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Hindi Section ( 4 Jan 2014, NewAgeIslam.Com)

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Martyrdom of Hussain: A Symbol for Oppressed People All Over the World इमाम हुसैन की शहादत ब्रह्माण्ड में मज़लूमों का प्रतीक है

 

 

 

 

आमिर रजा हुसैन

23 नवम्बर 2012

आशुरह, मुहर्रम की दसवीं तारीख को पूरी दुनिया के मुसलमान पैग़म्बर  के नवासे की दुखद मौत का ग़म मनाते हैं जिन्हें हज़रत मआविया रज़िअल्लाहु अन्हां के बेटे यज़ीद ने सातवीं सदी ईसवी में उनकी पूरे परिवार सहित हत्या कर दी थी।

उस दिन हनफी, मालकी, शिया और सुन्नी सहित तमाम धर्मों के लोग इमाम हुसैन की मौत का ग़म मनाते है। इमाम हुसैन ने हमें अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने और मासूमों की जान न लेने की शिक्षा दी है। इमाम हुसैन का संबंध एक ऐसे परिवार से था जिसमें कुर्बानी पेश करना जीवन का एक सिद्धांत था।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाहरी मृत्यु के बाद उन्होंने देखा कि उनकी माँ को उनके पिता के द्वारा सताया जा रहा है। उनकी मृत्यु उस गहरे ज़ख्म की वजह से हुई जो उन्हें उस समय पहुँचा था जब उनके घर पर हमला किया गया था और उनके घर का दरवाज़ा जल उठा था। उन्होंने फज्र की नमाज़ की इमामत करते हुए अपने पिता हज़रत अली की शहादत को देखा था। वह अपने भाई हसन के बिस्तर के पहलू में खड़े हो गए जब उन पर मुआविया की आम सहमति से दिए गए ज़हर का दर्दनाक हमला हुआ। इस्लाम पर यह पहला आंतकवादी हमला था।

इसलिए जब 680 शताब्दी में दस मुहर्रम को उन्होंने अपने परिवार और 72 साथियो  के साथ यज़ीद के जंगली भेड़ियों का सामना किया तो उसे शहादत का उच्चतम स्तर माना गया। यज़ीदी सेना ने अत्यंत कायरतापूर्ण हरकतों में सबसे पहले इमाम हुसैन के खेमे के लिए भोजन और पानी बंद किया और सात दिनों के बाद उन्होंने भूखे प्यासे इमाम हुसैन और उनके साथियो को शहीद कर दिया, उनके माल व असबाब को लूट लिया, उनके खेमों में आग लगा दी और उनकी औरतों और बच्चों को कैदी बना दिया।

उनकी बहादुरी की दास्तान

इसलिए हर साल मुहर्रम की पहली तारीख से हुसैनी बहादुरी की दास्तानें और उनके परिवार की बहादुरी के किस्से बयान किए जाते है जिससे  लाखों दर्द मंद आखों में आंसू जारी हो जाते है। इमाम हुसैन के नौजवान बेटे अली अकबर की बहादुरी, उनके भतीजे हज़रत क़ासिम की दिलेरी, उनके बहन के बच्चे औन व मुहम्मद की बहादुरी और उनके साथियो सईद, ज़हीर और हबीब इत्यादी की बहादुरी की दास्तान और इमाम हुसैन के छः महीने के बेटे प्यासे अली असग़र की दिल दहला देने वाली दास्तान जिन्हें यज़ीदी सेना के एक सिपाही ने मौत के घाट उतार दिया।

प्यास की चीखें

लेकिन सबसे बड़ी जवांमर्दी और बहादुरी भरी दास्तान इमाम हुसैन के सौतेले भाई और उनकी फौज के सेनापति क़मर बनी हाशिम अबूअलफाजिल अब्बास की है जिन्होंने इमाम हुसैन के परिवार की रक्षा में अपने दोनों हाथ गंवा दिए और उसके बाद इमाम हुसैन के बच्चों के लिए पानी लाने की कोशिश में अपनी जान भी गंवा दी। जब अपनी भतीजी, इमाम हुसैन की तीन साल की बेटी सकीना की हालत उनसे देखी न गई तो वे अकेले ही उस नदी तक पहुँचे जिस पर यज़ीद की फौज ने क़ब्ज़ा कर रखा था, फिर वह मसकिज़ह में पानी भर कर वापस लौट रहे थे तो उन्होंने अपना बायां हाथ गंवा दिया और उसके बाद बहादुरी के साथ लड़ते हुए अपना दाहिना हाथ भी गंवा दिया। फिर उसके बाद उन्होंने उस मसकिज़े को अपने दातों से दबा लिया लेकिन एक घातक तीर उनके मसकिज़ह से आकर लगा और सारा पानी बह गया। हज़रत अब्बास की तमाम उम्मीदे  खत्म हो गईं और उन्होंने इमाम हुसैन की गोद में अपना दम तोड़ दिया।

इमाम हुसैन की मौत भी उसी दोपहर को हुई लेकिन उनके ज़ख्मी सर के लिए अब कोई गोद नहीं बची थी। उनके जिस्म को बुरी तरह विकृत कर दिया गया, उनके सर को धड़ से अलग कर दिया गया और उनके बेजान शरीर को घोड़ो के टापों से रोंद कर कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में छोड़ दिया गया। लेकिन उनकी शहादत से उनके पैग़ाम को दोबारा जीवन हासिल हुआ,जिसका प्रचार पूरी दुनिया में उनकी बहन हज़रत ज़ैनब ने किया। इन चौदह सौ सालों में इमाम हुसैन की शहादत पूरी दुनिया के मज़लूमों का प्रतीक बन गई।

स्रोत: http://www.speakingtree.in/spiritual-articles/epics/the-sacrifice-of-husain

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