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Hindi Section (12 Jul 2019 NewAgeIslam.Com)



Sultan Shahin Urges UNHRC to Consider Jihadi Literature As Defamation of Islam जिहादी लिट्रेचर और असहिष्णुता को भी इस्लाम का अपमान माना जाना चाहिए, UNHRC में सुल्तान शाहीन का ख़िताब



सुलतान शाहीन, संस्थापक संपादक न्यू एज इस्लाम

८ जुलाई २०१९

उर्दू से अनुवाद: न्यू एज इस्लाम

संयुक्त राष्ट्र काउंसिल जेनेवा की ४१ वीं बैठक में न्यू एज इस्लाम के फाउन्डिंग एडिटर सुलतान शाहीन का ८ जुलाई २०१९ को दिया गया बयान

प्रेषक एशियन-यूरेशियन मानवाधिकार फोरम

सार्वजनिक बहस, एजेंडा ८, शीर्षक “Follow-up and Implementation of the Vienna Declaration and Programme of Action- वियाना घोषणा का इतलाक और व्यावहारिक खाका”

अध्यक्ष महोदय,

वियना आलामिया यह स्वीकार करता है कि “हर व्यक्ति को सोच व फ़िक्र, ज़मीर, अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार हैl” संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार काउंसिल ने पिछले मार्च एक प्रस्ताव स्वीकार किया था जिसे इस्लामी देशों की तरफ से पाकिस्तान ने पेश किया था जिसके अनुसार “धर्म का अपमान” को मानवाधिकारों की खिलाफवर्जी स्वीकार किया गया थाl ५६ देशों पर आधारित और्गिनाइज़ेश्न आफ इस्लामिक कांफ्रेंस का नेतृत्व करते हुए पाकिस्तान ने कहा था कि “इस्लाम को हमेशा गलत तौर पर मानवाधिकार की खिलाफवर्जी और आतंकवाद के साथ जोड़ा जाता हैl इसने राज्यों से ऐसे लोगों पर पकड़ मजबूत करने का मुतालबा किया था जो नस्लीय और मज़हबी अल्पसंख्यकों के लिए असहिष्णुता का प्रदर्शन करते हैं और यह भी कहा था कि “सहिष्णुता और सभी दीनों व मजहबों के सम्मान को बढ़ावा देने के लिए सभी संभव कदम उठाए जाएंl”

अध्यक्ष महोदय,

तथापि, इस्लामी देशों और ख़ास तौर पर खुद पाकिस्तान से अधितर मज़हबी अल्पसंख्यकों के लिए असहिष्णुता और उनकी तौहीन व तजलील की खबर बाहर आती रहती हैंl हम यह भी देखते हैं कि ऐसे लिट्रेचर मुफ्त छापे और बांटे जाते हैं जिनमें इस्लाम को आतंकवाद के साथ जोड़ा जाता है और मानवाधिकारों की अवहेलना और अतिवाद को बढ़ावा दिया जाता हैl यहाँ तक कि स्कूल और मदरसों की किताबें भी अतिवाद और अलगाववाद की शिक्षा से खाली नहीं हैं जिनमें मुसलमानों को दोसरे धर्मों से संबंध रखने वालों की मज़हबी और सांस्कृतिक घटनाक्रम से दूर रहने की शिक्षा दी जाती हैl पाकिस्तान के बदनाम ए ज़माना इंसेदाद तौहीन ए रिसालत कानून के आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को केवल तौहीन के आरोप में ही या तो जनता पीट पीट कर जान निकाल देती है या उन्हें मौत की सज़ा का परवाना दे दिया जाता हैl एक ईसाई औरत आसिया बीबी के मामले ने जो शुक्र है कि अब देश से बाहर हैं, इस समस्या को वैश्विक परिदृश्य पर ला खडा कर दिया हैl अहमदिया मुसलमानों को सरकारी तौर पर इस्लाम से बाहर कर दिया गया हैl यहाँ तक कि वह किसी भी स्थिति में मुसलमान होने का दावा भी नहीं कर सकतेl गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की तरह वह भी अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में विभिन्न प्रकार के अपमान का सामना करते हैंl सैंकड़ों युवा हिन्दू लड़कियों का बाक़ायदा अपहरण किया जाता है, उन्हें जबरदस्ती इस्लाम कुबूल करवाया जाता है और शादी के नाम पर उनका बलात्कार किया जाता हैl

हालांकि इस अनुबंध का उद्देश्य इस्लाम को किसी भी तरह आतंकवाद के साथ जोड़ कर इसकी तौहीन व तजलील से हिफाज़त करना है लेकिन तब भी ऐसे लिटरेचर का प्रकाशन कर के लगातार मज़हब का अपमान किया जा रहा है जिनमें गैर मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ हिंसा का औचित्य पेश किया जाता हैl तालिबान के तर्जुमान नवा ए अफगान जिहाद में एक लम्बे लेख का शीर्षक ही था: ‘ऐसे हालात का बयान जिनमें काफिरों के साथ बेगुनाह लोगों को हलाक करना जायज हैl’

इसलिए, मैं काउंसिल के सामने यह प्रकरण पेश करना चाहता हूँ कि वह मुस्लिम देशों से इस बात का मुतालबा करे कि वह अल्पसंख्यकों के लिए सहिष्णुता और जिहादी लिट्रेचर का प्रकाशन को भी इस्लाम धर्म की बदनामी करार देंl

ऊपर संदर्भित लेख में एक तालिबानी आलिम शैख़ यूसुफ अल अबीरी ने अमेरिकी अवाम और इदारों पर ११/९ हमलों का जवाज़ ऐसी बातों पर रखा है जो निश्चित रूप से इस्लाम की तौहीन के बराबर है जिस पर अब ओ आई सी पाबंदी चाहता हैl अल अबीरी का कहना है कि इस्लाम विशेष स्थिति के तहत बेगुनाह नागरिकों के अंधाधुंध हत्या का समर्थन करता हैl इसमें उन्होंने “शत्रु को आग के हवाले करने” या किसी किले के रहने वालों को या किसी महसूर शहर को डुबोने के लिए “दरियाओं और झीलों के बाँध खोलने” उन पर तोपों से हमले करने और दुश्मनों पर साँपों और बिच्छु छोड़ने” का भी जवाज़ पेश किया है हालांकि उनमें गैर लड़ाके महिलाएं और बच्चे ही क्यों ना शामिल होंl” इसके बाद उस फतवे में उन इकदामात की हिल्ल्ट भी बयान की गई है ‘उनकी इमारतों को तबाह करने, ज़हर और धुआँ फैलाने के’ साथ साथ अगर इन तरीकों को आज़माए बिना दुश्मन को बंदी बनाना या उन पर ग़ालिब होना संभव ना होl इस तरह “नागरिकों” के खिलाफ आतंकवादी हमले का प्रमाणीकरण करने के बाद तालिबानी आलिम अमेरिकी नागरिकों के क़त्ल का जवाज़ पेश करते हैं और ऐसे किसी भी मुसलमान की सूझ बूझ पर सवाल खड़े करते हैं “न्यूयार्क और वाशिंगटन में अमेरिकियों के ह्त्या को गैर कानूनी”, करार देता हैl

यह दलीलें इमाम नव्वी, अल्लामा इब्न कदामा अल कुदसी, इमाम बहकी और सहीहैन जैसे मध्य युग के कई प्रसिद्ध फुकहा और उनकी किताबों के हवाले से पेश किये गए हैंl (सहीहैन से मुराद सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम है जो इस्लामी अकीदे के बाब में कुरआन के बाद सबसे अधिक प्रमाणिक स्रोत माना जाता है)l

तालिबानी आलिम यूसुफ अल अबीरी यह खुलासा करते हैं: “इसलिए, शरीअत के दलीलों के पेशेनज़र यह कहा जा सकता है कि जिस किसी ने भी यह कहा है कि न्यूयार्क और वाशिंगटन में अमेरिकियों को क़त्ल करना गैर कानूनी है वह शरीअत की बारीकियों से अनभिज्ञ है और अँधेरे में तीर चला रहा हैl उसकी यह बात जिहालत और बेखबरी पर आधारित हैl दुश्मनों को जला कर या डुबो कर मारने और उन्हें कैद करने के लिए इमारतों को तबाह करने या हानि पहुंचाने या दुश्मनों को डराने से अक्सर उलेमा ए इस्लाम इत्तेफाक रखते हैंl नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा का भी यही अमल रहा हैl फिर किस तरह अमेरिकियों की मोहब्बत में कोई अंधा शख्स किसी ऐसे समस्या को प्रश्नों की ज़द में ला सकता है जो कुरआन और हदीस से सत्यापित हैl (नवाए अफगान जिहाद, जनवरी २०१३)

एक के बाद एक हर महीने इस्लाम के खिलाफ तालिबान की हरज़ह सराई नवाए अफगान जिहाद में लगातार जारी हैl उपरोक्त संदर्भित लेख २०१३ में आठ महीने तक किस्तवार प्रकाशित होता रहा थाl तालिबान के तर्जुमान नवाए अफगान जिहाद के एक ताज़ा तरीन शुमारे (मार्च २०१९) में एक तालिबान आलिम समीर खान शहीद का एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है “मरकज़ी नुक्ता”, अपने लेख में समीर खान शहीद लिखते हैं: “सऊदी अरब की नज़र में सोवियत यूनियन के खिलाफ जिहाद इस्लाम के लिए थाl जब कि वही जिहाद अगर अमेरिका के खिलाफ हो तो उनकी नज़र में गलत हैl हम उन लोगों से बरी होने का एलान करते हैं जो जिहाद को अमेरिका की रज़ा जुई का ज़रिया समझते हैंl असल बात यह है कि जिहाद उस समय तक ऐन फर्ज़ रहे गा जब तक कि अमेरिका और उसके मुर्तद इत्तेहादी इस्लामी सरज़मीनों से निकल नहीं जातेl और उसके इत्तेहादियों में केवल क्षेत्र के मुर्तद ही शामिल नहीं, बल्कि वह तवागीत भी शामिल हैं जो अमीर को अमीर तर और गरीब को गरीब तर बनाने में प्रयासरत हैं, जो तौहीदी निज़ाम की ख्वाहिश रखने वालों के खिलाफ बर्बरता करते हैं और अल्लाह के बनाए गए नियमों को अपनी ख्वाहिशात के अनुसार बदलते हैं” (नवाए अफगान जिहाद, मार्च २०१९, पृष्ठ-६६)

इसके बाद लेख में समीर खान अब्दुल्लाह उज़ाम का हवाला पेश करते हैं जिसे उसामा बिन लादेन का सैद्धांतिक मुरब्बी समझा जाता है’ और कहते हैं “अफगानिस्तान में अपने कयाम के दौरान मैंने यह महसूस किया कि इंसानी रूह में तौहीद इस तरह दाखिल हो ही नहीं सकती और ना ही इसमें वह सख्ती और मजबूती आ सकती है जो जिहाद के मैदानों में आती हैl अर्थात दुनिया में तौहीद का काम तलवार के ज़रिये से होता है, किताबें पढ़नें और अकीदे से संबंधित इल्म हासिल करने से नहीं” (नवाए अफगान जिहाद, मार्च २०१९, मरकज़ी नुक्ता- समीर खान, पृष्ठ ६६)

एक आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद के रहनुमा मसूद अज़हर जिन्हें हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी करार दिया है, पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर बंटने वाले एक दोसरे जिहादी लिट्रेचर अपनी किताब “फ़ज़ाइल ए जिहाद” में लिखते हैं, “मुसलमानों! अपनी मदद के लिए हम उन काफिरों से अपील नहीं कर सकते; हमें यह समझना होगा कि मुसलामानों को नेस्तनाबूद करना ही इनका बुनियादी उद्देश्य और मिशन है; मुसलमानों का खून बहता हुआ देख कर उन्हें ज़बरदस्त ख़ुशी होती हैl असल गम तो यह है कि एक मुसलमान की नज़र में दोसरे मुसलमान की ज़िन्दगी की कोई कद्र नहीं हैl मज़लूम मुसलमानों को दोसरे मुसलमान नफरत और हिक़ारत की नज़र से देखते हैंl हम एक दोसरे से बेज़ारी के उस मुकाम तक पहुँच गए, इसलिए, अब हम क्यों यह उम्मीद करते हैं कि खून ए मुस्लिम को ज़रा भी अहमियत दी जाए? यह कहना बिलकुल बेजा नहीं कि इस खून की कीमत से भी कम हो चुकी हैl मुसलमानों ने सार्वजनिक तौर पर अपने पड़ोसी मुस्लिम बिरादरियों के उपर ज़ुल्म व सितम से यह समझ कर केवल नज़र कर लिया है कि इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और वह सुरक्षित हैंl उन्होंने अपनी आँखों के सामने अनेकों मासूम नागरिकों के क़त्ल और उन पर ढाए जाने वाले ज़ुल्म व सितम का मुशाहेदा किया है लेकिन उन्हें इस ज़िल्लत व रुसवाई से कोई फर्क नहीं पड़ा जिससे उनकी माएं और बहनें लगातार गुज़रती रहेंl इस कत्ल व गारत गारी के तमाशाई मुसलमानों ने उन्हें जुबान से भी मदद करने की ज़हमत गवारा नहीं किया कि कहीं उनके आकाओं को तकलीफ ना हो जाए और उनकी दुनयावी हैसियत और शान व शौकत खतरे में ना पड़ेl

मुसलमानों को चाहिए कि वह त्वरित रूप से अपने अहवाल की इस्लाह करें और उस आग को अपने घरों से बाहर करें इससे पहले कि यह लोग उनके घरों तक पहुंचे, और मज़लूम मुसलमानों के समस्याओं को अपनी समस्या समझें और उनके दर्द को महसूस करने की कोशिश करेंl हमें कभी भी मज़लूम का मज़ाक नहीं बनाना चाहिए बल्कि उन काफिरों के खिलाफ कंधे से कंधा मिला कर जंग करना और हर मुसलमान की मौत का बदला लेना चाहिएl” मसूद अज़हर, फ़ज़ाइल ए जिहाद, पृष्ठ १३२-१३३)

उर्दू की एक किताब “यहूदियों की चालीस बीमारियाँ” में (जो कि alqalamonline.com पर पी डी एफ में उपलब्ध) मसूद अजहर ने यहूदी कम्युनिटी की बुरी तरह तौहीन व तजलील की है, जिनके सहीफों को कुरआन ने मुसलमान को खुदा की वही मानने का आदेश दिया है (कुरआन ४:१६२-१६३ और दोसरी आयतें), और जिनके से बहोत सारे पैगम्बरों का ज़िक्र उनके नामों के साथ कुरआन में खुदा के पैगम्बर के तौर पर वारिद हुआ हैl इस किताब की अहमियत पर रौशनी डालते हुए दोसरे जिहादी आलिम अबू लुबाबा इसके परिचय में लिखते हैं, “कुरआन में यहूदियों की निंदा जिस तरह बयान की गई है और नबी अलैहिस्सलात वस्सलाम ने उनके गंदे आचरण से बचने के लिए जैसी नसीहतें फरमाई हैं और सीरत की किताबों में यहूदियों की इस्लाम दुश्मनी और हमारे प्यारे नबी हज़रात मोहम्मद मुस्तुफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तकलीफें पहुंचाने के जो वाकियात उल्लेखित हैं, उनको पढ़ कर होना तो यह चाहिए था कि मुसलमान इस मरदूद, रांदा ए दरगाह, और नफरत के काबिल कौम की आदतों से कोसों दूर भागते, मगर यहूदियत सरापा फितना हैंl सरासर दजल हैl शुरू से आखिर तक फरेब हैl इन ना हंजार कौम ने अपने माहिराना प्रोपेगेंडे से फ़ज़ा पैदा कर दी है कि सारी दुनिया को तो छोड़ीए कि इनके पल्ले तो कुछ है ही नहीं, मुसलमान तक जिनको वही ए इलाही और सुन्नत की सच्ची शिक्षाओं और सहाबा व ताबईन और औलिया अल्लाह जैसे गर्व के काबिल असलाफ नसीब हैं, और जिन्हें यहूदियों की नक्काली और उन जैसी खराबियों से खुद को गंदा होने से बचने की सख्त ताकीद की गई थी, वह भी उन फटकारे हुए यहूदियों को मब्गूज़ व मलउन समझ कर सुन्नत ए नबवी और स्सिरत ए सहाबा से चिमटे रहने के बजाए उनके तौर त्रिकोण को अच्छा और काबिल ए तकलीद जानने लगे हैं” (मसूद अजहर, यहूदियों की चालीस बीमारियाँ- परिचय अबू लुबाबा की कलम से)

मुसलमानों के बीच अलगाववाद को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर के मजहबी स्कूल और मदरसे १३-१४ शताब्दी के एक महान आलिम ए दीन इब्ने तैमिया के इस फतवे का हवाला पेश करते हैं जिसे हाल ही में आइएसआइएस मैगज़ीन ‘रुमिया’ के छटवें शुमारे में भी नक़ल कर के प्रकाशित किया गया था:

मुशरिकों के तेहवार मनाने वालों का हुक्म

“इब्ने तैमिया से एक ऐसे मुसलमान के बारे में सवाल किया गया जो नए साल के दिन ईसाइयों की तरह अच्छे खानों का एहतिमाम करता है, और बपतिस्मा, क्रिसमस, “जुमेरात की दाल” [विशेष जुमेरात को तैयार किया जाने वाला खाना] “मुकद्दस हफ्ते का दिन” [ईदुल फसह के बाद ईसाइयों के यहाँ हफ्ते का मुकद्दस दिन] जैसे दिनों का जश्न मनाता है और जो उनकी ईवेंट के लिए उनसे कुछ बेचता है- क्या ऐसा करना उसके लिए जायज है या नहीं?

“उन्होंने इसका जवाब इस तरह दिया “ अल्हम्दुलिल्लाही रब्बिल आलमीनl किसी भी मुसलमान के लिए ईसाइयों के साथ किसी भी मामले में उनसे मुशाबेहत करना जायज नहीं है, जैसे उन जैसे खाने बनाना, उन जैसे कपड़े पहनना, उन जैसे गुस्ल करना, उन जैसे शम्में रौशन करना और अपने कारोबार से आम छुट्टी करना यह सभी काम निषिद्ध हैं, उनके लिए खाने का एहतिमाम करना, उन्हें तोहफे पेश करना, उनके तेह्वारों में सहायक बन्ने वाली चीजें बेचना बल्की बच्चों और दोसरे लोगों को उनके तेह्वारों के विशेष खेलों में शामिल होने की अनुमति देना और ना ही उनके लिए ज़ेब व ज़ीनत करना जायज हैl पूरी बात का खुलासा यह है कि किसी भी मुसलमान के लिए काफिर के किसी भी तेहवार को कोई ख़ास अहमियत देना जायज नहीं है, बल्कि उनके तेह्वारों के दिन मुसलमानों को आम दिनों की तरह गुजारना चाहिएl

“ इनमें से किसी एक दिन को भी मुसलमान का जान बुझ कर [इस तेहवार को मनाने की नियत के बिना ही कुछ ख़ास करके] अहमियत देना सल्फ़ और खल्फ़ दोनों को पसंद नहीं थाl अगर कोई मुसलमान उपरोक्त में से कोई काम [उनके तेह्वारों के जश्न में] विशेषता के साथ अंजाम देता है तो फिर उलेमा के बीच उसके बारे में कोई मतभेद नहीं हैl बल्कि कुछ उलेमा का यह कहना है कि जिस किसी ने भी ऐसा कोई काम किया उसने कुफ्र का प्रतिबद्ध किया, इस लिए ऐसा करने से कुफ्र के मज़हबी मामुलात को सम्मान से नवाजना लाज़िम आता हैl कुछ ने कहा कि उनके तेह्वारों के दिन दुम्बा ज़बह करना खिंज़ीर ज़बह करने की तरह हैl” (आइएसआइएस मैगज़ीन, रोमिया, शुमारा ६ पृष्ठ- १६)

एक तरफ तो जिहादी पाकिस्तान में उपरोक्त बातें कह कर इस्लाम और हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बदनाम करने के लिए आज़ाद हैं जबकि दोसरी तरफ पत्रकारों को किसी भी प्रकार के मतभेद के इज़हार की भी स्वतन्त्रता नहीं हैl हजब ए इख्तेलाफ के नेता बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने इस साल इंटरनेशनल प्रेस फ्रीडम डे के मौके पर कहा था कि, “पाकिस्तान में एक गैर एलानिया सेंसर शिप मौजूद हैl लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए गुंजाइश खतरनाक तरीके से कम हो गई है, मीडिया और इज़हार की आज़ादी का हक़ खतरे में हैl यहाँ पत्रकार रियासती और गैर रियासती तत्वों की ज़द पर हैंl २०१३ से २०१८ के बीच मारे जाने वाले २६ पत्रकारों में से केवल १६ मुकदमे ही अदालत में ले जाए गए, जिनमें से केवल छः मुकदमों का ट्रायल पूरा हो सका और केवल एक मुकदमे में निचली अदालत का फैसला आयाl लेकिन सज़ा एक को भी नहीं हुई क्योंकि इस एक फैसले को भी पलट दिया गयाl “यहाँ तक कि एक २३ वर्षीय पत्रकारिता के छात्र मशाल खान की ज़ालिमाना लिंचिंग और कत्ल से भी तौहीन ए रिसालत के सख्त कानून के लिए पाकिस्तान के रवय्ये में कोई थोड़ी भी तबदीली नहीं पैदा हुईl

URL for English article: http://www.newageislam.com/radical-islamism-and-jihad/sultan-shahin,-founder-editor,-new-age-islam/editor-sultan-shahin-urges-un-human-rights-council-to-consider-jihadi-literature-and-intolerance-of-minorities-in-muslim-countries-too-as-defamation-of-islam/d/119118

URL for Urdu article: http://newageislam.com/urdu-section/sultan-shahin,-founder-editor,-new-age-islam/editor-sultan-shahin-urges-un-human-rights-council-جہادی-لٹریچر-اورعدم-رواداری-کو-بھی-توہین-اسلام--تصور-کیا-جائے،-اقوام-متحدہ-کے-ہیومن-رائٹس-کونسل-سے-ایڈیٹر-سلطان-شاہین-کا-خطاب/d/119133

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/sultan-shahin,-founder-editor,-new-age-islam/sultan-shahin-urges-unhrc-to-consider-jihadi-literature-as-defamation-of-islam---जिहादी-लिट्रेचर-और-असहिष्णुता-को-भी-इस्लाम-का-अपमान-माना-जाना-चाहिए,-unhrc-में-सुल्तान-शाहीन-का-ख़िताब/d/119158

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