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Hindi Section (25 Jan 2014 NewAgeIslam.Com)



Munshi Nawal Kishor: Patron of Sciences and Art of the East पूर्वी ज्ञान और कला के संरक्षक: मुंशी नवल किशोर

 

मोहम्मद वसी सिद्दीकी

8 जनवरी, 2014

 कलम के ज़रिए रोटी कमाने की रस्म पूरी दुनिया में है और बहुत पुरानी है। प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के पहले कलम के ज़रिए रोटी पैदा करने के लिए लेखक को संरक्षक की ज़रूरत थी (जैसे शायर को) या फिर सार्वजनिक सहायता की (जैसे दास्तान गो को) लेकिन जब प्रिंटिंग प्रेस आ गया तो संरक्षकों का दौर खत्म होने लगा और यूरोप में तीन सौ वर्ष की अवधि में संरक्षकों का संगठन बिल्कुल समाप्त हो गया। भारत में प्रिंटिंग प्रेस बहुत देर में आया। प्रेस की शुरुआत और संरक्षकों का खत्म होना कमोबेश एक ही साथ अमल में आया। संरक्षक इसलिए खत्म हुए कि अंग्रेजों की लाई हुई नई सभ्यता ने संरक्षकों की वित्तीय स्थिति को बहुत कम कर दिया और ये बहुत तेजी से हुआ। पश्चिम में ये हुआ कि प्रेस (यानी प्रकाशक, अखबार) ने संरक्षक की जगह ले ली लेकिन हिंदुस्तान में इसका उलटा हुआ। यहां प्रेस ने लेखक को आय का ज़रिया बनाया लेकिन अपनी ही शर्तों पर यानि प्रेस के मालिक या किताब के प्रकाशक ने लेखक को कुछ मुआवज़ा न देने की रस्म बना ली।

तथ्य बताते हैं कि मुंशी नवल किशोर के ज़माने में किताबत किये गये पत्थर सुरक्षित रखे जाते थे और उन्हें किताब के अगले प्रकाशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता था अगर ये सही है तो पत्थरों को सुरक्षित करने और सुरक्षित रखने में बहुत कौशल और बहुत ज़्यादा जगह की ज़रूरत होती होगी। फिर ये भी है कि उन्हें क्रम से इस तरह जमा रखना कि आसानी और क्रम से फिर निकाला जा सके। ये बहुत बड़ा और कुशलता का काम रहा होगा। इन पत्थरों को दोबारा सही जगह पर वापस रखना बेशक बड़ी प्रशासनिक कुशलता का नतीजा था। नवल किशोर प्रेस की एक बहुत बड़ी उपलब्धि दास्तान अमीर हमज़ा की छियालीस जिल्दों का प्रकाशन है। ये कहा जा सकता है कि दूसरे ग्रंथ जो प्रेस से प्रकाशित होकर संरक्षित हुए उनमें से ज्यादातर हैं जिन्हें कोई न कोई संस्था यहाँ से या ईरान या मिस्र व अरब से प्रकाशित कर ही देता लेकिन दास्तान अमीर हमज़ा ऐसा ग्रंथ है जिसे नवल किशोर के सिवा कोई भी प्रकाशित नहीं कर सकता था। इसलिए अगर नवल किशोर प्रेस दास्तान अमीर हमज़ा को प्रकाशित न करता तो ये हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाता और हम ऐसी चीज़ से वंचित रह जाते जिसे दुनिया के काल्पनिक साहित्य के महानतम उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया में कम ऐसा हुआ होगा कि एक ही संस्थान ने कई संस्कृतियों और कई साहित्यिक और ज्ञान परंपराओं की ऐसी व्यापक सेवा की हो। मुंशी नवल किशोर को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में विशेष हैसियत हासिल है।

मुंशी नवल किशोर का जन्म 3 जनवरी, 1836 ई. को मथुरा के रेढ़ा (अब बलदेव) नाम के गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित यमुना प्रसाद भार्गव था और पैतृक कस्बा बसतोई, तहसील साहनी है। 1845 के बाद से 1850 ई. तक उनकी शिक्षा आगरा कॉलेज, आगरा में हुई। 1850 में उनकी शादी सरस्वती देवी से हुई। 1851 में उन्होंने अखबार ''सफ़ीर'' में अखबारी लेखन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1852 में वो लाहौर चले गए और वहां उन्होंने मुंशी हरसुख राय के उर्दू अखबार ''कोहेनूर' और उनके प्रेस की ज़िम्मेदारी संभाल ली। नवल किशोर की लाहौर से वापसी के बारे में अमीर हसन नूरानी लिखते हैं ''लाहौर में मुंशी नवल किशोर चार साल रहे उनकी उम्र का इक्कीसवाँ साल शुरू हो चुका था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की शुरुआत भी हो गयी थी जिससे नवल किशोर परिचित थे।

मुंशी नवल किशोर ने एक पत्रकार के रूप में स्थिति का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया था उन्होंने मन में तय कर लिया था कि कोहेनूर की नौकरी छोड़ कर अपने घर जाकर प्रिंटिंग प्रेस स्थापित करेंगे और एक अखबार शुरु करेंगे। इस दौरान हरसुख राय से मतभेद नौकरी छोड़ने का कारण बन गया। इसलिए आगरा वापस आ गए। आगरा में कुछ समय रह करके उन्होंने हालात का जायज़ा लिया और पाया कि उनके महत्वाकांक्षाओं के लिए आगरा का माहौल अनुकूल नहीं, इसलिए उन्होंने लखनऊ का रुख किया जो सदियों से विज्ञान और कला और संस्कृति का केंद्र था और 1857 के हंगामों में तबाह हो गया था। लेकिन इस शहर में संस्कृति और ज्ञान व कला का चिराग पूरी तरह बुझा नहीं था लेकिन इसकी लौ मद्धम ज़रूर पड़ गई थी।

मौक़ों को भांप कर नवल किशोर ने अपनी मेहनत और लगन से अपने लिए कुछ करने का बीड़ा उठाया। 1858 के शुरू में मुंशी नवल किशोर लाहौर से लखनऊ आए और उसी साल नवम्बर में नवल किशोर प्रेस स्थापित किया। जहां से जनवरी 1859 से उर्दू का ''अवध अखबार' प्रकाशित करना शुरू किया। पहले ये साप्ताहिक था बाद में दैनिक हो गया और 1950 तक चलता रहा। कुछ ही समय में उनका प्रेस विश्व प्रसिद्ध हो गया और उसने पेरिस के अल्पाइन प्रेस के बाद दूसरा स्थान हासिल कर लिया। मुंशी जी लगभग पांच हज़ार किताबें प्रकाशित कीं जो ऐतिहासिक रिकॉर्ड था। इस वक्त बिजली नहीं थी। प्रकाशनों में लगभग 65 प्रतिशत उर्दू, अरबी और फारसी और बाक़ी 35 प्रतिशत संस्कृत, हिन्दी, बंग्ला, गुरमुखी, मराठी, पश्तो, अंग्रेजी थी। जिनमें विज्ञान और कला के सभी विषय शामिल थे। मुंशी जी के निधन के बाद 1950 तक जो महत्वपूर्ण साहित्यकार प्रेस से जुड़े रहे उनमें नौबत राय नज़र, पंडित द्वारका प्रसाद वामिक़, पंडित विष्णु नारायण दर, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचंद, पंडित रूप नारायण पांडेय, दुलारे लाल भार्गव, कृष्ण बिहारी मिश्र और बांके बिहारी भटनागर भी थे।

 मुंशी जी का एक महत्वपूर्ण काम था हिंदू, इस्लाम और सिख धर्म की पवित्र किताबों का हिंदी, उर्दू और गुरुमुखी में अनुवाद जिसमें रामायण के उर्दू और गुरुमुखी संस्करण शामिल हैं। इस काम से भारत में सांप्रदायिक सद्भाव को बहुत बल मिला। मुंशी जी भारत में पहली पंक्ति के कारोबारी थे। 1871 में लखनऊ की अपर इंडिया पेपर मिल उन्हीं की देन थी, जो उत्तर भारत का पहला कागज़ बनाने का कारखाना था । इन कामों से मुंशी जी को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली और विदेशी शासक भी उन्हें सम्मान की नज़र से देखने लगे। 1885 में लुधियाना दरबार में अफगानिस्तान के शाह अब्दुर्रहमान ने मुंशी जी को देखते ही कहा था ''खुदा का शुक्र है कि मेरा ये सफ़र इसलिए सफल हुआ कि आपसे मुलाकात हो गई हिंदुस्तान में जो खुशी आपसे मिल कर हुई वो किसी काम से नहीं हुई।''

1888 में शाह ईरान ने कोलकाता में संवाददाताओं के एक सम्मेलन में कहा था, ''हिन्दुस्तान आने के मेरे दो मकसद हैं।  एक वायसराय से मिलना और दूसरा मुंशी नवल किशोर से।' नवल किशोर प्रेस ने बिना शक पश्चिमी, मध्य और दक्षिण एशिया से भारत के सद्भाव को बढ़ावा देने में यादगार खिदमत अंजाम दी। मुंशी जी की सामान्य सामाजिक सेवाएं भी उल्लेखनीय हैं। वो बड़े उदार थे। उन्होंने देश के विभिन्न संस्थानों को नकद या बहुत सी किताबें पेश कीं। शिक्षण संस्थान, अनाथ घर और अस्पताल आदि भी उनसे लाभान्वित हुए। 1885 में नवाब आगा मीर के महल को खरीद कर उसमें मुंशी नवल किशोर हाई स्कूल स्थापित किया। और बाद में 1887 में इसे सरकार को स्थानांतरित करके उसका नाम गवर्नमेंट जुबली कॉलेज कर दिया। लखनऊ के डफरिन अस्पताल की इमारत उन्हीं की देन है।

हज़रत गंज की रौनक़ बढ़ाने में उन्होंने जो सेवा अंजाम दी उसके सम्मान में उन्हें 1875 में लखनऊ नगर पालिका का पहला भारतीय सदस्य मनोनीत किया गया। समाज और देश के प्रति उनकी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए सरकार ने 1877 में उन्हें ''क़ैसरे हिंद'' के पदक से नवाज़ा और 1888 में सी.आई.ई. की डिग्री से सम्मानित किया। 1885 ई. के पहले कांग्रेस अधिवेशन में भी मुंशी जी ने हिस्सा लिया था। दक्षिण एशिया की साहित्यिक विरासत और एशियाई क्रांतिकारी राष्ट्रीयता के पालनकर्त्ता मुंशी नवल किशोर का निधन 19 फरवरी, 1895 ई. को लखनऊ में हुआ। भारत सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में उनकी महत्वपूर्ण सेवाओं के सम्मान में उनके 75वें श्रद्धांजिल दिवस (19.2.1970) पर एक विशेष डाक टिकट जारी किया। भारत में यूनानी चिकित्सा को जीवित रखने और हकीमों के सम्मान को विश्वस्तर पर परिचित कराने में मुंशी जी और उनके प्रेस का बहुत बड़ा हिस्सा है उनके जीवन में लगभग 150 चिकित्सा की किताबों का प्रकाशन हुआ।

नवल किशोर मिलीजुली संस्कृति के बड़े प्रतीक थे। दारुल उलूम देवबंद के इतिहास में बराबर नवल किशोर की सेवाओं का उल्लेख मिलता है। फिलहाल दो मिसालें पेश हैं। पहली ये कि जो किताबें दुर्लभ हो रही थीं उनको छापना और ज़ाहिर है देवबंद को सरकारी सहायता नहीं मिलती थी जैसे कि जामिया को नहीं मिलती थी। दारुल उलूम की पाठ्य पुस्तकें नवल किशोर ने मुफ्त में मुहैया कराईं। अलीगढ़ के लिए उनके अनुदानों का रिकॉर्ड मौजूद है। दूसरे ये कि हिंदी और संस्कृत का जो सरमाया (भण्डार) था उसे नवल किशोर ने उर्दू में स्थानांतरित करने की कोशिश की। मनु स्मृति और शिव पुराण के उर्दू अनुवाद प्रकाशित हुए और महाभारत का अनुवाद छापा गया।

ये हैरानी की बात है कि 1960 के आसपास तक लगभग सात सौ पांडुलिपियों जिनमें एक दर्जन से अधिक दास्तानें थीं नवल किशोर के स्टोर में पांडुलिपियों के रूप में मौजूद थीं और जो शायद अब तक नहीं छप पाए। सम्मान और ध्यान देने का ये आलम था कि नवल किशोर प्रेस में कलाम पाक की किताबत वज़ू कर के ही कराई जाती थी और ज़रूरत पर सलाह करने के लिए उलमा सलाहकार थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब फरमाते हैं कि पूर्वी ज्ञान और भारतीय इस्लामी सभ्यता की जो सेवा मुंशी साहब, उनके साथियों और उनके प्रेस ने अंजाम दी, उसने हमारे सांस्कृतिक इतिहास का नक्शा ही बदल दिया। मुंशी नवल किशोर ने भारत ही नहीं मध्य एशियाई देशों और मध्य एशियाई देशों की सभ्यताओं के जीवन को स्थापित रखने और फलने फूलने के मौक़े प्रदान किए। उन्होंने उर्दू के अलावा अरबी फारसी और संस्कृत की प्राचीन और दुर्लभ पुस्तकों के अच्छे नमूने तैयार कराए। उनमें संशोधन कराए और उन्हें कम कीमत के एडिशनों में प्रकाशित किया। इस तरह हमारी हज़ारों महत्वपूर्ण किताबें नष्ट होने और मिट जाने से सुरक्षित रहीं और न सिर्फ सुरक्षित रहीं बल्कि दूर तक पहुँची भी।

नवल किशोर के प्रेस ने अपने काम में सभी धर्मों और सभी संस्कृतियों को सम्मान दिया। वो भारतीय विचार और दर्शन और सहिष्णुता की विरासत है। अगर मुंशी नवल किशोर न होते तो भारतीय शिक्षा और ज्ञान और कला की दुनिया का इतिहास ही बदल गया होता। दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 7 जनवरी, 1970 को कहा था,

"Munshi Naval Kishore was one of our intellectual leader of the nineteenth century. He was intensely concerned with the evoluing of a synthesis between old and new knowledge. He was a publisher of phenomend energy and several languages ​​are indebted to him."

नाज़िर काकोरवी के अनुसार, ''लखनऊ में मशहूर था कि जिस कदर हाफिज़, इतिहासकार, लेखक, हदीस के जानकार इस प्रेस में थे हिंदुस्तान के किसी दूसरे प्रसे को नसीब नहीं हुए।'' इस लिहाज़ से नवल किशोर प्रेस, एक प्रेस नहीं बल्कि एक संगठन, अकादमी और ज्ञान व कला का केंद्र था। ज्ञान व साहित्य और इस्लामी ज्ञान के इस सेवक को मुसलमान हमेशा याद रखेंगे और श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। नसीर नातक़ी के शब्दों में:

शाया कलाम पाक हो, थी दिल की आरज़ू

गूंजी सदाए नेक फिज़ाओं में चार सू

आने लगी तहारत व पाकीज़गी का बू

लिखवाया फिर कलामे इलाही को बावज़ू

अल्लाह रे नफासत मुंशी नवल किशोर

कितनी हसीं थी फितरते मुंशी नवल किशोर

स्रोत: अज़ीज़ुल हिंद, नई दिल्ली

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