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Hindi Section ( 9 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

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The reality of the Syrian revolution सीरिया में क्रांति की वास्तविकता


सीरिया में क्रांति की वास्तविकता

उर्दू दैनिक का एक सम्पादकीय

उत्तरी अफ्रीका और अरब देशों की क्रांति में तेज़ी से उभर रहे परिदृश्य की समीक्षा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में लगातार एक अहम विषय बना हुआ है। ट्युनिस में एक छोटी सी घटना के बाद इस भूभाग में जिस तरह के हालात पैदा हुए हैं, उनसे न सिर्फ इस भूभाग की एक के बाद एक सरकारें गिर रहीं हैं, बल्कि स्वयं को दुनिया का सुपर पावर मानने वाला अमेरिका, और उसके द्वारा अनैतिक आधारों पर सहायता प्राप्त करने वाला इज़राईल भी इससे आश्चर्यजनकरूप से प्रभावित हैं। ये देश वर्तमान आंदोलन का रुख अपने पक्ष में करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका, इज़राईल और अन्य पश्चिमी देशों के उद्देशयों की प्राप्ति में सऊदी सरकार इन सबका सबसे ज़्यादा सहयोग कर रही है। जानकारों के अनुसार ऐसा करके सऊदी सरकार एक ओर अपने आकाओं को खुश रखने की कोशिश कर रही है तो दूसरी ओर अपनी धरती पर इस प्रकार के आंदोलन को पनपने न देकर, अपनी सरकार को बचाये रखने की भरपूर कोशिश कर रही है। इस क्षेत्र में हो रही घटनाओं से सीरिया की जनता में भी चेतना पैदा होना स्वाभाविक प्रक्रिया थी। यहां भी जनता ने लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त करने के लिए विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन किये, और सरकार पर राजनीतिक सुधार लाने के लिए दबाव डालना शुरु किया। प्रारम्भिक घटना में राष्ट्रपति बशर अलअसद ने जनता की मांगों को स्वीकार करते हुए, उन पर हमदर्दी के साथ विचार करने का यकीन दिलाया, लेकिन कुछ दिनों में ऐसी घटनाएं हुईं कि जिससे कुछ सशस्त्र लोगों के द्वारा माहौल खराब करने की कोशिशें शुरु हो गयीं, और सऊदी अरब के कट्टरपंथी तत्वों के द्वारा सरकार के विरोधियों का समर्थन भी स्पष्ट रूप से साबित हो गया। पिछले कई हफ्तों में मैंने सीरिया के हालात का तफ्सीली जायज़ा लिया है। मैंने सीरिया से सम्बंधित घटनाओं पर संयम इसलिए भी रखा है क्योंकि विश्लेषण करने में गलती न हो जाए। सीरिया अरब देशों में ऐसा अकेला देश है जिसने अमेरिका के विरुध्द ईरान के इस्लामी आंदोलन को शुरुआत से समर्थन दिया है। इसने इराक-ईरान युध्द में ईरान का खुलकर समर्थन किया है। सीरिया ने इस क्षेत्र में फिलिस्तीन के हमास और लेबनान के हिज़्बुल्लाह का भी हमेशा से समर्थन किया है, अर्थात सीरिया इस क्षेत्र में अकेली अमेरिका और इज़राईल विरोधी सरकार है। बशर अलअसद के पिता हाफिज़ अलअसद ने देश में सल्फी विचारधारा के संगठन इख्वानुल मुस्लमीन को फैलने से रोका था। सीरिया ऐसा देश है जहां शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच तनाव नहीं है। सीरिया की घटनाओं का विश्लेषण करने में इसलिए भी संयम से काम लिया, एक ओर तो राष्ट्रपति बशर अलअसद ने देश में जनता के आंदोलनों के पीछे लीबिया के राष्ट्रपति मोअम्मर गद्दाफी की तरह विदेशियों को शामिल बताया था, और दूसरी ओर अमेरिका और इज़राईल सीरिया में सरकार परिवर्तन के इच्छुक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पश्चिमी देशों की ओर से सीरिया की वर्तमान सरकार के विरोधियों को समर्थन देना स्वाभाविक ही है। इस बात के मद्देनज़र मैंने सीरिया की घटनाओं पर शोध और विश्लेषण करते वक्त प्रमाण के रूप में कुछ घटनाओं को पेश करना बेहतर समझा। देश भर में और विदेशों में मौजूद बहुत से पाठकों ने सीरिया में हो रही घटनाओं पर मेरे विचार जानने की इच्छा व्यक्त भी की। इस क्षेत्र के वर्तमान हालात का विश्लेषण मसलकी (संप्रदायिक) मतभेदों को दूर रख कर, और सरकार को किसी भी संप्रदाय का प्रतिनिधि माने बिना करना चाहिए। ये वास्तविकता है कि अक्सर अरब देशों की बादशाहतों को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अपने पक्ष में रखते हुए इन देशों की प्राकृतिक संपदा का शोषण किया है, और क्षेत्र की जनता को शिक्षा व तरक्की से दूर रखते हुए राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा। अमेरिका, इज़राईल और पश्चिमी देशों ने इस क्षेत्र के देशों को तमाम तरक्की से दूर रखने के लिए मुसलमानों में मसलकी(सांप्रदायिक) मतभेद को हवा दी है। 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इन साज़िशों में ज़्यादा तेज़ी आई है। क्रांति के जनक और लीडर आयातुल्लाह खुमैनी मरहुम की इत्तेहादुल मुस्लमीन की अपील को कमज़ोर करने के लिए इराक़ के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के द्वारा ईरान के विरुध्द युध्द शुरु कराना, और इस युध्द में क्षेत्र की अरब सरकारों की ओर से सद्दाम हुसैन का समर्थन कराना इसी साज़िश का हिस्सा था। इसके बाद हाल के कुछ वर्षों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर संदेह पैदा करके अरब देशों को भयभीत रखना और इसके परिणामस्वरूप अरब देशों की सरकारों को ये बताना कि उनके कथित दुश्मन का मुकाबला सिर्फ इज़राईल कर सकता है। इसलिए वो इज़राईल से नफरत करना छोड़ दें, बल्कि इसराईल के साथ सम्बंध बनायें। इसके प्रमाण के तौर पर आज ज़्यादातर अरब देशों में इज़राईल का बढ़ता हुआ कारोबार है। अरब देशों को ईरान से भयभीत करने का उद्देश्य इन देशों को बड़े पैमाने पर हथियार भी बेचना था। लेकिन उत्तरी अफ्रीका और अरब देशों में पैदा हुई वर्तमान राजनीतिक जागरूकता आंदोलनों का अमेरिका, इज़राईल और पश्चिमी देशों को अंदाज़ा नहीं था। पिछले महीने इमाम खुमैनी की बरसी के मौके पर इस्लामी क्रांति के जनक और लीडर अयातुल्लाह खुमैनी ने कहा था कि क्षेत्र में इस्लामी जागरूकता के आंदोलन, ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरित हैं। हालांकि उन्होंने सीरिया का नाम लिये बिना कहा था कि वो विदेशियों के द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों का समर्थन नहीं करते। हिंदुस्तान में सबसे सीनियर अरब पत्रकार वायल अवाद के अनुसार सीरिया में जारी वर्तमान आंदोलन में इख्वानुल मुस्लमीन के नेतृत्व में कट्टरपंथी सल्फी सुन्नी मुसलमान शामिल हैं। इख्वानुल मुस्लमीन के द्वारा 1982 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात के कत्ल के फौरन बाद सीरिया के राषट्रपति हाफ़िज़ अलअसद ने अपने देश में इनके विरुध्द बड़ी कार्रवाई की थी। सीरिया में वर्तमान लोकतांत्रिक आंदोलन को इख्वानुल मुस्लमीन अपने पक्ष में बदल करके देश में सल्फी विचारधारा को मानने वाली सरकार को स्थापित करना चाहती है। वायल अवाद के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने हालात को समझे बिना इसका समर्थन करना शुरु कर दिया। उनके अनुसार पश्चिमी ताकतों के इशारे पर सऊदी अरब के लोग भी दमिश्क में ईरान को समर्थन देने वाली सरकार को समाप्त करने की कोशिश में लगे हैं। इसके प्रमाण के रूप में सऊदी अरब के अलसफा और वेसालटीवी चैनलों के कार्यक्रम का जायज़ा लिया जा सकता है। शेख अदनान आयरूर इन टीवी चैनलों पर अक्सर ये कहते हुए सुनाई देते हैं किअल्लाह की बादशाहत कायम करने के लिए हलब(सीरिया का एक शहर) में एक लाख लोगों को मरने दो, और उनका गोश्त कुत्तों को खाने दो। ये बयान यू-ट्यूब पर देखा जा सकता है। वायल अवाद का सम्बंध सीरिया से है और वो पिछले बीस वर्षों से दुबई के अलअरबिया चैनल के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने इस  क्षेत्र की कई जंगों की रिपोर्टिंग की है। सीरिया में एक अहम घटना में 18 मार्च को जार्डन के नज़दीकी शहर दरआ में अलउमरी मस्जिद में जुमा की नामज़ के बाद हुए सरकार विरोधी प्रदर्शन के दौरान, जो नारे लगाये गये, वो पश्चिमी देशों के शामिल होने के स्पष्ट प्रमाण थे। एक नारा ये था कि वो न ईरान और न हिज़बुल्लाह चाहते हैं बल्कि ऐसे मुसलमान चाहते हैं जो अल्लाह से डरे। यही नारा 6 हफ्तो के बाद जब्र अलशग़ूर शहर में सुना गया। सीरिया की सरकार ने दावा किया था कि दरआ में जार्डन से भेजे गये सशस्त्र लोगों के द्वारा हालात खराब किये गये हैं, जो कि इख्वानुल मुस्लमीन का केंद्र है। जार्डन की न्यूज़ एजेंसी ने भी दरआ के लिए जाने वाले गैर कानूनी हथियार ज़ब्त करने की खबर दी थी, लेकिन किसी भी विदेशी मीडिया ने इसकी जांच नहीं की। 3 जून को सीरिया के उत्तरी शहर जब्र अलशग़ूर (जो तुर्की की सीमा के करीब है,) में भी एक नामालूम सशस्त्र व्यक्ति के जनता के प्रदर्शन में शामिल होने से माहौल खराब हो गया। इस घटना में 120 पुलिस और फौजी मारे गये। बीबीसी और सीएनएन और क्षेत्र में अमेरिकी समर्थक अलजज़ीरा चैनल ने शरणार्थियों और इस क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्त्ताओं के हवाले से खबर दी कि बाग़ी पुलिस के जनता से मिल जाने से पैदा तनाव के कारण ये मौतें हुईं हैं। सीरिया में अब तक कई सशस्त्र विदेशियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इन पर आरोप है कि ये देश में जारी लोकतांत्रिक आंदोलनों का रुख बदल कर सल्फी कट्टरपंथी सरकार की स्थापना के आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। सीरिया की घटना में अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से विरोधियों के समर्थन का मामला पिछले दिनों उस समय सामने आ गया जब दमिश्क में अमेरिका के दूत राबर्ट फोर्ड और फ्रांस के दूत ऐरिक शेवेलियर ने सरकार विरोधियों के उत्साहवर्धन के लिए उत्तरी शहर हामा का दौरा किया था। सीरिया की सरकार ने इसे राजदूतों से सम्बंधित सिध्दांतों के खिलाफ बताते हुए  दौरे को गैरकानूनी कहा था। दमिश्क में जनता ने भी अमेरिका और फ्रांस के दूतावास के सामने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के विरुध्द प्रदर्शन किया। सीरिया के इस आरोप और जनता के प्रदर्शन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि राष्ट्रपति बशर अलअसद ने सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है। इससे पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने सीरिया की सरकार के खिलाफ कई बयान दिये थे। दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका और पश्चिमी देश बहरीन में अलखलीफा सरकार के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए बहरीनी और सऊदी फौजों के द्वारा किया जा रहे कत्ले आम पर खामोश तमाशाई बने हुए हैं, जबकि सीरिया में उनके राजदूत सरकार विरोधियों का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका और सऊदी अरब यमन में भी अली अब्दुल्लाह सालेह की सरकार को बचाये रखने की अब तक कोशिश कर रहे हैं, जबकि वो ज़ख्मी हालत में सऊदी अरब में इलाज करा रहे हैं। 12 जुलाई को सीरिया के उत्तरी प्रांत अलहसाका में मुफ्तीये आज़म बदरुद्दीन हासून ने कहा कि सीरिया की जनता, दुश्मनों की साज़िशों के सबसे बुरे समय से जागरूकता और राष्ट्रीय एकता के बल पर गुज़रने में कामयाब हो गयी है। उन्होंने कहा कि देश के आंतरिक मामलों पर नियंत्रण पा लिया गया है। 12 जुलाई को दमिश्क में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के अंत में जो प्रस्ताव पारित हुए, उनमें देश में जारी हिंसा खत्म करने के लिए बातचीत जारी रखने पर सहमति हुई है। प्रस्ताव के अनुसार देश में राजनीतिक सुधार के लिए स्थायित्व ज़रूरी है। राष्ट्रीय सेमिनार में देश में किसी भी प्रकार की हिंसा से बचने के लिए कहा गया है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी पार्टियों को राजनीतिक सुधार की प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल रखने पर ज़ोर दिया गया है। हाल ही में कई अरब देशों में किये गये सर्वे के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की प्रसिध्दि में दो वर्ष पूर्व काहिरा में दिये गये भाषण के बाद अब आश्चर्यजनक रूप से कमी आयी है। अरब जनता क्षेत्र में शांति स्थापित करने में अमेरिकी हस्तक्षेप को एक बड़ी रुकावट मानती है। ये सर्वे पिछले एक माह के दौरान मिस्र, लेबनान, जार्डन, सऊदी अरब, युनाइटेड अरब अमीरात, मोरक्को में किया गया था। मेरा विश्लेषण है कि सीरिया में राजनीतिक सुधार, लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना और स्वतंत्र विदेश नीति जनता की आशा के अनुसार ही होंगें। क्षेत्र में अमेरिका, इज़राईल, पश्चिमी देश और सऊदी अरब के कट्टरपंथ से नफरत की वजह से सीरिया की आजादी पसंद जनता ने इनका बायकाट कर दिया है। ऐसे में दुनिया की सरकारों और अवाम को चाहिए कि उत्तरी अफ्रीका और अरब देशो में हो रही घटनाओं के दौरान जनता की इच्छाओं का आदर करें और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से परहेज़ करें।

(उर्दू से हिंदी अनुवाद-समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

URL: https://newageislam.com/hindi-section/the-reality-syrian-revolution-/d/5217


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