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Hindi Section ( 18 Jun 2014, NewAgeIslam.Com)

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Pakistan Army’s Operation ‘Zarb-e-Azb’ Against the Taliban तालिबान के खिलाफ पाकिस्तानी सेना का ऑपरेशन 'ज़र्बे अज़्ब'


न्यु एज इस्लाम एडिट डेस्क

नवाज़ शरीफ़ की सरकार के गठन के साथ ही देश के एक बड़े वर्ग की मांग थी कि तालिबान के खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई छेड़ी जाए क्योंकि उसने देश में आतंकवाद का बाज़ार गर्म कर रखा था। शियाओं के खिलाफ उसने कई बड़े खूनी  हमले किए थे और सैकड़ों की संख्या में मासूम शियों को क़त्ल किया था। सुरक्षा बलों पर भी ये लोग लगातार हमले करते रहे थे और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाते रहते थे। इसलिए नई सरकार के गठन के बाद जनता और ईमानदार राजनीतिक समूहों में ये उम्मीद जगी थी कि तालिबान और दूसरे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सरकार के स्तर पर कार्रवाई होगी। बहरहाल, कुछ राजनीतिक कारणों और तालिबान समर्थक दलों और नेताओं के दबाव में नवाज़ शरीफ़ ने तालेबान को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने और शांति एक मौका देने का पक्ष अपनाया। उन्होंने फरवरी के महीने में वार्ता की शुरुआत की घोषणा की और इस बात की उम्मीद जताई कि इस दौरान तालिबान हिंसा से परहेज़ करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सरकार पर दबाव बनाए रखने के लिए तालिबान की तरफ से सुरक्षाबलों पर हमले जारी रहे। एक हमले में उसने कराची में सुरक्षाबलों पर हमला करके 23 जवानों को मार दिया और एक बस पर हमला करके तेरह पुलिसकर्मियों को मार दिया। इसकी वजह से बातचीत गतिरोध का शिकार हो गई। बहरहाल, मार्च में एक बार फिर बातचीत शुरू की गई फिर भी उनके व्यवहार में बदलाव नहीं आया। ये सिलसिला चल ही रहा था कि पिछले हफ्ते तालिबान ने कराची हवाई अड्डे पर एक बड़ा आतंकवादी हमला कर दिया जिसमें 38 लोग मारे गए। जवाबी हमले में उनके भी दस आतंकवादी मारे गए। ये हमला एक तरह से पूरी बातचीत को खत्म करने वाला था। सरकार ने पूरी कोशिश करके देख ली थीं और तालिबान के सारे नाज़ और नखरे उठा कर देख लिये थे। सेना और सरकार ने फैसला किया कि तालिबान के खिलाफ अंतिम अभियान ज़रूरी है।  

इसलिए रविवार से उत्तरी वज़ीरिस्तान और स्वात के कबायली इलाकों में सेना ने आपरेशन अज़्ब (ग़ज़ब नहीं) शुरू किया और लगभग दो सौ आतंकवादियों को मार गिराया। ये ऑपरेशन इस लेख के लिखे जाने तक जारी है। आपरेशन के दौरान अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान के भी लड़ाके मारे गए जो इस इलाके में डेरा डाले हुए थे।

पाकिस्तान की जनता और राजनीतिक वर्ग तालिबान से कितना आजिज़ आ चुके थे इस बात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि जब नवाज़ शरीफ़ ने नेशनल असेंबली में इस फैसले का ऐलान किया तो सभी विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया। यहां तक ​​कि इमरान खान जो कि तालिबान से बातचीत के समर्थक थे उन्होंने भी अपने समर्थन का ऐलान किया। एएनपी और पीपीपी ने भी अपने समर्थन का ऐलान किया। बल्कि पूर्व राष्ट्रपति ज़रदारी ने ये भी कहा कि अगर ऑपरेशन अधूरा छोड़ा गया तो पहले से अधिक खून खराबा होगा। एक राष्ट्रीय सर्व के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत जनता ने इस ऑपरेशन का समर्थन किया है। सेना और नवाज़ शरीफ़ ने भी कसम खाई है कि आखरी आतंकवादी के खात्मे तक ये लड़ाई जारी रहेगी।

लेकिन दुर्भाग्यवश से पाकिस्तान की जमाते इस्लामी और जमात उलेमाए पाकिस्तान ने सदन में सरकार के इस कदम का विरोध इस बहाने के साथ किया कि इससे सूरतेहाल ज्यादा बिगड़ सकती है और इस आपरेशन से समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला है। जमाते इस्लामी पाकिस्तान के अमीर सिराजउल हक़ ने कहा कि हिंसा से समस्या हल नहीं होगी।

ये पहला मौका नहीं है कि पाकिस्तान सरकार और सेना ने तालिबान के खिलाफ ऑपरेशन किए हैं। इससे पहले भी आपरेशन राहे रास्त और ऑपरेशन राहे निजात तालिबान के खिलाफ किए जा चुके हैं, लेकिन न तो वो सीधे रास्ते पर आए और न ही पाकिस्तान को उनके अत्याचार से मुक्ति मिली। लेकिन इससे पहले पाकिस्तान सरकार को जनता के बहुमत और राजनीतिक वर्ग का इतना ज़बरदस्त समर्थन हासिल नहीं था। जनता भी सरकार की नीयत से संतुष्ट नहीं थी। मगर इस बार सरकार को सभी वर्गों का ज़बरदस्त समर्थन हासिल है। देश के तीस शिया और सुन्नी धार्मिक दलों सहित शिया उलेमा काउंसिल ने भी इस ऑपरेशन को अपने समर्थन का ऐलान किया है। ये इस बात का  प्रकट करता है कि पाकिस्तान का हर वर्ग तालिबान के फैलाए हुए इस आतंकवाद से परेशान था और उनकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई थी। महंगाई सिर चढ़ कर बोल रही थी, बेरोज़गारी ने नौजवानों को अपराध की तरफ धकेल दिया था और हर तरफ आतंक का माहौल था। नवाज़ शरीफ़ ने ठीक ही कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद की भारी कीमत अदा कर चुका है। दुख की बात ये है कि मस्जिदें, इमाम बारगाह, इबादतगाहें सुरक्षित नहीं हैं, खेल के मैदान वीरान हैं, बाज़ार और शहर खौफ के साये में हैं। आतंकवाद हमारी अर्थव्यवस्था को 103 अरब डॉलर का ज़ख़्म लगा चुकी है। आतंकवाद ने हमारे सम्मान को ठेस पहुँचाई है।  

एक अंदाज़े के अनुसार तालिबान ने अब तक पांच हज़ार सुरक्षाकर्मियों और पचास हज़ार लोगों को मारा है और वो भी सिर्फ इसलिए कि उनकी निगाह में इस्लामी खिलाफत का रास्ता खून खराबा और हिंसा से होकर जाता है जबकि इस्लाम ने बेवजह एक मासूम की हत्या को पूरी मानवता की हत्या के बराबर करार दिया है।  

तालिबान के खिलाफ पाकिस्तान की लड़ाई की सफलता पर इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता निर्भर है। इसलिए इस लड़ाई में विश्व समुदाय को पाकिस्तान का साथ देना चाहिए। हिंदुस्तान ने जिस तरह बांग्लादेश में आतंकवाद के खात्मे में सहयोग दिया है उसी तरह उसे पाकिस्तान की इस लड़ाई में साथ देना चाहिए। पाकिस्तान को भी अपनी धरती से आतंकवाद को खत्म करने के लिए ये सबसे अच्छा मौका है। उसने हिंदुस्तान की तरह आतंकवाद के हाथों अपना प्रधानमंत्री खोया है।  इसलिए पाकिस्तान अपनी पूरी ताक़त और ईमानदारी से इस मौक़े का फायदा उठाये और आतंकवाद को अपने देश से जड़ से खत्म कर दे। विश्व समुदाय उसके साथ है।

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