई उर्दू मीडिया को एक पैमाने के तौर पर लेता है तो कोई भी बिना मतभेद के भय के निश्चित रूप से कह सकता है कि देश में बमुश्किल ही कोई उदारवादी है। जो हैं भी उन्हें धमका कर चुप करा दिया गया है। इन मुकद्दस लोगों के खिलाफ बोलना गुनाह है। मुल्ला, मौलवी और मौलाना हज़रात और  दाढ़ी वालों के साथ ही बिना दाढ़ी वाले, मुस्लिम मीडिया  पर हैवी हैं और हमेशा अलग अलग तरह की साजिश  की थ्योरी को गढ़ते रहते हैं।

लेकिन उदारवादिता कोई समस्या नहीं है। मुसलमानों में बहुत से ऐसे होंगे जिन्हें उदारवादिता क्या है नहीं मालूम होगा। बुनियादी समस्या शिक्षा की कमी है। हम एक शिक्षित यहां तक ​​कि एक ख्वानदा (साक्षर) कौम भी नहीं हैं। दुनिया को यह समझना चाहिए कि अशिक्षा बड़े पैमाने पर विनाश के सबसे बड़े हथियार (Weapons of Mass Destruction) हैं। अधिकारी लोग धमकाए जाने और ब्लैक मेल किए जाने के कारण खुश हैं क्योंकि ये उनके लिए कुछ दिनों की प्रशासनिक समस्याओं को हल कर देगा। हर बार वो ऐसा करते हैं,  और उन्हें लगता है कि समस्या का समाधान कर दिया है और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन एक दीर्घकालीन समस्या तैय्यार हो रही है। एक टाइम बम को हम बिना तोवज्जोह के छोड़ रहे हैं। यह बेवजह नहीं और यही धार्मिक गैंगसस्टर और फितना पैदा करने वाले जो सलमान रश्दी को उनके जन्म के देश में आने से रोक रहे हैं वही मुसलमान बच्चों के शिक्षा के अधिकार (Right to Education RTE) के विरोध में जी जान से लगे हैं। वे जानते हैं कि कौम पर  उका कयादत तभी बरकरार रहेगी जब तक वह जनता को अनावश्यक समस्याओं जैसे सलमान रश्दी के वीडियो लिंक के जैसे मसले में उलझाए रखेंगे और जब तक वो शिक्षित नहीं हो जाते हैं। यह एक संयोग नहीं है कि वीडियो लिंक की नाकामी के बाद बड़ी संख्या में गुस्साये हिंदुस्तानियों, जिन लोगों का मीडिया ने इंटरव्यू किया उनमें से एक भी मुसलमान नहीं था। क्या वहां अशांत भीड़ में मुसलमान मौजूद थे,  मीडिया को उनकी राय जानने के लिए उन्हें तलाश करना चाहिए था और उनकी राय को नश्र (प्रसारित) करना चाहिए था।

इस देश में सलमान रश्दी पर कोई प्रतिबंध नहीं है,  उनकी किताब पर ज़रूर है। तो उन्हें क्यों नहीं वर्चुअली (Virtually) आने देना चाहिए और हमसे बात करने देना चाहिए। लेकिन अशिक्षित जनता और धार्मिक माफियाओं को आप कैसे फर्क समझा सकते हैं?

जावेद अख्तर ने जमाते इस्लामी के दाढ़ी वाले फ़ितना परवरों से पूछा, क्यों मुस्लिम महिलाओं को हिन्दुस्तान में एक नशिश्त में तीन बार तलाक कह देने से तलाक हो जाता है जबकि उन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस अपमान का सामना नहीं करना पड़ता है। लेकिन इस सवाल का जवाब जमाते इस्लामी को नहीं देना है। महिलाओं पर प्रतिबंध बरकरार रखने में उनका हिस्सा है। ये उनका धर्म है। वास्तव में जावेद अख्तर के सवाल का जवाब सरकार को देना है। हमारी सरकारें क्यों इतनी आसानी से गुन्डों के सामने हथियार डाल देती हैं, वो चाहे दायें बाज़ू (दक्षिणपंथी) हिंदू हों या मुसलमान। हमारे लोकतंत्र के संस्थापकों ने हमें एक ऐसा संविधान विरासत में दिया है जिसके लक्ष्यों में से एक कॉमन सिविल कोड निर्धारित है। वैसे एक कॉमन सिविल कोड की तज्वीज़ हिन्दोस्तान के लिए मुश्किल है क्योंकि कई सिविल कोड (नागरिक संहिता) पर यहां एक साथ अमल किया जा रहा है और उनमें समन्वय बना पाना मुश्किल होगा। लेकिन ऐसा क्या है जो हमें पाकिस्तान और बांग्लादेश में लागू मुस्लिम पर्सनल लॉ को अपनाने से रोक रहा है। जाहिर है सरकार ऐसे धार्मिक फितनापरवरों का सामना नहीं कर सकती है जो कई मामलों में हलाला के नाम पर महिलाओं के साथ ज़िना करने के एक ज़रिए के तौर पर एक नशिश्त में तीन तलाक को जायज़ कहते हैं।

मैं उम्मीद करता हूँ कि सरकार और मीडिया किसी को यह कहने की इजाज़ नहीं देंगे कि उन्हें एक किताब से तकलीफ पहुंची है, जब तक कि वो ये साबित  ल करें कि उन्होंने किताब पढ़ी है और बेशक वह साहित्य  की तारीफ करने के काबिल हों,  यहाँ तक कि अगर वो किताब पढ़ सकते हैं। लोगों को तब तक किसी भी कीमत पर पुस्तक पर बोलने के लिए दावत नहीं दी जानी चाहिए जब तक कि वो ये साबित न कर दें कि उन्होंने किताब पढ़ी है और उसे समझने के काबिल हैं। अक्सर हमारी नुमाइंदगी करने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया के ज़रिए दो लोगों को बुलाया जाता है उनमें से एक चार्टर्ड अकाउंटेन्ट हैं और दूसरे वकील हैं। मुझे वकीलों और चार्टर्ड अकाउंटेन्टों को कैसे अपनी कानून फर्मों और अकाउंटेन्सी के कारोबार को कैसे चलाया जाए इस की सलाह नहीं देना चाहिए। इसी तरह इन लोगों को साहित्य से लगाव रखने वालों को यह सलाह नहीं देना चाहिए कि क्या पढ़ें और क्या न पढ़ें और एक किताब को मैं क्या समझूँगा। इस दुनिया में किस तरह एक किताब आपको तकलीफ पहुँचा सकती है यदि आपने उसे पढ़ा ही नहीं है। अगर आपका अपने धर्म या अपने धर्म के बारे में अपने फिरके की तशरीह (व्याख्या) में यकीन मजबूत नहीं है तो उन धार्मिक किताबों को न पढ़ें जो आपके फिरके से बाहर के किसी लेखक ने लिखी है। किसी भी सूरत में फिकशन धर्म पर एक किताब नहीं है। लेकिन अंतर को समझने के लिए आपका पढ़ा लिखा होना ज़रीरी है।


URL for English article: http://www.newageislam.com/from-the-desk-of-editor/salman-rushdie-controversy--india-too-is-not-immune-to-perils-of-islamo-fascism/d/6467

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/salman-rushdie-dispute--india-is-not-safe-by-the-threat-of-islamofascism--سلمان-رشدی-تنازعہ---ہندوستان-بھی-اسلامو-فاسزم-کے-خطرات-سے-محفوظ-نہیں/d/6522

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/salman-rushdie-controversy-india-too/d/6543

 

Loading..

Loading..