
सुल्तान शाहीन, संपादक न्यु एज इस्लाम डाट काम के द्वारा इंटरनेशनल क्लब फार पीस रिसर्च की ओर से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कौंसिल में दिया गया बयान
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद 16वां सत्र,जिनेवा 28फरवरी-23 मार्च, 2011
एजेंडा आइटम 8: वियना घोषणा और कार्य योजना पर कार्यांवन और फालोअप पर सामान्य वाद विवाद
अध्यक्ष महोदया,
लगभग दो दशक पूर्व मानवाधिकार उल्लंघन के उन्मूलन के लिए आयोजित वियना घोषणा और प्रोग्राम आफ ऐक्शन के बावजूद हम पाते हैं कि कई क्षेत्रों में स्थिति और बिगड़ती जा रही है। अनुच्छेद 15 हमसे जेनोफोबिया(दूसरों से भय) के विरुध्द कार्य करने की अपेक्षा करता है और अनुच्छेद 19 सरकारों को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की बात कहता है, लेकिन इस्लामोफोबिया(इस्लाम से भय) के रूप में कई यूरोपीय देशों में ज़ेनोफोबिया बढ़ रहा है और आंशिक रूप से इसके कारण के तौर पर कई मुस्लिम बहुल देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार उल्लंघन को बताया जाता है।
पूरे विश्व में पेट्रोडालर पोषित इस्लाम ने मुस्लिम समाज में इस्लामी सर्वश्रेष्ठतावाद के ज़हर को बो दिया है। यहाँ तक कि इण्डोनेशिया और मलेशिया जैसे अनुकरणीय उदारवादी देश भी इस वायरस से ग्रसित हो गये हैं, लेकिन सबसे खतरनाक हालात तो एकमात्र इस्लामी न्युकिलाई शक्ति सम्पन्न देश पाकिस्तान में बन रहे हैं। जिहादी निगरानी कमेटी के सदस्यों के साथ ही पाकिस्तानी पुलिस व फौज के लोग भी ऐसे लोगों की ढूँढ़ कर हत्या कर रहे हैं जो इस्लाम के उनके संस्करण का विरोध कर रहे हैं। देश हिंसा के सागर में डूब रहा है लेकिन सिविल सोसायटी के लोग,मीडिया और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि भी इस्लाम के नाम पर हो रही हत्याओं के विरोध का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। शिक्षित मध्यवर्ग इन हत्यारों को हीरो की तरह सम्मान दे रहा है। सुरक्षा तंत्र में शामिल कई लोग तालिबान के पाकिस्तान और इस क्षेत्र व अन्य दूसरे देशों के अधिग्रहण के उद्देश्य का समर्थन करते हैं। इनके लक्ष्य को पागलपन कहा जा सकता है लेकिन इनका पागलपन 20वीं सदी के प्रारम्भ में यूरोप में नाज़ियों और फासिस्टों से अलग भी नहीं है।
पाकिस्तानी और अन्य जगहों के मुसलमानों को ये समझना होगा कि कट्टरपंथी पूरे विश्व में भावनात्मक मुद्दों को उठाते हैं, ताकि आम मुसलमानों की चेतना को प्रभावित कर सकें और उन्हें प्रतिक्रियावादी और बिना सोचे समझे काम करने वाला बना सकें। मुसलमानों के मस्तिष्क को प्रभावित करने के लिए कट्टरपंथी मुल्ला पैगम्बर मोहम्मद और पवित्र कुरआन की निंदा करने जैसे भावनात्मक मुद्दों को उठा रहे हैं। पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों में ईशनिंदा के मुद्दे को इस तरह ज़ोर शोर से उठाया जाता है कि आम मुसलमान इसके कारणों पर विचार न कर सकें। जिस तरह आसिया बेगम के मामले में पाकिस्तान में तूफान मचा उसके खिलाफ प्रमाण भी नहीं है सिवाय इसके कि एक महिला ने आरोप लगाया और इस महिला के साथ आसिया बेगम की पहले लड़ाई हो चुकी थी, लेकिन पाकिस्तान में कोई इस मामले में प्रमाण नहीं मांग रहा है,और कई तो ये भी नहीं जानना चाहते कि आसिया बीबी ने क्या कहा या क्या किया है। टेलीविजन पर मुल्ला लोग अपने बयान में कह रहे हैं कि कुरआन कहता है कि ईशनिंदा करने वालों की न सिर्फ हत्या की जाय बल्कि आनन्द लेकर हत्या की जाय। ये मुल्ला लोग अल्लाह और पैगम्बर मोहम्मद की पीड़ा देने वाली ऐसी छवि पेश करते हैं, जिसमें दूसरों को कष्ट देने और मारने में आनन्द आता है और अपने अनुयायियों से भी ऐसा ही करने को कहते हैं। विरोधाभास से बेखबर ये ऐसा कहते समय अल्लाह को मेहरबान व दयालु और पैगम्बर मोहम्मद को सिर्फ मुसलमानों ही नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के लिए दया के रूप में पेश करते हैं।
परिणामस्वरूप पाकिस्तानी समाज में एक तरह की अफरातफरी फैली हुई है ।कोई भी सोच विचार करने वाला मुसलमान इनका शिकार हो सकता है। इस मामले से सम्बंधित विषय को तालिबानी इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे पाकिस्तान में कोई भी उदारवादी या तो ईशनिंदा (ब्लासफेमी) का समर्थक है या तो इसमें शामिल है। इसका परिणाम ये है कि दण्ड के भय के बिना ही ये लोग पाकिस्तान सरकार के अकेले अल्पसंख्यक मंत्री और पंजाब राज्य के शक्तिशाली गवर्नर की हत्या करने में सफल हो सके।
इन लोगों की हत्याएं इसलिए हुईं क्योंकि ये लोग पाकिस्तान के बदनाम ईशनिंदा कानून के खिलाफ मुहिम चला रहे थे, जिसके तहत किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक जैसे हिंदू या ईसाई को बगैर उसका अपराध बताये ही मौत की सज़ा दी जा सकती है। हाल ही में ऐसा ही कुछ आसिया बीबी के मामले में हुआ है। सरकार का हिस्सा रहे इन दो लीडरों की हत्या इसलिए हुई क्योंकि ये लोग उस असहाय महिला के लिए सहानुभूति रखते थे और कोशिश कर रहे थे कि उसको दी गयी मौत की सज़ा आजीवन कारावास में परिवर्तित हो जाये, क्योंकि उसके विरुध्द कोई भी प्रमाण नहीं था। केवल ईशनिंदा का एक आरोप पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को मौत की सज़ा देने के लिए काफी है। कोई भी न्यायाधीश असली न्याय देने की हिम्मत नहीं कर सकता है, अगर वो चाहे तब भी नहीं, वो खुद अदालत के कमरे में ही मारा जा सकता है।
इसको समझने के लिए आवश्यक है कि उन परिस्थितियों को जाना जाय जिनके तहत ये कानून बनाये गये। 1984 में तत्कालीन फौजी शासक जनरल ज़ियाउल हक़ ने अहमदी संप्रदाय के लोगों के लिए खुद को मुसलमान बताने को एक अपराध घोषित कर दिया था। दो वर्ष बाद इसी कानून में पैगम्बर मोहम्मद की निंदा करने वाले के लिए मौत की सजा के प्रावधान को जोड़ दिया गया। इसके बाद से ही इस कानून का प्रयोग लगभग पचास लाख अहमदी संप्रदाय के साथ ही हिंदू और ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यकों के शिकार के लिए किया जाता रहा है।
कुछ आंकड़ों से इस समस्या की गंभीरता को समझने में मदद मिल सकती है। इस कानून के अंतर्गत 1986 के बाद से अब तक सज़ा पाये एक हज़ार लोगों में से लगभग आधे अहमदी संप्रदाय या ईसाई समुदाय के रहें हैं, जो पाकिस्तान की पूरी आबादी के पांच फीसद भी नहीं हैं। उच्च अदालतों ने आमतौर पर ईशनिंदा के ज़्यादातर मामलों को खारिज कर दिया है, इनमें से अधिकांश मामलों को अदालत ने झूठा पाया है। जमीन के लिए लड़ाई और घरेलू विवाद के कारण ही ये मामले सामने आये हैं, लेकिन इस कानून का भावनात्मक मूल्य इतना है कि अदालत के द्वारा मुक्त किये गये 32 लोगों की कट्टरपंथियों ने बाद में हत्या कर दी और उन दो न्यायाधीशों की भी हत्या कर दी, जिन्होंने सबूत न मिलने के कारण इन लोगों को रिहा कर दिया था। इस प्रकार यदि एक बार ईशनिंदा का आरोप लग गया तो यह अनिवार्य रूप से मौत की सज़ा होनी चाहिए। कोई भी सरकार इन कानूनों को समाप्त करने की हिम्मत नहीं कर सकती और ये लोग वास्तविक रूप से अपने प्रतिबध्द लीडरों की हत्या की भर्त्सना भी नहीं कर सकते।
अध्यक्ष महोदया,
यहां तक की पाकिस्तानी संसद में स्वतंत्र रूप से निर्वाचित सदस्य भी इन हत्याओं की निंदा नहीं कर सकते हैं। कई दशकों से धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए मानवाधिकार की बात कर रही सिविल सोसाइटी भी अब अपने कदम को पीछे खींच चुकी है। सिविल सोसाइटी के अहम लोग जनता के बीच ये बात कह रहे हैं कि वो अपनी हत्या किये जाने का इंतेज़ार कर रहे हैं। ये लोग डरे हुए हैं क्योंकि कोई भी सरकारी संस्थान बचा नहीं है जिसने समझौता न किया हो या डर न रहा हो। दण्ड के भय के बगैर सिविल सोसाइटी के लोगों के खिलाफ शह देने का काम जारी है। सभी राजनीतिक दल जिहादियों के तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं। पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर ने उन बैनरों को हटवा दिया था जिनमें उग्रवाद का विरोध करने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों की हत्या कर देने की बात लिखी थी,लेकिन उनकी हत्या के बाद,उनके कत्ल को न्यायोचित ठहराने और हत्यारों के जयजयकार करने वाले बैनर की पूरे राज्य में बाढ़ आ गयी और अब इनको रोकने वाला कोई नहीं बचा था। लोकप्रिय प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का बड़ा वर्ग सिविल सोसाइटी के खिलाफ इस उकसावे को बढ़ाने में हिस्सेदार हैं।
कभी उदार माने जाने वाले बरेलवी संप्रदाय के साथ ही विभिन्न इस्लामी संप्रदाय अब एक अतिवादी मंच पर एक साथ आ गये हैं। गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने वाला व्यक्ति बहुसंख्यक बरेलवी संप्रदाय से सम्बंधित था और संयुक्त बयान में जमात अहले सुन्नत के 500 उलेमाओं ने उसका समर्थन किया था। ये बयान ही अपने आप में ईशनिंदा की अति है क्योंकि ये इस्लाम को हत्यारों के धर्म और अल्लाह को इस रूप में पेश करता है जो निर्दोषों को केवल ईशनिंदा के आरोप में हत्या कर देने का आदेश देता है। गवर्नर सलमान तासीर के अंतिम संस्कार में भाग लेने वाले किसी भी व्यक्ति को हत्या की धमकी देने वाले बयान में उलेमा ने कहा कि “पैगम्बर मोहम्मद की निंदा करने वाले की पवित्र कुरआन, सुन्नत,मुस्लिम राय की सहमति और उलेमा की व्याख्या के आधार पर सज़ा केवल मौत ही हो सकती है। इस बहादुर व्यक्ति (कादरी-हत्या किये गये गवर्नर का अंगरक्षक) ने 14 सौ वर्षों की परम्परा को और विश्व के 1.5 अरब मुसलमानों के सिर को गर्व से ऊँचा बनाये रखा।“ मुख्यधारा के उदारवादी मुसलमानों के लिए यह बेहद अपमानजनक है क्योंकि पवित्र कुरआन, पैगम्बर की अधिकारिक बातों और यहां तक कि इस्लामी न्यायशास्त्र में कहीं भी इस तरह का वर्णन नहीं है, लेकिन इस नृशंस हत्यारे के समर्थन में मौलवियों के हस्तक्षेप के बाद वो अब एक लोकप्रिय नायक बन गया है और शिक्षित मध्यवर्ग भी अब उसकी प्रशंसा कर रहा है। पाकिस्तान के गृह मंत्री जिनसे अपेक्षा की जाती है कि वो कानून का राज कायम करने के लिए काम करेंगें लेकिन उन्होंने कहा कि वो खुद ईशनिंदा करने वाले व्यक्ति की हत्या बिना किसी कानूनी कारवाई के ही कर देते। इस तरह के आक्रामक बयान देने के बाद भी वो अपने पद पर बने रहे।
गवर्नर की हत्या के बाद भी जो कुछ आवाजे सुनायी दे रही थीं वो कैबिनेट मंत्री शाहबाज़ भट्टी की हत्या के बाद अब शांत हो गयी हैं। मानवाधिकार कार्यकर्त्ता ताहिरा अब्दुल्लाह बताती हैं कि सलमान तासीर की हत्या के बाद पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित मानवाधिकार संस्थानों के आयोजनों में केवल 100 या 200 लोग मात्र जुटे जबकि इस्लामाबाद में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की आबादी 10 लाख है और इसी तरह पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर में हुए आयोजनों में भी सिर्फ 500 लोग ही जुटे जबकि यहां की जनसंख्या 1.8 करोड़ है।
अध्यक्ष महोदया,
कुछ क्षेत्रों को छोड़कर उदारवादी लोग अधिकांश जगह अपनी लड़ाई हार रहे हैं। 1974 से पेट्रोल के ज़रिए हासिल दौलत को पूरे विश्व में उग्रवादियों में बड़े पैमाने पर वितरित की गयी है और इसके कारण धर्म की प्रकृति काफी सीमा तक परिवर्तित हो गयी है। इस्लामी सर्वश्रेष्ठतावाद सिर्फ मुस्लिम बहुल देशों में ही नहीं बल्कि उन देशों में भी नियम बन गया है जहाँ ये लोग अल्पसंख्यक हैं। लाखों मुसलमान अब अन्य धर्मों के अनुयायियों को हेय दृष्टि से देखते हैं और इन्हें स्थायी रूप से नरक का भोगी मानते हैं।
पवित्र कुरआन और इस्लामी परम्पराओं के अनुसार हम मुसलमानों को सभी 124000 पैगम्बरों में विश्वास होना चाहिए, जिन्होंने अल्लाह के संदेश को विश्व के विभिन्न भूभागों में पहुँचाया और इनको पैगम्बर मोहम्मद के बराबर ही सम्मान देना चाहिए। हमें इन पैगम्बरों के मानने वालों के साथ आसमानी किताब(अहले किताब) वाले समुदाय की तरह ही व्यवहार करना चाहिए और इनके साथ सामाजिक व वैवाहिक सम्बंध की अनुमति इस्लाम में है। लेकिन आसमानी किताब वाले समुदाय की अवधारणा अब पूरी तरह से (बेमानी)व्यर्थ हो गयी है। इसके विपरीत मदरसों और स्कूल(पाकिस्तान और अन्य देशें के मामले में) में अन्य धर्मों के अनुयायियों को हेय दृष्टि से देखना सिखाया जाता है। हम में से कई दूसरे धर्म के मानने वालों के लिए नफरत का भाव पैदा कर चुके हैं। तथाकथित इस्लामी विद्वान हमें बताते हैं कि दूसरे धर्म के अनुयायी अहले किताब हो सकते हैं लेकिन वो फिर भी काफिर हैं। वो ये नहीं बताते कि दो विरोधाभासी बातें कैसे एक साथ प्रस्तुत करते हैं। कोई समुदाय किसी अन्य समुदाय के लिए नफरत रखे वो बहुसंस्कृति वाले और भूमंडलीकरण के इस युग में शांतिपूर्वक शायद ही रह सकता है।
यहां तक कि किसी देश में हम मुसलमान यदि बहुमत में हैं तो मानव निर्मित शरीअत कानून को दिव्य कानून बताकर जनता पर थोपना चाहते हैं। अब तो उन देशों में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं वहां भी वो शरीअत कानून द्वारा नियंत्रित होना चाहते हैं। भारत के अलावा कोई अन्य देश या समाज इसकी अनुमति देने के लिए तैयार नहीं है। ये अनावश्यक तनाव पैदा कर रहा है और कई समाज में इस्लामोफोबिया (इस्लाम के विरुध्द भय और नफरत) में वृध्दि कर रहा है।
अध्यक्ष महोदया,
इस्लामोफोबिया शब्द का प्रयोग जब पहली बार किया गया तो सिविल सोसासइटी में हम जैसे कई लोगों ने इसे अतिश्योक्ति माना, लेकिन ऐसा नहीं था। इस्लामोफोबिया उससे भी अधिक खतरनाक है क्योंकि ये इस्लामोफोबिया की एक लहर को बढ़ावा दे रहा है, जो यूरोप के कई देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा पैदा कर रहा है।
विश्व समुदाय को इस खतरे से तत्काल लड़ने के लिए रणनीति पर काम करने के लिए ये बाध्य करता है, और ये मुस्लिम समुदाय में उदारवादी तत्वों को इस्लाम के भीतर वैचारिक संघर्ष को गंभीरता से लेने को जरूरी बनाता है। हमें पैगम्बर मोहम्मद के आखरी उपदेश को याद दिलाने की ज़रूरत है जिसमें उन्होंने कहा था कि :
“पूरी मानव जाति आदम और हव्वा की संतान हैं।एक अरबी को किसी गैरअरबी पर कोई श्रेष्ठता नहीं है और किसी गैरअरबी को किसी अरबी पर कोई श्रेष्ठता नहीं है। न किसी गोरे को किसी काले पर कोई श्रेष्ठता है और न ही किसी काले को किसी गोरे पर कोई श्रेष्ठता है, सिवाय धर्मपरायणता और अच्छे कर्म के। इसलिए अपने साथ किसी प्रकार का अन्याय न करो। याद रखो एक दिन सबको अल्लाह से मिलना है और तुम्हें अपने कर्मों का जवाब देना है। इसलिए होशियार रहो और मेरे जाने के बाद धर्म के रास्ते से मत हटना।“
जैसा कि कोई भी समझ सकता है कि पैगम्बर मोहम्मद ने ये नहीं कहा कि एक मुसलमान को किसी गैरमुसलमान पर श्रेष्ठता है। उनके समीप श्रेष्ठता केवल धर्मपरायणता और अच्छे कर्म थे। बस यही सब कुछ है। हमें इसे याद रखना चाहिए और इस्लामी सर्वश्रेष्ठतावाद के हानिकारक विचारधारा की बढ़ती शक्ति के विरुध्द खड़े हो जाना चाहिए। इस्लामी सर्वश्रेष्ठतावाद और इस्लामी फासीवाद हमको बहु संस्कृति वाले और भूमंडलीकृत विश्व में हमें शांति के साथ रहने के योग्य नहीं रखता है, जो कि हम मुख्यधारा के मुसलमान हमेशा से रहे हैं।
(अनुवादक-समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)
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