सुहैल अंजुम
जनता पार्टी के अध्यक्ष और इकलौते लीडर सुब्रमण्यम स्वामी का मुसलमानों के खिलाफ़ लिखा गया लेख ज़हर में बुझा ऐसा तीर है जिसने न सिर्फ मुसलमानों के दिलों को तकलीफ पहुँचाई है बल्कि देश के सेकुलर मस्तिष्क को भी कष्ट पहुँचाया है। यही कारण है कि इस लेख पर मुसलमानों से ज़्यादा गैरमुस्लिम बुध्दिजीवी, पत्रकारों और लेखकों ने विरोध किया और स्वामी के खिलाफ कारवाई की मांग की है। स्वामी का लेख, लेख नहीं बल्कि एक ऐसा खतरनाक बम है जिसके निशाने पर इस देश की शांति और खुशहाली है, और यदि इस ज़िंदा बम को नाकाम नहीं किया गया तो इसके बड़े ही खतरनाक और विस्फोटक परिणाम सामने आ सकते हैं। स्वामी के इस लेख को किसी दीवाने की बकवास कह कर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ऐसा करने से उन तत्वों का उत्साह बढ़ेगा जो देश में हमेशा हिंदू-मुस्लिम दंगे कराने के प्रयास में रहते हैं, और सहअस्तित्व के सिध्दांत के विरुध्द, हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाने की मुहिम चलाने में लगे हुए हैं। स्वामी ने इस लेख में तथाकथित इस्लामी आतंकवाद को खत्म करने के तरीके सुझाए हैं, लेकिन वास्तव में उनका ये लेख देश में एक विशेष प्रकार के आतंकवाद को बढ़ावा देना वाला और मुसलमानों के विरुध्द दुर्भावनाएं भड़काने वाला है। ये लेख स्वयं में एक प्रकार के आतंकवाद का रूप है, और इसका सम्बंध उस कड़ी से है, जिसके नमूने स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और प्रवीण तोगड़िया जैसे लोगों में देखे जा सकते हैं। स्वामी के इस लेख में उठाये गये हर मुद्दे का जवाब दिया जा सकता है, लेकिल इसकी यहाँ गुंजाइश नहीं है। इसलिए इसके कुछ विशेष मुद्दों का पोस्टमार्टम किया जा रहा है।
स्वामी ने अपने लेख का शीर्षक रखा है ”इस्लामी अतंकवाद को कैसे खत्म किया जाय?”। ये शीर्षक ही सिरे से गलत है, क्योंकि दुनिया में इस्लामी आतंकवाद का कोई वजूद नहीं है। एक खतरनाक योजना के तहत ये शब्दावली गढ़ी गयी है, जो कि पूरी तरह गुमराह करने वाली और बेबुनियाद है। जिसे इस्लामी आतंकवाद कहा जा रहा है, वो अतंकवाद तो हो सकता है, लेकिन इस्लामी आतंकवाद बिल्कुल नहीं हो सकता है, क्योंकि इस्लाम में न तो आतंकवाद के लिए कोई जगह है और न ही कोई गुंजाइश। ये बात बहुत पहले से कही जा रही है, और अब इसके लिए बहुत ज़्यादा स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं हैं। उन्होंनें आगे लिखा है कि हिंदुस्तान में प्रति माह कम से कम 40 आतंकवादी हमले होते हैं, जिनमें से कुछ की रिपोर्ट हो पाती है, कुछ की नहीं, लेकिन स्वामी ने इसका कोई प्रमाण नहीं दिया है, और न ही कोई हवाला। यदि इस बात में सच्चाई है तो यकीनी तौर पर इसका ज़्यादातर निशाना मुसलमान बनते हैं, क्योंकि इन हमलों की तो बिल्कुल रिपोर्टिंग नहीं होती है, जिनमें ‘हिंदू आतंकवादी’ शामिल होते हैं। कुछ दिनों पहले नांदेड़ की एक छोटी सी जगह पर एक डाक्टर के दवाखाने में जो बम धमाका हुआ है उस पर मीडिया ने कोई ध्यान नहीं दिया, जबकि इसका सम्बंध आतंकवाद से हो सकता है। यदि ये धमाका किसी मुसलमान के यहाँ हुआ होता, तो अब तक आसमान सिर पर उठा लिया गया होता। स्वामी ने मुम्बई पर हुए ताज़ा हमले के संदर्भ में कहा है कि हिंदू हलाल तरीके से ज़बह किये जाने को बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसका जवाब तो कुछ और भी हो सकता है, लेकिन अगर हम स्वामी की ज़बान में जवाब दें, तो यही कहना पड़ेगा कि इस्लाम में इंसान का ज़बीहा नहीं है। जहाँ तक जानवरों के ज़बह करने का का सम्बंध है, तो सिर्फ़ उन्हीं जानवरों को ज़बह किया जाता है जो हलाल हों, हराम जानवरों को ज़बह नहीं किया जाता है। उनका ये भी कहना है कि 2012 तक पाकिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो जायेगा और उसके बाद इस्लाम अपने नामुकम्मल मिशन को पूरा करने के लिए हिंदूवाद से मुक़ाबला करेगा। इसे सिवाय इसके और क्या कहा जा सकता है ये किसी दीवाने की बकवास है। इस्लाम का कोई मिशन नामुकम्मल नहीं है और अगर हो भी तो उसे मुकम्मल करने के लिए उसे हिंदूवाद से मुक़ाबला करने की ज़रूरत नहीं है। दरअसल उनके दावे का जवाब उनके लेख के अगले ही पैराग्राफ में मौजूद है। वो कहते हैं इस्लाम ने जिस भी देश पर भी विजय प्राप्त की, वहां दो दशकों के बाद सौ फीसद धर्म परिवर्तन हो गया, और सब के सब मुसलमान हो गये, लेकिन हिंदुस्तान में मुसलमानों के 8 सौ साल के शासन के बाद भी 1947 में अविभाजित हिंदुस्तान में 75 फीसद हिंदू थे। इस तरह उनका ये भी दावा गलत है कि इस्लाम ज़बरदस्ती मुसलमान बनाता है। यदि ऐसा होता तो दो दशकों में ही हिंदुस्तान को सौ फीसद इस्लामी या मुस्लिम देश बन जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अर्थात इस देश के मुस्लिम शासकों नें कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की, और सबको अपने अपने धर्म और संस्कृति का पालन करने की पूरी आज़ादी थी। स्वामी हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम दंगों के संदर्भ में झूठ बोलते हैं। वो कहते हैं कि 1947 के बाद से जितने भी दंगे हुए वो मुसलमानों ने शुरु किये। इसका मतलब ये है कि इससे पहले जितने भी दंगे हुए हिंदूओं ने शुरु किये होंगें। दूसरी बात ये कि मुसलमानों की ओर से दंगे शुरु करने की कहानी एक योजनाबध्द षड़यंत्र का हिस्सा है। ऐसे हालात में जबकि दंगों के सबसे ज़्यादा शिकार मुसलमान ही होते हैं, उन्हीं को मारा जाता है। उन्हीं की सम्पत्ति बर्बाद होती है, और उन्हीं को गिरफ्तार किया जाता है। ये कैसे सम्भव है कि इन सबके बावजूद दंगे की शुरुआत मुसलमान हीं करें। इस सिलसिले में सिफ इतना कहना चाहूँगा कि वो सीनियर पुलिस अफसर वी.एन. राय की किताब Combating Communal Conflicts और एस.एम.मुशरिफ़ की किताब Who Killed Karkare को पढ़ लें, उनकी आंखों पर जो भेदभाव को जो चश्मा लगा है वो हट जायेगा। वो गुजरात दंगों के बारे में भी झूठ बोलते हैं, और कहते हैं कि इसकी शुरुआत मुसलमानों ने 56 हिंदूओं को ट्रेन में आग लगाकर मार देने से किया था। इस सिलसिले में सच्चाई सामने आ चुकी है, और यू.सी.बनर्जी रिपोर्ट और दूसरी अन्य रिपोर्टों में दूध का दूध और पानी का पानी किया जा चुका है। वो ये भी कहते हैं कि हिंदुस्तान के तमाम दंगे आतंकवाद ही हैं। इनकी ये बात सही है, और उन्हें ये स्वीकार कना होगा कि दंगे की शुरुआत हिंदुओं का एक समूह करता है, और वो मुसलमानों के विरुध्द स्पष्ट रूप से आतंकवाद है। उनके अनुसार मुसलमान हिंदूओं पर इसलिए हमला करते हैं कि ताकि उनके उत्साह को कम किया जा सके। इस देश में जहाँ विभिन्न उपायों एवं बहानों से मुसलमानों के हौसले को पस्त किया जा रहा हो वहाँ मुसलमान भला कैसे ये हिम्मत कहाँ से पैदा हो जायेगी कि वो हिंदुओं को पस्त करने के लिए हमला करें, और वो भी तब जब हिंदू बहुसंख्यक हैं, और तमाम बड़े और अहम पदों पर विराजमान हैं, और सच्चर कमेटी रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है। उन्हें इस बात का भी दुःख है कि हिंदू किसी एक पार्टी के झण्डे तले इकट्ठा नहीं हो रहे हैं, और यदि वो हो जायें तो संसद और असेम्बलियों में असली हिंदू पार्टी बहुमत में आ जाये। वो दरअसल आरएसएस के राजनीतिक धड़े बीजेपी के पक्ष में मुहिम चला रहे हैं, लेकिन उनमें इतना नैतिक बल नहीं है कि वो खुल कर बीजेपी का नाम ले सकें। जहाँ तक एक पार्टी के झण्डे तले इकट्ठा होने का सम्बंध है, तो इसकी सबसे ज़्यादा जरूरत मुसलमानों को है। वही अलग अलग हिस्सों में बंटे हैं। यदि मुसलमान एक प्लेटफार्म पर आ जाएं तो उनकी आधी समस्याएं खुदबखुद हल हो जायेंगीं। वो कहते हैं कि आतंकवाद के विरुध्द सभी हिंदूओं को एकजुट होकर खड़ा होना होगा, और मिलकर जवाब देना होगा। इसमें वो मुसलमान भी शामिल हो सकते हैं जो हिंदूओं के बारे में सोचते हों। सुब्रमण्यम स्वामी को ये मालूम होना चाहिए कि आतंकवाद के शिकार मुसलमान भी होते हैं, और मुसलमान भी इसके उतने ही खिलाफ हैं जितने की हिंदू। इसे बार बार साबित करने की आवश्यकता नहीं है। यदि स्वामी ये कहते हैं कि आतंकवाद के विरुध्द सभी हिंदुस्तानियों को एकजुट होकर लड़ना होगा तो ये बड़ी बात होती, लेकिन वो आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों के विरुध्द हिंदूओं को एकजुट करना चाहते हैं, और इस तरह देश में हिंदू-मुस्लिम दंगा कराने का प्रयास कर रहे हैं। इससे एक ओर वो मुसलमानों को आतंकवादी बनाकर पेश करते हैं, और दूसरी ओर हिंदू आतंकवाद को बढ़ावा देना चाहते हैं। उन्होंनें दारुल हरब और दारुल अमन की बहस छेड़कर भी मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की है और एक विराट या वृहत हिंदुस्तान की वकालत की है। यानि आरएसएस हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाने की जो मुहिम चला रहा है, स्वामी उस आग में घी डालने का कम कर रहे हैं।
सुब्रमण्यम स्वामी हिंदूओं को जो सुझाव दे रहे हैं या वो तथाकथित इस्लामी आतंकवाद के खात्मे के लिए जो सुझाव पेश कर रहे हैं, उनके अनुसार कश्मीर से सम्बंघित धारा 370 समाप्त कर दी जाए, और सिर्फ हिदूओं के लिए पुनन कश्मीर बनाया जाये। जवाबी कार्यवाई के तौर पर ज्ञानवापी मस्जिद समेत तीन सौ मस्जिदों को ढहा दिया जाये, मुसलमानों से उस वक्त तक वोट देने का हक छीन लिया जाये जब तक वो हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र और अपने पूर्वजों को हिंदू स्वीकार नही कर लेते। समान आचार संहिता लागू किया जाय, संस्कृत की शिक्षा और वंदे मातरम का गायन ज़रूरी किया जाय, हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाय, हिंदूओं के धर्म परिवर्तन को गैरकानूनी करार दिया जाय, बंग्लादेश से जितने घुसपैठिये यहाँ आकर रह रहे हैं,उसी अनुपात में बंग्लादेश से भूमि छीन ली जाय और मदरसों, मस्जिदो और चर्चों में हिंदूओं के विरुध्द जो शिक्षा दी जाती है,उसके जवाब में हिंदू मानसिकता तैयार की जाय। उन्होंनें ज़ोर देकर कहा है कि अगर इस रणनीति पर अमल किया जाय, तो हम पाँच साल के अंदरआतंकवाद की समस्या पर काबू पा सकते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने यहूदियों का उदाहरण दिया है, और उनसे सबक सीखने को कहा है।
इस प्रकार ये पूरा लेख ज़हर में बुझा हुआ है, और आरएसएस के खतरनाक विचारों का प्रचार करता है। यदि इस प्रकार की हरकतों पर रोक नहीं लगाई गयी तो देश को इसके संगीन परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
(उर्दू से हिंदू अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)
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