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Hindi Section (13 Dec 2013 NewAgeIslam.Com)



Concept of God in Islam इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा

 

 

 

 

अरब न्यूज़

8 नवबंर, 2013

हर भाषा में एक या कुछ ऐसी शब्दावलियाँ होती है जिनका इस्तेमाल ईश्वर के लिए किया जाता है और इनका इस्तेमाल कभी कभी छोटे देवी देवताओं के लिए भी किया जाता है। ये समस्या शब्द अल्लाह के साथ नहीं है जो कि एक सच्चे खुदा का नाम है। किसी और को अल्लाह नहीं कहा जा सकता। इस शब्द का न तो बहुवचन होता है और न ही इसका लिंग होता है। जब इसकी तुलना ‘god’ से की जाती है तो इसकी विशिष्टता उजागर हो जाती है क्योंकि इसका बहुवचन ‘gods’ और इसी तरह स्त्रीलिंग ‘goddess’ होता है। ये जानना दिलचस्प है कि शब्द ‘अल्लाह’ का उल्लेख ईसा मसीह की भाषा आरामायिक में भी है जो कि अरबी भाषा के ही परिवार की है।

इस्लाम जो ईश्वर के साथ एक अनोखी अवधारणा को जोड़ता है वो एक सच्चे ईश्वर को प्रतिबिम्बित करता है। एक मुसलमान के लिए अल्लाह सर्वशक्तिमान, ब्रह्मांड का निर्माता और सबका पालनहार है। वो किसी के समान नहीं है और न ही किसी की तुलना उससे की जा सकती है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से उनके समकालीन लोगों ने अल्लाह के बारे में पूछा जिस पर उसका जवाब कुरान की एक छोटी सी सूरे के रूप में सीधे खुदा ने दिया और जिसे एकेश्वरवाद का सार या एकेश्वरवाद का आदर्श वाक्य माना जाता है। '' कहो, वह अल्लाह यकता है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य, और न कोई उसका समकक्ष है।" (112: 1- 4)

इस्लाम में अल्लाह की अवधारणा ये है कि वो रहमान और रहीम है। यही वजह है कि सूरे तौबा के अलावा बाक़ी तमाम सूरतों की शुरुआत इस आयत से होती है, ‘‘अल्लाह के नाम से शुरु जो निहायत मेहरबान और इंतेहाई रहम वाला है’’

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ‘‘अल्लाह की मोहब्बत और उसकी रहमत उसके बन्दों के लिए इससे कहीं ज़्यादा है जो एक माँ की मोहब्बत और रहमत उसके अपने बच्चे के लिए होती है।’’

इस्लाम में खुदा इंसाफ का नमूना है। इसीलिए अनर्थ करने वालों और गुनाहगारों को उसकी सज़ा मिलेगी और सदाचारी लोग उसकी मदद और रहमत के हक़दार होगें। दरअसल अल्लाह के रहमान और रहीम होने का गुण उसके न्याय के गुण में पूरी तरह अभिव्यक्त होता है। जो लोग उसकी खातिर अपनी पूरी ज़िन्दगी में मुसीबतों का सामना करते है उन्हें दूसरों का शोषण और उत्पीड़न करने वाले वालों के साथ किये जाने वाले अल्लाह के व्यवहार का शिकार नहीं होना पड़ेगा। उनके लिए ऐसे प्रतिफल की उम्मीद रखना उस विश्वास के खिलाफ है कि आखिरत (परलोक) में लोग अपने अपने व्यवहार के लिए जवाबदेह होगें। इसलिए इस दुनिया में नैतिक और धार्मिक ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए सभी प्रोत्साहनों से इंकार करना है।

इस मामले में निम्नलिखित आयतें बहुत स्पष्ट और दो ​​टूक हैं: ''बेशक परहेज़गारों के लिए उनके रब के पास नेमतों वाले बाग़ हैं, क्या हम फरमा-बरदारों को मुजरिमों की तरह (महरूम- वंचित) कर देंगे, तुम्हें क्या हो गया है, क्या फैसला करते हो।''

इस्लाम किसी भी इंसानी शक्ल में खुदा की तस्वीर पेश करने और धन, ताक़त या नस्ल की बुनियाद पर उसे किसी खास व्यक्ति या समूह का तरफदार बयान करने का खंडन करता है। उसने सभी इंसानों को बराबर पैदा किया है। लोग सिर्फ तक़वा (धर्मपरायणता) और नेकी के द्वारा ही खुद को अलग बता सकते हैं और उसका मार्गदर्शन और समर्थन हासिल करने के हकदार हो सकते हैं।

ये धारणाएं कि अल्लाह ने दुनिया बनाने के सातवें दिन आराम किया, अल्लाह ने अपने एक सिपाही के साथ कुश्ती लड़ी, ये कि अल्लाह इंसानों के खिलाफ साज़िश करने वाला है और खुदा किसी इंसानी शक्ल में अवतार लेता है, इस्लाम में इन धारणाओं को ईशनिंदा माना जाता है।

शब्द अल्लाह इस्लाम में खुदा की पवित्रता पर ज़ोर देने की एक झलक है, और अल्लाह के तमाम पैगम्बरों के संदेशों का सार भी यही है। इसी वजह से किसी पूज्य या किसी व्यक्ती को खुदा के साथ शामिल करने को इस्लाम में एक ऐसा पाप समझा जाता है जिसे खुदा कभी माफ नहीं करेगा, इस हक़ीक़त के बावजूद कि वो चाहे तो दूसरे तमाम गुनाहों को माफ कर दे।

रचनाकार का स्वाभाव रचित या निर्मित से अलग होनी ही चाहिए, इसलिए कि अगर दोनों एक ही स्वाभाव के होंगे तो रचनाकार अस्थायी और नश्वर होगा और जिसे एक निर्माता की आवश्यकता होगी। ये बताता है कि कोई उसके जैसा नहीं है। अगर निर्माता अस्थायी नहीं है तो वो ज़रुर अविनाशी होगा। लेकिन अगर वो शाश्वत है तो वो कारण नहीं बन सकता, और अगर उसके अस्तित्व में आने के लिए कोई कारण नहीं, उसके वजूद के अलावा कोई वाह्य कारण नहीं है, तो इसका मतलब ये है कि वो आत्मनिर्भर है। और अगर वो अपने अस्तित्व को जारी रखने में किसी पर निर्भर नहीं है तो फिर उसके अस्तित्व की कोई सीमा नहीं है। इसलिए निर्माता शाश्वत और अनंत हैः ''वो (खुदा) अव्वल भी है और आखिर भी।''

अल्लाह आत्मनिर्भर है या कुरान की शब्दावली में अलक़य्यूम है। अल्लाह चीज़ों की रचना सिर्फ इस अर्थ में नहीं करता कि उन्हें अस्तित्व दिया है बल्कि खुदा उन्हें सुरक्षित भी करता है और अस्तित्व से बाहर भी ले जाता है और उनके साथ जो कुछ भी होता है उस का परम कारण वही है।

स्रोत: http://www.arabnews.com/news/474046

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam-and-spiritualism/arab-news/concept-of-god-in-islam/d/14362

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/arab-news,-tr-new-age-islam/concept-of-god-in-islam-اسلام-میں-خدا-کا-تصور/d/34742

URL for this article:

http://newageislam.com/hindi-section/arab-news,-tr-new-age-islam/concept-of-god-in-islam-इस्लाम-में-ईश्वर-की-अवधारणा/d/34833

 




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  • Good and spiritual
    By Shadaab Neyazi - 12/16/2013 9:49:25 AM



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