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Hindi Section ( 18 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

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Education in Pakistan does need a revolution पाकिस्तान में तालीमी इंक़लाब की ज़रूरत है, लेकिन ये मस्जिदों, स्कूलों और मदरसों से नहीं आ सकता है


परवेज़ हूद भाई

8 फरवरी, 2012

हाल की कुछ खबरों पर पर्याप्त तवज्जोह नहीं दी गई जिस पर कई देशों में तुरंत खौफ पैदा हो गया होता। लेकिन मेमो-गेट में पागल पाकिस्तान के सैन्य या असैनिक शासक, और न ही आम तौर पर बातूनी टीवी एंकरों ने अभी तक एनुअल सेटेटस आफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) पर किसी भी तरह का रद्दे अमल नहीं दिया है। एक हफ्ते पहले सामने आई ये रिपोर्ट पाकिस्तानी स्कूलों की निंदा करती है। रिपोर्ट उजागर करती है कि किस तरह देश बच्चों को बहुत ही बुनियादी कला सिखाने में भी बुरी तरह नाकाम है। एक ऐसा मुल्क जहां नौजवानों की बड़ी संख्या है और जहां की आबादी में काबू से बाहर इज़ाफ़ा हो रहा है, इसके नतीजे डराने वाले हैं।

बड़ी मेहनत से एक पेशेवर टीम ने इस रिपोर्ट को -5,000 स्थानीय रज़ाकारों (स्वयंसेवकों) की मदद से तैयार किया है- ASER रिपोर्ट में 2599 गांवों/ ब्लाक्स, 49793 घरों और 146874 बच्चों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट तस्दीक़ करती है कि पाकिस्तानी बच्चों को किसी भी ज़बान के पढ़ने और यहाँ तक कि मामूली हिसाब के सवाल हल करने में भी दुश्वारी आती है। 5-16 साल (पाकिस्तान में स्कूल जाने वाले बच्चे) के ग्रुप के सिर्फ 40.1 फीसद दो संख्या के जोड़ (हासिल के साथ) के सवालात हल कर सकते हैं, जबकि सिर्फ 23.6 फीसद तीन संख्या वाले तक्सीम (भाग देने) के सवालात को हल करने की हालत में थे। सिर्फ 41.8 फीसद उर्दू या अपनी मादरी ज़बान (मातृ भाषा) (अंग्रेज़ी तो दूर की बात है) में एक जुमला (वाक्य) पढ़ सकते हैं। इनमें से बहुत कम कोई कहानी पढ़ सकते हैं।

ये रिपोर्ट निराश ज़रूर करती है लेकिन सदमा नहीं पहुँचाती है। लगभग 25 साल पहले, कायदे आज़म युनिवर्सिटी में मेरे साथियों ने और मैंने विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले छात्रों की बुरी तैयारी पर फिक्रमंद होकर, इसके कारण को समझने और हल तज्वीज़ करने की कोशिश की थी। तालीम के अहम पहलुओं का जायेज़ा लेने के लिए पाकिस्तान टीवी ने हमें एक तफ्सीली 13 हिस्सों वाली डाक्युमेंट्री सिरीज़ बनाने की दावत दी। कौमी सतह पर देखे जाने वाले इन प्रोग्राम्स में छात्रों और शिक्षकों ने कैमरे पर हमसे बात की, और हम लोगों ने नेसाब (पाठ्यक्रम), दरसी (पाठ्य पुस्तकों) किताबों, इतिहास और विज्ञान की शिक्षा, शिक्षकों की शिक्षा, इम्तेहानात वगैरह की विज़ुअली जांच की। आज हम ASER रिपोर्ट के आँकड़े से ये पाते हैं कि एक चौथाई सदी से भी अधिक के बाद सूरतेहाल और भी खराब है, हालात बेहतर नहीं हुए हैं। सवाल आख़िर उठता है कि ऐसा क्यों है?

करप्शन और एक खास सरकार पर इल्ज़ाम लगाना आसान है लेकिन यह गलत होगा। कई सरकारें आईं और बिना कोई खास बदलाव किए ही चली गईं। लेकिन करप्शन बड़े पैमाने पर है इसके बावजूद ये असल वजह नहीं है। उचित और अच्छे अस्पतालों को बनाने, एक कौमी एयर लाइन है जो अब भी किसी तरह उड़ान की व्यवस्था बनाए हुए है और सड़कों के बेहतर नेटवर्क को बनाने से पाकिस्तान को कभी किसी ने नहीं रोका है। दुनिया के किसी खास नुक्तए नज़र ( नज़रिया पढ़ें) की ज़रूरत सड़कों की तामीर के लिए नहीं है। लेकिन तालीम और इसके अदारों (संस्थाओं) के निर्माण का मामला अलग है।

मशहूर भौतिकी विशेषज्ञ मरे गेल मान, ने तालीम को सांस्कृतिक डीएनए (DNA) कहा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी मुंतक़िल (स्थानांतरित) होती है। मिसाल के तौर पर तालीम भी मुस्तक़बिल के समाज की तश्कील के लिए दिमाग बनाना है। ऐसे समाज में जाहिर है कि आवश्यक मेयारी इक्दार (मानक मूल्यों) का होना ज़रूरी होगा। इसलिए, दुश्वारी यहाँ पर हैः आधुनिक समय के लिए ज़रूरी समकालीन शिक्षा, विकास के दृष्टिकोण के बिना संभव नहीं है। एक लागू हो सकने वाली शिक्षा व्यवस्था की स्थापना में पाकिस्तान की नाकामी बुनियादी तौर पर बद-इंतेज़ामी या बद- उन्वानी के सबब नहीं है, लेकिन एक खयाली नेज़ामे  जदीदियत के लिए गैर मौज़ू है। इसलिए इमरान खान और तहरीके इंसाफ ने जब ऐलान किया कि वो सत्ता में आते ही शिक्षा में क्रांति लाने जा रहे हैं, ऐसे में उनसे पूछा जाना चाहिए कि शिक्षा से उनकी मुराद क्या है।

इमरान खान की बसारत का इल्म मुझे 1996 में तब हुआ था जब उन्होंने लाहौर की अपनी रिहाइश पर एक निजी बैठक बुलाई थी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में तालीमी इंकलाब पैदा करने के लिए उन्हें हमारी मदद की जरूरत है। उनके बुलाए गए छः मेहमानों में से तीन दाढ़ी वाले मौलाना थे। ये लोग इंकलाब लाने पर तो सहमत थे लेकिन ऐलान किया कि ये सिर्फ मस्जिद के स्कूलों और मदरसों के ज़रिए हो सकता है। हमारी तीन घंटे की बैठक के दौरान, वो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष बनाने की पश्चिमी साजिश की रट लगाते रहे। एक मौलाना ने इसरार (आग्रह) किया कि ख्वांदगी (साक्षरता) की तालीम अलिफ से अल्लाह, 'बे' से बंदूक, 'जीम' से जिहाद के बगैर बेकार थी।

मीटिंग ना-खुश्गवार रही। मुझे सदमा लगा कि इमरान खान ने इस तरह के आदम ज़माने के खयालों को  बहस के काबिल समझा। उन्होंने मुझे बताया कि बेहतर नताएज के लिए हमें इन लोगों को अपने साथ रखने की ज़रूरत है। कई सालों के बाद, उनके मेहमानों में से एक, शदीद फिरकावाराना नज़रियात के लिए जाने जाने वाले मौलाना गुलाम मुर्तज़ा मलिक की लैण्ड-क्रूज़र गाड़ी जब ट्रैफिक लाइट पर रुकी थी तब उन्हें, उनके सशस्त्र गार्डस समेत उनके विरोधियों ने गोली मार कर हत्या कर दी।

उम्मीद की जा सकती है कि चेयरमैन इमरान खान उन दिनों के मुक़ाबले में आगे बढ़ गए होंगे लेकिन अलामत इसकी यकीन दहानी नहीं कराते हैं। उनकी हाल ही में आई आत्मकथा हमें उनके एवेन्जेलिकल जन्म को बताती है और जो 'पक्का भूरा साहब की ऐची सन कॉलेज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शिक्षा के खिलाफ गुस्से में बोल रहे हैं। ज़्यादातर तौबा करने वाले गुनहगारों की तरह, वो भी अक्सर मोतज़ाद (परस्पर विरोधी) हैं। उदाहरण के लिए जब भी खान ने ज़्यादा से ज़्यादा तकनीक पर जोर देने की बात की तो वो सख्ती से विज्ञान और वैज्ञानिक विधि के आधार पर हमले करते हैं। लेकिन दूसरी जगहों पर व्यवहारिकता का बोलबाला रहता है किसी न किसी तरह रौशनी देखकर वो अपने बच्चों को आला स्कूलों में भेजने से रोक नहीं सकते हैं जिन्हें वो अब हिकारत की नजर से देखते हैं।

अवाम कुछ ज़ाती तज़ाद (मतभेद), हालांकि ये ज्यादा न हों, के बावजूद रहनुमाओं के साथ जीना सीख सकते हैं। लेकिन खान के सबसे अहम दावे कि सभी पाकिस्तानी स्कूलों के लिए एक मेयारी नेसाब (मानक पाठ्यक्रम) और भाषा लागू कराएगें, इससे आदमी समझे क्या? यक़ीनी तौर पर ये सभी मसावात पसंद एहसासात और तालीमी उसबियत में तक्सीम मुल्क को ज़रूर अपील करेगा।

लेकिन ये एक मोजज़े (चमत्कार) से थोड़ा कम है, ये नामुमकिन है क्योंकि पाकिस्तानी अपनी खयाली और मोतवाज़ी दुनियाओं में रहते हैं। कैसे चेयरमैन इमरान खान डंके की चोट पर एक नज़रियाती रियासत में जो मज़हबी झगड़ों में डूबा हुआ है, एक मजहबी नेसाब पर इत्तेफाके राय हासिल करने के लिए मंसूबाबंदी कर रहे हैं? विभिन्न वर्गों में शिक्षा की एक भाषा तय कर देने से, ये उन्हें जातीय और भाषाई आधार पर विभाजित कर देगा? या कराची में बेकन हाउस स्कूल के छात्रों को वही पाठ्यक्रम पढ़ाने की व्यवस्था करें जो आदिवासी वजीरिस्तान और ग्रामीण सिंध के छात्र पढ़ते हैं? अब यही आला किस्म के बेकन हाउस स्कूल भी मिस्टर खुरशीद कुसूरी के ज़रिए पीटीआई में नुमाइंदगी कर रहे हैं, ये देखना दिलचस्प होगा।

बहुत ज़्यादा उम्मीद के बजाय, चेयरमैन खान ने पाकिस्तान के वास्तविक हितों का ध्यान रख सकते हैं, जहां वो अपने स्कूलों के नेज़ाम से मांग कर सकते हैं सांप्रदायिक और धार्मिक नफरतों को फैलाना बंद करें, दूसरे मुल्कों के लोगों को अपने दुश्मन के रूप में देखना बंद करें, हमारे इतिहास के बारे में झूठ बोलना बंद करें, विज्ञान और गणित की स्थानीय लिखी गई बुरी किताबों का उपयोग करना बंद करें, परीक्षा में तोते की तरह याद करने वालों को सम्मानित करना बंद करें, और बड़े पैमाने पर शिक्षकों की अनुपस्थिति को सहन करना बंद करें।

पाकिस्तान तहरीके इंसाफ की खुदसाख्ता (तथाकथित) 'तालीमी सुनामी' एक पेट की गुड़ गड़ाहट की तरह है। ये गुजर जाएगी, लेकिन एक बुरी बदबू छोड़ने के बाद। इसके युवा समर्थक, मिसाली लेकिन मासूम लोगों को विनाश की ओर ले जाने वालों के नेतृत्व में वहम के अज़ाले और मायूसी की तरफ ले जा रहे हैं।

पाकिस्तान को शिद्दत से तालीम की ज़रूरत है जो सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार, फिक्रमंद और अच्छी तरह बाखबर लोग पैदा करे और वो ऐसी मानसिकता के मालिक हों जो देश की भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों की विविधता को आसानी से स्वीकार कर सकते हों। मकसद में ज़रूरी महारत और इल्म की ऐसी सतह शामिल होना लाज़िमी है जो रोज़गार और आधुनिक समाज में योगदान के काबिल बना सके। इमरान खान की जज़्बाती भाषणबाज़ी इससे छुटकारा नहीं दिलायेगी।

स्रोत: एक्सप्रेस ट्रिब्यून, लाहौर

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