certifired_img

Books and Documents

Hindi Section (08 Mar 2018 NewAgeIslam.Com)



Triple Talaq: Removing the Misunderstandings and Doubts, and Islamic Teachings तीन तलाक: गलतफहमियों और शक का दूर करना, और इस्लामी शिक्षा

 

 

 

इमाम सय्यद इब्ने अली डेट्राईट अमेरिका, न्यू एज इस्लाम

कुछ दिन हुए इंडिया से एक बच्ची ने फोन करके प्रश्न किया कि यह तीन तलाक का इस्लाम में क्या जवाज़ है और इस बारे में इस्लामी शिक्षा क्या है?

अभी मैं इस विषय पर लिखने को सोच ही रहा था कि इस बारे में इस्लामी शिक्षा लिखूं और कुरआन व हदीस से इस विषय की वजाहत करूँ कि तीन तलाकों के बारे में बहुत गलतफहमी पाई जाती है जिससे बहुत सारे घराने मुश्किलों में पड़े हुए हैंl इस बीच ही एक फतवा भी नज़रों से गुजरा और कुछ दीने मतीन के आलिमों की गुफ्तगू सुनने को मिली और यह वह घटना थी जब आसमा जहाँगीर साहिबा का इन्तेकाल हुआ और उनके जनाज़े पर पुरुष और महिलाओं ने एक साथ जनाज़ा की नमाज़ अदा कीl इस पर यह फतवा दारुल इफ्ता अहले सुन्नत वालों की ओर से जनाब अबु सालेह मुहम्मद कासिम कादरी साहब का थाl जिसमें उन्होंने लिखा:

“मख्लूत (औरत मर्द एक साथ) इज्तेमा में इबादत केवल खाना काबा में जायज हैl इसके अतिरिक्त किसी भी जगह मर्दों और औरतों का इकट्ठे नमाज़ अदा करना शरीअत के एतेबार से नाजायज है जिन लोगों से यह गुनाह हुआ है उनको अल्लाह के हुजुर इस गुनाह की माफी मांगनी चाहिए और हिदायत का तलबगार होना चाहिएl” यहाँ तक तो बात ठीक थी कि अगर इस प्रकार की कोई बात हो जाए तो खुदा के हुजूर इंसान को इस्तिग्फार, तौबा और गुनाह से माफी का तलबगार होना चाहिएl मगर इस फतवे में आगे चल कर एक बड़ी ही मज़ाकिया बात की गई है और वह यह है

“ना केवल महिलाओं बल्कि जो मर्द भी उस जनाज़े के नमाज़ में शरीक हुए उन सब को शरीअत के एतेबार से फिर से निकाह की जरूरत है, उनके पहले निकाह मंसूख हो चुकेl इन सबको अल्लाह के हुजूर माफी मांगनी चाहिए, सदका व खैरात करनी चाहिए और तुरंत निकाह की ज़रूरत हैl” इस पर यह भी नोट लिखा थाl “ऐसी सूरत में हलाला की जरूरत नहीं”

यह फतवा कैसा ही क्यों ना हो जो भारी परेशानी की बात है वह यह है कि इससे इस्लामी अहकामात और तालीमात से पुरी तराह अज्ञानता व्यक्त हो रही है कि आखिर मर्द और औरत के इकट्ठे नमाज़ पढ़ने से “निकाह क्यों टूट गएl” इसमें तो शक नहीं कि मर्द और औरत का एक साथ इस तरह नमाज़ पढ़ना जिस तरह TV पर दृश्य दिखाए गए सहीह नहीं थाl लेकिन इससे निकाह क्यों प्रभावित हो गए? ऐसा ही एक बार शायद पिछले साल इण्डिया के एक गाँव में एक जनाज़े की नमाज़ पढ़ने से विरोधी अकीदा रखने वालों के निकाह भी टूट गए थेl और फिर TV पर दिखाया गया कि किस प्रकार सब लोग फिर से निकाह के लिए इकट्ठे हुए थेl

यह सब कुछ इस्लामी शिक्षाओं से अज्ञानता के कारण है और यही कारण है कि इस विषय को लिखने की ज़रूरत पेश आई हैl

सबसे पहले तो मैं यह बयान करना चाहूँगा “निकाह की सेहत और उसके क्या शर्त हैं”l इसके बाद 3 तलाक वाला मसला कुरआन और हदीस की रौशनी में लिखता हूँl इसलिए जानना चाहिए कि निकाह की सेहत के लिए मूलतः 3 शर्त हैंl

1-    औरत रुकावट पैदा करने वाली चीजों से खाली हो- (अर्थात ऐसी औरतें जिनसे कभी भी निकाह जाएज़ ना हो यह अबदी महरम कहलाती हैंl दूसरी वकती महरमात हैं अर्थात जिनसे किसी शरई रोक की वजह से जाएज़ ना हो और इस रोक के दूर हो जाने पर निकाह जाएज़ हो जाए)

हर तरह की महरमात का बयान कुरआन करीम की सुरह निसा की आयतों 24-25 में हैl जहां पर माओं, बेटियों, बहनों, फुफियों और खालाओं और मुंह बोली माओं से निकाह हराम हैl विस्तार बयान नहीं कर रही आयतों का अनुवाद खुद अध्ययन कर लेंl

2-    औरत और उसका वली दोनों इस निकाह पर राजी होंl क्योंकि لَا نِکَاحَ اِلَّا بِوَلِیٍّ अर्थात औरत का निकाह वली की इजाज़त के बिना नहीं हो सकताl इसी तरह हज़रत आयशा से मरवी है कि हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अगर कोई औरत वली की इजाज़त के बिना निकाह करे तो उसका निकाह अमान्य हैl (तिरमिज़ी किताबुन्निकाह बाब لَا نِکَاحَ اِلَّا بِوَلِیٍّ जिल्द एक)

3-    निकाह के मुआहेदे के कम से कम दो गवाह होंl निकाह कि सेहत के लिए कम से कम दो गवाहों का होना जरुरी हैl  हज़रत इब्ने अब्बास रादिअल्लाहु अन्हु से यह हदीस मरवी है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि बिना वली के और दो गवाहों के निकाह सहीह नहीं हैl (दार कुतनी)

यह तीन कारण हैं जो निकाह को सहीह रकते हैंl निकाह टूटने की ऐसी कोई शर्त नहीं है जैसा कि उपरोक्त फतवे में लिखा गया हैl यह बहुत ही अजीब और हास्यास्पद बात है कि कोई भी गलत काम हो जाए उसका सबसे पहले प्रभाव निकाह पर पड़ता है जो कि किसी स्तिथी में भी सहीह नहीं हैl ना शरअन ना अकलनl हाँ तौबा इस्तिग्फार, सदका व खैरात ही इसका असल इलाज हैl अल्लाह बेहतर जानता है

अब मैं दुसरे मसले को बयान करता हूँl यह बहस भी धार्मिक, राजनितिक और दीनी जमातों का विषय बनी हुई है और वह है तलाक का मसलाl सबसे पहले तलाक का अर्थ और तलाक के बारे में और उसके शर्तों के बारे में जानना जरुरी हैl

जानना चाहिए कि निकाह दो पक्षों की आपसी सहमति से अमल में आता हैl अगर दोनों पक्ष इस समझौते को निभाने के काबिल ना रहें या आपस में निबाह ना कर सकें और इस समझौते को खत्म करने पर मजबूर हो जाएँ तो बावजूद इसके दीनी पवित्रता के शरीअत इस समझौते को ख़त्म करने की अनुमति देता हैl हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस समझौते को खत्म करने को ابغض الحلال عند اللہ الطلاق कहा है अर्थात खुदा के नजदीक हलाल चीजों में सबसे अधिक अवांछित तलाक हैl और फिर इसमें भी जल्दबाजी से मना किया है और जहां तक हो सके कोशिश की जाए कि निकाह बरक़रार ही रहेl और केवल उस स्तिथी में मियाँ बीवी का संबंध ख़त्म हो जब हकीकत में उसके बिना कोई चारह ना रहेl

तलाक की सेहत-

और इसके प्रभावी होने के लिए निम्नलिखित तीन शर्तें हैं-

1-    तलाक होश व हवास और पुरी सोच विचार के बाद अपनी मर्जी से दी जाएl जल्दबाजी, गुस्से और जबरदस्ती के तहत दी गई तलाक प्रभावी ना होगीl (हालांकि कुछ फुकहा ने गुस्से, जल्दबाजी और जबरदस्ती तलाक को प्रभावी भी माना है)

2-    तलाक ऐसे “तुहर” में दी जाए जिसमें शौहर ने अपनी बीवी से मुबाशेरत ना की हो, हैज़ की हालत में दी गई तलाक प्रभावी नहीं होगीl

3-    मौखिक या लिखित तलाक की सुचना बीवी को मिल जाएl और उसका लागू होना उस समय से शुरू होता है जब बीवी को इसकी सूचना मिल जाए और उसी समय से औरत की इद्दत शुरू होगीl

तलाक अपनी ज़ात में हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशाद के अनुसार अबगजुल हलाल है अर्थात हलाल चीजों में सबसे बुरी और मकरूह खुदा के नजदीक तलाक हैl जहां तक हो सके इस समझौते को कायम रखने के लिए हर तरह की कुर्बानी कर लेनी चाहिए इस लिए अलग अलग समय में तलाक देने की रिआयत शौहर को दी गई हैl

इस लिहाज़ से तलाक के तीन स्तर हैंl यह स्तर हैं, यह नहीं कि 3 बार तलाक, तलाक, तलाक कहने से औरत हमेशा हमेशा के लिए मर्द से अलग हो जाती हैl वह तीन दर्जे तलाक के कौन से हैं:

1-तलाक रजई 2-तलाक बाईन 3-तलाक बत्ता

तलाक रजई: इस तलाक में इद्दत के दौरान शौहर रुजुअ कर सकता है इस बारे में इस्लाम की उसूली हिदायत यह है कि मर्द औरत के तुहर के दिनों में केवल एक तलाक दे उसके नतीजे में तीन हैज़ इद्दत गुजरने के दौरान अगर शौहर चाहे तो वह बिना किसी शरई रोक के रुजुअ कर सकता है जैसा कि कुरआन शरीफ की सुरह बकरा आयत 229 में फरमाया है:

وَبُعُوْلَتُہُنَّ اَحَقُّ بِرَدِّھِنَّ فِیْ ذٰلِکَ اِنْ اَرَادُوْا اِصْلَاحًا۔ (2:229)

अनुवाद: और अगर उनके शौहर आपसी सुधार का इरादा कर लें तो वह उस मुद्दत के अंदर अंदर उनको अपनी जौजियत में लेने के अधिक हकदार हैंl

और फिर इद्दत गुजरने के बाद चाहे अलगाव पूरा हो जाएगा, लेकिन अगर यह दोनों चाहें तो आपसी सहमति से दुबारा निकाह कर सकते हैंl

इस तरह तलाक दे कर इसके बाद इद्दत के अंदर रुजुअ करने का हक़ कुरआन की आयतों की रौशनी में दो बार है जैसा कि अल्लाह पाक फरमाता है(اَلطَّلَاقُ مَرَّتٰنِ فَاِمْسَاکٌ بِمَعْرُوْفٍ اَوْ تَسْرِیْحٌ بِاِحْسَانٍ۔ (2:230

अर्थात ऎसी तलाक जिसमें रुजूअ हो सके दो बार हो सकती हैl फिर या तो मुनासिब तौर पर रोक लेना होगा या हुस्ने सुलूक के साथ रुखसत कर देना होगाl

तलाक बाइन: वह तलाक है जिसमें तलाक तो हो जाती है लेकिन इद्दत गुजरने के बाद मर्द आपसी सहमती से दुबारा निकाह कर सकता हैl

तलाक बत्ता: यह वह तलाक है जिसमें ना तो रुजूअ हो सकता है और ना दुबारा निकाह हो सकता है मानो यह तलाक दोनों पक्षों के बीच कतई अलगाव का कारण बन जाती हैl और ऐसी ही तलाक पर “حَتّٰی تَنْکِحَ زَوْجًا غَیْرَہ” की पाबंदी लागू होती हैl

कुछ और ज़रुरी मसले

फरमाया: “कुरआन शरीफ के फर्मुदा की रौ से तीन तलाक दी गई हों और उनमें से हर एक के बीच इतना ही गैप रखा गया जो कुरआन शरीफ ने बताया है तो इन तीनों की इद्दत गुजरने के बाद उस शौहर का कोई संबंध उस बीवी से नहीं रहता, हाँ अगर कोई और शख्स उस औरत से इद्दत गुजरने के बाद निकाह करे और फिर इत्तेफाक से उसको तलाक देदे तो उस पहले शौहर को जाएज है कि उस बीवी से निकाह कर लेl मगर अगर दुसरी शौहर, पहले शौहर के लिए उस बीवी को तलाक दे ताकि वह पहला शौहर उससे निकाह करले तो यह हलाला होता है और यह हराम है लेकिन अगर तीन तलाक एक समय में दी गई हों तो उस शौहर को यह फायदा दिया गया है कि वह इद्दत के गुजरने के बाद भी उस औरत से निकाह कर सकता है क्योंकि यह तलाक नाजाएज तलाक था और अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान के अनुसार नहीं दिया गया थाl”

(अल हकम 10 अप्रैल 1903, पृष्ठ 14)

फुकहा में तलाक के बारे में विरोधाभास पाया जाता हैl एक मसलक यह है कि मर्द को विकल्प है कि वह यह हक़ जिस तरह चाहे इस्तेमाल करे चाहे तो एक बार में यह कह कर अपना हक़ इस्तेमाल कर ले कि तुझे “तीन तलाक” या तुझे तलाक, तुझे तलाक, तुझे तलाक या थोड़े थोड़े समय के बाद अलग अलग समय में तीन बार यह हक़ इस्तेमाल करे उसे हर तरह से विकल्प हैl

दुसरा मसलक यह कहता है कि मर्द यह हक़ तीन अलग अलग तुहरों में इस्तेमाल कर सकता है जैसे पहली तुहर में पहली तलाक दे, दुसरे तुहर में दूसरी तलाक दे और तीसरे तुहर में तीसरीl इस तरह तीन तलाकें वाके हो जाएंगीl और दोनों में हमेशा के लिए अलगाव हो जाएगाl

तीसरा मसलक यह कहता है कि मर्द अपना यह हक़ इस्तेमाल करने में आज़ाद नहीं बल्कि विशेष शर्तों के तहत ही यह हक़ इस्तेमाल कर सकता हैl इस अंतर के बावजूद उम्मत के सभी उलेमा के नजदीक इस्लाम यह पसंद करता है और इसे वरीयता देता है कि शौहर को तीन तलाक देने का जो हक़ दिया गया है वह उसे बड़ी सावधानी से इस्तेमाल करे अर्थात केवल एक तलाक देl इसका लाभ यह होगा कि इद्दत के दौरान वह रुजूअ कर सके गा और इद्दत के बाद आपसी सहमती से उनका दुबारा निकाह हो सकेगाl इसलिए हर संभव प्रयास इस बात की होनी चाहिए कि दोनों पक्ष अगर सुधार करना चाहते हों और वह निकाह को कायम रख सकें तो इस सिलसिले में शरीअत के असल मंशा को पेश नज़र रखा जाए जो यह है कि पति पत्नी के संबंध को कतई तौर पर ख़त्म करने से पहले हर संभव मौक़ा रुजूअ का दिया जाएl

कुरआनी अहकाम और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशाद के अनुसार तीन तलाक एक साथ देना शरई नहींl अगर किसी व्यक्ति ने एक बार में ही तीन तलाक देदी तो वह एक ही रजई तलाक मानी जाएगीl मुसनद अहमद में एक रिवायत यह आती है कि एक सहाबी हज़रत रुकाना रदिअल्लाहु अन्हु ने एक मजलिस में अपनी बीवी को तीन तलाकें दे दीं जिसका उसे बाद में एहसास हुआ जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास यह मामला पहुंचा तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि उसने तलाक किस तरह दी थी उसने बताया कि एक ही मजलिस में उसने 3 तलाकें दे दीं थीं इसपर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि इस तरह तो एक ही तलाक लागू होती है तुम रुजुअ कर लोl

यह बात प्रामाणिक रिवायतों से साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हज़रत अबूबकर के सारे खिलाफत के ज़माने और हज़रत उमर के खिलाफत के ज़माने के शुरूआती दौर में एक मजलिस में दी गई तीन तलाकें एक तलाक मानी जाती थीl लेकिन हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु ने जब यह महसूस किया कि शरीअत की दी गई एक सहूलत को कुछ नादान लोगों ने मज़ाक बना लिया है तो यह हुक्म दिया कि लोगों की इस जल्दबाजी से गिरफ्त की जाए और इस तरह दी गई तीन तलाकों को तीन ही माना जाए ताकि लोगों को सबक मिलेl मगर उमर रदिअल्लाहु अन्हु का यह ताजीरी रंग रखता है और इसे दाएमी (हमेशा रहने वाला) हुक्म नहीं करार दिया जा सकताl

बस इस तरह की दी गई 3 तलाकों पर अगर कोई व्यक्ति शर्मिन्दा हो और रुजूअ करना चाहे तो उसके रुजूअ के हक़ को स्वीकार किया जाएगाl

तफसीर सगीर में आयत के नीचे सुरह बकरा छठें एडिशन पृष्ठ 55 पर लिखा है:

“आम तौर पर इस ज़माने के उलेमा यह समझते हैं कि जिसने तीन बार तलाक कह दिया उसकी तलाक बाईन हो जाती है अर्थात उसकी बीवी उससे दुबारा उस समय तक शादी नहीं कर सकती जब तक किसी और से निकाह ना करले मगर यह गलत है क्योंकि कुरआन में साफ़ फरमाया गया है “اَلطَّلَاقُ مَرَّتٰنِ” अर्थात वह तलाक जो बाईन नहीं वह दो बार हो सकती है इस तौर पर कि पहले मर्द तलाक दे फिर या तलाक वापस ले ले और रुजूअ करे या इद्दत गुजरने दे और निकाह करे फिर अन बन की स्तिथी में दुबारा तलाक देl बस ऐसी तलाक का दो बार होना कतई तौर पर साबित हैl पस एक ही तीन या तीन से अधिक बार तलाक कह देने को बाईन करार देना कुरआन करीम के बिलकुल खिलाफ है तलाक वही बाईन होती है कि तीन बार उपरोक्त तरीके के अनुसार तलाक दे और तीन इद्दतें गुजर जाएं इस सूरत में निकाह जाएज नहीं जब तक कि वह औरत किसी और से दुबारा निकाह ना करे और उससे भी उसको तलाक ना मिल जाएl लेकिन हमारे देश में यह तलाक मज़ाक हो गई है और इसका इलाज हलाला जैसी गन्दी रस्म से निकाला गया हैl”

तफसीर सगीर जेरे आयत सुरह बकरा 230 एडिशन छः पृष्ठ 55)

नोट: इस पर अगर कोई और सवाल हो तो आप निम्नलिखित फोन नंबर या ई मेल एड्रेस पर संपर्क कर सकते हैं

909-636-8332

shamshadnasir@gmail.com

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/imam-syed-ibn-ali,-new-age-islam/triple-talaq--removing-the-misunderstandings-and-doubts,-and-islamic-teachings--تین-طلاقیں۔۔۔غلط-فہمیوں-اور-شبہات-کا-ازالہ‘-اور-اسلامی-تعلیم/d/114360

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/imam-syed-ibn-ali,-new-age-islam/triple-talaq--removing-the-misunderstandings-and-doubts,-and-islamic-teachings--तीन-तलाक--गलतफहमियों-और-शक-का-दूर-करना,-और-इस्लामी-शिक्षा/d/114513

New Age Islam, Islam Online, Islamic Website, African Muslim News, Arab World News, South Asia News, Indian Muslim News, World Muslim News, Women in Islam, Islamic Feminism, Arab Women, Women In Arab, Islamphobia in America, Muslim Women in West, Islam Women and Feminism

 




TOTAL COMMENTS:-   3


  • Assalamu alaikum,
    I m mohd sajid from india.my cousin gave tripple talaq to his wife.first he said I permit u to marry others,she insisted give me properly,I don't accept it.then he said triple talaq

    By Mohd sajid - 8/23/2019 12:01:12 PM



  • Writer sahab Talaw par itna lamba mazmoon likhe lekin Talaq Baain, Talaq Rajii aur Talaq Mugallaza ka farq, shayad nahi maalum, isi wajah se itni badi misake kar baithe, jaisa ki neeche wale passage se zahir hai. Ilm waale hazrat bakhubi waaqif ho jaaenge
    wo likhte hain “आम तौर पर इस ज़माने के उलेमा यह समझते हैं कि जिसने तीन बार तलाक कह दिया उसकी तलाक बाईन हो जाती है अर्थात उसकी बीवी उससे दुबारा उस समय तक शादी नहीं कर सकती जब तक किसी और से निकाह ना करले मगर यह गलत है"""
    mera sawal hai ki kis aalim deen ne triple talaq ko baain likha hai. YE TAHREER ilmi mugalata ki ek zabardast misal HAI... lekin ye koi nai baat nahi...
    Triple talaq ko baain nahi balki mugallaza kaha jaata hai
    MEDIA SE LEKAR BADE BADE FANKAR KO TALAQ KE MASAAIL KA ILM HI NAHI HO PAA RAHA
    HAIRAT HAI IS 21st century par.
    By GGS - 6/25/2019 4:24:08 AM



  • Agar koi apne biwi ko tin talaq dede phir o usi biwi se dobara nikah karna chahta he to Kay karsakta he?
    By Asad - 6/25/2019 1:17:51 AM



Compose Your Comments here:
Name
Email (Not to be published)
Comments
Fill the text
 
Disclaimer: The opinions expressed in the articles and comments are the opinions of the authors and do not necessarily reflect that of NewAgeIslam.com.

Content