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Hindi Section (20 Dec 2013 NewAgeIslam.Com)



Phony Muslimness among Muslim Boys in Schools and Colleges in UK ब्रिटेन के स्कूलों और कॉलेजों में मुस्लिम लड़कों के बीच कल्पनिक इस्लामपरस्ती

 

 

 

 

माइक ग़ौस, न्यु एज इस्लाम के लिए

25 नवम्बर, 2013

मुझे ब्रिटेन में मुस्लिम स्टूडेंट एसोसिएशन के द्वारा सेमिनार और दूसरी शैक्षणिक गतिविधियों के लिए कॉलेजों और युनिवर्सिटियों में छात्रों छात्राओं के लिए अलग अलग बैठने की व्यवस्था को लेकर चिंतित हूँ।

 

 

 

 

 

 

 

 

अमेरिका में स्टूडेंट एसोसिएशन के विपरीत जहां पुरुषों और महिलाओं के बैठने का प्रबंध एक साथ किया जाता है और वो दोनों एक साथ किसी भी आयोजन में भाग ले सकते हैं, ऐसा लगता है कि ब्रिटेन में मुस्लिम स्टूडेंट एसोसिएशन लड़के चलाते हैं। जब उन्हें किसी ऐसी घटना की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसमें मुसलमानों की बड़ी तादाद शामिल होने वाली हो तो ये लड़के तुरन्त पाखण्डी मुसलमान बन जाते हैं। (ऐसा लगता है) वो औरतों को आज़ादी के साथ कहीं भी बैठने से जितना रोकते हैं वो उतने ही बड़े मुसलमान बन जाते हैं! ये किस तरह का पाखण्ड हैं!

ऐसा सिर्फ लड़के ही नहीं कर रहे है बल्कि कुछ इमाम भी ऐसे हैं कि जब वो किसी विशेष समारोह में भाषण देने आते हैं वो सबसे पीछे, अंधेरे हिस्से में बैठी गपशप कर रही औरतों को खामोश रहने का हुक्म देते हैं। अगर आपका भाषण इतना मूर्खतापूर्ण होगा तो मर्द भी ऐसा ही करेंगे, या तो वे आपस में बातचीत करेंगे या अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाएंगे। मुझे खुशी है कि मैं ऐसे आयोजनों में नहीं जाता, लेकिन अगर कभी मौक़ा मिला तो औरतों पर इस तरह के अभद्र और सम्मान से खाली टिप्पणी के लिए मैं उनकी निंदा करूँगा। ये हमेशा याद रखें कि हमारी खामोशी ऐसे लोगों को उनके गलत कामों को जारी रखने की इजाज़त देती है। आप इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करेंगे तो दूसरे लोग इसमें हस्तक्षेप करेंगे।

पुरुषों और महिलाओं को किसी आयोजन में अलग अलग जगहों पर बिठाने की परम्परा को खत्म करने की ज़रूरत है।  पुरुषों और महिलाओं को खुद ये तय करने की आज़ादी होनी चाहिए कि उन्हें किस जगह बैठना सही होगा, उन्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए।

क्या वो इस बात की शिक्षा देते हैं कि इस्लाम अपनी आदतों को नियंत्रित करने का नाम है और दूसरों के प्रति उदार, सच्चा, भरोसेमंद, ख़याल रखने वाला होना है। और अपने व्यक्तित्व को अमानत दार बनाने की ज़रूरत है, इसलिए कि पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को अमीन कहा जाता था। निस्संदेह मुसलमानों को बुनियादी सुन्नत पर सबसे पहले अमल करना चाहिए। इस्लाम दूसरों की आदतों को नियंत्रित करने का नाम नहीं है। इस्लाम आज़ादी का नाम है- आप अपने कामों के लिए आपको निजी तौर पर खुदा का ईनाम मिलेगा या आप उससे वंचित रखे जाएंगे। न तो मुस्लिम स्टूडेंट एसोसिएशन और न ही आपके शहर का मुफ्ती दूर दूर तक आपके कामों के लिए जवाबदेह है। माँ बाप, जीवन साथी, बहन और भाई या इमामों की बातें तो छोड़िए पैगम्बरे इस्लाम भी क़यामत के दिन आपको बचाने नहीं आएंगे। पैगम्बरे इस्लाम ने किसी को कुरान की शिक्षा देने की जिम्मेदारी नहीं दे रखी है।

हिजाब और अलगाव मुख्य रूप से मुस्लिम देशों की सांस्कृतिक पैदावार है। इस्लाम में इसकी कोई इजाज़त नहीं है। पहली और सबसे स्पष्ट इबादतगाह में अब तक अलगाव का कोई नामो निशान नहीं पाया जाता। मर्द और औरत एक साथ हज अदा करते हैं, अल्लाह हम सबको बिना किसी भेदभाव के एकजुट करना चाहता है।

ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा या धरती पर दूसरी जगहों पर बसने वाले मुसलमानों की बिना किसी अनिच्छा के अपना संस्कृति या संशोधित संस्कृति है। सऊदी अरब के विपरीत जहां महिलाओं की निगरानी की जाती है। लेकिन दूसरे देशों में रहने वाली औरतों को अपना जीवन जीने, खुद से कमाने और अगर उनके अपने बच्चे हैं तो उनका पालन पोषण खुद करना होगा, और उनकी संस्कृति उनकी ज़रूरतों पर आधारित होनी चाहिए न कि सऊदी अरब की ज़रूरतों पर।

ऐसे माँ बाप को शर्म आनी चाहिए जो अपनी बेटियों को मर्दों का मोहताज बनाते हैं और जब उस पुरुष की मृत्यु हो जाती है या वो भाग जाता है तो उनके लिए मुश्किल हालात पैदा हो जाते हैं। क्या इसी तरह माता पिता अपनी बेटियों का खयाल रखते हैं? बेटियों को पूरी आज़ादी हासिल होनी चाहिए और उनके अंदर इतनी क्षमता होनी चाहिए कि वो अपने मामलों को खुद सँभाल सकें। पैगम्बरे इस्लाम ने अपनी बेटी फ़ातिमा से कहा था कि तुम्हें जन्नत का परवाना सिर्फ इसलिए मुफ्त में हासिल नहीं हो जायेगा कि तुम मेरी बेटी हो बल्कि दूसरे सभी लोगों की तरह तुमको भी इसे हासिल करना होगा।

अगर किसी महिला को अलग थलग रहने का प्रशिक्षण दिया जाए तो वो उन परिस्थितियों का सामना कैसे करेगी जब उसके पिता, भाई, पति या पुत्र उसके आस पास न हों। प्यार का मतलब ये नहीं है कि हम जिसे प्यार करें उसे किसी का मोहताज बना दें। हाँ अगर हम अपने किसी प्रिय से प्यार करते हैं तो हम उन्हें आत्मनिर्भर और आज़ाद बना देते हैं, और उन्हें इतना सक्षम बना देते हैं कि वो विषम परिस्थितियों में कम से कम मुश्किलों के साथ अपने दम पर कायम रहें।

वैसे ही स्थिति एशिया के सिखों, हिंदुओं, जैनियों, ईसाइयों और दूसरों की है।

माइक ग़ौस ने संगठित अमेरिका के निर्माण के लिए अपने आपको समर्पित कर रखा है, और रोजमर्रा की समस्याओं पर बहुलवादी समाधान पेश करते हैं और वो एक पेशेवर वक्ता, विचारक और बहुलवाद, राजनीति, नागरिक मामलों, इस्लाम, भारत, इसराइल, शांति और न्याय के विषय पर लिखतें हैं। माइक फॉक्स टीवी पर सीन हनीटी शो पर अक्सर मेहमान के तौर पर आते हैं, और नेशनल रेडियो नेटवर्क पर एक कमेंटेटर हैं। माइक डलास मॉर्निग न्यूज़ में साप्ताहिक टेक्सास फेथ कालम लिखते हैं और हफिंगटन पोस्ट और दुनिया के दूसरे अखबारों में अक्सर लिखतें हैं। ब्लॉग www.theghousediary.com रोज़ाना अपडेट किया जाता है।

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http://www.newageislam.com/islamic-society/mike-ghouse-for-new-age-islam/phony-muslimness-among-muslim-boys-in-schools-and-colleges-in-uk/d/34571

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http://www.newageislam.com/urdu-section/mike-ghouse-for-new-age-islam/phony-muslimness-among-muslim-boys-in-schools-and-colleges-in-uk-برطانیہ-کے-اسکولوں-اور-کالجوں-میں-مسلم-لڑکوں-کے-درمیان-مصنوعی-اسلام-پرستی/d/34894

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