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Hindi Section (23 Feb 2012 NewAgeIslam.Com)



मुसलमानों में तशरीही बेदारी और तशरीह के तरीकए कार की कमी

डा. अदिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम डाट काम

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाटकाम)

हम कितनी बार ऐसे मोज़ाकरात औऱ मज़ामीन सुनते और पढ़ते हैं जो हमें बताते हैं कि फलां फलां मसले पर कुरान या सुन्नत का पक्ष ऐसा ऐसा है? अक्सर इन दावों को साबित करने के लिए इस्तेमाल की गई दलीलें कुछ कुरानी आयात या हदीस (अगर हम भाग्यशाली हुए तो हम कुछ इनके बारे में जानकारी भी प्राप्त कर पाते हैं) पर आधारित होती हैं। इस लेख में मेरी दलील यह है कि लोग भी इस तरह के चर्चा में भाग लेते हैं वो विद्वान हों या नहीं इन सभी लोगों को इस बात से परिचित होना चाहिए कि किस तरह क़ुरान और सुन्नत पर हमारे विचार हमेशा कुछ तशरीही मफरूज़ात पर आधारित होते हैं जिनसे हम परिचित नहीं होते हैं और जिन्हें हम पहली नज़र में फलां फलां समस्या को कुरान या हदीस से सम्बंधित तसव्वुर करते हैं और जो उनके बारे में राय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मैं क़ुरान की तशरीह के सवाल तक अपने विश्लेषण को सीमित रखूंगा और सुन्नत और हदीस (जिसे मैं कहीं और लिख चुका हूँ) की समस्या को संबोधित नहीं करूंगा लेकिन जिस तरह बहुत से तर्क कुरान पर लागू होते हैं उसी तरह उन पर भी लागू हैं। बहुत से लोगों के विचारों के विपरीत, आम तौर पर, कुरान एक पाठ नहीं है (या असल हकीकत में एक बेहतर शब्द गुफ्तगू या इससे भी बेहतर बड़ी संख्या में मकाले हैं), और जिसे कोई निश्चित तौर पर व्याख्या कर सकता है। कुछ विचारों से परे जो पूरे क़ुरआन में लगातार और स्पष्ट रूप से आता है जैसे अकायेद (विश्वास) (नस्ल और जुर्म व सज़ा समेत) या मानव प्रकृति के तत्वों से संबंधित अन्य मुद्दों पर कुरान का कहना न केवल यह की आसानी से नहीं पहुंचा है, यह किसी के तशरीही नुक़्तए नज़र और उन पर लागू होने वाले फोरूज़ात (कृपया इस वेबसाइट पर मेरा हाल में लिखा लेख देखें जिसमें मैंने अपनी पुस्तक का विवरण दिया है और जिसमें इन मुद्दों पर व्यापक रूप से चर्चा की गयी है) से संबंधित है।

आइए संक्षिप्त रूप में हम कुछ उदाहरणों की समीक्षा करें। आइए आज़ादाना खयाल के मसले के साथ शुरू करें। एक मौज़ू पर कुरान पढ़ने से हमें पता चलता है कि कुरान इस समस्या पर मोतज़ाद जब तक कि उस पर तशरीह के मुनज़्ज़म तरीकए कार से रुजू न करें। इस तज़ाद (मतभेद) की सर्वश्रेष्ठ पुष्टि तब होती है जब हम इस सवाल पर इस्लामी इतिहास की जांच करते हैं और हम तुरंत यह निष्कर्ष निकालते हैं कि स्वतंत्र विचारों ने मुस्लिम स्कालरों के बीच बहुत सी टिप्पणियों और राय को पैदा किया है जो अक्सर दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं या तो कुरान पूरी तरह आज़ाद खयाली की वकालत करता है या डिटरमिनिज़्म (नियतिवाद) या दोनों के बीच कुछ (यहां यह उल्लेखनीय है कि इस्लाम के दीनियात अहम मकतबे फिक्र अल-मोतज़ेलह, मातरीदी और अल-अशअरिया के बीच इस मामले पर विभाजित थे। मैं यहाँ इस प्रश्न को विस्तार से संबोधित करने नहीं जा रहा हूँ, संक्षिप्त रूप से कहने के अलावा, जैसा कि शब्बीर अख्तर ने मेरे ख्याल से इस संदर्भ में संतुष्ट करने वाली दलील देते हुए कहा कि खुदा की मर्ज़ी पर जोर देते हुए कुरान की आयतें इंसान के भाग्य का निर्धारण और उनकी मुक्ति सहित इन आयात का नोज़ूल मक्का के मोतकब्बुर लीडरों जो खुदा के बजाय अपनी मर्ज़ी पर ज़ोर देते थे, के संदर्भ में हुआ जिस पर कुरान ने इश गुफ्तुगू के जवाब में खुदा कू हुकूमत पर जोर दिया। लेकिन शब्बीर की दलील है कि इन कुरानी आयात को कुरान के दृष्टिकोण के रूप में आज़ाद खयाली से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि ऐसी आयात जो आज़ाद खयाली के सिद्धांत के प्रभुत्व को रखते हैं, के रूप पर देखा जाना चाहिए।

आज़ाद खयाली के सवाल से हटकर सामाजिक, राजनीतिक या कानूनी महत्व के अन्य मामलों की भी निर्भरता काफी हद तक तशरीह के हमारे तरीके-कार पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, शूरा के कुरानी सिद्धांत की तशरीह संसदीय लोकतंत्र से सैद्धांतिक लोकतंत्र और चन्द लोगों की सरकार से लेकर सैन्य शासन और समाजवाद के शासन तक तशरीह की गई है। समाज में महिलाओं की स्थिति और किरदार से जुड़ी समस्याओं (इसमें विरासत, शादी और तलाक के नियमों आदि शामिल हैं) की तशरीह इस तरह की गई है जो संकेत देते हैं कुरान या तो महिलाओं की बहुत स्वतंत्रता या सख्त पिदराना नेज़ाम (सामंती) का समर्थन करता है। हुद हुद को सज़ा देने के मामले की तशरीह मध्यकाल के जमाने की उन रस्मों की व्यापकता और लोकप्रिय संस्कार और रिवाज के तौर पर पुष्टि करता है और जो न्याय, दया और क्षमा करने को अंतिम उद्देश्य और चिंता दोनों के लिए जोर देता है। अगर हम में इतनी हिम्मत है तो हमें अपनी इच्छा की मौत, स्टेम सेल अनुसंधान, जेनेटिकल इंजीनियरिंग (मानव जाति सहित) या अन्य आधुनिक विज्ञान की समस्याओं से जुड़े नैतिक मामलों पर जोखम उठाना चाहिए। कुरान क्या कहता है और तशरीह के मोनज़्ज़म तरीके-कार के साथ ही तशरीही बेदारी की अहमियत फर्ज़ हो जाती है कि नहीं, इस बारे में भी गैर मोताज़लज़ल हैं।

अंत में, जब तक कोई कुरान की तशरीह के मोनज़्ज़म तरीके-कार के समले को मुखातिब नहीं करता (समस्याओं जैसे पाठ और संदर्भ में संबंध, तशरीह के अमल में क़ारी की भूमिका, कुरान और सुन्नत व हदीस के बीच तशरीही ताल्लुक़ात, तशरीह और अन्य मामलों में वजह की गुंजाइश) या कम से कम खुद की तशरीही लियाक़त और शऊरी या लाशऊरी तौर पर कई मफरूज़ात से वाकिफ होना चाहिए और जिन आधार पर इसकी दलीलें निर्भर हैं। कोई कभी भी सुधार या दूसरी सूरत के लिए कोई माक़ूल दलील देने के काबिल नहीं होगा।

डॉक्टर अदिस दुदरीजा, मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं।

URL for English article:

http://newageislam.com/the-war-within-islam/what-is-salafism?/d/6606

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/مسلمانوں-میں-تشریحی-بیداری-اور-تشریح-کے-طریقہ-کار-کی-کمی/d/6703

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 http://www.newageislam.com/hindi-section/डा.-अदिस-दुदरीजा,-न्यु-एज-इस्लाम-डाट-काम/मुसलमानों-में-तशरीही-बेदारी-और-तशरीह-के-तरीकए-कार-की-कमी/d/6708

 




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