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सहाबा हों या ताबईन व तबा ताबईन, सूफिया हों या मशाइख सभी अल्लाह वालों ने सीरत रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हुस्ने अख़लाक़, इखलास व नरमी और नेक किरदार व अमल की खुबसूरत शिक्षाएं प्राप्त की थी यही कारण है कि वह इन शिक्षाओं पर अमल करके भारतीयों के दिलों को जीतने में सफल हुएl

 

मदनी, आज़ाद, मौदूदी और उनके अखलाफ थोड़े मतभेद के साथ एक ही तरह के इस्लामी सिद्धांतों के हामिल हैंl इसमें आश्चर्य की इस लिए कोई बात नहीं है क्योंकि इन सभी को एक ही प्रकार के पारम्परिक मदरसों की शिक्षा प्राप्त हुई हैl

 

जितना संभव हो लोगों के दिलों को आराम पहुँचाओ क्योंकि मुसलमान का दिल वास्तव में खुदा के ज़हूर का मकाम है, कीमत के बाज़ार में कोई सामान इतना मकबूल नहीं होगा जितना दिलों को आराम पहुंचाना मकबूल हैl

 

अल्लामा इकबाल अहमदिया जमात की तफरका बाज़ प्रकृति और साम्राज्यवादी परियोजना के कारण इस पर अपना भरोसा एक दशक पहले ही खो चुके थे, और अलीगढ़ के छात्र इस्लाम के कुरआनी मॉडल के प्रचार प्रसार के लिए काफी “दुनियादार” ज़ाहिर हुएl

 

कुरआन अक्सर अपनी आयतों में (सलात, ज़कात, मलाइका, जन्नत और दीन) जैसे कीवर्ड का प्रयोग एक महत्वपूर्ण संदेश देने के लिए करता हैl अगर इन शब्दों के प्रमाणिक अर्थ स्वतंत्र रूप से तलाश कर लिए जाएं तो हमें कुरआन ए मजीद के असल अर्थ को समझने के लिए हदीसों या शाने नुज़ूल पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं होगीl

 

आज जिस ईसाइयत पर अमल किया जा रहा है यह वह ईसाइयत नहीं है जिसके लिए अल नासरह के हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जान लगा दी थीl

 

प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास पर आधारित आज जिस रूप में इस्लाम हमारे सामने मौजूद है है इसे अल्लामा इकबाल ने ‘अजमी इस्लाम’ और सर सैयद अहमद खान ने ‘इख्तेराई इस्लाम’ और जमालुद्दीन अफगानी ने, ‘जबरी इस्लाम’ कहा हैl

 

इसी तरह, यह कहना कि नमाज के कारण किसी तरह का शोर-शराबा होता है या आसपास रहने वाले लोगों को कोई परेशानी होती है, भी गलत है।

 

हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने हुर बिन अब्दुर्रहमान को स्पेन का गवर्नर नियुक्त किया थाl उन्हीं के शासन काल में मुस्लिम सेनाएं दक्षिण फरसा तक प्रवेश कर चुकी थींl वह अरबी भाषा में महत्वपूर्ण घटनाओं पर आधारित एक पत्रिका लिखा करते थेl

 

प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास की तीसरी रिवायत मूसवी, खादिम जादा, फ़ातमी, कुरात्मी, इमदादी, हमीदुद्दीन, मोंटगमरी और दुसरों की तसनीफ़ात पर आधारित डाक्टर अहमद के रिव्यु (review) से लिया गया हैl

 

मूलतः इस्लाम एक अल्लाह, एक नबी और एक किताब की शिक्षा देता हैl हदीसों ने ना केवल यह कि कुरआन के बारे में संदेह पैदा किये बल्कि कई लोगों को ‘नबूवत’ का दावा करने की भी हौसला अफज़ाई कीl...

 

किसी भी प्रजातांत्रिक समाज के स्वस्थ होने का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह है कि उसमें अल्पसंख्यक स्वयं को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं।…….

धार्मिक खानों की पुस्तकें देखने के बीच मेरी नज़र अज्ञात लेखक, लेसी हेज़िलटन की एक पुस्तक पर पड़ीl यह किताब लेखक के अपने कट्टरता के साथ वही सामान्य मवाद पर आधारित थी…….

 

वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह राममंदिर विवाद को हल करने के प्रयासों से लंबे जुड़ाव के लिए भी जाने जाते रहे हैं। हाल ही में आई उनकी पुस्तक ‘अयोध्याः रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का सच’ खासी चर्चित हो रही है।

 

इस्लाम एक सादा और प्रेक्टिकल धर्म थाl लेकिन दुर्भाग्यवश यह दीन भी उसी प्रकार की चुनौतियों का शिकार हो कर रह गया है जिनका शिकार अक्सर दोसरे धर्म होते रहे हैंl इस्लाम धर्म के हवाले से इस बेचैनी का बुनियादी कारण यह है कि प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहास किस रूप में और किस प्रकार हमारे सामने पेश किया गया हैl

कुदरत व ताक़त  नहीं होने की वजह से अगर इंसान बदला ना ले सकता हो तो यह अफो (क्षमा करना) नहीं होगा बल्कि इसे असमर्थता का नाम दिया जाएगाl अफो तो तब होगा जब कोई व्यक्ति समर्थता व शक्ति रखने के बावजूद किसी को माफ़ कर देl

 

दरअसल जब हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में अत्यधिक तलाक़ और तलाक़ देने में जल्दबाज़ी के कारण स्थिति गंभीर हो गई तो अत्यधिक हलाला की घटनाएं पेश आने लगींl किसी ने किसी को जल्दबाज़ी में तलाक़ ए मुगल्लाज़ा देदी फिर पछतावा हुआ तो अपने किसी दोस्त या सगे भाई से अपनी तलाक़ शुदा बीवी का निकाह इस नीयत या इस शर्त के साथ करा दिया कि एक दो रातें गुज़ारने के बाद वह उसको तलाक़ दे कर उसके लिए हलाल कर देl यह कुरआन की रूह के बिलकुल विपरीत थाl इस पर हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सख्त अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए फरमाया कि ऐसा करने वाले और करवाने वाले दोनों पर खुदा की लानत हैl

 

आतंकवाद और अतिवाद ने जब से धर्म और नस्ल का लिबादा ओढ़ा है तब से कई धर्मों और नस्लों के जोशीले और जज़्बाती लोग इसके साए में फंस चुके हैंl हमारे देश में खालिस्तान के हामी सिखों, अलग तमिल राज्य की स्थापना चाहने वाले श्रीलंकाई तमिलों, गुमराह मुसलामानों और हिन्दुओं के दहशतगर्द समूहों ने कई बार इस सरजमीन को खून से लाल किया हैl

 

किताबों पर प्रतिबन्ध की मांग और पाकिस्तानी क्रिकेट टीम और वहां के गायकों का विरोध भारत में आम हैं. सैटेनिक वर्सेज को प्रतिबंधित किया गया, मुंबई में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच न होने देने के लिए वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद दी गयी और मुंबई में गुलाम अली के ग़ज़ल गायन कार्यक्रम को बाधित किया गया. हाल में, इस तरह की असहिष्णुता में तेजी से वृद्धि हुई है. और अब तो हमारे देश के कलाकारों का भी विरोध होने लगा है.

जिन्होंने यह और इन जैसे प्रश्न रखने के लिए मुझे कॉल किये, मैं उन लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि न्यू एज इस्लाम अपने दृष्टिकोण पर कायम है, हालांकि हम अपने स्तम्भकारों को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैंl जो पैराग्राफ कुछ पाठकों को नागवार गुज़रा मैं इसके बारे में यह कहना चाहता हूँ कि इसमें जनाब गुलाम रसूल देहलवी ने जिन विचारों को व्यक्त किया है मुझे नहीं लगता कि वह इन विचारों के हामिल हैंl उन्होंने इस पैराग्राफ की शुरुआत “कुछ लोग यह कह सकते हैं” वाक्य से की हैl संभव है कि कहा जाए कि इस “कुछ लोग” में वह भी शामिल हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा कहना दुरुस्त होगाl इस पुरे लेख का गुफ्तगू का अंदाज़ और संदर्भ एक और ही दृष्टिकोण पेश करता हैl जहां तक मैं समझता हूँ गुलाम रसूल देहलवी अपने इस पैराग्राफ में केवल इस बात पर चिंता का इज़हार कर रहे हैं कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस्लामी रियासत मदीना के अपने पिछले सिद्धांत पर प्रतिबद्ध रहेंगे या बाद की उन नीतियों पर अमल करेंगे जिन्होंने इस्लाम के फुकहा और पाकिस्तान के आतंकवादी सिद्धांत निर्माताओं की नज़रों में पिछली नीतियों को मंसूख कर दिया हैl वह अपने इस पैराग्राफ में केवल यह वर्णन मांगते हुए दिखाई दे रहे हैं कि इमरान खान किस मदीना मॉडल की पैरवी करेंगे; मिसाक ए मदीना पर आधारित प्रारम्भिक मदीना मॉडल की जिसमें बहुसांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा प्राप्त था या उस जमाने की नीतियों कि जिसमें “मदीना की इस्लामी रियासत की एक आक्रामक तस्वीर हमें देखने को मिलती है जिसमें गज्वात, तौहीन ए रिसालत का कानून, यहूदियों और ईसाईयों का रियासत से निकाला जाना और “لا اکراہ فی الدین” जैसे कुरआन के शांतिपूर्ण आयतों का मंसूख किया जाना भी पाया जाता हैl”

 

ईद मीलादुन्नबी सल्लाल्लाहु अलैहि वसल्लम के मौके पर हम नात पाक के जो कैसेट बजाते हैं उनमें नातों के बीच भड़काऊ नारे भी होते हैं जो साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह  का मज़हर होते हैंl हम जिस समाज में रहते हैंl उसमें गैर मुस्लिम बहुमत में हैं और वह हमारी हर बात पर नज़र रखते हैंl इस प्रकार के नारे साम्प्रदायिक मतभेद को हवा देते हैं और गैर मुस्लिमों में भी नकारात्मक प्रतिक्रिया का कारण बनते हैंl यह कैसेट किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा हैंl इसलिए मुसलामानों की धार्मिक और कौमी संगठन इस प्रकार के कैसेट का नोटिस लें और मुसलमानों को ऐसे कैसेट बजाने से रोकें जो सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले हैंl नातिया कैसेट में भड़काऊ नारे दाख़िल करने के पीछे कौन लोग हैं यह पता लगाना आवश्यक हैl

 

मीलादुन्नबी की आमद आमद है रबीउल अव्वल का महीना अपने नाम के अनुरूप हर पल हर ओर खुशियाँ और बहार बरसाए हुए है और क्यों ना हो जबकि जाने बहार तशरीफ ला रहे हैं क्योंकि बहार का वजूद भी सरकार के जहूर का मोहताज था जैसा की अल्लाह पाक ने स्वयं हुजुर को संबोधित कर के फरमाया ऐ महबूब “لو لاک لما خلقت الافلاک و الارضین”इसलिए जब जमीन और आसमान ही नहीं होते तो खिजां और बहार, सूरज और चाँद, बिजली और फल और दुसरे मौजुदात कहाँ होतेl

 

बिलकुल यही मफहूम उस एतेहासिक तथ्य से भी निकाला जा सकता है कि मक्का विजय के बाद जब मुसलामानों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई और उनके लिए जान व माल की सुरक्षा निश्चित हो गई तो हिजरत का आदेश मंसूख कर दिया गया, जैसा कि उपर्युक्त हदीस से स्पष्ट है जिसका मफहूम यह है कि मक्का विजय के बाद हिजरत का कोई हुक्म बाकी नहीं रहाl इसलिए, अब किसी भी अतिवादी धार्मिक लीडर या किसी इस्कॉलर को यह अनुमति नहीं कि वह मुसलामानों को भारत से किसी और देश की तरफ हिजरत की दावत दें, और इसकी वजह स्पष्ट है कि भारत मुसलामानों को धर्म की स्वतन्त्रता और जान व माल की सुरक्षा प्रदान करता हैl

दत्त हुसैनी ब्राह्मण, हिन्दू ब्राह्मणों का एक ऐसा वर्ग है जिसने हज़रत हुसैन रज़ीअल्लाहु अन्हु के साथ अपनी मुहब्बत और अकीदत का प्रमाण कर्बला के मैदान में दिया और हुसैन रज़ीअल्लाहु अन्हु के शहादत के बाद यज़ीद के विरुद्ध अभियानों में भाग लिया और यज़ीदियों को अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण किरदार अदा किया मगर उनकी बलिदानों को इस काबिल नहीं समझा गया कि उन्हें इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएl एक दत्त हुसैनी ब्राह्मण रेहाब दत्त ने अपने सात बेटों को कर्बला में कुर्बान कर दिया और हुसैन रज़ीअल्लाहु अन्हु के शहादत के बाद मुख्तार सकफ़ी के साथ यज़ीदियों के खात्मे में भाग लियाl

 

कुरआन की यह आयत मुसलामानों को दुसरे खुदाओं के बारे में बुरा भला कहने से रोकती है, कि कहीं ऐसा ना हो कि इसके बदले में उनके मानने वाले तुम्हारे खुदा को गालियाँ देंl यहाँ रुक कर हमें इस बात पर गौर करना चाहिए विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच जो फसाद और क़त्ल व गारत गरी के घटनाएं घटित हुईं हैं उनमें से अक्सर की वजह यह रही है कि उन्होंने एक दुसरे के खुदाओं को और उनकी सम्मानित हस्तियों को बुरा भला कहाl निश्चित रूप से अनगिनत फसाद और मुठभेड़ की वजह यही रही हैl

 
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