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यह रमजानुल मुबारक का पाक महीना है जिसमें अपने गुनाहों की मगफिरत और अपने रब को राज़ी करने के लिए गरीबों, मोहताजों कू जरूरियात पूरी की जाए और खुद भी उनको खाना खिलाएं और अपने करीबियों को भी नेक अमल करने की ताकीद करेंl

Roza and Health रोज़ा और सेहत
Muhammad Ansar Usmani, New Age Islam

जो लोग बिस्यार खोरी की लत में लिप्त होते हैं उनके रमज़ान में रोज़ा रखने से जिस्मानी साख्त में बेहतरी के आसार नमूदार होते हैंl अल्लाह पाक का बहोत बड़ा एहसान है कि उसने हम मुसलमानों पर रोज़े रखने फर्ज़ किये हैंl.........

 

रमजान उल मुबारक में अहल ए ईमान के रिजक को कुशादा कर दिया जाता हैl यह चूँकि कुरआन की नुज़ूल का महीना है इसलिए कुरआन की बरकत से जिंदगियों में ईमान व यकीन की रौशनियाँ पैदा होती हैंl हर जगह अमन व भाई चारे की फिज़ा बन जाती हैl

 

रोज़ा एक दिनी फरीज़ा और अफज़ल इबादत है जिसके लिए बड़े सवाब का वादा अल्लाह ने किया हैl कुरआन में रोज़े की ताकीद की गई और हदीसों में भी रोज़े की बहोत ताकीद की गई हैl कुरआन में रोजों के सम्बन्ध में कहा गया है कि पिछली सभी उम्मतों पर रोज़ा फर्ज़ किया गयाl........

 

एक प्रश्न बार बार पूछा जाता है कि क्या अत्यधिक क्रोध की हालात में तलाक हो जाती है या नहीं? फुकहा इस प्रश्न का उत्तर तकय्यिद के साथ देते हैं कि गुस्से की वह हालत जो हद जूनून तक पहुँच जाए इस हालत में तलाक स्थित नहीं होतीl

 

कुरआन इंसानों को खुदा की अजमतों का ज़िक्र करते हुए यह बिंदु भी बयान करता है कि खुदा की अजमतों का एतेराफ ना केवल जानवर करते हैं बज़ाहिर गैर जानदार चीजें भी करती हैं क्योंकि उनको खुदा की हिकमत और ताक़त का अंदाजा हैl यह ज़मीन और आसमान, पेड़, पहाड़, चाँद, सूरज और कीड़े मकोड़े यहाँ तक कि साए भी खुदा को सजदा करते हैंl

 

श्रीलंका में आतंकी हमले के बाद भारत में बुर्के पर प्रतिबंध लगाये जाने की मांग की जा रही है. शिवसेना के मुखपत्र सामना  का सम्पादकीय पूछता है कि रावण की लंका में बुर्के पर प्रतिबन्ध लग गया है, राम की अयोध्या में कब लगेगा…..

 

आतंकवादी संगठनों पर वतन का मफहूम इसलिए स्पष्ट ना हो सका क्योंकि कुरआन की समझ के सहीह स्रोतों का उन्होंने प्रयोग नहीं किया, देश प्रेम के इशारे कुरआन ए पाक और मुफ़स्सेरीन के कलाम में मौजूद हैंl इमाम राज़ी, मुल्ला अली कारी और दोसरे अनेकों उलेमा व मुफ़स्सेरीन के यहाँ इसको देखा जा सकता हैl

 

भारत में मुफ़्ती ए आज़म का खिताब उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसे इस्लामी मामलों में फतवा या प्रमाणिक कानूनी राय देने का विकल्प प्राप्त होl लेकिन क़ाज़ी अल कज़ाह की इस ताज़ा नियुक्ति पर एक गहरी नज़र डालने से बरेलवी मसलक के उलेमा के वर्ग में आपसी प्रतियोगिता और मतभेद व फूट का पता चलता हैl........

 

हज़रत इबराहीम अलैहिस्सलाम को यहूदी और नसरानी अपने फिरके का इमाम बताते हैं जबकि कुरआन कहता है कि वह ना तो यहूदी थे औए ना ही नसरानीl इबराहीम की की औलादें और उनकी उम्मत में से जो लोग खुदा की वहदत पर ईमान लाए उनहें मुसलमान कहा गयाl

ख्वारिज के यहाँ भी पहला मसला हाकिमियत का था और आज भी शिद्दत पसंद जमातों का सबसे महत्वपूर्ण मसला यही है (५) ख्वारिज जिस तरह की दलीलों से मान सकते थे उन्हीं को उनके सामने पेश किया ऐसा नहीं था कि उन्होंने ख्वारिज को हार देने के लिए कोई नया मनहज या हदीस के इनकार का सहारा लियाl.........

 

दुनिया का पहला प्रिंटेड कुरआन १५३७ में इटली के शहर वेनिस के एक प्रिंटिंग प्रेस में छापा गयाl दोसरा कुरआन १६९४ हेम्बर्ग जर्मनी और तीसरा कुरआन रूस में छापा गयाl यह वह समय था जब मुस्लिम दुनिया में किसी प्रकार का प्रिंटिंग प्रेस लगाना या कोई प्रिंटेड किताब रखना हराम और बड़ा अपराध थाl

 

जिस प्रकार कुरआन ने नमाज़ और ज़कात को बराबर रूप से आवश्यक करार दिया है उसी प्रकार कुरआन ने कई मौकों पर मोहताजों को खिलाने की भी ताकीद की हैl इससे यह तास्सुर मिलता है कि मोहताजों को खिलाना भी मोमिन का एक फरीज़ा है और उसके लिए बहोत सवाब का वादा किया गया हैl मोहताजों को खिलाने वाला आसानी से जन्नत में जाएगाl........

 

हम मुसलमान कुरआन और सुन्नत पर ईमान रखते हैं लेकिन अफ़सोस की बात है कि हम में से बहुत सारे लोग इनकी शिक्षाओं पर अमल नहीं करतेl ऐसे भी कुछ मुसलमान हैं जो इस्लाम का प्रयोग केवल अपने राजनीतिक हितों के लिए करते हैं और परिणामस्वरूप इस्लाम की ज़िल्लत व रुसवाई का कारण बन जाते हैंl....

 

“ऐ ईमानदारों आपनी खैरात को एहसान जताने और (सायल को) ईज़ा (तकलीफ) देने की वजह से उस शख्स की तरह अकारत मत करो जो अपना माल महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते ख़र्च करता है और ख़ुदा और रोजे आखेरत पर ईमान नहीं रखता तो उसकी खैरात की मिसाल उस चिकनी चट्टान की सी हैl……..

 

सूफियाना तफसीर से मुराद है तसव्वुफ़ वालों का प्राप्त किये हुए इशारों की सहायता से कुरआन ए करीम की ऐसी तफसीर करना जो उसके ज़ाहिरी मफहूम के खिलाफ तो हो मगर उसके ज़ाहिरी और बातिनी मफहूम में जमा व तत्बीक संभव होl

 

इस्लाम वालों और चारों खलीफाओं ने बाद अहदी नहीं कीl मगर आज का दौर ऐसा हो गया है कि एक देश अपने फायदे के लिए अहद ही नहीं तोड़ता बल्कि दोसरे पर अत्याचार भी करता हैl एक व्यक्ति कुछ कहता है और दोसरा कुछ, पल पल में अपना बयान बदलते हैं मगर इस्लाम इस बात की शिक्षा देता हैl........

 

क्या उलेमा ए इस्लाम को इस्लामी किताबों की गलत ताबीर व तशरीह से पैदा होने वाले आधुनिक बुनियाद परस्त बयानिये को पराजित करने के लिए इस्लाम के रूहानी संदेश को आम करने की आवश्यकता नहीं है? क्या हमारा केवल आतंकवाद विरोधी फतवे जारी कर देना ही पर्याप्त है, जबकि ‘जिहादी अतिवादी’ अपना प्रोपेगेंडा बार बार जारी करते हैं और हर बार इसके लिए मामूली परिवर्तनों के साथ नई नई चालें चलते हैं?

 

ऐसा बताया जा रहा है कि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान की धरती पर स्थित आतंकी कैम्पों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर दिया है और बड़ी संख्या में आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया है (26 फरवरी 2019)। यह हमला कश्मीर के पुलवामा में हुए भयावह आतंकी हमले के बाद किया गया जिसमें 44 सीआरपीएफ जवान मारे गए।

 

स्वामी असीमानंद पक्के संघी हैं और गुजरात के डांग जिले में, वनवासी कल्याण आश्रम के लिए काम करते थे. उन्होंने डांग में शबरी कुम्भ के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. उनका नाम कई बम धमाकों के सन्दर्भ में सामने आया था, जिनमें मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह और समझौता एक्सप्रेस धमाके शामिल थे……..

 

जब तक वास्तविक रूप से उदारवादी मुस्लिम उलेमा इस्लाम और राज्य के बारे में सफलता के साथ इन धार्मिक सिद्धांतों पर प्रश्न करने के लायक नहीं हो जाते और एक आधुनिक, बहुलतावादी और शांतिपूर्ण इस्लामी दृष्टिकोण स्थापित नहीं कर लेते तब तक इन तत्वों को बढ़ावा प्राप्त करने और फलने फूलने के लिए छोड़ देना एक मुर्खता होगीl वह विश्व शान्ति के लिए ख़तरा रह चुके हैं और भविष्य में बड़े पैमाने पर विश्विक शान्ति को हानि पहुंचा सकते हैंl जैसा कि मैं इससे पहले भी कह चुका हूँ कि उदारवादी उलेमा को और अधिक समय और गुंजाइश प्रदान करने में पूरी दुनिया को एक जुट होना चाहिए ताकि वह इस अलगाववाद और हिंसा पर आधारित इस्लामी फिकह का आत्मनिरीक्षण और रद्द कर सकें और उसकी जगह शान्ति और बहुलतावाद पर आधारित एक नया फिकही सिद्धांत कायम कर सकेंl

 

न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में 15 मार्च 2019 को हुए भीषण नरसंहार ने दुनिया को दहला दिया है. हत्यारा ब्रेंटन हैरिसन टेरेंट, ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है. दो मस्जिदों पर हुए इस हमले में करीब 50 लोग मारे गए, जिनमें से नौ भारतीय मूल के थे.........

 

इस्लामी शरीअत की इस्तेलाह में तकवा का अर्थ हराम कामों से परहेज़ करते हुए नफ्स को गुनाहों से सुरक्षित रखना हैl हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहु अन्हुमा) ने कहा कि मुत्तकी वह है जो शिर्क, बड़े गुनाह और बुरी बातों से स्वयं को सुरक्षित रखेl

 

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब मदीना हिजरत किया तो उसके बाद मुसलमानों को ना केवल धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई बल्कि उन्होंने मुसलमानों, यहूदियों, मुनाफ़िकों और काफिरों सहित मदीने के सभी बिरादरियों के हक़ में आज़ादी और संरक्षण को वास्तविक बनायाl हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मीसाक ए मदीना भी स्थापित कियाl

 

यह उस लेखन श्रृंखला की दोसरी कड़ी है जिसमें कुरआन में मानवीय मूल्यों और अच्छे आचरण का उल्लेख किया गया हैl..........

 
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