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Hindi Section (22 Jul 2019 NewAgeIslam.Com)



Human Rights in Islam-Part-2 इस्लाम में मानव अधिकार


कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम

इंसानी जान के खून की हुरमत

अल्लाह पाक का इरशाद है:

مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم بَعْدَ ذَٰلِكَ فِي الْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ ﴿٣:۵﴾

अनुवाद: इसी वजह से हमने बनी इस्राइल पर (नाज़िल की गई तौरात में यह आदेश) लिख दिया (था) कि जिसने किसी व्यक्ति को बिना किसास के या ज़मीन में फसाद (फैलाने अर्थात खूँ रेज़ी और डाका जनी आदि की सजा) के (बिना हक़) क़त्ल कर दिया तो गोया उसने (समाज के) सारे लोगों को कत्ल कर दिया और जिसने उसे (नाहक मरने से बचा कर) जीवित रखा तो गोया उसने (समाज के) सारे लोगों को जीवित रखा (अर्थात उसने इंसानी जीवन का सामूहिक निज़ाम बचा लिया), और बेशक उनके पास हमारे रसूल स्पष्ट निशानियाँ ले कर आए फिर (भी) उसके बाद उनमें से अक्सर लोग यक़ीनन ज़मीन में हद से आगे बढ़ने वाले हैंl (सुरह मायदा ५:३२)

इमाम अबू मंसूर मात्रीदी इस आयत की व्याख्या करते हुए फरमाते हैं:

من استحل قتل نفس حرم الله قتلها بغير حق، فكأنما استحل قتل الناس جميعا، لأنه يكفر باستحلاله قتل نفس محرم قتلها، فكان كاستحلال قتل الناس جميعا، لأن من كفر بآية من كتاب الله يصير كافرا بالكل".........

وتحتمل الآية وجها آخر، وهو ما قيل: إنه يجب عليه من القتل مثلما أنه لو قتل الناس جميعا. ووجه آخر: أنه يلزم الناس جميعا دفع ذالك عن نفسه ومعونته له، فإذا قتلها أو سعى عليها بالفساد، فكأنما سعى بذالك على الناس كافة........وهذا يدل أن الآية نزلت بالحكم في أهل الكفر وأهل الإسلام جميعا، إذا سعوا في الأرضا بالفساد. (تأويلات أهل السنة للإمام أبي منصور الماتريدي: 3:501)

अनुवाद: जिसने किसी ऐसी जान का क़त्ल हलाल जाना जिसका नाहक कत्ल करना अल्लाह पाक ने हराम कर रखा है तो गोया उसने सारे लोगों के क़त्ल को हलाल जाना, क्योंकि ऐसी जान जिसका कत्ल हराम है वह व्यक्ति उसके कत्ल को हलाल समझ कर कुफ्र का दोषी हुआ है, वह ऐसे ही है जैसे उसने सारे लोगों के कत्ल को हलाल जाना, क्योंकि जो शख्स किताबुल्लाह की एक आयत का इनकार करता है वह पूरी किताब का इनकार करने वाला हैl

“इस आयत की (सुरह मायदा ५:३२) एक और तौजीह है और वह यह कि कहा गया है कि किसी जान के क़त्ल को हलाल जानने वाले पर सारे लोगों के क़त्ल का गुनाह लाज़िम आएगा (क्योंकि उसने इंसानियत के एक फर्द को कत्ल कर के गोया उसने पूरी इंसानियत पर हमला किया है)l

“एक तौजीह यह भी है कि सारे लोगों पर लाज़िम है कि सामूहिक प्रयास के साथ उस जान को कत्ल से बचाएं और उसकी मदद करेंl पास जब वह उनको कत्ल करके फसाद बपा करने की कोशिश करेगा तो गोया वह पूरी इंसानियत पर फसाद बपा करने की कोशिश करता है_____और यह चीज दलालत करती है कि यह आयत इस हुक्म के साथ सारे अहले कुफ्र और अहले इस्लाम के लिए नाज़िल हुई है जबकि वह फसाद फिल अर्ज़ के लिए सरगर्दां हों” (تأويلات أهل السنة للإمام أبي منصور الماتريدي: 3:501)

इमाम अबू हफ्स हम्बली अपनी तफ़सीर “अल बाब फी उलूमिल किताब “ में बयान करते हैं:

१- हज़रत मुजाहिद ने फरमाया: जिस व्यक्ति ने एक जान को भी नाहक कत्ल किया तो वह इस कत्ल के सबब दोज़ख में जाएगा, जैसा कि वह तब दोज़ख में जाता अगर वह सारी इंसानियत को कत्ल कर देता (अर्थात उसका दोज़ख का अज़ाब ऐसा होगा जैसे उसने पूरी इंसानियत को कत्ल कर दिया हो)

आगे कहते हैं कि अल्लाह के इस फरमान (انما جزاء الذین یحاربون اللہ) में हर वह व्यक्ति शामिल है जो इन बुरे गुणों का मालिक हो चाहे वह मुस्लिम हो या काफिरl यह नहीं कहा जाएगा कि यह आयत कुफ्फार के हक़ में नाज़िल हुई क्योंकि एतेबार शब्द के सामान्य अर्थ का होता है ना कि ख़ास सबब काl (अल बाब फी उलूमिल किताब, ७:३०१)

अल्लाह पाक का इरशाद है

وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِف فِّي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنصُورًا ﴿٣٣:۱۷﴾

और तुम किसी जान को कत्ल मत करना जिसे (कत्ल करना) अल्लाह ने हराम करार दिया है सिवाए इसके कि (उसका कत्ल करना शरीअत की रू से) हक़ हो, और जो शख्स ज़ुल्म से क़त्ल कर दिया गया तो बेशक हम ने उसके वारिस के लिए (किसास का) हक़ मुकर्रर कर दिया है इसलिए वह भी (किसास के तौर पर बदले के) कत्ल में हद से आगे ना बढ़े, बेशक वह (अल्लाह की तरफ से) मदद पाए हुआ है (इसलिए उसकी मदद व हिमायत की जिम्मेदारी हुकूमत पर होगी) (सुरह अल इसरा: १७:३३)

अल्लाह पाक का इरशाद है:

وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًا

अनुवाद : और (यह) वह लोग हैं जो अल्लाह के साथ किसी दोसरे माबूद की पूजा नहीं करते और ना ही किसी ऐसी जान को कत्ल करते हैं जिसे बिना हक़ मारना अल्लाह ने हराम फरमाया है और ना (ही) बदकारी करते हैं, और जो शख्स यह काम करेगा वह गुनाह की सज़ा पाएगा (२५:६८)

अल्लाह पाक का इरशाद है: إِنَّ الَّذِينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَرِيقِ

अर्थात: बेशक जिन लोगों ने मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को तकलीफ दी फिर तौबा (भी) नहीं की तो उनके लिए जहन्नम का अज़ाब है और उनके लिए (विशेषतः) आग में जलने का अज़ाब है (८५:१०)

कुछ मुफ़स्सेरीन इस आयत (८५:१०) की तफ़सीर में फरमाते हैं कि यहाँ फितने में मुब्तिला करने से आग में जलाना भी मुराद लिया गया हैl मुफ़स्सेरीन के इस अर्थ की रू से देखा जाए तो मौजूदा दौर में होने वाले खुद काश हमलों, बम धमाकों, और बारूद से आम नागरिकों को जला कर मार देने वाले फितना परवर लोग अज़ाब के हकदार हैंl

(बाकी इंशाअल्लाह)

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