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Hindi Section (21 Aug 2012 NewAgeIslam.Com)



मुसलमान क्यों ईसाई धर्म स्वीकार कर रहे हैं, एक आत्मविश्लेषण!

 

मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम

सह लेखक (अशफाक अल्लाह सैयद के साथ), इस्लाम का असल पैग़ाम, आमना पब्लिकेशन, यूएसए 2009

(अंग्रेजी से अनुवाद - समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

इस विषय पर इस वेबसाइट पर हाल ही में पोस्ट किए गए एक लेख के जवाब में,

http://newageislam.com/muslims-and-islamophobia/by-shakeel-rasheed,-tr.-new-age-islam/muslims-need-to-reflect-why-so-many-millions-of-us-are-leaving-islam-for-christianity-or-simply-calling-ourselves-ex-muslim/d/8089

जनसांख्यिकीय अध्ययन से पता चलता है कि पिछली एक शताब्दी में अफ्रीका में बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया है- ये एक रुझान है जिसने हाल के दिनों में रफ्तार हासिल की है। इसे आर्थिक, सैनिक और अशिक्षा के कारकों से जोड़ा जा सकता है, जैसा कि हवाले के रूप में दिए गए लेख में शानदार तरीके से इस्लामी विद्वान और विचारक मंज़ूरुल हक़ ने अपनी ज्ञानात्मक टिप्पणी में वकालत की है, जो सबसे ज़्यादा खतरनाक है वो है मुसलमानों के बीच गैर मुस्लिमों की मौजूदगी- अंदर के लोग जो अपने विश्वास का स्वयं मजाक उड़ाते हैं और मौका मिलने पर अपने धर्म को बदल लेते हैं, साथ ही साथ वो लोग जो लगातार बहुत मामूली धार्मिक मसलों में उलझे रहते हैं और इस्लाम को सातवीं शताब्दी के अरब में बनाए रखना चाहते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस्लाम को अलविदा कहना एक नया रुझान है और ये इसकी बिगड़ी हुई स्थिति का चित्रण है। ये इसे 21 वीं सदी के शिक्षित और यहाँ तक कि अनपढ़ लोगों का समर्थन करने के अयोग्य बनाता है। वो लोग जो इसकी वजह नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मोहब्बत या धर्म के प्रति जिम्मेदारी में कमी को बताते हैं ये समझने में असमर्थ हैं कि वो जो कुछ कह रहे हैं वो इस्लाम के बिगाड़ का परिणाम है। जब तक इस्लाम को नया जन्म नहीं दिया जाएगा, तब तक लोगों में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मोहब्बत और अपने ईमान का सम्मान पैदा नहीं होगा और लोग इस आस्था को छोड़ कर जाएंगे। ये लेख इस विनाशकारी रुझान (प्रवृत्ति) के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने की एक कोशिश है, कहीं ऐसा न हो कि इसका गलत मूल्यांकन विश्व स्तर पर मुसलमानों के लिए नुक्सानदेह साबित हो।

1. इस्लाम को प्राचीन शरीयत कानून से जोड़कर देखा जाता है जो एक ऐसा धर्म है जो अन्य बातों के अलावा व्याभिचार के लिए रजम की सज़ा (पत्थरों से मार मार कर मौत की सज़ा), इर्तेदाद (स्वधर्म त्याग) और तौहीने (अपमान) रिसालत के लिए मौत की सज़ा, समलैंगिकों के लिए सज़ा, गुलामी, गैर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव और नफरत, दुनिया को जनसांख्यिकी आधार पर मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में विभाजित करना, ज्ञान का इस्लामी और गैर-इस्लामी में विभाजन करना, अस्थायी शादी, मौके पर ही तलाक, बलात्कार का कानून, सम्मान (आनर किलिंग) के नाम पर हत्या, महिलाओं का पूरा पर्दा, सकल रूप से लैंगिक असमानता, बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के खिलाफ अभिभावकों को माफी आदि, जो आधुनिक सभ्यता के जितने विरोधी हैं इतने ही कुरान के संदेश से मतभेद रखते हैं [1]।

2. वर्तमान समय की इस्लामी संस्कृति ने हदीस के संग्रह का पूरी तरह सम्मान करना और उन्हें बरकरार रखना जारी रखा हुआ है जिसमें से "कुछ विवरण बहुत अजीब और कामुकता के लिए उकसाने वाले, आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले, अंतरधार्मिक नफरत को बढ़ावा देने वाले, कट्टरता से महिला विरोधी, वैज्ञानिक दृष्टि से जिसका समर्थन न किया जा सके, खुद में ही परस्पर विरोधी और कुरान से मेल नहीं रखने वाले हैं"[2]।

3. इस्लामी स्रोतों (हदीस और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की जीवनी) पर निर्भर करते हुए पश्चिम देशों के विद्वानों ने ऐसी बर्बर सज़ाओं जैसे अंगों को काट लेना, आंखं निकाल लेना, ज़बान, नाक, कान, उंगलियां, हाथ, पैर, अण्डकोष काट लेना और न केवल चाकू से बल्कि ऐसे उपकरणों से आंते निकाल लेना जिन्हें पहले आग पर गर्म कर लाल किया जाता है"[3] इन विद्वानों ने इसको सही साबित किया है।

4. साहित्यिक शैली, स्थापना, मिसालें और हदीस साहित्य मध्यकाल के प्रारंभ काल से संबंध रखते हैं "इनका लगातार पारंपरिक धार्मिक स्कूलों (मदरसों) में शिक्षण और प्रचार प्रसार छात्रों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, जो उनकी तर्क शक्ति को प्रभावित कर सकता है और व्यावहारिक रूप से उनकी बुद्धि को मध्यकाल के प्रारंभ काल में ही स्थिर रख सकता है [4]।

5. पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को ऐलानिया और व्यंगातमक रूप से बुरा भला कहा गया है। प्रतिक्रियावादी विद्वानों ने हदीस और रसूलल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की प्रारंभिक जीवनी से इन तत्वों को जोड़कर चुना है जो हमारे पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को ऐसे इंसान के तौर पर पेश करती हैं (नऊज़ो बिल्लाह) जिन्होंने कैदियों का नरसंहार किया, काफिलों को लूटा, महिलाओं और बच्चों को गुलामी के लिए बेच दिया, महिला कैदियों के साथ यौन संबंध स्थापित किए, कैदियों को हिंसा  का निशाना बनाया, 9 साल की लड़की से शादी की, अपने गोद लिए बेटे को मजबूर किया कि वो अपनी पत्नी को तलाक दे ताकि मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम उसे अपनी पत्नी के रूप में रख सकें (वो कथित तौर पर बहुत सुंदर थी), गैरमुसलमानों के खिलाफ युद्ध का आदेश दिया और उन्होंने अपने कुछ आलोचकों और प्रतिद्वंदियों को कत्ल किया था [5]।

6. जैसा कि अल्लामा इकबाल कहते हैं, '' मशरिक में उसूले दीन बन जाते हैं- मग़रिब में मगर मशीन बन जाते हैं[6]। उनका जो स्पष्ट रूप से मतलब था जो आज भी सही है कि मुस्लिम दुनिया में जोर 'समस्या 'या धर्म के सिद्धांतों पर है और उसके ज्ञानी लोगों का एक बड़ा हिस्सा लगातार धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या और पुनर्व्याख्या कर रहा है। ये एक ऐसी मेहनत है जिससे मानव सभ्यता के विकास में एक मिमी की भी उन्नति नहीं होती है, जो कि कहने के लिए दूसरे शब्दों में किलोमीटर की गति से उन्नति कर रही है।

7. ईमान के बुनियादी स्तम्भों के प्रति इनकी जुनूनी और विशिष्ट आस्था कुरान के सामाजिक और नैतिक मिसालों की समझ को गूढ़ बनाता है और ये उनके अनुसंधान और महान कामों पर ग्रहण लगाता है उसकी उत्कृष्ठता पर पाबंदी लगाना, बुद्धि, फुकहा और इज्तेहाद के खिलाफ उसकी समझ में रुकावट पैदा करता है। इस तरह समय के गुजरने के साथ ही इन लोगों ने इस्लामी बौद्धिक विरासत और प्रबोधन की आत्मा को खो दिया है, जो इतिहास के संगम के द्वारा जिसे पश्चिम के ईसाईयों के रूप में रास्ता मिल गया है। अल्लामा इकबाल का हवाला फिर यहां पेश है [7]।

"उठाए कुछ वरक़ लालए ने, कुछ नर्गिस ने, कुछ गुल ने- चमन में हर तरफ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी । उड़ा ली क़ुमरियों ने, तूतियों ने, अंदलीबों ने- चमन वालों ने मिलकर लूट ली तर्ज़े फुगाँ मेरी"।।

8. उपरोक्त (ऊपर 7) के निष्कर्ष के तौर पर, शिक्षा और व्यावसायिक क्षेत्रों, सांस्कृतिक क्षेत्रों, बाइज़्ज़त और हलाल रोज़गार के अवसरों में व्यावहारिक रूप से इन सभी देशों में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक के रूप में हैं और साथ ही साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की भागीदारी बहुत कम है।

9. मुसलमान अवैध रूप से खुद को एक विशेष समुदाय और खुद को बाकी के लोगों से अलग के तौर पर पेश करने की ज़िद पर हैं। कुरान के वैश्विक संदेश के विपरीत ये एक अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी सांस्कृतिक बस्ती का गठन करते हैं। और ईमान के स्तम्भों के साथ इनकी विशेष आस्था व्वहारिक रूप से इस्लाम को ईमान के पाँच स्तंभों के एक पंथ में परिवर्तित कर रहा है [8]।

10. अपनी विशिष्टता का औचित्य पेश करने के लिए मुसलमानों ने हाल के दशकों में खुदा के लिए वैश्विक स्तर पर अरबी भाषा के प्रतीक (अल्लाह) को मानदंड बना दिया है, जो कुरान के बयान का गंभीर उल्लंघन है, क्योंकि खुदा का नाम नियमित रूप से (विभिन्न भाषाओं में, 30:22) खानकाहों, चर्चों, यहूदियों के पूजा स्थलों और मस्जिदों में लिया जाता है (22:40), और सभी सुंदर नाम खुदा से संबंध रखते हैं (59:24)। ये लोग मुसलमान महिलाओं के लिए मध्यकाल के नन के अंदाज़ का लिबास बना रहे हैं, ये एक ऐसा अंदाज़ है, जो मुस्लिम महिलाओं को प्राथमिक इस्लाम के ज़माने की बिना सिली हुई चादर के पर्दे की ओर ले जाएगा जिसमें महिलाएं सिर से लेकर पैर तक पूरी तरह ढँकी रहती थीं और जो कि गैर इस्लामी है। आयत 24:32 (जो आमतौर पर नज़र आता है उसे ज़ाहिर करें सिवाय शर्म गाहों के) और आयत 33:59 के ऐलान "शरीर के चारों तरफ चादर लपेटें (इस तरह) ताकि उनकी पहचान की जा सकती हो" इसके बावजूद एक महिला की पहचान के लिए उसका पूरा चेहरा (सिर, कान, और ठोड़ी भी शामिल है) को बेनकाब करने को नहीं मानते हैं।

11. विद्वानों का एक हिस्सा बहुत ही अजीब हदीसों के हवाले से बहुत बेवकूफी भरे फतवे जारी करता है जबकि इन हदीसों के प्रमाणिक होने के बारे में इसके संग्रहकर्त्ताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है, जो कि उनके संकलन में शामिल रहे हैं, क्योंकि वो उनके विश्लेषण के स्तर के अनुसार थीं (उसके साथ भेजने वाले और रावियों की एक श्रृंखला भी पेश किया था जिनका सिलसिला पीछे जाकर नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दौर से जा मिलता था) [2]। ये दुनिया की नज़रों में इस्लाम की गलत छवि पेश करता है और बहुत से प्रतिक्रियावादी और ज्ञानी मुसलमानों के विश्वास को कमजोर करता है।

12. शिक्षित या अन्य मुसलमान अपने पसंदीदा प्रचारक के बयान से अपने ईमान को समझते हैं। ये प्रचारक धर्म ज्ञान के अपने स्रोत से आसानी से अपनी विचारधारा, पृष्ठभूमि, और सांप्रदायिक, बांटने वाले और प्राथमिकता देने वाले विचारों के अनुसार कुरान के संदेश की व्याख्या करते हैं, और अपने ईमान की बुनियादी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय खुद की आस्था की महिमा बयान करने में व्यस्त रहते हैं।

13. कुरान का शाब्दिक अनुवाद जिसे मुसलमान और गैर-मुसलमान दोनों पढ़ते और जिसका हवाला देते हैं ये गंभीर रूप से इसके संदेश को क्षति पहुँचाता है, क्योंकि, (i) इसका आम अरबी शब्द 'मुसलमान' (खुदा में विश्वास रखने वाला कोई भी मोमिन) को केवल पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकार तक सीमित किया जाता है (जिन्हें आज हम मुसलमान समझते हैं), (ii) कुरान के तत्कालीन श्रोताओं (काफ़िर अरबों और अन्य वही का इन्कार करने वाले) को वर्तमान समय के गैर मुस्लिमों से बदल दिया गया है, और (iii) अपनी आयात के शोध (38:29, 47:24) के बारे में कुरान के निर्देश का बिल्कुल लिहाज़ नहीं करते और केवल निर्णायक आयात (आयते मोहकेमात) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो कि इसके संदेश की मूल आत्मा को निर्मित करती हैं (3:7) जो पाक दिल से इससे रुजू करते हैं (56:79) और इसमें बेहतरीन मानी तलाश करते हैं (39:18,39:55)।

14. नबियों के बीच विभेद न करने की क़ुरान के बार बार की याद दिलाने के बावजूद (3:84, 2:285 4:152) मुसलमान अपने नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को सभी नबियों में सबसे महान के रूप में पेश करते हैं और अन्य नबियों को अल्लाह की तरफ़ से प्रदान किए गए अनूठे आशीर्वाद को साफ तौर पर कम करके बताते हैं, इससे मुस्लिम समुदाय का ध्यान क़ुरान के पैग़ाम से हटकर पैग़म्बरों के व्यक्तित्व की तरफ जाता है।

15. इस्लाम के प्राचीन फुकहा (धर्म शास्त्री) और रुढ़िवादिता ने साथ मिलकर खुदा के संदेश- कुरान को पलट कर रख दिया। ऐतिहासिक रूप से तैयार किये गये हदीस को अप्रत्यक्ष रूप से वही के तौर पर आदर और विद्वानों और फुकहा की राय को कुरान पर विशेषाधिकार देते हैं और ये कुरान के आदेश के साथ विवादास्पद होती हैं [10]।

निष्कर्षः वर्तमान समय के इस्लाम और मुसलमानों की उपरोक्त में बताई गई सच्चाईयाँ कई बुद्धिजीवी मुसलमानों के लिए निराशाजनक हो सकती हैं जो चेतना, सखावत और महान फ़ज़ाइल ईसाई धर्म में दूसरों के मुकाबले अधिक पाते हैं और ऐसा ही उनके प्रतिबद्ध और प्रबुद्ध पादरियों की तरफ से प्रचार किया जाता है। बेशक सूची को और भी विस्तार दिया जा सकता है लेकिन ये इस्लाम से ईसाई धर्म की ओर लोगों के जाने को स्पष्ट करने के लिए काफी है। खुदा की रचनात्मक योजना में दोनों धर्म किताबों वाले हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच वैचारिक मतभेद के बावजूद ईसाई धर्म का आज जिस तरह प्रचार प्रसार किया जा रहा है वो इस्लाम के मुकाबले आज कुरान के संदेश के अधिक बेहतर प्रतिनिधि हैं। न्याय, स्वतंत्रता, समानता, नेक कार्यों, अच्छे पड़ोसी और अंतर्रधार्मिक संबंध, बुराई का जवाब भलाई से देना, सखावत, माफ करना, समुदाय के साथ धन की साझेदारी, उत्पादों और सेवाओं के लिए उचित भुगतान, जरूरत मंदों की आर्थिक सहायता, महिलाओं का सशक्तिकरण, अच्छी व्यावसायिक नैतिकता, बुद्धि का इस्तेमाल, उत्कृष्ठता के लिए प्रयास आदि जैसा कि कुरान ने समर्थन किया है, वो आज हर एक उदार ईसाई प्रचारक की ज़बान पर है।

 धार्मिक श्रेष्ठता का लगातार दावा, पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की महिमा, कुरान का वैज्ञानिक चमत्कार और ईमान के स्तंभों की विशिष्टता, जैसा कि आम मुसलमान प्रचारक करते हैं इसके मुकाबले उनका ज्ञानी श्रोताओं पर कहीं अधिक प्रभाव होता है। हम ग्लोब्लाईज़्ड दुनिया में रह रहे हैं और कार्यस्थल, कार्यालय, और पड़ोस आदि को गैर मुस्लिमों के साथ साझा करते हैं। अपने अंतिम और असम्बद्ध अंतराल में कुरान का संदेश एक दूसरे को जानने (49:13) और नेक कामों और हलाल गतिविधियों में विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ मुकाबला करने को कहता है (5:48, 49:13)। आज के मुल्ला, टीवी पर आने वाले प्रसिद्ध प्रचारक और रूढ़िवादी लोग इस्लाम के बहुलवाद पर आधारित संस्करण, महान सामाजिक और नैतिक नसीहतों और इस्लाम की स्वतंत्रत करने वाली आत्मा से इन्कार करने या उसे खत्म करने पर तुले हुए हैं और धर्म को पांच स्तंभों वाले एक पंथ में तब्दील कर रहे हैं जिसका एक अरबी ख़ुदा (अल्लाह, उपरोक्त में 10) और दुनिया के सबसे महान व्यक्ति मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इसके पैग़म्बर हैं। एक पंथ जिसकी जड़ें मध्यकाल के धार्मिक बातचीत में है और इसमें सभी अत्याचारी, शैतानी और प्राचीन अस्लाफ की निशानी है (उपरोक्त में 2, 3)।

दूसरी ओर ईसाई धर्म ने मध्यकाल की अपनी मजबूत जड़ों और पाबंदियों से खुद को सुधारवादी प्रक्रिया और धार्मिक उदार प्रक्रिया से अलग कर लिया है- दूसरी ओर इस्लाम केवल बिगाड़ की प्रक्रिया से गुजर रहा है जिसे उपरोक्त में दी गई सूची प्रदर्शित कर सकती है। तो फिर मुसलमानों को आस्था बदलने की प्रक्रिया के उलट जाने पर क्यों आश्चर्य करना चाहिए?  इस तरह जब तक इस्लाम को मध्यकाल की धार्मिक कैद और धर्म का अपहरण करने वालों के चंगुल से मुक्ति नहीं हासिल होती है [हदीस का आदर करने वाला रुढ़िवादी वर्ग और प्राचीन शरई कानून के समर्थक- उपरोक्त में 8 और 9] तब तक ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या में वृद्धि होती रहेगी, यहाँ तक कि मुत्तक़ी (परहेज़गार) मुसलमान एक दिन में पचास बार नमाज़ पढ़ने लगें या नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम (ये मान लेने के तौर पर कि नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अब हमारे साथ नहीं हैं) से अपने से अधिक मोहब्बत करने लगें।

नोट्स

1. प्राचीन इस्लामी कानून अल्लाह के अल्फाज़ नहीं हैं!

http://www.newageislam.com/hindi-section/प्राचीन-इस्लामी-कानून-अल्लाह-के-अल्फाज़-नहीं-हैं-(भाग-1)/d/6272

http://www.newageislam.com/hindi-section/प्राचीन-इस्लामी-कानून-अल्लाह-के-अल्फाज़-नहीं-हैं-(भाग-2)/d/6289

2. Defending the Hadith and its Compilers - the Great Imams who are sometimes misunderstood and even reviled

http://newageislam.com/islamic-sharia-laws/by-muhammad-yunus,-new-age-islam/defending-the-hadith-and-its-compilers-–-the-great-imams-who-are-sometimes-misunderstood-and-even-reviled/d/8011

3. बेंजामिन वाकर, फ़ाउंडेशन ऑफ इस्लाम दी मेकिंग ऑफ ए वर्ल्ड फ़ेथ, पीटर ओवेन पब्लिशर्स, यूके, पृष्ठ 316

4. मोहम्मद यूनुस और अशफाक अल्लाह सैयद, इसेंशियल मैसेज ऑफ इस्लाम, आमना पब्लिकेशन, 2009, यूएसए, पृष्ठ 342

5. अमरीकन लायर, एंड्रयू जे इस्टूनिख की 1 अप्रैल, 2010 को Amazon.com में पोस्टिंग, जान एस्पोसिटो की किताब फ़्युचर ऑफ इस्लाम के तहत

6. बाँगे दरा 'ज़रीफाना' शुरुआती हिस्सा

7. बाँग दरा 'ज़रीफाना' शुरुआती हिस्सा, तस्वीरे दर्द, शुरुआती पंक्तियाँ

8. Literalist comprehension of, and exclusivist dedication to the Pillars of Faith purports to reduce Islam to a Cult of Five Pillars.  

http://newageislam.com/islamic-ideology/muhammad-yunus,-new-age-islam/literalist-comprehension-of,-and-exclusivist-dedication-to-the-pillars-of-faith-purports-to-reduce-islam-to-a-cult-of-five-pillars/d/7771

9. आसफ ए.ए. फ़ैज़ी, आउट लाइंस ऑफ मोहम्डन लॉ, 5वां संस्करण, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली 2005 पृष्ठ 33

10. "कोई भी क़ुरानी आयत जो 'हमारे आक़ा की राय के खिलाफ जाए उसे रद्द माना जाएगा, या प्राथमिकता का कानून लागू किया जाएगा। बेहतर ये है कि आयत की इस तरह से व्याख्या की जाए जो उनकी राय के अनुसार हो" - डाक्टरिन ऑफ इज्मा इन इस्लाम, से लिया गया, अहमद हुसैन, नई दिल्ली, 1992, पृष्ठ 16

11. The Muslims’ Ignorance /Disregard of the Qur’anic Guidance and Its Colossal and Recurring Cost

http://newageislam.com/islamic-ideology/muhammad-yunus,-new-age-islam/the-muslims’-ignorance-/disregard-of-the-qur’anic-guidance-and-its-colossal-and-recurring-cost/d/7795

1 अगस्त, 2012

मोहम्मद यूनुस ने आईआईटी से केमिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की है और कार्पोरेट इक्ज़ीक्युटिव के पद से रिटायर हो चुके हैं और 90 के दशक से क़ुरान का गहराई से अध्ययन और उसके वास्तविक संदेश को समझने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी किताब इस्लाम का असल पैग़ामको साल 2000 में अलअज़हर अलशरीफ, काहिरा की मंज़ूरी प्राप्त हो गयी थी और इसे यूसीएलए के डॉ. खालिद अबुल फ़ज़ल का समर्थन भी हासिल है। मोहम्मद यूनुस की किताब इस्लाम का असल पैग़ामको आमना पब्लिकेशन मेरीलैण्ड, अमेरिका ने साल 2009 में प्रकाशित किया।

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http://www.newageislam.com/ijtihad,-rethinking-islam/why-are-the-muslims-converting-to-christianity---a-soul-searching-exercise?/d/8134

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http://www.newageislam.com/urdu-section/محمد-یونس،-نیو-ایج--اسلام/مسلمان-کیوں-عیسائیت--قبول-کر-رہے-ہیں--ایک-خود-احتسابی-مشق؟/d/8201

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TOTAL COMMENTS:-   5


  • Adopting Christianity means adopting true religion of Allah
    By Mahender Kumar - 8/19/2019 6:50:49 AM



  • Dear Ashok sharma
    Mr Rehan Nezami must be living in an Utopia where the All Muslims posses all possible highest morals.
    Dawah is tool to convert Non-Muslims by peaceful method. It is a duty for every Muslim to do Dawah. Terrorism is another method. Both are acceptable.
    A single conversion brings unlimited ecstasy to Muslims. A Muslim who does this is glorified to highest.
    Jansanghis (or others) feel annoyed  because conversion is one way only. How Muslims react if a single Muslim even thinks of the conversion.
    Marriage between Muslims and Non-Muslims is acceptable to Muslims only when Non-Muslim girl is marrying a Muslim boy not vice versa. The reasons are obvious:
    1. Muslims are superior.
    2. Making a Non-Muslim Muslim is an act of highest possible virtue.
    3. Muslim girl's faith is under threat in non-Muslim family.
    I don't endorse these views.
    I think faith is much protected in non-Muslim families. They believe mostly in Lakum Deenukum waliya deen. Do Muslim believe in this? They keep parroting in words not in practice. Actions speak louder.
    Mr Rehan must be asked what Quran says about marriage of Muslim girl to a Non-muslim boy? Leave jansanghies a side.
    What about the marriage between Syed and Jolaha, teli etc? Acceptable? Who is narrow minded Muslims or Non-Muslims.
    Is there anything in non-Muslims scriptures that a non-Muslim should not marry to a Muslim.
    If Non-Muslims are reluctant the reasons are social not religious.
    If all believers in one God come under broader notion of Deen-e-Islam proposed by Md Yunus(1), there should not be any difficulty in marrying a Muslim girl to a non-Muslim boy.
    Let us see what do our Muslim brothers say?
    By mohd yunus - 8/22/2012 10:38:12 PM



  • I would be grateful if someone could elaborate Mr. Nezami's claims on conversion of Muslims as the reports received from various countries are contrary to this. Muslims converting to other faiths are also given death sentences (wajib-ul-qatl) . Recent example from Afghanistan is there to see when a German convert of Afghanistan origin was sentenced to death. President Obama had to appeal for his release and he was smuggled out of Afghanistan secretly.
    By Ashok Sharma - 8/22/2012 7:09:44 AM



  • Mr Ashok: Your statement is vice versa concerning the pride and rejoicing upon the marriages between the Hindus and the Muslims. The Jansanghees take it seriously if a non-Muslim is converted or even marries to another religion, the Muslims leaves it upon Allah as it is a divine matter not for our concern.
    By Raihan Nezami - 8/22/2012 2:40:34 AM



  • There is no problem when non-Muslims get converted to Islam. In fact, Muslims feel proud of such conversions. Why there is so much opposition and concern if Muslims convert to other religions ? In any case, I would like to quote : Religion undoubtedly surpasses every human endeavour in sheer quantity and variety of nonsense it creates. Religion has also been an accomplice of class domination throughout history, so it is sadly little wonder that it has brought upon itself the contempt and hatred of ever increasing numbers of peoples and in particular of revolutionaries who then found their own methods of replicating class domination even in notionally classless societies. Human beings will usually find some reason to believe that if any of their fellows are in some fashion different to the local majority, then they must be punishably wrong, thus showing that diversity is the least acceptable difference of all.

    By Ashok Sharma - 8/21/2012 11:57:57 PM



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