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Hindi Section ( 21 Jul 2011, NewAgeIslam.Com)

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Religion and Terrorism: Zubair Ahmed धर्म और आतंकवाद: ज़ुबैर अहमद


ज़ुबैर अहमद शुक्रवार, 08 जुलाई 2011, 20:01 IST

पिछले हफ्ते मेरे ब्लॉग पर कई लोगों ने अपनी राय भेजी जिसके लिए मैं सब को धन्यवाद देता हूँ. आप में से कई लोगों ने लिखा कि मुझे घर मिलने को मज़हब से नहीं जोड़ना चाहिए था.

मैं खुद ऐसा नहीं करना चाहता हूँ लेकिन अगर मकान मालिक आपका नाम सुन कर ब्रोकर से कहे मैं मुसलमान को किराए पर घर नहीं दूंगा तो आप किया सोचेंगे?

समस्या ये है की मैं अकेला नहीं हूँ. कई ऐसे लोग हैं जिन्हें इस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

ये भी सच है की सब मकान मालिक ऐसे नहीं हैं और ये भी सच है की भेदभाव क्षेत्रीय आधार पर भी है.
और सच ये भी है कि मुसलमान भी हिंदुओ के साथ भेदभाव करते हैं.

लेकिन समाज में भेदभाव है तो इसका खंडन करना ज़रूरी है.

दुख हुआ एक साहब की टिप्पणी से जिन्होंने केवल 'टेस्ट'के नाम से अपनी राय प्रकट की थी.

उनका कहना था,"अगर वहां (मुंबई) आके बम विस्फोट करेंगे तो यही हाल होगा."

एक दुसरे व्यक्ति ने अपना नाम नहीं लिखा लेकिन कुछ इस तरह से टिप्पणी की, " सभी मुस्लिमों को अब आतंकवाद रोकने के लिए कुछ ना कुछ करना होगा और समाज को विश्वास दिलाना होगा कि आप उनके साथ नहीं हैं."

यह मानसिकता ग़लत है और मेरा ब्लॉग इसी मानसिकता के विरोध में था.

क्या आतंकवाद को रोकने की ज़िम्मेदारी सिर्फ मुसलामानों पर है या फिर सभी भारतीय नागरिकों पर? और क्या मुसलामानों को समाज को सही मानों में विश्वास दिलाना होगा की वो आतंकवादियों के साथ नहीं हैं? क्या समाज को शक है की मुसलमान आतंकवादियों के हमदर्द हैं?

ये पढ़ कर मुझे अयोध्या में एक साहब की बात याद गई. उन्होंने मुझ से कहा, "ज़ुबैर जी मुसलमान देशद्रोही होते हैं."

मैंने कहा ये आपकी राय है लेकिन अगर आप गृह मंत्रालय से उन नामों की लिस्ट मंगाएं जिन्होंने 1947 से अब तक पैसे लेकर पाकिस्तान को सरकारी फाइलें बेचीं हैं तो आप अपना बयान वापस ले लेंगे, क्योंकि उनमें 95 प्रतिशत लोग मुसलमान नहीं हैं"

वो ख़ामोश हो गए. मैंने कहा कि हम उस लिस्ट को देख कर ये नहीं सोचेंगे की इसमें कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान. बल्कि हम सभी को देशद्रोही मानेगे.

आतंकवादी तो अकसर बाहर से आते हैं. लेकिन उन देशद्रोहियों का कोई खंडन क्यों नहीं करता जो रोज़ रिश्वत लेकर आपका काम करते हैं और देश को नीलाम करते हैं.

अभी पिछले दिनों एक विदेशी एफ़आरआरओ के दफ्तर गया, उसके कागज़ात अधूरे थे लेकिन रिश्वत देकर उसने अपना काम करवा लिया.

पासपोर्ट बनवाने जाएं तो बिना घूस के आपका काम नहीं होगा.

जबसे हेडली का मामला सामने आया है क़ानून सख्त हो गए हैं लेकिन इसके कारण रिश्वतखोरी भी अधिक बढ़ गई है.

अगर कोई पड़ोस का विदेशी आतंकवादी आए तो वो आराम से पुलिस और पासपोर्ट दफ़्तर को घूस दे कर एक भारतीय नागरिक बन सकता है.

देश को ऐसे ही लोग ख़तरे में डाल रहे हैं और सही मानो में ऐसे ही लोग देशद्रोही हैं.पर वो तो देशभक्तों में शामिल होते हैं क्योंकि वो सरकारी दफ़्तरों में मुलाजिम हैं.

टिप्पणियाँ Comments खें

·        3. 22:42 IST, 08 जुलाई 2011 indian: जु़बैर जी अपना देस चाहे जैसा भी हो अपना ही होता है , जहाँ तक भारत में आतंकवाद की बात है तो इसके लिए पाकिस्तान में पल रहे जेहादी मानसिकता के लोग ज़िम्मेदार है, जब तक पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने बेनकाब नही हुआ था, बहुत कम भारतीय मुसलमान थे जो पाकिस्तान की तारीफ़ नही करते थे. मुझे आज भी याद है आज से दस साल पहले मेरे कई मुसलमान दोस्त थे जो बताते थे कि जुम्मा के दिन मस्जिद में नमाज़ के दौरान किस तरह से भारत के बारे भड़काया जाता था और पाकिस्तान की तारीफ़ की जाती थी , कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें पाकिस्तान के सारे क्रिकेट खिलाडि़यों के नाम याद थे और उनके पसंदीदा खिलाड़ी भी पाकिस्तानी ही थे और भारतीय खिलाडि़यों के खेल उन्हें बेकार नजर आता था. आज भी मुस्लिम बहुल इलाके में पाकिस्तान के मैच जितने पर पटाखे जलाये जाते है. 
जुबैर जी आपका लेख बदले के भावना से प्रेरित नजर अता है, क्योंकि अप उन गिने चुने लोगो में से नजर आते है जिनको देश सब कुछ देता है और भारतीय से प्यार मिलता है ;इसके बावजूद थोडा सा भी कोई परेशानी होता है तो उसे भेदभाव करार देते है . आपके सामने सिने अभिनेता हाश्मी का उदाहरण है , जिन्हें समूचे भारतीय समुदाय ने क्या कुछ नही दिया परन्तु किसी सोसाइटी में घर नही मिला तो उसने धार्मिक भेदभाव करार दिया . आज अगर वो किसी मुस्लिम देश में होते तो क्या उतनी आजा़दी मिल पाती जीतनी भारत में है. इसी एक प्रकार पूर्व क्रिकेट कप्तान पर जब मैच फिक्सिंग पर आरोप लगा तो उसने भी धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया. आपका आरोप भी कुछ इसी तरह का है.

·        4. 23:06 IST, 08 जुलाई 2011 naval joshi: मुझे अपना यह मत जाहिर करने में अब कोई संकोच नहीं है कि आप बेशक मुसलमान होने का भ्रम पाले हों लेकिन मुसलमान हो पाना अभी आपके लिए दूर की कौडी जैसा है.जो वास्तव में मुसलमान या हिन्दू हो गया तो उसे कोई भी मुसलमान या हिन्दू नजर ही नहीं सकता है. जो मोटी बुद्धि के लोग हैं वे ही हिन्दू या मुसलमान का रोना रोते है और अपनी पहचान लोगों पर थोपने की कोशिश करते है. यही विवाद का कारण भी हो जाता है. लोगों को इस बात से बहुत अन्तर नहीं पडता कि आपकी इबादत का तरीका क्या है. लेकिन जब हम अपनी पहचान दूसरों पर थोपने लगते हैं तो सामने वाला भी तीखी प्रतिक्रिया करता है .हम और आप जैसे लोग मुसलमान या हिन्दू होते नहीं हैं इसलिए दिखने की कोशिश करते हैं और यह आडम्बर हमें उन्हीं बहस के उसी कीचड़ में घसीट देता है जहॉ साम्प्रदायिक लोग अफवाह उत्तेजना को लेकर बात का बंतगड़ बना देते हैं।

5. 00:37 IST, 09 जुलाई 2011 anand: सब लोग उतने समझदार नहीं होते लेकिन वो उतने बुरे भी नहीं होते ये बात सही है कि ज़िम्मेदारी सबकी है लेकिन स्वाभाविक तौर पर उनकी ज़्यादा है , जो आतंकवाद के शिकार भी है और उसके इल्ज़ाम से बदनाम भी. हाँ नफ़रत का कारोबार दोनों तरफ से है. जी हाँ दोनों तरफ से.अगर मैं आपको वो बाते बताऊं जो मुझे कुछ मुस्लिम दोस्तों ने कही हैं तो अआप हैरान रह जायेंगे, लेकिन मैं मनाता हूँ वे समझदार नहीं हैं,दिशाभ्रमित हैं.आप भी यही मानें. पूरे मुल्क या कौम के बारे में इतनी जल्दी राय कायम करें.

6. 00:48 IST, 09 जुलाई 2011 vivek kumar pandey:

जुबैर जी देश को और दुनिया को सबसे बड़ा ख़तरा इस्लामिक चरमपंथ से है क्योंकि उनको व्यापक समर्थन और सहानुभूति मिलती है जबकि हिन्दू चरमपंथ फल-फूल नहीं सकता और वह बस कुछ लोगों तक ही सीमित है .इसका मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की कमी है .आज भी मुसलमानों को मदरसे की तर्ज़ पर सिर्फ़ धर्म की शिक्षा दी जाती है, जो उनमें धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देती है और उनको आधुनिक सोच से दूर रखती है . मुझे पोलियो टीकाकरण अभियान में शामिल होने का मौका मिला और मैंने देखा की कुछ मुस्लिम लोग अपने बच्चों को पोलियो की ड्रॉप्स पिलाने से साफ़ मना कर देते है .पूछने पर बताते है कि ये सरकार की साजिश है हमारी आबादी को रोकने की .मैंने भी ठान लिया था कि मैं लोगो को समझाउगा और उनकी ग़लतफ़हमी दूर करूँगा, लेकिन मुझे कामयाबी नहीं मिली .मैंने पूछा कि आप टीवी./रेडियो पर शाहरुख खा़न और अमिताभ बच्चन को पोलियो ड्रॉप्स की अपील करते हुए देखते हैं ,जबाब मिला हाँ वो तो पैसे के लिए कुछ भी कर सकते है .आप इसको किस रूप में देखते है?

7. 02:16 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

भेदभाव के बहुत से आधार हैं लेकिन सबसे ज़्यादा भेदभाव धर्मं के नाम पर मुसलमानों के साथ हो रहा है. क्या मुसलमान इस देश के किरायेदार हैं जो सबको विश्वास दिलाते फिरें कि हम आतंकवादी नहीं हैं. जिसको जो समझना है समझता रहे, लेकिन सलाह दें कि मुसलमानों को क्या करना चाहिए. बम कोई और फोडे और नाम मुसलमानों का आता हैं. अब तो असली आतंकवादी बेनकाब हो चुके हैं. रिश्वत लेकर देश को बेचने वाले इस देश के असली गद्दार हैं और हमें फख्र है की देश में घोटाले करने वाले मुसलमान नहीं हैं.

8. 09:19 IST, 09 जुलाई 2011 Amit Bhatt:

आपको किराये में मिलने में परेशानी हुई इससे आप विचलित है,या वास्तव में हिन्दू ,मुसलमान का भेदभाव आपको परेशान कर रहा है. छोडिये जु़बैर सहाब इन बातों में कुछ नहीं रखा है ये तो केवल बातें हैं बातों का क्या? भेदभाव केवल हिन्दू- मुसलमान में ही नहीं होता है जिसके लिए आप फिक्रमंद दिखने की कोशिश कर रहे है. बात कुछ और ही है,जिसे आप छुपाना चाहते हैं. एक भाई अमीर हो जाता है तो अपने ग़रीब भाई के प्रति वह कैसा व्यवहार करता है,इसी मुम्बई में दूसरे राज्य के लोगों को किस तरह मारा गया क्या यह व्यवहार कम पीडा़दायी था. आपको कोई उदाहरण देना सूर्य को दिया दिखाने जैसा होगा आप सब जानते हैं लेकिन हम आपकी यह राजनीति नहीं समझ पा रहे हैं जो आप कर रहे हैं.

11. 13:15 IST, 09 जुलाई 2011 BHEEMAL Dildar Nagar: जनाब जु़बैर भाई आपने उदहारण देकर अपने विष-वमन की प्रक्रिया चालू कर रखी है . इसे मैं आल्ला मियाँ की या राम जी की मर्ज़ी कहूं. फिलहाल मेरा शक एकदम विश्वास में बदल गया है कि बीबीसी स्टाफ को भारत मैं ज़हर फैलाने का ठेका मिल गया है, येनकेन प्रकारेंण विष-विष. यह अभी स्पष्ट होना चाहिए कि ये ठेका धृतराष्ट्र , गांधारी , शकुनि , दुर्योधन या दुशाशन किसने दिया है . मेरा शक पक्का हो गया कि ज़हर फैलाने का काम कितना आसान और लाभकारी काम है . अगर ये काम पाकिस्तान में करो तो... मैं आपका धन्यवाद करना नहीं चाहता.

14. 13:59 IST, 09 जुलाई 2011 jane alam: ज़ुबैर साहब, आपके ब्लॉग को पढ़कर मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे देश में जबतक भ्रष्टाचार व्याप्त रहेगा तब तक आतंकवाद को शह मिलती रहेगी. आज ज़रूरत है हमें एक जुट होने की, हमारे दिलों में देश प्रेम की भावना जागृत करने की. जब तक भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ कोई सख्त़ का़नून नहीं बनेगा तब तक आतंकवाद फलता फूलता रहेगा .

19. 16:28 IST, 09 जुलाई 2011 tahir ahmed:

जो लोग अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक ढंग से करे वो सभी देशद्रोही हैं. देशवासियों को मौलिक अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन उनसे कोई 11 मूल कर्तव्यों के बारे में पूछे तो शायद 5 का भी जवाब नहीं दे पाएंगे और ऐसे कितने लोग है जो ये दावा कर सकते हों कि उन्होंने देश के लिए यह सही काम किया है . बोलने में तो सभी देशभक्त हैं लेकिन देश के लिए किया क्या ,उनका योगदान क्या रहा . ऐसे 90 फ़ीसदी लोग हैं जिन्होंनें रोटी खाई , अपने शौक पूरे किये और कुछ नहीं किया . इसलिए देशभक्ति का भ्रम दिमाग से निकाल देना चाहिए.

22. 17:27 IST, 09 जुलाई 2011 BINDESHWAR PANDEY[BHU]: माना कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं किन्तु आज ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता? साहब गेंहूँ के साथ घुन को भी पिसना पड़ता है. लोगों को अफज़ल गुरु तथा जु़बैर अहमद में फ़र्क करने में वक्त तो लगेगा ही.

23. 17:33 IST, 09 जुलाई 2011 raza husain: यह बात पूरी दुनिया जानती है कि मुसलमान का ईमान पैसा नहीं बल्कि देश के लिए क़ुर्बानी देना होता है.हिन्दू धर्म में पैसे की पूजा होती है . इतिहास गवाह है कि अंग्रेज़ों ने इंडिया में 200 साल राज किया. कौन से लोग अंग्रेज़ों को यहाँ लाए. सिर्फ पैसे के चक्कर में हिन्दू रजा अंग्रेज़ों को इंडिया मे लाए . मुसलमानों ने तो अपनी जान देकर अंग्रेज़ो को इंडिया से बाहार किया. आखिर क्यों इंडिया में मुसलमानों को आतंकी नज़र से देखा जाता है ? इंडिया में सरकारें हिन्दू होती है. नेपाल, बांग्लादेश , कश्मीर, चीन सीमा पर चंद पैसों की लालच में सेना के लोग उन लोगों को सीमा के अंदर घुसने देते हैं. यही नहीं इनके राशन कार्ड भी बन जाते है. इंडिया में 6-7 करोड़ विदेशी लोग आराम से रह रहे है .यह क्या आतंकवादी नहीं है ? इस देश में पासपोर्ट , राशन कार्ड , सरकारी लोन सब कुछ पैसा देकर हो जाता है. क्या यह देशद्रोही नहीं है ? बांग्लादेश सीमा रोज़ पार कराई जाती है , नेपाल सीमा से स्मग्लिंग पुलिस और सेना की मिलीभगत से होती है , कश्मीर सीमा से आतंकवादियों को पैसा और हथियार आता है यह सबको पता है ? यही हाल चीन का है बिना देश की सेना , पुलिस , डिपार्टमेंट के अफसरों के चीन की सेना इंडिया की सीमा के अंदर कब्ज़ा नहीं कर सकती? आज हिंदुस्तान भ्रष्टाचार , आबादी , कन्याभ्रूणहत्या जैसे कारनामों में दुनिया में नाम रोशन कर रहा है . क्या इन सबका दोषी मुसलमान है? 1974 में देश का बटवांरा हुआ, जितना दोष जिन्ना का था उससे ज़्यादा नेहरु , पटेल का था , कश्मीर समस्या के दोषी भी नेहरु हैं.हर बात पर मुसलमानों को दोषी ठहराना बंद होना चाहिये . अब तो हिन्दू आंतकवादी भी दुनिया के सामने गये हैं ? मेरे कहने का मतलब यह है कि बुरे लोग हर मज़हब में होते है इसका यह मतलब नहीं को वो मज़हब ख़राब है? हमे मिल-जुलकर देश में आतंकवाद , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को दूर करना होगा तभी देश तरक्की करेगा.

24. 17:41 IST, 09 जुलाई 2011 PRAVEEN SINGH: क्या बीबीसी और पत्रकार टीम भारत राष्ट्र की शत्रु हैं , इतनी बात अमरीका में करो तो सीआईए तुमको सी -ऑफ कर देगा .

25. 17:51 IST, 09 जुलाई 2011 jubairamir: आप ये कह सकते हैं कि अफ़ज़ल गुरु नकली नाम है वो एक पंडित है .आप ये भी कह सकते हैं कि कसाब नाम का कभी पैदा ही नहीं हुआ , सब सरकारी गद्दारों की धोखाधड़ी है . साथ में इतने दर्द जो मानवजाति के लिए है आपके , कह सकते हो कि पंडितों और सिख लोगों की कश्मीर मैं पूजा होती है , 2 लाख पंडितों को स्वर्गवासी बना दिया , ये परम देश भक्त लोगो ने किया. अगले ब्लॉग में ज़रूर लिखो कि यासीन मालिक , गिलानी , अफ़ज़ल गुरु को शांति के लिए भारत रत्न भी देना चाहिए .

26. 18:13 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat: जनाब बिंदेश्वर पाण्डेय जी, आपका ये सोचना बिलकुल गलत है कि ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं, आप बताइए क्या लिट्टे, माओवादी, उल्फा, संघ ये सब इस्लामिक संगठन हैं और दुनिया में जाने कितने ऐसे संगठन होंगे. ज़रूरी बात ये है कि मुसलमानों के नाम का शोर ज्यादा मचाया जाता है. अगर मुसलमान अपने हक़ के लिए या इंसाफ़ कायम करने के लिए लड़तें हैं तब भी उन्हें आतंकवादी कहा जाता है लेकिन अमरीका बेवजह ईराक पर हमला करता है फिर भी उसे आतंकवादी नहीं कहा जाता. आखि़र क्यों ?
मुसलमानों के पकडे जाते ही ख़बरिया चैनल उसे आतंकवादी घोषित कर देते हैं लेकिन प्रज्ञा सिंह, पुरोहित, कुलकर्णी और असीमानंद को आतंकवादी नहीं कहते. आखिर क्यों? (जबकि असीमानंद जुर्म क़ुबूल कर चुके हैं)

29. 20:07 IST, 09 जुलाई 2011 MD. KHURSHID ALAM: प्रिय ज़ुबैर, इस तरह की परिस्थितियों से चिंतित होने की ज़रूरत नही है. पूरी दुनिया में ऐसा होता है.मृत्यु के बाद जीवन के बारे में सोचें. अपने काम में सच्चे इस्लाम धर्म का पालन करें.

30. 21:23 IST, 09 जुलाई 2011 khalid: मुझे लगता है कि समाज में फैली इन परिस्थितियों से निपटने के लिए सब से पहले हमें खु़द को बदलना होगा जब तक हम अपने आप को एक मुसलमान के तौर पर पेश नहीं करेंगे तब तक इस तरह की परिशानियों का सामना करना ही पड़ेगा. हमें खु़द को पेश करने में कहीं कहीं कुछ चूक हो रही है और यूँ भी इल्ज़ाम उस वक़्त तक नहीं लगाया जाता जबतक कोई व्यक्ति उस तरह का कोई कदम उठाये.

31. 21:58 IST, 09 जुलाई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA: जु़बैर साहब, यह नफ़रत पहले तो नहीं थी, काश यह नफ़रत पहले हो जाती तो शायद इंडिया आज़ाद भी नहीं होता .कुछ भी हो, जु़बैर साहब मैं आप को सलाम करता हूँ कि आप में सच लिखने की हिम्मत है. शायद आप को बीबीसी की नौकरी भी छोड़नी पड़ सकती है.दुःख इस बात का है कि इंसानियत मर चुकी है और सच लिखने को सीधा धर्म से जोड़ दिया जाता है . आप किस किस की क़लम या आवाज़ को रोकेगें. मुझे बहुत दुःख हुआ कि बीबीसी के श्रोता भी ऐसे विचार रखते है.

37. 00:34 IST, 10 जुलाई 2011 नदीम अख्तर: न्देश्वर पांडेय ने कहा कि गेहूं के साथ जौ पिसाता है, लेकिन उन्होंने यह कैसे तय कर लिया कि सारे मुसलमान गेहूं और जौ ही हैं. जो आतंकी हैं, उन्हें गेहूं और जौ की संज्ञा दीजिए, बाकि बचे तो गुलाब भी हो सकते हैं. उन्हें आप गेहूं के साथ पीसने की कुटिल नीति क्यों अपना रहे हैं. देश के वांछित आतंकियों की सूची देखिये, उसमें सारे इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखने वाले नहीं हैं. 50 फी़सद के आसपास दूसरे धर्म के भी लोग हैं, जो गेहूं और जौ की विशेषता रखते हैं. अगर आपको आतंक और आतंकियों से निजात चाहिए, तो मानसिकता बदल कर बड़े परिदृश्य पर गौ़र करना होगा. घिसी पीटी और नफ़रत का बीज बोने वाली मानसिकता से तौबा कीजिए, तब जाकर जु़बैर साहब की बातें अकल की चौथी मंजिल को पहुंच पायेगी, वर्ना रह जायेंगे ग्राउंड फ्लोर से बहुमंजिली इमारत को ताकते हुए और टोपी गिर जायेगी.

38. 01:08 IST, 10 जुलाई 2011 Vivek kumar: मुझे लगता है जहाँ तक इंडिया का सवाल है, तो यहाँ ढेर सारे और अलग- अलग धर्मों से जुड़े़ उग्रवादी हैं लेकिन पूरे संसार में देखा जाय तो ये बात खुल कर सामने आती है कि कुछ कुछ तो बात मुस्लिम धर्म में ज़रुर है जो 10 साल के बच्चे तक आतंकवाद में लिप्त होते हैं .जहाँ तक अन्य धर्मों की बात है उनका अनुपात मुस्लिम आतंकवादियों की तुलना में नगण्य है . हिन्दू उग्रवाद सिर्फ भारत तक सीमित है पर इस्लामी आतंकवाद विश्व स्तर का है .अन्य धर्म के कट्टरपंथी भी मुस्लिम आतंकवाद को आदर्श मान कर उनसे ही प्रेरित होते हैं .इन आंकड़ों के आधार पर यदि आप मुस्लिम हैं आप का पहनावा आपको सामान्य लोगों से अलग करता है. लोग आपको शक की निगाह से देखते हैं आप से डरते हैं तो इसमें उनकी क्या गलती है. भले ही आप आतंकवादी हों पर क्या पता कब कोई मुस्लिम बम धमाका कर किसी की जान ले ले .

39. 01:10 IST, 10 जुलाई 2011 नेपथ्य निशांत : समस्या मुसलमान और हिंदू में नहीं, धर्म और जाति की बनाई जड़ों में है. जब तक हम और आप चीज़ों को धर्म से जोड़ कर देखेंगे, जाने या अनजाने में समस्या होती रहेगी. आखि़र एक हिंदू का नाम शकील या इमरान और एक मुसलमान का नाम मोहन या गोविन्द क्यों नहीं रखा जा सकता. सच तो यह है कि हमारी सोच का दायरा बचपन से ही सीमित कर दिया जाता है. इसी सोच को खिड़की से जब हम दूसरों को देखते है, तो हमें लगता है ब्रह्मांड की असीम सीमा हमारे धर्म तक है. और दूसरे धर्म का आदमी एलियन है, फिर बहाना चाहे जो भी हो. आशा है,आप सीमित सोच के खिड़कीनुमा दुराग्रहों को उदार मन से क्षमा कर सकेंगे. अब कहेंगे समस्या का समाधान क्या है? मेरे ख्याल से जहाँ तक संभव हो सके, धर्म एवं जाति का परिचय देने से बचा जाये, आखि़र हमसे कोई धर्म पूछे तो सिर्फ "मानव" उत्तर क्यों नहीं दिया जा सकता .क्या उससे भी बड़ा कोई धर्म है. दूसरा समाधान है, धर्म एवं विज्ञान की बहस को बीबीसी जैसी मीडिया को प्रमुखता से उठाना चाहिए, सभी धर्मो के सिद्धांतों, परम्पराओं, ब्रह्मांड एवं मनुष्य की उत्त्पति के बारे में सदियों से बनाये गये विचार को विज्ञान एवं तर्क के कसोटी पर कसा जाये , जहां परिकल्पना को गणितीय एवं प्रयोग के बुनियाद के बिना कुछ भी प्रमाणिक ना माना जाए. तो शायद सभी धर्म एवं उसकी पहचान गैर प्रासंगिक होने लगेगी. और शायद एक ऐसा समाज बन सके जहाँ वोट, मकान या शादी के लिए किसी से धर्म एवं जाति के पूछताछ को लोग जरुरत ही ना समझे. लेकिन सवाल यह भी है कि बीबीसी के पत्रकार इस ब्लॉग के आगे व्यापक संदर्भ में इस बहस को आगे बढाएंगे?

·        42. 09:58 IST, 10 जुलाई 2011 naval joshi: कुछ लोग मुसलमानों की ओर से स्वयंभू पैरोकार हैं और कुछ हिन्दुओं की ओर से जबकि इनके पास किसी की ओर से इस तरह पैरोकारी करने का अधिकार नहीं है. सूत कपास जुलाहों में लठ्ठमलठ्ठा. हिन्दू या मुसलमान कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है कि कोई भी उसमें किस्मत आज़मा ले और बिल्ली के भाग से यदि छींका टूट गया तो कोई पद मिल जाऐगा.हिन्दू या मुसलमान हो पाना एक उपलब्धि जैसा है.ऊपर वाले ने एक ज़िन्दगी दी है जो इसमें सफल हो गया वही सच्चा मुसलमान और हिन्दू है. लगभग तीन घंटों में जिस तरह परीक्षा दी जाती है वैसी ही परीक्षा है यह. लेकिन कुछ लोग आंकडे देकर खुद को साबित करना चाहते हैं हिन्दू या मुसलमान की अर्न्तधारा से इनको कुछ भी लेना-देना नहीं है. आंकडे देने में तुमसे बेहतर कहने वाले और हमसे बेहतर सुनने वाले आये और आकर चले गये.

·        43. 10:36 IST, 10 जुलाई 2011 kuldeep srivastava: जु़बैर जी,कोई आपकी बात से इत्तेफाक रखे, रखे, मैं रखता हूं,क्योंकि मैंने ऐसा होते देखा है... मेरा एक प्रिय मित्र जो खु़द एक ब्राह्मण है, अपने भाई के दोस्त को सिर्फ इसलिए साथ रख रहा है क्योंकि वो एक मुसलमान है और उसे इसी कारण से दिल्ली जैसे शहर में घर किराए पर नहीं मिल रहा है. हद तो तब हो गई जब एक प्रापर्टी डीलर को मैं और मेरा दोस्त ये समझाते समझाते थक गए कि इसी देश में कलाम और अशफ़ाक जैसे लोग भी पैदा हुए हैं ,जिनकी वजह से आज भी सर फख्र से ऊंचा हो जाता है,लेकिन उसने एक सुनी और उसे साथ रखने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा दोनों अपने पास रख लिया.सवाल इसका नहीं कि आप और 'वो'दोनों मुसलमान हैं और एक हिन्दू उसे अपने यहां किराए पर नहीं रख रहा है. सवाल तो उस कुत्सित मानसिकता का है जो तेजी से लोगों के दिमाग में घर कर रहा है. बदलना सोच को है क्योंकि उसके बाद कोई हिन्दू होगा मुसलमान होगा तो एक इंसान जो दूसरे इंसान की कद्र करेगा...

·        49. 16:25 IST, 10 जुलाई 2011 siddharth joshi: कोई बच्चा यदि अपनी मॉ के पास रोता हुआ आये और कहे कि मुझे एक बच्चे ने चिढाया है, तो बात समझ में आती है. मॉ जानती है कि बाल मन को कोई चोट लगी है वह इसे पुचकारती और दुलराती है. लेकिन उस मुद्दे में नहीं जाती है कि किसने क्या कहा, क्योंकि इसका कोई रेडिमेड समाधान भी नही हैं जैसे-जैसे बच्चे को समझ में बातें आने लगती है वह बिना मॉ से पूछे सारी समस्याओं को समझता जाता है और शेखी भी नहीं बघारता कि मैने किसको कैसे पराजित किया. यह लगभग दिनचर्या का हिस्सा जैसा हो जाता है लेकिन बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार बात का इस कदर बतंबड़ बना देगें यह जानकर दुख तो नहीं लेकिन हैरानी जरूर हुई. प्रतिक्रिया में आपने जिस तरह के सवाल उठाये है. मुझे अपना यह मत जाहिर करने में अब कोई संकोच नहीं है कि कुछ लोग बेशक धार्मिक होने का भ्रम पाले हों , लेकिन ऐसा हो पाना अभी इनके लिए दूर की कौड़ी जैसा है.जो वास्तव में मुसलमान या हिन्दू हो गया तो वह लोगों को मुसलमान या हिन्दू की नज़र से नहीं देख पाता है. यह काम केवल मोटी बुद्धि के लोगों का है या कहा जा सकता है कि बुद्धिहीनों का है. हिन्दू या मुसलमान होने का मतलब है कि आप जीवन उर्जा कैसे पाते हैं और उसका उपयोग कैसे करते है. लेकिन आज कुछ लोगों ने इसको मुखौटे की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. अन्दर से तो वे वैसे ही हैं जैसा उन्हें नहीं होना चाहिए. इसलिए जब कहीं फॅसने कर स्थिति आती है तो ये लोग नारा लगाने लगते हैं कि हिन्दू ख़तरे में हैं या इस्लाम ख़तरे में है, जैसे कि ये ही हिन्दू या मुसलमान का पर्यायवाची हो गये हों. जब इन्हें कहीं कोई फायदा होता है तब उसे अपनी जेब में रखते हैं. उस समय से लोग उसे इस्लाम या हिन्दुत्व के नाम समर्पित नहीं करते हैं और कहीं कोई इनकी निजी समस्या होती है तो पहाड़ सिर पर उठा लेते हैं.

·        53. 20:35 IST, 10 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat: इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथ, ये शब्द बहुत कहे जा रहे हैं. कहने वालों का तर्क है कि मुसलमानों को आतंकवाद कि प्रेरणा इस्लाम से मिलती है. लेकिन मुसलमानों ने इस्लाम से प्रेरणा लेकर बहुत से काम किए हैं उन्हें इस्लामी क्यों नहीं कहा जाता? ताजमहल को इस्लामी ताजमहल, जीटी रोड को इस्लामी जीटी रोड, 1857 की जंग, जिसमें हजा़रों मुसलमान शहीद हुए, उसे इस्लामी जंग--आज़ादी क्यों नहीं कहा जाता? मुसलमानों की ये चीज़े राष्ट्र की धरोहर हैं और आतंकवाद इस्लाम कि धरोहर है? अन्य आतंकियों के धर्म का नाम क्यों नहीं आता. आखिर किस आधार पर जनाब ओसामा को आतंकवादी कहा जा रहा है और अमरीका को नहीं कहा जा रहा है. अगर कोई संगठन निर्दोष लोगों का खून बहाए तो उसे आतंकवादी संगठन कहते हैं, लेकिन जब कोई शक्तिशाली देश बिना किसी कारण के किसी देश पर हमला करके नागरिकों का खून बहाता है तो उसे आतंकवादी क्यों नहीं कहा जाता? शायद इसलिए कि वो शक्तिशाली है और दोष हमेशा कमज़ोर को दिया जाता है. जनाब ओसामा ने आतंक नहीं फैलाया बल्कि अमरीका जैसे आतंकी से लड़ कर दुनिया पर एहसान किया. अगर ओसामा चरमपंथी थे तो अफ़गानिस्तान, इराक़, लीबिया और बहुत सारे देशों पर हमले का ज़िम्मेदार अमरीका चरमपंथी क्यों नहीं है. भारत के लोग बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड को पसंद कर सकते हैं, भारतीय कंपनियों को छोड़ कर विदेशी माल खरीद सकते हैं तो पाकिस्तानी टीम का समर्थन क्यों नहीं कर सकते?. भारत में बहुत से लोग पाकिस्तान विरोधी भावना के शिकार हैं. भारतीय फिल्मों में भी पाकिस्तान को ख़लनायक कि तरह दिखाया जाता है. 

·        56. 04:59 IST, 11 जुलाई 2011 Amit: अतहर साहब इतना भी नाराज़ मत होइये. हर उस विचारधारा जिससे नफ़रत फैले उसकी निन्दा होनी चाहिये. चाहे वो धर्म हो या माओ . आप हर बुरी बात के लिये अमरीका को दोष देने लगते है हमें कु्छ अपनी ग़लतिया भी तो देखनी चाहिये. पाकिस्तान भारत के खि़लाफ नफ़रत फ़ैलाने के लिये आतंकवाद से लेकर धर्म सब कुछ इस्तेमाल कर रहा है. सलमान तासीर के मारे जने के समय भी मैने आपकी बाते सुनी और आपका साफ साफ कहना था कि सब कुछ का़नून के हिसाब से सही हुआ है पर आज आप देखिये पाकिस्तान का क्या हाल है खु़द पाकिस्तान के अखबार अब लिख रहे है कि सरकार धर्म के नाम पर आतंकवाद को बांट रही है. हर धर्म में अच्छी और बुरी बातें है हमें वाद विवाद करने और अपनी कमिया दूर करने के लिये तैयार रहना चाहिये. मैने पाया है ज़्यादातर समय लोगो का ये मानना है मेरा धर्म महान है और बाकी सबका बेकार है पर ये तो अच्छी बात नही है ना. दुनिया के कइ देशों में धर्म के नाम पर संगीत को पाप कहते है पर ये तो पागलपन ही है ना. हमें सब धर्मो और सब लोगों का सम्मान करना चहिये ना कि उन्हें नीचा समझना चाहिये चाहे वो कोइ भी हो.

·        58. 08:56 IST, 11 जुलाई 2011 Dr.Lal Ratnakar: वाह ज़ुबैर भाई, आपने जो कुछ लिखा वह बिलकुल सच है और गीता हाथ में लेकर बोलना हो तो भी, 'यह केवल और केवल मुसलमान के लिए ही नहीं है, हज़ारों सालों से से इस देश में गै़र बराबरी का बोलबाला है, आज भी मंगत कोरी की याद आती है तो दिल दहल जाता है, घटना 'अमेठी' की है मुसलमानों की बस्ती से सटा हुआ कोरियों का मोहल्ला और थोड़ी दूर आर्य समाज मंदिर, उसी परिसर में मेरा आवास, अगल बगल बनिया,बामन, कायस्थ और ठाकुरों के परम्परावादी मोहल्ले. जहाँ अक्सर मंगल कोरी की सम्मानजनक उठक बैठ और वह दिन जब 'शाहिद' ने बताया कि यही मंगल रात में मुस्लिम मोहल्ले में ' सूअर......'को और उसके कटे अंगों को फेंकता है, 
आश्चर्यजनक ये था. दिन भर भारतीय जाति व्यवस्था को गाली बकते नहीं थकता था मंगल. वी.पी. सिंह का हिमायती,साम्प्रदायिकता के विरोध में जुलूस, लब्बो लुबाब यह कि सामाजिक स्तर पर भारत 'नफ़रत' और अपमानित करने की मानसिकता का देश है. गाँव से लेकर उच्च अकादमियों तक ही नहीं राष्ट्रीय पुरस्कारों पर आये दिन उंगलियाँ उठती हैं, यहाँ किसी को भी जो 'उनकी जाति धर्म और समूह को नहीं स्वीकारता' को किराये पर ही नहीं, मौलिक हक़ नहीं मिलते. मंगल कोरी कि तरह .........जब मैंने मंगल से सहमते हुए प्रेम से पूछा क्या 'रात में तो उसने कहा उस दिन ज़्यादा पिला दिया था.' ये भारतीय जब पी कर कोई काम करते हैं तो उन्हें यह याद नहीं रहता कि वह क्या कर रहे हैं. भले ही वह चरणामृत ही क्यों हो. अतः आप मुसलमानों कि व्यथा को लिखते वक्त बड़े व्यापक समाज को भूल गए हैं कि उन्हें बगल में बैठने नहीं देते. 

·        63. 13:27 IST, 11 जुलाई 2011 D Chandra: चाहे जो भी हो, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी हीं. आपने अपनी बात की, लोगों को अपनी और उनकी बात लगी. बस भीड़ गए. ज़रा दोनों कानों के बीच के मशीन पर भी जोड़ दें और केवल बातों और लांछनों से आगे बढें. तोहमतों के कीचड़ से चोंगे ही गंदे होंगें. ज़रूरत हिन्दू या मुसलमान बनकर सोचनें की नहीं बल्कि एक संवेंदनसील इन्सान की तरह सोचने की है. जु़बैर भाई के दिल में कुछ घटनाओं के कारण दर्द हुआ, यहाँ उन्होंनें अपनी बात कुछ मरहम के आस में राखी होगी की अपने जैसे कुछ और घाव पैदा करने के लिए. मेरे हिसाब से बातें तो हों पर आखं के बदले आँख की नहीं बल्कि कुछ सृजनात्मक हल की जिसमें हरेक भारतवासी आपने आप को भारतीय कह कह कर संबोधित करे कि हिन्दू या मुसलमान.

सुलतानों बादशाहों की हुकूमत की जीती जागती दास्तानें सामने रखते हैं। ये उसी दौर के कलमनवीसों ने लिखे हैं। अख्तर अब्बास रिजवी साहब को सलाम, जिन्होंने इसका तजुर्मा अरबी-फारसी से ङ्क्षहदी में करने की जहमत की। दोस्तो मंदिरों की मूर्तियों को तोडक़र मस्जिदों की सीढिय़ों पर हजारों दफा चुनवाया गया और उसके बांट बनाकर मांस तोलने के लिए कसाइयों को दिए गए। हिंदुओं के कत्लेआम के किस्से पढ़ लेंगे तो सो नहीं पाएंगे। लेकिन इसके लिए वही बाहरी मुस्लिम कुसूरवार हैं। आज के 99 फीसदी भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुस्लिम तो उन अभागे हिंदू पूर्वजों के ही वंशज हैं, जिन्हें जहालत के उसी दौर में लालच और डर के चलते अपनी बल्दियतें बदलनी पड़ीं। हमें इनसे क्यों नफरत होनी चाहिए? मेरे कई मुस्लिम दोस्त हैं, जो मानते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन वे कहते हैं कि सूफी संतों के प्रभाव में उनके परदादाओं ने अपना मजहब बदला। यह एकदम गलत है। जो नामी-गिरामी सूफी आज खुदा की तरह पूजे जाते हैं, वे भी सुलतानों की मदद से सिर्फ इस्लाम को फैलाने के एक सूत्रीय कार्यक्रम में लगे रहे। लालच और भय के अंतहीन अंधेरे में स्वभाव से अहिंसक रहे हिंदुओं को धर्म बदलने पर मजबूर किया जाता रहा। मैं जुबेर में, अहमद में, खलील में, खालिद में, शाहरुख में, सलमान में अपने उन्हीं मजबूर पूर्वजों का चेहरा देखता हूं। मुझे इनसे कतई नफरत नहीं जागती। मैं उनसे मोहब्बत करता हूं और उनकी नादानी पर दया।

Source: http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/07/post-179.html#comments

URL:  https://newageislam.com/hindi-section/religion-terrorism-zubair-ahmed-/d/5078


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