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Hindi Section (10 Feb 2012 NewAgeIslam.Com)
ज़िक्रे ख़ुदा

नीलोफ़र अहमद (अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

13 जनवरी, 2012

ज़िक्र शब्द कुरान में कई बार विभिन्न अर्थ के साथ प्रयोग किया गया है। इसके अर्थ याद करने या ख़ुदा के किसी नाम या सभी नामों को बार बार लेकर ज़िक्र करने या कुरान की कुछ आयतों या किसी हिस्से की तिलावत या रसूल अल्लाह (स.अ.व.) पर दरूद भेजने के हो सकते हैं।

नमाज़ को भी ज़िक्र ही कहा जाता है। ज़िक्र का अर्थ `मुखलिसाना मशविरे` (3:58) के भी है, दोनों, जब यह दिया जाता है और जब इस पर अमल किया जाता है। हर ज़िक्र का अपना ही लाभदायक प्रभाव है। शैतान की नकारात्मक ऊर्जा और उसकी कोशिशें ज़िक्र की सकारात्मक ऊर्जा से ज़ाइल (खत्म) हो जाती हैं।

इस दुनिया में सभी अपने रब की हम्दो सना करते हैं, जानदार अपनी ज़बान से और बेजान अपने हालात की खामोश सहमति के ज़रिए हम्द करते हैं। सातों आसमान और ज़मीन और जो लोग इनमें हैं सब उसी की तसबीह करते हैं। और (मख़लूकात में से) कोई चीज़ नहीं मगर उसकी तारीफ के साथ तसबीह करती है। लेकिन तुम उनकी तसबीह को नहीं समझते। बेशक वो बुर्दबार (और) गफ़्फार है (17:44)।

फरिश्ते खुदा की तसबीह करते हैं (2:30)। परिंदो, पेड़ों और पहाड़ों ने अपने रब की तसबीह में पैगम्बर दाऊद अलैहिस्सलाम का साथ दिया (34:10)। चूंकि इंसानों और जिन्नों को मर्ज़ी की आज़ादी दी गई है, और वो बेएख्तियार तौर पर ख़ुदा की तसबीह नहीं करते हैं।

सूफी असात्ज़ा (शिक्षकों) के मुताबिक, खुदा की याद को दो किस्म (प्रकार)- प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में किसी एक शब्द को बार बार या किसी एक तश्कील को जिससे खुदा राज़ी होता है, शामिल है। इस तरह का ज़िक्र अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि यह तकरार तक ही महदूद (सीमित) होता है।

अगर अमल जारी रहता है तो दिल ग़ालिब आ जाता है और अपने आप ज़िक्र शुरू कर देता है। अप्रत्यक्ष ज़िक्र निसबतन! थोड़ा मुश्किल है, इसमें हर एक लफ्ज़ और नीयत खुदा की रज़ा के मुताबिक मुसलसल  ज़िक्र किया जाता है। ज़मीर अब मुहाफिज़ के साथ ही साथ वली भी हो जाता है, जो उसको खुदा की तसबीह करने के फर्ज़ से जोड़े रखने के लिए खुद में काफी होता है।

ज़िंदगी का मकसद सबसे पहले एक खुदा के वजूद के आला हक को तस्लीम करना और फिर इस हक़ का अपनी ज़बान, दिल, तखैय्युल, अमल और आखिर में अपने पूरे वजूद के साथ दिन रात ज़िक्र  करना है। जो व्यक्ति इस मंजिल तक पहुँच गया उसे मुत्तक़ी कह सकते हैं जिसका अर्थ परहेज़गार या हक बेदार है या एक शख्स जो खुदा से इस कदर मोहब्बत करता हो कि उसे नाराज़ करने से डरता हो।

सूफी हज़रात के अनुसार इससे अलग कि बाहर क्या हो रहा है, शांति, हृदय के अंदर से ही आती है। वो लोग जो दुनियावी ख़ुशियों का पीछा करते रहते हैं, ऐसी स्थिति में पहुँज जाते हैं कि उन्हें लगता है कि सभी सफलताओं ने उनके अंदर संतोष पैदा नहीं किया। कुरान में कहा गया है, 'इल्ला बेज़िकरिल्लाहा तुत्मइन अलक़ुलूब' यक़ीनन खुदा की याद दिल को आराम देती है (13:28) और इसके अलावा, फ़ज़ कुरुनी अज़ कुर कुम, तुम मुझे याद करो। मैं तुम्हें याद किया करूँगा (2:152)।

सूरे अल-अहज़ाब में 10 बेहतरीन खुसूसियात के मालिक मर्दों और औरतों की एर फेहरिस्त पाई जाती है। इनमें सबसे ज़्यादा अहम हैं- खुदा को कसरत से याद करने वाले मर्द और कसरत से याद करने वाली औरतें। कुछ शक नहीं कि उनके लिए खुदा न बख्शिश और अजरे अज़ीम तैय्यार कर रखा है (33:35)।  रूहानी मैदान में, मर्दों और औरतों दोनों के एक ही मकासद और एक जैसे ही इनामात हैं।

एक हदीस के अनुसार, रसूल अल्लाह (स.अ.व.) ने फ़रमाया कि, अल्लाह फरमाता है कि, "मैं अपने बन्दों को अपने बारे में उनकी राय के मुताबिक ही नवाज़ता हूँ और मैं उनके साथ होता हूँ जब वो मुझे याद करते हैं। अगर वो ज़ाती तौर पर मुझे याद करते हैं तो  मैं भी उसे ज़ाती तौर पर याद करता हूँ और अगर वो मुझे अवाम में याद करता है, उसे एक बेहतर इज्तेमा (फरिश्तों के) में याद करता हूँ। बुखारी

अल्लाह के ज़िक्र के अनगिनत फार्मूलों में से बहुत से हदीस में पाए जाते हैं` जो दिन में 100 बार सुबहानअल्लाहे वबेहमदिही पढ़ता है, उसे अजरे अज़ीम हासिल होगा (बुखारी)।

तसबीह फ़ातिमा नबी करीम (स.अ.व.) ने अपने बेटी को सिखाया थाः 33 बार सुब्हान-अल्लाह (खुदा अदम तक्मील से आज़ाद है), 33 बार अलहम्दोलिल्लाह (सभी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं) और 33 बार अल्लाहो अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) और एक रवायत के मुताबिक 34 बार (बुखारी) पढ़ा जा सकता है। ये ज़िक्र जब नमाज़ के बाद किया जाता है, अज़ीम रूहानी फवायद लाता है और जैसा कि नबी करीम (स.अ.व.) ने शिक्षा दी है जो सदका नहीं कर सकते हैं उनके लिए यह तसबीह एक मुताबादिल (विकल्प) हो सकती है।

पैग़म्बर (स.अ.व.) ने फ़रमाया है कि, अल्लाह को याद करने का सबसे अच्छा तरीका, ला इलाहा इल्लल्लाह (नहीं कोई माबूद सिवाय अल्लाह के- तरमज़ी) का विर्द है। नबी करीम (स.अ.व.) ने अबू मूसा से पढ़ने को कहा, 'ला हौला वला कूवतह इल्ला बिल्लाह '(नहीं है कोई कुदरत और ताकत सिवाय अल्लाह के- मुस्लिम)। चौथे कल्मा को एक दिन में 100 बार पढ़ने से तहफ्फुज़ हासिल होगा और अजरे अज़ीम होगा (बुखारी)। अल्लाह की पनाह हासिल करने के लिए आयतल कुर्सी (2:255) के विर्द करने की परंपरा रही है।

एक जमात में ज़िक्रे खुदा करने की फज़ीलत के बारे में कई हदीसें हैं। पैग़म्बर (स.अ.व.) ने फरमया है कि जब लोगों की एक जमात अल्लाह की याद के लिए जमा होती है तो फरिश्ते अपने पन्खों से उन्हें घेर लेते हैं, अल्लाह की रहमत उन्हें अपने घेरे में ले लेती है। सुकून का उन पर नुज़ूल होता है और अल्लाह अपने पास के लोगों से इन लोगों का ज़िक्र करता है (मुस्लिम)। इसेतग़फार या माफी का मुताल्बा, पूरे मुल्क से सज़ा को दूर रख सकता है क्योंकि, 'खुदा ऐसा न था कि जब तक तुम (मुहम्मद (स.अ.व.)) उनमें से थे उन्हें अज़ाब देता। और ऐसा न था कि वो बख्शिशें मांगें और उन्हें अज़ाब दे '(8:33)।

ज़िक्र के बारे में न खत्म होने वाला सिलसिला बरकरार रखा जा सकता है। कुरान के मुताबिक, और अगर यूं हो कि जमीन में जितने दरख्त हैं (सब के सब) कलम हों और समुंदर (का तमाम पानी) सियाही हो (और) इसके बाद सात समुंदर और (सियाही हो जायें) तो ख़ुदा की बातें (यानि उसकी सिफतें) खत्म न हों। बेशक ख़ुदा ग़ालिब हिकमत वाला है (31:27)।

लेखिका कुरान की विद्वान हैं और समकालीन मुद्दों पर लिखती हैं।

स्रोतः दि डॉन, कराची

URL for English article:

http://newageislam.com/NewAgeIslamArticleDetail.aspx?ArticleID=6366

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/NewAgeIslamUrduSection_1.aspx?ArticleID=6571

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    By hayat umar - 2/16/2012 1:36:53 AM

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