सुल्तान शाहीन अपनी वेबसाइट न्युऐज इस्लाम डाट काम(www.newageislam.com) के माध्यम से मुस्लिम कट्टरपंथ से लोहा ले रहे हैं। मोहम्मद वजीहुद्दीन, दि टाइम्स आफ इण्डिया, मुम्बई पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज इलाके के एक छोटे से कमरे में एक शख्स अपना ज़्यादातर वक्त कम्प्युटर मानीटर के सामने गुज़ारता है। अपने इस जुनून के मामले में वो लाखों लोगों की तरह हैं लेकिन सुल्तान शाहीन यूँ ही सिर्फ वेब के आदी नही हैं।अपनी वेबसाइट न्युऐज इस्लाम डाट काम (www.newageislam.com) पर सर्फिंग करने और अपनी वेबसाइट पर कुछ लेख लगातार पोस्ट करते रहने का एक मकसद है इस्लाम को जेहादियों और पेट्रोडालर की मदद पाने वाले सलफियों-वहाबियों के चंगुल से छुड़ाना है । शाहीन वेबसाईट के निडर सिपाही है, जो अत्याचारी तालिबान और उनसे हमदर्दी रखने वालों के साथ ही साथ ऐसे लोगों के खिलाफ वैचारिक स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं जिनका मानना है कि इस्लाम ही एकमात्र मार्ग है जो स्वर्ग को ले जाता है, ।वो ऐलान करते हैं कि उनकी लड़ाई पेट्रोडालर इस्लाम के विरुध्द है।“मैं एक ऐसे फोरम का निर्माण कर रहा हूँ जो हमें दूसरे धर्मों के वजूद को मानने के साथ ही सबको साथ लेकर चलने वाले इस्लाम से रुबरु करायेगा”। और वो ये भी कहते हैं कि इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है।“कुरान कहती है कि ये(इस्लाम)पहले के धर्मों की पुनरावृत्ति है और उन्हें फिर से वैध बनाता है। अपने अध्ययन कक्ष में वो ये बातें दावे के साथ कहते हैं । कट्टरपंथियों द्वारा बहिष्कृत किये जाने के कारण सुल्तान शाहीन को कई अनुयायी भी मिल गये हैं। न्युऐज इस्लाम डाट काम के 60 वर्षीय संपादक का दावा है कि स्थापना के केवल दो बरसों में ही वेबसाइट के रजिस्टर्ड सब्सक्राइबर (सब्सक्रिप्शन मुफ्त है) की संख्या 1,17,000 तक पहुँच गयी है।पांच सहयोगियों की मदद से तैयार किया जा रहे इनके न्यूज़लेटर ने ऐसे मुद्दों और शख्सियतों पर बहस की शुरुआत की है जिन पर शायद ही कभी मस्जिद जाने वाले और मज़हबी नज़र आने वाले मुसलमानों ने बहस की हो। न्युऐज इस्लाम डाट काम ने टीवी पर नजर आने वाले मुम्बई के डा.ज़ाकिर नायक की भी खिंचाई की है, लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं की है क्योंकि वो कथित तौर पर अमीर सऊदी शेखों के द्वारा मदद पाते हैं बल्कि वो अन्य सभी धर्मों को निकृष्ट साबित करने के साथ ही इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करने की कोशिश करते हैं। 20 वीं सदी के एक भारतीय विद्वान और उर्दू पत्रिका-निगार के संपादक नियाज़ फतेहपुरी,इस्लामी सिद्धांतों की तर्कसंगत और सरल व्याख्या की वजह से वेबसाइट पर बहुत पसंद किये जाने वाले व्यक्ति बन गये हैं।वेबसाइट उर्दू प्रेस पर भी नज़र रखती है जिनमें पाकिस्तान के उर्दू दैनिक भी शामिल हैं,इनमें प्रकाशित तर्कसंगत विचारों को उर्दू के मूल रुप के साथ ही अंग्रेज़ी में भी वेबसाइट पर स्थान दिया जाता है। सुल्तान शाहीन के मुताबिक वेबसाइट पर मिलने वाली प्रतिक्रिया हैरान कर देने वाली है ।जब मैंने वेबसाइट की शुरुआत की थी तब मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था कि ये इतनी दिलचस्पी पैदा करेगी,ख़ास तौर से आस्ट्रेलिया से लेकर अबु धाबी और कनाडा से लेकर कोयम्बटूर के नौजवान मुसलमानों में। 1970 के दशक में रुढ़िवादी जमाते इस्लामी के मुखपत्र साप्ताहिक रेडियंस से अपने पत्रकारिता के कैरियर की शुरुआत की,जो उन दिनों पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान की गलियों से प्रकाशित होता था। एक मौलवी के बेटे, सुल्तान शाहीन बिहार में औरंगाबाद ज़िले के एक गांव में पले, और उन्हें कई रातें अब भी याद हैं जब उन्हें अपने पांच भाई बहनों के साथ भूखे सोना पड़ा था,क्योंकि उनके पिता बीमार हो गये थे ,बाद में जिनका इंतेक़ाल भी हो गया।ऐसे में परिवार की ज़िम्मेदारी शाहीन के युवा कंधों पर आ गयी।पटना में एक कालेज में पढ़ाई के दौरान शाहीन ने कई स्थानीय उर्दू दैनिकों के लिए पार्ट टाइम(अंशकालिक) काम किया।बाद में शाहीन हिंदोस्तानी मूल के आरिफ अली के साप्ताहिक अखबार एशिया टाइम्स के संपादक के तौर पर लंदन चले गये।शाहीन का कहना है कि एक दशक या उससे कुछ अधिक समय तक इंग्लैण्ड में रहने के दौरान बहुत कुछ सीखने को मिला,क्योंकि मुझे यहां इस्लाम और मुसलमानों के अलग अलग फ़िरक़ों के बारे में जानने का मौका मिला। जैसे नाटिंघम में एक दोस्त के घर पर एक 20 साल के मुसलमान लड़के को अहले हदीस की तारीफ़ करते सुना,ये तब्क़ा (संप्रदाय) कट्टर इस्लाम की वकालत करता है ।शाहीन ने उस लड़के से पूछा कि उन मुसलमानों के बारे में क्या राय है जो अहले हदीस तब्क़े पर विश्वास नही रखते है ।उस युवक ने कहा कि उनका क़त्ल कर देना चाहिए।लड़के के इस जवाब ने मुझे बेहद परेशान कर दिया।इस युवक का संबंध अल मुहाजरुन और हिज़बुत तहरीर जैसे कट्टरपंथी संगठनों से था।भड़काने वाले वक्ता ओमर बकरी ने वहां के हज़ारों मुस्लिम युवकों का ब्रेनवाश किया था और किसी संत की तरह ही उसके समर्थक भी उसका सम्मान करते थे। शाहीन को यह लग रहा था कि इस्लामी कट्टरपंथ की इस आग को भारतीय महाद्वीप तक पहँचने में ज़्यादा वक्त नही लगेगा और ये आग हमारे नौजवानों को भी निगल लेगी। लंदन में नौकरी छोड़ जब शाहीन 1990 के दशक में दिल्ली में एक पत्रिका संपादित करने के लिए भारत वापस आए तब उन्हें यहां भी उस कट्टरपंथ वहाबीवाद के बदसूरत चेहरे का सामना करना पड़ा। हालांकि ये पत्रिका प्रभावशाली,शिक्षित,और पढ़े लिखे मुसलमानों के एक समूह द्वारा चलायी जा रही थी। शाहीन ने पत्रिका के संपादन का काम कुछ महीने पहले ही संभाला था कि प्रबंधक मंडल के एक सदस्य ने एक दिन पूछा कि तुम ने एक दशक पहले एक हिंदू लड़की (प्रज्ञा) से शादी की थी, तुमने उसे अभी तक मुसलमान क्यों नहीं बनाया। सुल्तान शाहीन ने कुरान की एक आयत ला-इकराहा फिद्दीन का ज़िक्र करते हुए कहा कि मज़हब में कोई जब्र(ज़बरदस्ती) नहीं है।इस्लाम धर्म स्वीकार करना या न करना उसका अपना निजी मामला है ।शाहीन का कहना है कि बात इतनी सी थी और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया । उन्हें सबसे बड़ा सदमा इस बात का लगा कि जिन लोगों ने उनके साथ ये व्यवहार किया वो भारतीय मुस्लिम समुदाय का सबसे बेहतरीन और पढ़ा लिखा माना जाता है । नौकरी जाने के बाद शाहीन स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगे। अपने लेखों में उन्होंने कट्टरपंथी मानसिकता का खुलकरविरोध किया, जिससे कई संस्कृतियों के संगम वाले भारतीय समाज और भारतीय इस्लाम को ख़तरा है। इस्लामी सिध्दांतो की उदार और तर्कसंगत वकालत की वजह से उन्होंने कई इस्लामवादियों को नाराज़ किया ,जो वेबसाइट की स्थापना के बाद से , अक्सर वेबसाइट को हैक करते हैं साथ ही अपमानजनक पत्र और जवाब पोस्ट करते हैं।इनमें से कई उन्हें नरक की आग का खौफ़ दिखाते हैं। शुरुआत में मैंने वेबसाइट को बगैर मानीटर के रखा था,क्योंकि मैं स्वतंत्र और स्पष्ट संवाद करना चाहता था,लेकिन अब हम वेबसाइट को मानीटर करते हैं । शाहीन चार बच्चों के पिता हैं। शाहीन की धर्मों के गहरे अध्ययन विशेष रूप से इस्लाम के बाद इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि आदम, मूसा और मोहम्मद की तरह राम और कृष्ण भी उनके लिए पैगंबर हैं और अगर हम मोहम्मद को हज़रत मोहम्मद पुकारते हैं तो राम को मुझे हज़रत राम कहने में कोई परहेज़ नहीं है। उदार और सबको साथ लेकर चलने वाले इस्लाम के इस चैंपियन से अलविदा लेते समय हमें भारत के उदार धर्मनिरपेक्षता पर गर्व होता है। कौन सा इस्लामी देश है जो शाहीन को बर्दाश्त करेगा ? इसे सलमान रुश्दी या तसलीमा नसरीन से ज़्यादा बेहतर कौन समझ सकता है। (अनुवादक- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम) |
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