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Hindi Section ( 18 Apr 2013, NewAgeIslam.Com)

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The Salafi Wave in South Asia– Episode 3 दक्षिण एशिया में फैलता हुआ सल्फ़ी आंदोलन- क़िस्त 3


 खामा बगोश मदज़िल्लहू, न्यु एज इस्लाम

17 अप्रैल, 2013

पाकिस्तान में सल्फ़ी इस्लाम का अग्रणी संगठन जमातुद् दावा पूर्व दावत वलइरशाद 1993 से लेकर अब तक अपनी पत्रिकाओं मोजल्ला अलदावा और मोजल्ला अलहरमैन एक हज़ार ऐसे नौजवान शहीदों के जीवन और जंग के मोर्चे या जिहाद पर बहादुरी व जान न्यौछावर करने की घटनाओं को प्रकाशित कर चुका है।

जिनमें न केवल आश्चर्यजनक रहस्योद्घाटन हैं और क़त्ल  होने वालों की ख़तरनाक दास्ताने मौजूद हैं बल्कि ऐसे शहीदों और उनके परिजनों के बयान भी नक़ल हैं जिन्हें पढ़कर अक़्ल दंग रह जाती है।

आधे से अधिक शहीदों की उम्र सोलह से अठारह साल के बीच हैं और उन्होंने अपनी वसीयतों में हिंदू सैनिकों और कश्मीर के आम हिंदूओं को क़त्ल करने की तीव्र इच्छा जताई है और उन्हें यक़ीन है कि जब तक हिंदू काफ़िर और मूर्ति पूजने वाले मुशरिक का क़त्ल न किया जाए कश्मीरी मुसलमानों पर जारी उत्पीड़न का पूरा बदला नहीं लिया जा सकता। 1996 में लश्करे तैयबा के केंद्र दावतुल इरशाद मुरीदके में आयोजित होने वाले वार्षिक तीन दिवसीय समारोह के महत्वपूर्ण और अंतिम दिन हाफिज़ मोहम्मद सईद के भाषण से पहले क़ब्ज़े वाले कश्मीर के एक निवासी नौजवान को मंच पर लाया गया जिसने नारए तकबीर के बाद कहा कि अल्हमदोलिल्लाह मैं अब मुसलमान हूँ और अपने हिंदू माँ बाप और एक भाई का सिर क़लम कर चुका हूँ। इस नौ मुस्लिम और अबु क़तादा के जिहादी नाम वाले नौजवान ने लाखों की भीड़, जिसमें में आई.एस.आई. के पूर्व प्रमुख जनरल हमीद गुल भी मौजूद थे, के सामने बहुत जज़्बाती अंदाज़ में बताया कि कैसे उसने अपने हिंदू माँ बाप और भाई को इस्लाम की दावत दी और उन्होंने मेरा मज़ाक़ उड़ाया तो रात में किस इत्मिनान के साथ उन्हें जहन्नम रवाना कर दिया। इसके बाद नारए तकबीर का एक न रुकने वाला सिलसिला शुरू हो गया। मोजल्ला अलदावा, दिसंबर 1996 में इस सभा की दास्तान लिखते हुए लेखक ने दावा किया है, ''अबु क़तादा भाई मुज़फ्फराबाद के प्रशिक्षण शिविर में सारे जिहादी भाइयों की आंखों का तारा हैं क्योंकि वो अपने जिहादी भाईयों के साथ इस क़दर रहमदिली से पेश आते हैं और इतना ज़्यादा मोहब्बत का इज़हार करते हैं, इनसे मिलने वाले फ़ौरन उनको पसंद करने वाले बन जाते हैं।''

कोई नहीं जानता कि इस वक्त अबु क़तादा भाई कहाँ हैं, पाकिस्तान या भारत में हैं या जन्नत में अपनी 72 ख़ूबसूरत बीवियों के साथ हमेशा के लिए मज़े लूट रहे हैं। जनवरी, 1995 में प्रकाशित होने वाले मोजल्ला अलदावा पेज नम्बर 22 पर एक फ्रेम में लिखा है ''अब्बू जान आप मेरी शादी करना चाहते हैं, क्या आपकी नज़र में मेरे मेयार (मानकों) के मुताबिक़ कोई लड़की है? अब्बू जान मेरा मेयार तो हूर है जो इस दुनिया में नहीं जन्नत में है और शहादत के बाद बस उसी के साथ शादी करूंगा''

जमातुद् दावा ने पिछले दो दशकों में लाखों पाकिस्तानी नौजवानों को प्रभावित किया है और अपने संस्थानों में शामिल किया है। मोजल्ला अलहरमैन के ताज़ा अंक में ये दावा किया गया है कि चालू शैक्षणिक वर्ष में पूरे पाकिस्तान से पचास हजार से अधिक बच्चों ने अलदावा मॉडल स्कूलों, कॉलेजों और दीनी मदरसों में दाखिला लिया है। इस खुलासे के साथ ये भी लिखा है कि इंशाअल्लाह मुजाहिदीने इस्लाम की संख्या तेज़ी के साथ बढ़ रही है जो प्यारे वतन में बिदत (नवाचारों) और मकरूहात और अश्लीलता और नग्नता के अलावा कुफ़्फ़ार के साथ हर मोर्चे पर संघर्षरत होंगे।

हालांकि इस तरह के पूरे आँकड़े तो कहीं नहीं मिलते लेकिन जमातुद् दावा के प्रकाशन के अध्ययन से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दो दशकों की मेहनत के बाद कितने लोग अपने आपको उग्रवादी सल्फ़ी विचारधारा के लिए समर्पित कर चुके हैं। लेकिन अब ये मुश्किल भी नहीं रहा कि सल्फ़ियत को पाकिस्तान के समाज में उभरता हुआ न देखा जा सके क्योंकि पाकिस्तान का उर्दू मीडिया हो या शैक्षिक संस्थान या सरकारी और निजी कार्यालय हर जगह सल्फ़ियत का प्रदर्शन आम है।

पाकिस्तान में अब ये एक आम बात है कि किसी को भी तौहीने रिसालत का इल्ज़ाम लगाकर बेदर्दी के साथ क़त्ल कर दो। अनगिनत ऐसी घटनाएं घटित हो चुकी हैं जिनमें बेगुनाहों की हत्या की गई, इनमें जहां मुसलमान भी शामिल थे वहीं अल्पसंख्यकों को पूरी ताक़त के साथ निशाना बनाया गया। ऐसी सभी घटनाओं में जमातुद् दावा के सैन्य विंग लश्करे तैयबा ने भरपूर हिस्सा लिया है और अल्पसंख्यकों पर संगठित हमलों से लेकर तौहीने रिसालत के इल्ज़ाम की ज़द में आने वाले आम लोगों को भी मारने में भूमिका अदा की है। मिसाल के तौर पर ताज़ातरीन घटना में बहावलपुर में एक पागल व्यक्ति को थाने पर हमला करके अग़वा किया गया और फिर भरे बाज़ार में ईंटों और पत्थरों से मार मार कर घायल किया गया। जब वो मरने के करीब था तो उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी गई। हजारों की भीड़ नारए तकबीर बुलंद करती रही और वो बेबस इंसान जलकर राख हो गया।

उसकी मौत के बाद मालूम चला कि वो कुछ समय पहले पागलखाने से इलाज करवाके वापस पहुंचा था लेकिन पागलपन के असर अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए थे कि एक दिन उस पर इल्ज़ाम लगा कि उसने कुरान की तौहीन की है। पुलिस उसको गिरफ्तार करके थाने ले गई लेकिन सल्फ़ी जवानों ने पूरे शहर की मस्जिदों में ऐलान करके लोगों को इकट्ठा कर लिया और थाने पर हमला कर दिया। थाने में आग लगा दी गई जिससे आसन्न इमारत में रहने वाले एक कांस्टेबल का क्वार्टर भी जल गया जिसमें उसकी जवान बेटियों के दहेज का सामान मौजूद था। बाद में इस कांस्टेबल ने मीडिया को बताया कि इस सामान में कुरान के दो नुस्ख़े भी मौजूद थे जो एकमात्र पागल व्यक्ति पर कुरान की तौहीन का इल्ज़ाम लगाने वाले ज़बरदस्त मुसलमानों ने खुद ही जला दिये। इसी तरह पंजाब में गोजरा, शांति नगर और बादामी बाग़, लाहौर में तौहीन (अपमान) के साबित न हुए इल्ज़ाम के बाद सल्फ़ी उग्रवादियों ने हमले किए और न सिर्फ़ दोनों गांवों को जला दिया गया बल्कि कई लोगों की इन हमलों में जान भी गई।

तौहीन के इल्ज़ाम पर बिफरे हुए जज़्बाती लोगों ने गिरजे तक जला डाले और बाइबिल के कई नुस्ख़े इसी तरह के अपमान के चरणों से गुज़रे जैसे कथित तौर पर कुरान मजीद गुज़रा था। लेकिन कुरान की तौहीन के इल्ज़ाम साबित नहीं हुए थे कि जज़्बाती सल्फ़ियों ने बाइबल और गिरजों का जानबूझ कर अपमान किया। आश्चर्यजनक बात ये है कि जिन लोगों पर तौहीन का इल्ज़ाम साबित न हो सका उन पर मुक़दमे तौहीन की धाराओं के तहत दर्ज किए गए और जिन लोगों ने जानबूझकर धार्मिक किताबों जैसे बाइबल और धार्मिक स्थलों का अपमान किया उन पर दर्ज मुक़दमे तौहीन की धाराओं के मुक़दमें नहीं थे बल्कि उन पर बलवे और जलाव, घेराव के मुक़दमे दर्ज किए गए जो अपर्याप्त शहादतों और आरोपियों की बड़ी संख्या के कारण किसी को सज़ा से हमकिनार करने के काबिल नहीं। अपर्याप्त गवाहियों की असल वजह सल्फ़ी उग्रवादियों का खौफ़ है क्योंकि इस सूरत में कमज़ोर और बेबस अल्पसंख्यकों की जान दोबारा खतरों से दो चार हो सकती है।

तौहीन के इल्ज़ाम के तहत क़त्ल होने वालों के मुक़दमों के बेअसर होने का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि आरोपियों के लिए कोई वकील अदालत में हाज़िर होने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि इस मामले में एक आरोपी का समर्थक समझकर उसको क़त्ल किया जा सकता है। अदालतों के जज ये दुआएं मांगते हैं कि उनकी अदालत में तौहीन का कोई मुक़दमा सुनवाई के लिए न आए। इसकी वजह सल्फ़ी उग्रवादियों का खौफ़ है जो इससे पहले लाहौर हाई कोर्ट के एक जज आरिफ इक़बाल भट्टी की हत्या कर चुके हैं। जिन्होंने गुजराँवाला के रहमत मसीह और मंज़ूर मसीह को तौहीने रिसालत के आरोप में अपर्याप्त गवाही के आधार पर बरी कर दिया गया था। आरोपियों में से एक को तो अदालत के कमरे से बाहर निकलते ही क़त्ल कर दिया गया जबकि दूसरे ने पाकिस्तान से भागकर अपनी जान बचाई।

पाकिस्तान में बढ़ावा पा रही कट्टर सल्फ़ियत को रोक देना किसी के बस की बात नहीं रही क्योंकि जहां ताक़तवर संस्थाएं अपने विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं के कारण भारतीय कश्मीर में संधर्षरत सल्फ़ी उग्रवादियों का समर्थन जारी रखे हुए हैं वहाँ अफगानिस्तान में भी अपनी मर्ज़ी लागू के लिए जिहादियों की सेवाएं हासिल की जाती हैं। पंजाब की 36 ज़िला जेलों में जमातुद् दावा के प्रशिक्षण केन्द्रों, डिस्पेन्सरियाँ और लाइब्रेरियाँ स्थापित की गई हैं जिनका सीधा नियंत्रण जमातुद् दावा के पास है जो लश्करे तैयबा के शाहीनों की मदद से इन जेलों में मौजूद हज़ारों कैदियों तक पहुँच हासिल कर चुके हैं। सामाजिक स्तर पर सत्ता के पारंपरिक केंद्र, राजनीतिज्ञों की पकड़ से निकल कर सल्फ़ी उग्रवादियों के पास जा चुके हैं और पंचायत तक के फैसले कट्टरपंथी करते हैं जिनसे किसी पक्ष के विचलन का मतलब उसकी दर्दनाक मौत है। राजनीतिक दल चुनाव और अन्य मामलों में उग्रवादियों के कृतज्ञ हैं जो सशस्त्र समर्थन से लेकर सुरक्षा प्रदान करने जैसा काम भी करते हैं और आज अनगिनत राजनीतिज्ञ,उद्योगपति,ज़मींदार, नौकरशाह यहां तक ​​कि बुद्धिजीवीर और पत्रकार सशस्त्र धार्मिक संगठनों को अपने संरक्षण के लिए भत्ता प्रदान करते हैं।

पंजाब के एक शीर्ष अधिकारी भी सल्फ़ी संगठन को भत्ता देते हैं ताकि उनकी जान बची रहे। भविष्य में स्थिति और अधिक खराब होती नज़र आ रही है क्योंकि एक देश की हैसियत से पाकिस्तान के आंतरिक मामलों पर पकड़ कमज़ोर हो रही है और गिरती हुई अर्थव्यवस्था एक दूसरी मुसीबत जो इस प्रकार के संगठनों और पार्टियों को प्रोत्साहित करती हैं। रोज़गार के अभाव के कारण युवाओं की एक बड़ी संख्या ऐसे संगठनों के हत्थे चढ़ जाती है जिसकी बेहतरीन मिसाल मुंबई हमलों में ज़िंदा गिरफ्तार होने वाला अजमल कसाब है जो बेरोज़गारी के कारण सल्फ़ी कैम्प में शामिल हो गया।

खामा बग़ोश मदज़िल्लहू का परिचयः दुविधा में पड़ा एक मुसलमान जो ये समझने में असमर्थ है कि मुसलमान की असल परिभाषा क्या है? क्या मुसलमान वास्तव में सलामती के पक्षधर हैं या अपने ही सहधर्मियों की सलामती के दुश्मन? इस्लाम के मूल सिद्धांत, इतिहास, संस्कृति और विश्व की कल्पना क्या है? और क्यों आज मुसलमान न सिर्फ सभी धर्मों बल्कि संस्कृतियों के साथ भी संघर्षरत हैं? क्या इस्लाम की विजय होने वाली है या अपने ही अनुयायियों के हाथों पराजित हो चुका है, मैं इन्हीं विषयों का छात्र हूँ और न्यु एज इस्लाम के पन्नों पर आप दोस्तों के साथ चर्चा करने की कोशिश करूंगा।

URL of Episode 2: 

https://www.newageislam.com/hindi-section/the-salafi-wave-in-south-asia-episode-2-दक्षिण-एशिया-में-फैलता-हुआ-सल्फ़ी-आंदोलन--क़िस्त-2/d/11089

URL of Episode 1: 

https://www.newageislam.com/hindi-section/the-salafi-wave-in-south-asia-episode-1-दक्षिण-एशिया-में-फैलता-हुआ-सल्फ़ी-आंदोलन--क़िस्त-1/d/11032

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https://www.newageislam.com/radical-islamism-and-jihad/khama-bagosh-madzallah,-new-age-islam/the-salafi-wave-in-south-asia---3rd-episode/d/11173

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https://www.newageislam.com/urdu-section/the-salafi-wave-in-south-asia---3rd-episode--جنوبی-ایشیاء-میں-پھیلتی-ہوئی-سلفیت-۔قسط-۔3/d/11174

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