मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
3 सितंबर, 2011
(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
मोहम्मद यूनुस, सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैय्यद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यू.एस.ए. 2009
लेख के बाद के हिस्से में पुराने इस्लामी कानून के ज़रिये रोज़ा, पांचों वक्त की नमाज मस्जिद में अदा करने, औरतों को अपने पूरे जिस्म को ढँकने, और चाँद शारीरिक रूप से मौजूद होकर देखने वगैरह पर इसरार आज तेजी से दुनिया में मुसलमानों के बहुमत पर वास्तव में बोझ डालने वाला और ऐतिहासिक संदर्भ में गलत ज़मानी वाला बन रहा है। इसके अलावा, इस्लाम के उन रसूम व रिवाज और अलामती पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने से ये इस्लाम को एक ऐसे पंथ में तब्दील कर रहा है जिसे आज तेजी से अलग थलग और हाशिए पर ले जाया जा रहा है और इससे नफरत की जा रही है, जबकि इस 'शानदार धर्म ने अपनी प्रारंभिक शताब्दियों में, दुनिया में ज़बरदस्त कामयाबियाँ हासिल की थी और यहाँ तक कि अपने दुश्मनों से भी तारीफ़ें हासिल की थी। ये मुसलमानों को एक ऐसे इलाकें में ले जा रहा है जहाँ रसूम और रिवाज और अलामतों का गलबा है और ये मुसलमानों को बाकी दुनिया से बेगाना बना रहा है।
समस्या मुस्लिम विद्वानों के साथ है। वो कट्टरपंथियों और उलेमा को इस्लाम में रसूम और रिवाज और अलामतों को खत्म करने के लिए कहते हैं और ये जाने बग़ैर कि वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि वो उसके निर्माता और अकेले संरक्षक है और धार्मिक मामलों से फायदा उठाने वाले हैं। अगर वो सुधार चाहते हैं तो उन्हें रूढ़िवादियों और उलेमा को उनके ही अंदाज में चुनौती देनी होगी और उन्हें कुरान का गहराई से अध्ययन करना होगा। तब उन्हें एहसास होगा कि रस्मों औऱ अलामतों के लिए सीमित स्थान है और ये कई सामाजिक, नैतिक और वैश्विक उदाहरणों को स्पष्ट करेगा जो उन्हें 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।
लेखक की चिंता की कद्रदानी के साथ मैं लेख में बिना किसी संदर्भ और सोचे समझे बिना दिए गए बयान पर निम्नलिखित टिप्पणी देने के लिए मजबूर हुआ हूं, जो धर्म में उलझन का कारण बनेगा और आने वाली पीढ़ियों में भी उलझन पैदा करेगा और इस्लाम का खौफ फैलाने वालों को मजबूती प्रदान करेगा।
1. "हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने पैरोकारों को, विशेष रूप से खानाबदोश (घुमंतू) अरब क़बीलों को सिखाया है कि वो किस तरह ईमान के पांच सुतूनों पर बेहतर तरीके से अमल कर सकते हैं ..."
मेरा कमेण्ट
(1) इसकी मंशा नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के किरदार को कम करने की है। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम तमाम इंसानियत और हर एक ज़माने के लिए सबको गले लगाने वाला पैग़ाम कुरान लेकर आए जिसकी गुंजाइश ईमान के सुतूनों की हद से बाहर निकल जाने की रही है। इस तरह मिसाल के तौर पर, कुरान आमाले सालेहा, इंसाफ, मुंसिफाना कारोबार के तरीकों, दौलत का ज़रूरतमंदों के साथ शिराकत अपने रिश्तेदार और वो लोग जिनके साथ हमारे मामले हैं, उनके प्रति हमारी सामाजिक जिम्मेदारी (इनमें मुलाज़िम शामिल हैं), अच्छे अंतर विश्वास संबंध, सहिष्णुता, शऊर का इस्तेमाल, हलाल सरगर्मियों में और भी बेहतर करने की कोशिश, महिलाओं को सक्षम बनाने, गुलामी के अंत पर बहुत जोर देता है।
(2) नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का वाहिद काम पैग़ाम को (5:99, 7:158, 13:40 42:48) वज़ाहत के साथ (5:92, 16:82 24:54) पहुँचाना था। कुरान हर ज़माने के मुसलमानों से आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आदर्श नैतिक आचरण और व्यवहार (30:21) का पालन करने को कहता है जिसकी कुरानी झलक आपके मिशन में पाई जाती है। लेकिन आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को ‘खानाबदोश (घुमंतू) अरब कबीलों’ के उस्ताद के तैर पर पेश करना, इस्लामी शिक्षाओं की तारीखी हद (ऐतिहासिक सीमा) को निर्धारित करता है और कुरान के आलमगीरियत (वैश्वीकरण) को कमजोर करता है।
(3) ये अपने पैरोकारों की व्यक्तिगत विशेषताओं और साख को कमजोर करता है। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु, उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु, उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु, उमरो बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु, अदब अल्लाह इब्ने अबू राबिआ रज़ियल्लाहु अन्हु के जैसे लोग जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के करीबी सहाबा थे, वो खानाबदोश (घुमंतू) नहीं थे। इसके अलावा, नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकारों में ऐसे लोग थे जो बाद में गवर्नर, व्यवस्थापक और तेजी से बढ़ रहे इस्लामी साम्राज्य के खुल्फा बन गए, और वो भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की वफात के सौ सालों के अंदर ही, इसकी हदें अटलांटिक महासागर (स्पेन) के किनारे से प्रशांत महासागर (चीन) तक फैल गई और अलग धर्म और संस्कृतियों, जिनसे इनका सामना हुआ, इससे अनगिनत लोग इस्लाम में दाखिल हो गये। कोई भी जिसे कुरान का बुनियादी इल्म है वो जानता है कि कुरान ने कई खानाबदोश (घुमंतू) अरबों के ईमान में कमजोरी (48:11) और कुछ को नेफाक़ में शदीद (9:95-97) बताया है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकारों की वज़ाहत खानाबदोश (घुमंतू) कबीलों के तौर पर करना कुरानी पैग़ाम और इतिहास दोनों में बिगाड़ पैदा करना है।
2. इस्लाम के ज़्यादातर बड़े अमलियात हकीकत में में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कायम किए थे और बाद में इसमें तौसी (विस्तार) इमाम हज़रत अबु हनीफा जैसे विभिन्न इस्लामी विद्वानों (इमामों) ने किया था।
मेरा कमेण्ट
(1) ये बयान इस्लाम को कुछ अमलियात तक महदूद करता है और आगे ले जाने वाले सामाजिक और नैतिक सुधार और आलमगीरी मिसालों को गुमनाम बनाता है। इबादत के पारंपरिक अर्थों में इस्लाम एक खुदा/खुदाओं की इबादत या कुछ अमल और रसूमात के एक सेट के ज़रिए संतों के सम्मान का धर्म नहीं है। इस्लाम एक धर्म, या एक जीवन शैली है जो सबको गले लगाने के संदेश के बाद मिसाली (आदर्श) बना।
(2) ये पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को अहम अमलियात के मेमार (निर्माता) के तौर पर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के किरदार को बढ़ा चढ़ा कर पेश करता है और इस तकरार के साथ एक ऐतिहासिक आयाम जोड़ता है कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जो अमलियात कायम किए उसमें बाद के इमामों ने तैसी (विस्तार) किया। जैसा कि कुरान गवाही देता है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का काम सिर्फ खुदा के पैगाम को पहुंचाना था जो वही की शक्ल में नाज़िल हुआ था। वही में नमाज़ की हालत के विभिन्न प्रारूप, वुज़ू करने के तरीके, मनासिके सफरे हज और रोज़े का हवाला दिया गया है। सिर्फ वो जिनको ये लगता है कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कुरान के (नऊज़ो बिल्लाह) लेखक हैं वही ऊपर दिया गया बयान दे सकते हैं। कोई भी मुसलमान जान बूझकर उपरोक्त बयान कभी नहीं दे सकता है।
3. "हमें ये बताया गया है कि रोज़े रखने से हमें एक भूखे शख्स के कष्ट का अहसास होता है"।
मेरा कमेण्ट
कुरान ऐसा कभी नहीं कहता है। जहां तक क़ुरानी पैग़ाम का संबंध है तो ये तक़वा हासिल करने के एक ज़रिये के तौर पर रोज़ा रखने का हुक्म देता है अपने नफ्स पर काबू पाना और अपने ज़मीर की जानिब मोतवज्जह होने को पैदा करना है (2 : 183, 2:187)। इसके लिए किसी जुर्माना या सज़ा का प्रावधान नहीं है और जो न रख सके कम से कम एक गरीब को खाना खिला कर उसे छोड़ सकता है (2:183)। रोज़ा को खुदा का इबादत के एक तरीका के तौर पर बताया गया है जिसमें हिदायत के लिए खुदा का शुक्र अदा किया जाता है (2:185)। क़ुरान ये भी ऐलान करता है कि खुदा लोगों के लिए आसानी चाहता है और लोगों के लिए कष्ट नहीं चाहता है (2:185 ), और इसलिए रोज़े की नाईयत पर इंहेसार करते हुए जो लोग इसे बहुत सख्त पायें वो तय कर सकते हैं कि रोज़ा रखें या नहीं- हालांकि क़ुरआन कहता है कि रोज़ा रखना बेहतर है (2:183)। इस तरह लेखक का हवाले के तौर पर दिया गया बयान गुमराह करने वाला है।
मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब ‘इस्लाम का असल पैग़ाम’ को आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।
Related article: Need to Modify Various Islamic Rituals & Practices
URL for English article: https://newageislam.com/islam-spiritualism/muhammad-yunus-responds-m.-husain/d/5429
URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/need-amendments-islamic-rituals-/d/7261
URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/muhammad-yunus-responds-m.-husain/d/7277